समीक्षा:व्यंग्य की धारदार भाषा है 'धरतीपकड़ निर्दलीय' उपन्यास में / डॉ. रामबहादुर मिश्र


साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 

अपनी माटी

धरतीपकड़ निर्दलीय
 (व्यंग्यात्मक उपन्यास) 
रवीन्द्र प्रभात 
प्रकाशक : 
हिंदयुग्म प्रकाशन, 
1, जिया सराय, 
हौज खास,
 नई दिल्ली- 110016 
प्रकाशन वर्ष : 2013 
पृष्ठ: 168 (पेपर बैक)
मूल्य: रु 95/- 



लखनऊ से प्रकाशित दैनिक जनसंदेश टाइम्स के साप्ताहिक धारावाहिक 'चौबे जी की चौपाल' के माध्यम से ही रवीन्द्र प्रभात जी से संपर्क हुआ। विशुद्ध गंवई अंदाज़ में व्यंग्य की पैनी धार चलाने में माहिर प्रभात का अंदाज़ भी अलग है। कुंठा, हताशा, निराशा और अवसाद भरे परिदृश्य में उनका लेखन हमें गुदगुदाता ही नहीं सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की बखिया भी उधेड़ता है बड़े ही प्राकृत ढंग से। उन्होने अपने व्यंग्य लेखों को उपन्यास का जामा पहनाकर 'धरती पकड़ निर्दलीय' को जिस ढंग से प्रस्तुत किया है वह भी अनूठा है। जैसा की उन्होने स्वयं लिखा है की ये व्यंग्य लेख फरवरी 2011 से मई 2012 के बीच समय-समय पर लिखे गए हैं लेकिन इन व्यंग्य लेखों को उपन्यस्त कर जिस कलात्मक ढंग से उन्होने प्रस्तुत किया है वह भी काबिले तारीफ ही कहा जाएगा।

ध्यान से देखा जाय तो भाषा और बोली के लिहाज से इसका विस्तार लखनऊ से बिहार की सीमा तक है। रवीन्द्र प्रभात की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होने भोजपुरी और अवधी में ऐसा समन्वय स्थापित किया है जिसमें विभेद खोज पाना बड़ा ही कठिन है। उनका यह भाषाई कमाल चमत्कृत करता है । उनके व्यंग्य लेखन में लोकभाषा का तड़का ही नहीं है अपितु, लोक संस्कृति पूरे वैभव के साथ उपस्थित है। सभी पात्र प्राय: लोकजीवन से सी उठाए गए हैं- गुलटेनवा, राम भरोसे,गाजोधर, रामलाल, राम बदन, बटेसर, धनेसर, रमज़ानी मियां, पिंडोगी बाबा, चनरिका, अकलुया, खुरपेंचिया और तिर्जुगिया की माई जैसे नाम केवल संगयवोढक नहीं अपितु वे लोकजीवन का विम्ब भी प्रस्तुत करते हैं। कुछ देशज शब्दों के प्रयोग अर्थगांभीर्य और भाव गांभीर्य देते हैं- मचर्रे-मचर, छूछूमाछर, भोंकार, मुंहचुप्पा, फुलौना जैसे देशज शब्द अपनी गहन अर्थवत्ता तथा मारक क्षमता के बल पर कथन को और अधिक पैना बना देते हैं। रवीन्द्र प्रभात अङ्ग्रेज़ी शब्दों का देशजीकरण करने में निपुण हैं। प्रोडक्ट से प्रोडक्टवा, कंट्रोल से कंट्रोलवा आदि ऐसे ही शब्द हैं। मुहावरों और लोकोक्तियों को भी उन्होने प्रसंगानुकूल बड़े ढंग और सलीके से प्रस्तुत किया है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा- "पहिरई सब कोई झमकई कोई-कोई" इसका अर्थ यह है कि कपड़े और गहने तो सब लोग पहनते हैं लेकिन नाटकीय प्रदर्शन बिरले लोग ही करते हैं।
  
पूरा उपन्यास सर्ग,खंडों अथवा अध्यायों के बजाय धारावाहिक शीर्षकों के डैम पर विस्तार पाता है। पहले पहल, ऊपर सब टांके-टांका है अंदर से सरक गया समूचा तंत्र, गंदा है पर धंधा है, हमारे पास मंहगाई है, मौसम में मिलावट, खाया पिया पचाया सब माया, अबकी सरकेगी चुन्नी शीला हो या मुन्नी, धत जिगर से कहीं बीड़ी जालिहें, न रन न बिकेट इंडिया हिट बिकेट, पीटने-पटकने में माहिर हैं हम, है मुखर माफिया प्रखर चोर भी, अनशन पर अन्न सुख के कांटा हुये सिब्बल, पुरस्कार से अल्ला मियां का का ताल्लुक, जो जनता की सोचेगा वही राज करेगा आदि शीर्षक ही उस अंश का मजमून बताने में समर्थ है। इस प्रकार के लगभग 65 शीर्षकों द्वारा सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों का पोस्टमारतम किया गया है।

