शोध : नीलेश रघुवंशी की कविता का जनतंत्र / कार्तिक राय - अपनी माटी

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रविवार, अगस्त 01, 2021

शोध : नीलेश रघुवंशी की कविता का जनतंत्र / कार्तिक राय

 नीलेश रघुवंशी की कविता का जनतंत्र / कार्तिक राय



शोध-सार  

       नीलेश रघुवंशी समकालीन हिंदी स्त्री-कविता की परंपरा में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। भारतीय आमजन के जीवन की परत-दर-परत पड़ताल करती हुई कवयित्री उन सभी घटनाओं, परिवेश एवं मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखती हैं जिनसे आमजन पल-पल गुजर रहा है। इस परिवेश में एक आम लड़की के सपनों, उसकी उम्मीदों और उसके अंतर्द्वंद्व को कवयित्री ने मुखरता से अभिव्यक्त किया है। स्त्री संबंधी धार्मिक-सामाजिक-लौकिक आदि प्रक्षिप्त चिंतन व अर्गलाओं पर कवयित्री का रुख बेजोड़ है। लोकतंत्र की निरंतर घटती साख, कमजोर पड़ती क्रांतिधर्मी चेतना और तानाशाही शक्तियों का उभार आदि अनेक चुनौतियों पर कवयित्री की चिंता जायज ठहरती है। सामाजिक-राजनीतिक जड़ता व भ्रष्टनीति को कवयित्री ने अपने स्थानीय बोध से एक नया कैनन दिया है। किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, हाट-बाजार में श्रमरत महिला श्रमिक आदि की अंतर्कथाओं को कविता का रूप देते हुए कवयित्री ने अपने समय के युवा मन को स्वर दिया है। इक्कीसवीं सदी में बढ़ते आतंक, बर्बरता और धार्मिक उन्माद के दौर में लोकतंत्र की खूबसूरती को बचाना ही नीलेश के काव्य मानस का अभिधेय है। नीलेश की कविता नागरिक बोध की कविता है। उनकी कविताओं की आमफहम भाषा समकालीन हिंदी कविता को एक रोचक पाठ से जोड़ती है।    

 

बीज-शब्द : निम्न मध्यवर्गीय समाज, नयी चेतना, स्त्री-अनुभव, चर्चा-ए-आम, संवादात्मक, आमजन, स्त्री-मन, जनपद, प्रेम, साहसिकता, सार्वजनीनता, भ्रष्टनीति, पारिवारिकता, आत्मलोचन, समायोजन, मेलोड्रामा, इक्कीसवीं सदी, दुर्बोधता, तानाशाही, जनतांत्रिक परिवेश, सृजनात्मक पहचान।

          

मूल आलेख

नीलेश रघुवंशी की कविता समकालीन दौर की एक सशक्त आवाज़ है। उनकी कविता का मूल प्रतिपाद्य ही छल से मुक्ति की चाह  है। मुक्ति के केंद्र में हैं- साधारण घर की लड़की, गरीबी की मार झेल रही शहरी-कस्बाई आम जनता और उनके सपने! उनकी काव्य यात्रा का आरंभ और उत्स दोनों ही बड़े सरल, सहज और सामान्य सी लगने वाली अति साधारण घटनाएं हैं। लेकिन इसी साधारणता को असाधारण करती नीलेश की कविताएँ लड़की की दिनचर्या की कथा को उन्हीं के शाब्दिक परिवेश में कहती है। नीलेश की कविता निम्नमध्यवर्गीय घर-परिवार से पहली बार बाहर निकली लड़की की अनुभूत संघर्ष गाथा है।

         

निम्नवर्गीय तथा निम्नमध्यवर्गीय समाज की स्त्री की कर्मठता, दैनंदिनी, रोमांच, संत्रास तथा सपनों को नीलेश ने अपनी कविताओं में विशेष स्थान दिया है। सपने देखती लड़की के निराश मन को वह एक नयी चेतना से भर देना चाहती है। घर बसाने और दूसरों की ख्वाइश पूरी करते ज़िंदगी बिताती लड़की के स्वप्न को कवयित्री नयी तान और ऊर्जा से भर देना चाहती हैं-


“ओ मेरी बहन की तरह,

सत्रह साल की लड़की,

दौड़ते हुए क्यों नहीं निकल जाती मैदानों में ,

क्यों नहीं छेड़ती कोई तान,

तुम्हारे सपनों में क्यों नहीं है,

कोई उछाल!”1


कस्बाई जीवन और शिक्षा का अभाव स्त्री-जीवन को घर की दहलीज़ पर रोक देता है। पारिवारिक-सामाजिक सीख उसे सीमित दायरों में रहने एवं घर बसाने की हिदायतें देता, उसके मन-मस्तिष्क को पारंपरिक घरेलू स्त्री में परिवर्तित कर देता है।

 

          गौरतलब है कि विगत तीस-चालीस वर्षों में स्त्री-कविता ने अपना स्वरूप निर्मित करते हुए स्त्री-अनुभव के प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक वर्ग तथा अनुभवों के प्रत्येक परतों को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया है। नीलेश इस फेहरिस्त में युवा कवयित्री होते हुए भी प्रौढ़ चिंतन की बानगी पेश करती हैं। समाज में प्रचलित औरतपन को कविता में चर्चा-ए-आम बनाने का उनका प्रयत्न अनोखा है। कवयित्री की आमफहम भाषा इस चर्चा-ए-आम को और भी रोचक बनाता है। पहली रुलाई तक डायरी की इक्कीस कविताएँ उनकी बेहद चर्चित कविताएँ हैं जो आधुनिक हिंदी कविता में पहली बार प्रसव, जन्म और मातृत्व को संवादात्मक रूप में प्रामाणिकता से अभिव्यक्त करता है। इन कविताओं में स्त्री-जीवन-बोध के साथ ही उस पूरी मानसिक-शारीरिक परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रामाणिक संवाद है जो किसी भी पाठक को एक नये लोक में ले जाती है और स्त्री-मन को समझने की वास्तविक कुंजी दे जाती है-


“एकदम से शक्ल ही बदलती जा रही है मेरी,

बहुत शर्म आती है, कहीं भी आने-जाने में,

मोटी अम्मा बनाकर रख दिया तुमने तो,

कितना आसान है कहना- 

जनम देना सृष्टि का सबसे सुखद कार्य है,

लेकिन कितना मुश्किल है जनम देना,

यह पीड़ा, यह कष्ट, तुम क्या जानो”2 


दूसरी ओर कवयित्री इस स्थिति में भी देश-विदेश की विभिन्न घटनाओं पर, मातृत्व एवं प्रसव संबंधी रहस्यों पर अपनी बेबाक राय रखती हैं- प्रसव-पीड़ा को कोई और नाम देना चाहिए

 

नीलेश रघुवंशी की कविताओं से उभरते बिम्ब एवं चित्र भारतीय समाज के तंगहाल सपनों और विकराल स्थितियों में भी जीवन के गान को बचाये रखने वाले सामान्य आमजन के चित्र हैं। कवयित्री का स्त्री-मन इस आमजन के आर्तभाव को सहजता से कविता का रूप देती हैं। इस आमजन के जीवन में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए इस आमजन में पारिवारिक सदस्य- माँ-पिता, भाई-बहन, बुआ-मौसी आदि के साथ किसान, दिहाड़ी-खेतिहर मजदूर, छोटे व्यवसायी, हाट-बाज़ार में खटती स्त्रियाँ, चौथे दरजे के नौकरीशुदा लोग आदि सभी कवयित्री की कविता के जद में है। आलोचक रेखा सेठी लिखती हैं : “नीलेश रघुवंशी की कविताओं का संसार हमारे सम्मुख स्त्री-कविता की एक नयी दुनिया उपस्थित करता है। उनकी कविताओं में स्त्री की जिस छवि से हमारा परिचय होता है वह उस लड़की की है जो शिक्षा से उपजे आत्म-विश्वास को लेकर दुनिया मुट्ठी में करने निकली है। वह अपने छोटे-छोटे सुख-दुख में सुखी और दुखी होती है, हैरान-परेशान भी लेकिन निराश कभी नहीं। अपनी सकारात्मक टोन में ये कविताएँ स्त्री-जीवन का एक नया सौंदर्यशास्त्र रच रही हैं कविताएं इसके साथ-साथ उनकी अधिकांश कविताओं का अंतर्पाठ सामाजिक वर्ग-विषमता को काव्य-विमर्श के केंद में स्थापित करता है कविताएँ।3

 

          नीलेश रघुवंशी की अब तक चार काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं : घर-निकासी’(1997), ‘पानी का स्वाद’(2004), ‘अंतिम पंक्ति में(2008) और खिड़की खुलने के बाद’(2017) । इन दो दशकों की काव्य यात्रा एक स्त्री की सामाजिक-राजनैतिक और आंतरिक अनुभवों के निरंतर परिवर्तन की यात्रा है। इस यात्रा में कवयित्री ने अपनी कविताओं में अपने परिवार, अपने जनपद के साथ ही उस आम जनसमूह की अंतर्चेतना को केन्द्रीकृत किया है जिनकी धूल-मिट्टी से कवयित्री का मानस निर्मित हुआ है। कवयित्री का जन्मस्थान गंजबासौदा तथा भोपाल शहर की दर्जनों अर्थ-छवियों से विन्यस्त उनकी कविताएँ कविता में स्थानीयता की महत्ता को रेखांकित करती है। लोकल इज़ ग्लोबल से महमह। सन 1997 ई. में प्रकाशित घर-निकासी कवयित्री का प्रथम संग्रह है। घर-निकासी की कविताएँ लोग है लागि कवित्त बनावत मोहि तो मेरे कवित्त बनावत की उक्ति को चरितार्थ करती एक नयी काव्यभाषा और कवि संवेदना को सामने लाती है। मूर्धन्य कवि मंगलेश डबराल इस संग्रह के विषय में लिखते हैं : “इस कविता-संग्रह की कविताएँ पढ़कर यह सुखद एहसास होता है कि हमारे आसपास, दैनिक जीवन के कार्यकलाप, उसके मामूली और सहज ब्यौरों में किस तरह कविता छिपी हुई है। एक बिलकुल नए कवि या कवयित्री से पहली उम्मीद शायद यही है की जा सकती है कि उसकी रचनाओं में अनुभवों को देखने, पहचानने, उनका चयन करने और उन्हें अभिव्यक्ति देने का एक नया, ताज़गीभरा और दूसरे कवियों से भिन्न कोई ढंग होगा। नीलेश की कविताएँ यथार्थ को देखने का ऐसा ही परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।”4 इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ कवयित्री के निजी अनुभव, परिवार के ताने-बाने और विस्थापन, भूख, संत्रास आदि के साथ प्रेम के उम्मीद की कविताएँ हैं-


मुझे प्रेम चाहिए,

घनघोर बारिश-सा।

कड़कती धूप में घनी छांव-सा,

ठिठुरते ठंड में अलाव-सा प्रेम चाहिए मुझे।... 

मुझे प्रेम चाहिए 

सारी दुनिया रहती हो जिसमें।”5

         


छल-कपट से भरी इस दुनिया में कवयित्री का प्रेम प्रकृति के करीब है। प्रकृति के सानिध्य में प्रेम की पूर्णता की कोशिश। नीलेश की अधिकांश प्रेम कविताओं में प्रकृति आलम्बन रूप में आती है। जब भी होती हूँ पेड़ों के करीब उसके बालों की खुशबू याद आती है, या देख न सकेंगे वे आँखें जो साथ देख हमें जलती थीं। हमारे आसपास हमारे दोस्त होंगे पेड़अथवा उसका होना पूरी पृथ्वी का साथ होना है और करती हूँ याद तुम्हें इस घनघोर बारिश में आदि दर्जनों उद्बोधनात्मक सूक्तियाँ हैं जो प्रेम के साहचर्य को प्रकृति के साथ पूरित करता है। प्रेम में प्राकृतिक सौन्दर्य व घटनाएँ – पेड़-पौधे, बारिश-आँधी, सूरज की लालिमा, चाँद की शीतलता आदि प्रिय के स्मरण को और भी उद्दीप्त करता है। हिंदी कविता में प्रेम को अभिव्यक्त करने वाले ये स्थायी उपमान के रूप में चित्रित हुए हैं। नीलेश की प्रेम संबंधी चिंतन भी इन कविताओं की तरह ही बेहद स्पष्ट और सीधी-सरल है। पेड़ों के करीब’, ‘तब भी’, ‘उसका होना’, ‘बारिश’, ‘एक दिन’, ‘उलटबाँसी’, ‘घनघोर आत्मीय क्षण आदि अद्भुत प्रेम कविताएँ हैं जो इस पागल समय को प्रेम की ऊर्जा से शिकस्त देती नज़र आती है। कल्पनीय रूमानियत से अलग विशुद्ध सांसारिक प्रेम जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को नयी ऊष्मा और नयी ताजगी से भर दें। मुझे प्रेम चाहिए कविता प्रेम की साहसिकता एवं सार्वजनीनता की व्याख्या करती है। कवयित्री प्रेम की छोटी और महीन परिभाषा के खिलाफ हैं। प्रेम व्यापक है, अनंत है; सभी परिभाषाओं से परे। सार्वभौम। अप्रमेय। आकाश जितना अनंत, धरती जितनी व्यापक। प्रेम की अर्थवत्ता को समझना जीवन के अर्थ को समझना है। नीलेश प्रेम के पंथ में छल-कपट अथवा रंजिश को फटकने भी नहीं देती क्योंकि सच्चे प्रेम की आत्मीयता इस ईर्ष्या भाव को नष्ट कर देता है।

 

          समाज और साहित्य के सामानांतर तीव्र गति से बदल रही मानवीय चेतना, स्वार्थलोलुपता, भ्रष्टनीति और आमजन की बदहाली को कवयित्री एक साथ कई स्तरों पर महसूस करती है। स्त्री के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह और परिवार-तंत्र के बदलते मूल्यों के दौर में नीलेश की कविता पारिवारिक सांद्रता को तथा उसकी सामूहिक भावना को बचाना चाहती है। उन्हें विश्वास है कि इस पारिवारिकता की सामूहिक भावना व्यक्ति के अन्तःकरण को प्रदीप्त करता है, उसे जीवन में संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। बावजूद इसके परिवार-तंत्र में स्त्री की भूमिका और उसकी समाजिकीकरण पर कवयित्री प्रश्न उठाने से पीछे नहीं हटती। तोड़-मरोड़कर’, ‘हंडा’, ‘घर से निकलना’, ‘बुआ का दुख’, ‘माँ’, ‘मलेरिया में बहन’, ‘संबोधन आदि कविताएँ परिवार-समाज में स्त्री की भूमिका पर आत्मालोचन के लिए एक नयी जमीन तैयार करती है। बेटे के जन्म पर हर्ष और बेटी के जन्म लेते ही विषाद की पुरुषवादी सामाजिक क्रूरता को कवयित्री ने संबोधन का रूप दिया है-


“एक स्त्री ने एक स्त्री को जन्म दिया,

स्त्री की स्त्री से नाल,

एक स्त्री ने काटी,

एक स्त्री ने,

स्त्री को ज़मीन में गाड़ दिया,

पितृसत्ता का कैसा भयानक कुचक्र कि,

स्त्री ने ही स्त्री का समूल नाश किया।”6 


 समाज के इस दारुण चित्र का जवाब ढूँढना मुश्किल है। यह कविता कवयित्री ने आंदोलनधर्मी आशा मिश्र के लिए लिखी हैं लेकिन कविता का भाव समाज में स्त्री के प्रति हिंसा और अमानवीयता को साफ-साफ दिखाता है। आज भी कन्याभ्रूण हत्या, बलात्कार तथा अन्य शारीरिक-मानसिक हिंसा स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक समाज के रवैये को दिखाता है।

 

          नीलेश अपनी कविताओं में पितृसत्ता के दंश को मुखरता से नहीं, मनुष्यता की ताप से बदलना चाहती है। इसका मुख्य कारण उनका परिवार एवं पिता के प्रति अतिरिक्त प्रेम है। समूची हिंदी कविता में पिता की अंतःसंवेदना गायब रही है। समकालीन कुछेक कवियों ने पिता को केंद्र रख अनेक कविताओं में पिता की अंतर्व्यथा को शब्दबद्ध किया है। नीलेश की परिवार केन्द्रित कविताओं में पिता का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण जान पड़ती है। पितृसत्ता के प्रतिनिधि पिता के प्रति प्रतिरोध के बजाय उनके तंगहाल परिस्थितियों का रूपान्तरण और पिता के प्रति बेटी की चाह-


ओ मेरे पिता,

क्या तुम कभी नहीं टहल पाओगे,

माँ के साथ सड़कों पर,

कभी नहीं पढ़ पाओगे क्या,

आरामकुर्सी पर बैठकर अख़बार।7


निःस्वार्थ त्याग और परिवार के प्रति पूर्णतः आत्मसमर्पित पिता कवयित्री के लिए संघर्ष की प्रेरणा है। आर्थिक तंगहाली वर्चस्ववादी प्रवृत्ति की धार को कुंद कर देता है। ढाबा : आठ कविताएँ’, ‘टेलीफोन पर पिता की आवाज’, ‘अभाव’, ‘बिना टिकट यात्रा करती लड़की’, ‘पिता की पीठ’, ‘यात्रा करते पिता और बुढ़ापे में पिता आदि कविताएँ परिवार की यथास्थिति के मध्य पिता के जीवन-संघर्ष का आर्तनाद है। पिता के प्रति प्रेम और दायित्व का यह भाव आगे चलकर कवयित्री की दृष्टि को और अधिक व्यापक रूप देती है। ग्यारह सदस्ययी (आठ बहनें, एक भाई और माता-पिता) परिवार की सामूहिकता और समायोजन नीलेश की सांसारिक दृष्टि को अधिक वयस्क और प्रौढ़ बनाती हैं।

 

          ट्रेन की रफ्तार की तेज़ी से बदल रहे समय को कवयित्री ने विभिन्न घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा है। शहरी हो या कस्बाई, किसान हो या मजदूर अथवा प्रेम में संलिप्त प्रेमी-प्रेमिकाएं आदि सबके जीवन में परिवर्तन की घटाटोप ने उसकी निजता, अर्थवत्ता और मधुरता को निरीहता में बादल दिया है। इस परिवर्तन को कवयित्री अपने चारों ओर महसूस करती है। किसानों की बदहाल स्थिति उन्हें कचोटती है, निरंतर रोजगार के लिए विस्थापित होते परिवार के जीवन का दंश उन्हें हतप्रभ करता है, हाशिये पर जीवन बसर कर रही घरेलू स्त्रियाँ, मज़दूरनी की जिजीविषा कवयित्री की आँखों को नए सपनों से भर देती है, फेशियल कराती आधुनिक स्त्रियों के चेहरे से झूठ को पकड़ती कवयित्री जीवन के अनबूझे सवालों से टकराती हैं। बाज़ार और सत्ता के इस चक्रव्यूह में इंसानी नस्ल एक उत्पाद, एक पण्यवस्तु बनकर रह गया है। नीलेश इस मशीनीकरण के शिकार आम-जनजीवन को उकेरती है। वे इस पागल समय को एक स्त्री-दृष्टि से देखती है। इस संसार में जीने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति इस घनघोर अमानवीयता को पहचाने और उसी के अनुकूल व्यवहार करें-


“इतना पतन और घोर अविश्वास,

धरती पर जनम लेगा,

जाना पहली बार,

पहली बार जाना,

दुनिया में आना है तो,

भीगे ख़रगोश कि तरह नहीं,

दहाड़ते हुए शेर की तरह आना होगा।”8

 

          नीलेश की कविता लगातार खंडित होते समाज में बढ़ती गैरबराबरी, अभाव और लोकतंत्रात्मक परिवेश में रोजगार और रोटी के लिए बिलख रहे किसान, मजदूर, यात्रारत राज्य-दर-राज्य बेरोजगार युवा, जनरल बोगी की ठसाठस भीड़ आदि को एक पहचान देना चाहती है। रोटी, कपड़ा, मकान और स्वास्थ्य-शिक्षा आदि की मूलभूत सुविधाओं से बेखबर यह जन केवल सरकारी आँकड़ों में ही साँसें लेती है। सरकार की कीमियागिरी और छल से अभ्यस्त यह समूह अब अपनी जुबान भी भूल चुका है। आपस में ही एक-दूसरे को मारते-पीटते, काम-धंधे के लिए लालायित धरती को अपनी धड़कने सुनाता जीवन लघुता को पार कर जाता है। जन-गण-मन को भी कोई दरकार नहीं इनसे! साक्षारता महज़ नोट पर छपे अंकों के मानिंद ही होती है। बेघर इस आमजन की कोई एक तस्वीर नहीं, कोई पहचान नहीं, सामूहिक अव्यवस्थित दिन-रात अपना ख़ून-पसीना बहाता भीड़ ही इनकी तस्वीर है।

 

          लोग कहते हैंकविता अर्थतन्त्र के इस छिटके हुए पहिये की वृत्ताकार पहचान को प्रकाश में लाती है। कवयित्री एक मेलोड्रामा की तरह श्रमशील आमजन के आम मुद्दों को बेखौफ़ रखती हैं-


“मजूर मजूरी के लिए रो रहे हैं पढ़े-लिखे नौकरी के लिए...

पानी बिजली नहीं है भैया अब तो अइसो लागत है,

हम औरें एक-दूसरे के सिर फोड़ दें जा पानी बिजली के चक्कर में,

सरकार से पान लगाने को कहोगे तो उसमें भी दस कमेटियाँ बैठा देगी।

मरते मर जाओगे तरस जाओगे लेकिन पान नहीं खा पाओगे,

... हम गरीब इंसान हैं हमारी कोई क्यों सुनेगा।

पीवे को पानी तक तो है नहीं और तुम शौचालय की बात करत हो,

पानी पानी बिजली बिजली,

सड़क सड़क रोजगार रोजगार,

मंडी में किसान लूट लूट लूट,

यही है तस्वीर हर जिले की।”9



हर जिले ही नहीं यह भारत की सम्पूर्ण श्रमशील आम जनता की तस्वीर है। सरकार तथा व्यवस्था की लाचारी ही इन्हें भूख से मारती हैं, आत्महत्या के लिए मजबूर करती है। पूरी कविता कैमरे की निगरानी में चलती है लेकिन बाइट जीवन की आभा को मोहक बना देता है। कैमरे के भीतर का यह गतिशील चलचित्र जीवन की रुग्णता की पूरी विभीषिका को प्रस्तुत करती है। हत्यारे’, ‘एकबार फिर अकाल’, ‘खिड़की खुलने के बाद’, ‘विरक्ति’, ‘तीस मिनट बाद’, ‘भूख का चक्र’, ‘मुहावरा’, ‘जनरल बोगी’, ‘मल्लाह का शोकगीत आदि कविताएँ नीलेश रघुवंशी के कवि-व्यक्तित्व का ऐसा रूप है जो उन्हें हिंदी की प्रगतिशील कवियों की परंपरा में जनता का कवि साबित करता है। लोकतन्त्र के अंतिम पायदान पर खड़ी इस आमजन की विरक्ति को कवयित्री ने नया मुहावरादिया है- 


“किसान को बाइट देनी नहीं आती अभी,

और गेहूँ तो बोलते ही नहीं हैं,

हम्माल दूर कहीं बीड़ी धौंकते पीठ सीधी कर रहे होंगे,

सोचो,

अगर बोलने दिया जाता किसान को तो क्या बोलता वह।”10 


         

कवयित्री ने लोक चेतना द्वारा वर्तमान राजनीति के गहरे सरोकारों को इन कविताओं में उजागर किया है। कवयित्री की राजनीतिक चेतना को इन कविताओं द्वारा समझा जा सकता है। नीलेश इन किसानों, मजदूरों तथा प्रतिदिन खटते आम जनता के सपनों को सुनती है। उनकी आँखों के कोर में बसे आस को जीवन के स्पंदन से भर देना चाहती है। जीवन के इन भाव बिंबों को नीलेश अपनी कविताओं में एक वृत्तांत का रूप देती है। कवि आलोचक परमानंद श्रीवास्तव नीलेश की काव्य सर्जना के संदर्भ में लिखते हैं “कविता अप्रत्याशित की खोज नहीं है—मामूलीपन के खटराग में औसतपन का प्रतिकार है। नीलेश गंजबासौदा की जनपदीय, कस्बाई चेतना से लबरेज लंबी कविताओं में वृत्तांत रचती हैं और भीतर-बाहर के सफ़रनामे को इस तरह संभव करती हैं कि देखना क्रिया, जानना क्रिया से अभिन्न है।”11 यह कस्बाई चेतना ही नीलेश की कविताई मिजाज को जमीन से जोड़े रखती है। इनके सपने भी गाड़ी, घोड़े या बहुमंजिला मकान की नहीं पेट भरने और सुखी रहने की होती है। फावड़ा चलाते मजदूर, सिंघारा बेचती स्त्री, कचहरी में लूटता-पिटता किसान और उसकी फसल, रोजगार के लिए दर-दर भटकते युवा, भ्रष्टाचार से जूझती आम जनता, भूख और आतंक के साये में पल रहा बचपन, झूठी देशभक्ति का स्वार्थी खेल और धार्मिक उन्माद के बीच रिसती मनुष्यता को कविता में बचाने की चेष्टा है नीलेश की कविताएँ ! भविष्य के प्रति आश्वस्ति के लिए वर्तमान से जूझना जरूरी है। इक्कीसवीं सदी की कई चुनौतियों को कवयित्री ने कविता का रूप दिया है।

 

          इक्कीसवीं सदी अर्थात नयी सदी में घातक हो चुकी मानवी सभ्यता विस्फोट, वैमनस्यता और बायो हथियार की सदी है। यहाँ मनुष्य ही दूसरे मनुष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मानव बम, जिहाद और रसायनिक वायरस इसके नए हथियार हैं। वर्चस्व और महाशक्ति बनने की लड़ाई प्रतिदिन सैकड़ों की जाने ले रही है। भय, आतंक और असुरक्षा आम जनता के स्थायी भाव हैं। धर्म-परंपरा-संस्कृति, क्षेत्र, भाषा, नस्ल की दीवारों ने नफरत और घृणा के नित नये रूप धारण कर लिए हैं। श्रेष्ठता की घृणा ग्रंथी, फर्जी देश प्रेम और तानाशाही का लोकतंत्रीकरण मानवीय समता के मूल्यों को नष्ट कर मनुष्य को अंधा, बहरा और वैचारिक रूप से विकलांग बना रहा है। इस नयी सदी में मध्यकालीनता बोध का उग्र और हिंसक रूप अपने चरम पर है। सूचना तथा तकनीकी इसे पल-पल ओवरडोज़ देता है। कवयित्री इस इक्कीसवीं सदी में बढ़ते युद्धोन्माद और उजड़ते संसार के भयानक चित्र को देख अविश्वास से भर उठती है। महाशक्ति बनने के दंभ में निरंतर बढ़ रहे परमाणु हथियारों का परीक्षण तथा एक पल में दुनिया को तबाह कर देने वाली मिसाइलें छोटे-छोटे देशों को लील रही है। मनुष्य इस मशीनीकरण बनाम आतंक का एक पुरजा बनकर रह गया है। इस नई सदी ने कवयित्री की चेतना को झकझोर दिया है-


“आतंक और बर्बरता से शुरू हुई नई सदी,

धार्मिक उन्माद और बर्बर हमले बने पहचान इक्कीसवीं सदी के,

बदा था इक्कीसवीं सदी की किस्मत में,

मरते जाना हर दिन बेगुनाह लोगों का,

हज़ार बरसों पीछे ढकेलने का षड्यंत्र!

आखिर किया किसने?”12

 

          इक्कीसवीं सदी का यह रूप, यह प्रश्न बढ़ती असुरक्षा भाव ने सम्पूर्ण मनुष्य जाति को ही संदेह और दुर्बोधता के घेरे में ला खड़ा किया है। सत्ता का चरित्र इस व्यवस्था को और भी भयावह रूप में प्रसारित कर रहा है। जनतंत्र के इस भयावह तानाशाही दौर में भी कवयित्री सुंदर भविष्य के स्वप्न को देखना नहीं भूलती! कवयित्री इस बहरी हो चुकी व्यवस्था के खिलाफ एक जबरदस्त हुंकार भरना चाहती हैं, इस बर्बरता के खिलाफ बढ़-चढ़कर लिखना-बोलना चाहती हैं। दो हिस्से’, ‘चिड़ियाँ की आँख से’, ‘मेरा देश’, ‘शोर’, ‘तीसरा एस. एम. एस.’, ‘हिकारत’, ‘लोकतन्त्र का तानशाह’, ‘साँकल’, ‘जल से भरी खुशी’, ‘जल से भरी अपराधी आदि कविताएँ नई सदी की चुनौतियों की कविताएँ हैं। ये कविताएँ संकुचित हो चुकी अवधारणाओं-राष्ट्रप्रेम-देशप्रेम, लोकतन्त्र-धर्मतंत्र, प्रतिरोध-सत्याग्रह आदि को नये रूप में परिभाषित करती है। एक नई दुनिया का निर्माण इन कविताओं का मूल उद्देश्य है। मनुष्यता और मानव सभ्यता को बचाने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति प्रतिरोध की आवाज़ को ज़िंदा रखें, तानाशाही तंत्र के खिलाफ उठ रही आवाज़ को स्वर दें। कवयित्री मंद पड़ती प्रतिरोध की आवाज़ों से चिंतित होती है। विरोध के बिना जीवन कैसा होगा या क्या हड़तालें और जुलूस बीते युग की बातें होने जा रही हैं अथवा ऐसी नहीं वैसी दुनिया चाहिए का स्वप्न लोकतन्त्र के तानाशाही दौर में दब जाएंगे! लोकतन्त्र को बचाये रखने की चिंता तथा तानाशाही तंत्र को उघारने का जज्बा कवयित्री को धूमिल, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय सरीखे प्रगतिशील कवियों की चेतना से जोड़ती है।

 

        लोकतन्त्र का तानशाह अपनी नयी खोल में आम जनता को गुलाम बनाने के लिए भय और आतंक का सहारा लेता है। वह अपनी आँखों में घृणा लिए हर दृश्य को अपने अपने अनुरूप ढालना चाहता है और लुभावना दिखना चाहता है। वह लोकतन्त्र का हवाला देकर अपनी कुर्सी / सिंहासन को सार्वकालिक बनाना चाहता है। कवयित्री इस तानाशाही रूप को कई अर्थों, कई प्रतिरूपों में देखती हैं-


“लोकतंत्र का तानाशाह,

कितना लुभावना दिखना चाहता है,

दृश्य में बने रहने के लिए... 

तानाशाह की आँख में घृणा इतनी ज्यादा,

कि कैमरे की लैंस भी दहल जाते हैं...

तानाशाह के लोकतंत्र में तंत्र ही तंत्र है,

ढह रहे हैं सिंहासन के चारों पाये,

कितना नादान है,

कुर्सी को सिंहासन समझता है,

लोकतंत्र का तानाशाह।”13 


इस तानाशाही तंत्र के बढ़ते प्रभाव को प्रतिरोध की संस्कृति से ही रोका जा सकता है। नीलेश इस जनतांत्रिक परिवेश में पहली बार अपने सपनों को लेकर आगे बढ़ रही साधारण स्त्री के जनतंत्र को भी बिल्कुल भिन्न नज़रिये से देखती हैं। प्लेटफॉर्म पर घबराई हुई सी माँ जैसी स्त्री, घर बसाने का सपना देखती सत्रह साल की लड़की, माँ-पिता-भाई-बहन के सपनों को पूरा करने की ख्वाइश लिए बिना टिकट यात्रा करती लड़की हो या मरीना त्स्वेतायेवा की तरह कवि बनने का स्वप्न लिए कविता लिखने वाली लड़कीअथवा दुनिया के सारे स्वप्नों को गर्भ में समेटे गर्भवती कामकाजी स्त्री आदि सभी स्त्री की सामाजिकता को और उसकी जनतांत्रिकता को अलग स्वरूप देता है। कवयित्री की चिंता वैयक्तिक के बजाय स्त्री के-सम्पूर्ण मानव जाति के सामूहिक उत्थान की है। इसलिए वे फ़ैशनपरस्त अभिजात्यवादी विमर्श केन्द्रित स्त्री-मुक्ति की चिंतन प्रणाली पर व्यंग्य करती है। स्त्री-विमर्श में कामगार हाशिये की स्त्री की चिंता के बगैर स्त्री-मुक्ति की लड़ाई अधूरी ही रहेगी। नीलेश की यह चिंता स्त्री-विमर्श को आईना दिखाने के साथ ही उसे सकरात्मक दिशा बोध भी देती है। स्त्री-विमर्श कविता स्त्री-विमर्श की चिंता और चुनौतियों दोनों को ही सामने रखती है। बाजारवादी फ़ैशनपरस्त परदे पर स्त्री को मोहक और प्रदर्शन प्रिय बनाने के खिलाफ कवयित्री सुंदरियों को सचेत करती है। कवयित्री सम्मान समारोहों में मंच पर स्त्री की उपस्थिति को महज़ सौंदर्य की पूर्ति बनते नहीं देखना चाहती हैं-


“मत आया करो तुम सम्मान समारोहों में,

तश्तरी, शाल और श्रीफल लेकर,

दीप प्रज्वलन के समय,

मत खड़ी रहा करो माचीस और दीया-बाती के संग,

मंच पर खड़े होकर मत बाँचा करो,

अभिनंदन पत्र,

तुम ऐसा करके तो देखो,

बदल जाएगी ये दुनिया सारी।”14 


 दुनिया को बदलने के लिए आवश्यक है कि हम रूढ़ व जड़तावादी फाँस को तोड़ उससे बाहर निकलें। स्त्री की वैचारिक पहचान की कवायद है नीलेश की स्त्री संबंधी चिंतन। शारीरिक सौन्दर्य की अपेक्षा वैचारिक सौंदर्य तथा शारीरिक पहचान के बजाय वैचारिक सृजनात्मक पहचान ही समाज में स्त्री-पुरुष के संतुलन को एक नयी दिशा देगी।

 

          बेखटके आधी रात में जीने का स्वप्न लिए नीलेश स्त्री-देह की सीमाओं और इच्छाओं के मध्य समाज की मानसिकता पर प्रहार करती हैं। समझ न ले कोई ऐसी-वैसी  या देह भी क्या तुच्छ चीज़ है का डर उसे नागरिक होने के अर्थ को उससे छीन लेता है। सामाजिक ढाँचे का यह रूप स्त्री के व्यक्तित्व को शून्य में विलय करता है। नीलेश की स्त्री एवं कवि-व्यक्तित्व इन सबक़ों धता बताते हुए भी स्वयं को आकार देना चाहती है-


“फिरती हूँ गली-गली,

रीढ़हीन आत्मा के साथ चमकती देह के लिए,

जाने कौन कब उसे उघाड़कर रख दें,

तिस पर जमाने को पीठ दिखाते,

आधी रात में,

बेखटके घूमकर,

पानी को आकार आकार देना चाहती हूँ।”15 


पानी को आकार देना जीवन, सपने और अपनी चाहत को आकार देना है। स्त्री-जीवन को पराया धन, घर-परिवार की इज्ज़त-आबरू आदि के पारम्परिक बेड़ियों से निकालकर कवयित्री ने स्त्री व्यक्तित्व को नयी उड़ान दी है। पहली उड़ान और उन्मुक्तता का एहसास साधारण स्त्री को रोमांच से भर देती है पहली बार घर से निकलना कितना रोमांचक, कितना बेपरवाह।

 

          नीलेश स्त्री के सामाजिक-पारिवारिक भूमिका को भिन्न तरीके से खोलती हैं। युवा कवयित्री-आलोचक सुजाता ने नीलेश की कविताओं में जेंडर-रोल से मुक्ति के स्वर को यूँ व्यक्त करती हैं : “नीलेश की कविताएँ घोर अस्मिता-चेतस कविताएँ हैं। यहाँ एक स्त्री की भीतर-बाहर की छटपटाहट है। उस जेंडर-रोल से मुक्ति की छटपटाहट है जिसे समाज ने रूढ़ कर दिया है जिससे विचलन समाज को स्वीकार नहीं। ... नीलेश की कविता में दायरों, बंधे हुए जीवन, बंधे हुए रोल, रूटीन से निकल भागने की प्रबल इच्छा की कविता है। वजूद की उत्कट ललक, खुद को पहचानने के लिए कुछ भी और हो जाने की तत्पर संवेदनशीलता है यहाँ।”16 इस संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करती उनकी अधिकांश कविताओं में स्त्री के भीतर की बौद्धिक स्त्री निरंतर पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों पर प्रहार करती है।  माँ’, ‘सत्रह साल की लड़की’, ‘चबूतरा’, ‘जीवन’, ‘एक आशंका के साथ’, ‘घर से निकलना’, ‘स्त्री-विमर्श’, ‘फेशियल’, ‘तोड़-मरोड़कर’, ‘बेखटके आदि अनेक कविताएँ समाज की अचर्चित अवर्णित स्त्री-अस्मिता एवं संघर्ष के देशज-बोध की कविता है।

 

          नीलेश केवल घर-परिवार, माता-पिता, भाई-बहन आदि के साथ साधारण लड़की की खालिस ज़िंदगानी की कवयित्री नहीं है अथवा निम्नमध्यवर्गीय समाज को कविता में चित्रित करने वाली चितेरी कवयित्री ; इन सब घेरों से आगे वह वैश्वीकरण की कूटनीति, व्यवस्था की दोहरी नीति और आम जन की पीड़ा को कविता में ढालने वाली प्रगतिशील कवयित्री हैं। लोकतंत्र की घटती साख को मजबूती से थामे एक जनकवि की तरह जागरूक एवं अपने  सरोकारों के प्रति समर्पित कवि । बाइट के जरिये लोकतंत्र के अघोषित चौथे स्तम्भ मीडिया की भजन-नीति को भी कवयित्री उजागर करती हैं। साधारण जन के सपने, आकांक्षा तथा जिजीविषा को स्वर देना हो या वैयक्तिकता, पारिवारिकता आदि सभी संवेगों पर नीलेश की कविता एक बलाघात करती हैं।


संदर्भ :

  1. नीलेश रघुवंशी : घर निकासी. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, 2009, पृ. 21
  2. नीलेश रघुवंशी : कवि ने कहा चुनी हुई कविताएँ. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम पेपरबैक संस्करण, 2016, पृ. 59
  3. रेखा सेठी : स्त्री-कविता : पक्ष और परिप्रेक्ष्य, नयी दिल्ली, राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्कारण, 2019, पृ. 144
  4. नीलेश रघुवंशी : घर निकासी. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, 2009, फ्लैप से उद्धृत
  5. वही, पृ. 78
  6. नीलेश रघुवंशी : खिड़की खुलने के बाद. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2017, पृ. 46
  7. नीलेश रघुवंशी : घर निकासी. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, 2009, पृ. 104
  8. वही, पृ.50
  9. नीलेश रघुवंशी : कवि ने कहा चुनी हुई कविताएँ. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम पेपरबैक संस्करण, 2016, पृ.104-105,107-108
  10. वही. पृ.89
  11. नीलेश रघुवंशी : खिड़की खुलने के बाद. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2017, फ्लैप से उद्धृत
  12. नीलेश रघुवंशी : कवि ने कहा चुनी हुई कविताएँ. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम पेपरबैक संस्करण, 2016, पृ.53-54
  13. नीलेश रघुवंशी : खिड़की खुलने के बाद. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2017, पृ.85-86
  14. नीलेश रघुवंशी : कवि ने कहा चुनी हुई कविताएँ. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम पेपरबैक संस्करण, 2016, पृ.47
  15. नीलेश रघुवंशी : खिड़की खुलने के बाद. किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2017, पृ.101
  16. सुजाता : आलोचना का स्त्री पक्ष. राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2021, पृ.279

 

कार्तिक राय

शोधार्थी, हिंदी विभाग, प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता

kky.slg@gamil.com, 6290941652, 9434464350

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

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