राजनीतिक भ्रष्टाचार पूरे उपन्यास पर हावी है । निर्दलीय धरतीपकड़ जी की चौपाल में जब भी राजनीतिक विमर्श होता है वह चर्चा बहुत जोरदार ढंग से उठाई जाती है। धरती पकड़ निर्दलीय उर्फ भुईडोल चौबे के बारे में यह कहा जाता है कि "भुईया डोले चाहे ना डोले पर ससुरी राजनीति की बातें सुनके ऊपर से नीचे तक डांवाडोल हो जाते हैं निर्दलीय जी।" नेता और जनता के सम्बन्धों का विश्लेषण कराते हुये धरतीपकड़ कहते हैं -"हम सब को चाहिए एकता और नेता को चाहिए अनेकता। हम सबको चाहिए रोटी और नेता को चाहिए बोटी। हम सबको चाहिए लत्ता, और नेतावन को चाहिए सत्ता। हम सबको चाहिए मकान और नेतावन को चाहिए आन-वान-शान।"

अन्ना हज़ारे ने देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने का बीड़ा उठाया पूरा देश अन्नामय हो गया। लगा कि अब भ्रष्टाचार इतिहास की चीज हो जाएगा , सतयुग की वापसी हो जाएगी, राम राज्य का विस्तार होगा, लेकिन हुआ क्या सबको पता है। गाजोधर कहता है -"बुढ़ऊ मुद्दे गलत उठाय लिया। जवान देश के राग-राग मा बहत हैं भ्रष्टाचार आउर रिश्वत के रंग। उ देश मा का मिलावट का बनावट, का बुनावट, का दिखावट सभै एक जइसन।"

लोकतन्त्र माने जनता का शासन, लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा है। सुने तिर्जुगिया की माई की जुबानी-"ई हमनी सबके दुर्भाग्य है कि लोकतन्त्र की उल्टी परिभाषा रचे में हमरे नेता लोग कामयाब होइ गए। अज़ तक जेटना सरकारी धन फाइल तक आयेल नेता लोग अगर सही ढंग से लगाने देते और अफसर लोग सही जगहिया पे ऊ धन लगाते तो हमरे गाँव के साथ-साथ पूरे देश की तस्वीर बादल गई होती। आज भारत गरीबी की कैद मा है, गरीब फाइलों की कैद मा, फाइल अफसरशाही की कैद मा, अफसरशाही नेतवन की कैद मा और नेता अपने आलाकमान की कैद मा।"

भारतीय समाज में 'चांदी का जूता मारना' एक मुहावरा है जिसका संबंध रिश्वत और घूसख़ोरी से है। उपन्यासकार ने कई प्रकार के जूतों का वर्णन किया है, जैसे चट्टी चमरौधा, चटपटिया, पंप जूता, बूट, नारी, मलेटरी बाला जूता, कपरहवा जूता, का बयान करेते-करते चाँदी के जूते पर आ जाता है और उसकी महिमा का गुणगान कराते हुये कहता है -"मगर जो मजा चांदी के जूते में है वह किसी जूते में नहीं। आज पूरा का पूरा देश छूछमाछर होके एक-दूसरे को चाँदी का जूता मार रहा है और जूता खानेवाला फूलके कुप्पा हो रहा है।" वे आगे कहते हैं कि ........"चांदी का जूता राजकाज में ही नहीं राजनीति में भी खुबई चलता है आजकल। आज जेकरे पास चांदी का जूता है वोकरे पास पद, पैसा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, प्रसिद्धि,कार, मोटर, कुर्सी सब। यानि इ बहुतई कारगर अस्त्र है।"

भारत धर्म प्रधान देश है। यहाँ पर विभिन्न धर्मावलम्बी, मतावलंबी, संप्रदाय और अनेक प्रकार के धर्मपंथ है। कभी शैव शाक्त और वैष्णव संप्रदाय हुआ कराते थे आज इतने पंथ हो गए हैं कि गिनना मुश्किल। सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान के विस्फोट के इस युग में धर्म के नाम पर अंध विश्वास का बाज़ार बहुत ज़ोरों पर है। छद्म धर्म और कर्मकांड की आड़ में अधर्म का खेल हो रहा है । इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर तो प्रतिस्पर्द्धा का दौर है । निर्मल बाबा, आशाराम बापू और भगवान रजनीश का कच्चा चिट्ठा वही चैनल खोल रहे हैं जो उनका गुणगान कराते थे । धर्म आज आस्था, विश्वास और साधना का क्षेत्र न रहकर बहुत बड़ा बाज़ार बन गया है। बक़ौल निर्दलीय जी-" सच पूछो तो देश में सर्वश्रेष्ठ कैरियर बाबा बनाने में है । बाबागिरी से बेहतर कुछ भी नहीं है रे। काहे कि आपन देश बाबाओं का देश है बबुआ। इहाँ के कण-कण में बाबा विद्यमान हैं। सुबह से लेकर शाम तक नाना प्रकार के चैनलों पर भांति-भांति के बाबा अवतरित होत रहत हैं। रिमोट के कवनों बटन दबाओ परिणाम में एक नए बाबा के अवतरण होई जात है।"

बस्तुत: धरतीपकड़ निर्दलीय एक ऐसा उपन्यास है जो कहने भर को उपन्यास है क्योंकि इसमें औपन्यासिक तथ्यों का अभाव है यह कथाकार का कौतुक है कि उसने अपने व्यंग्य लेखों को कड़ी-दर-कड़ी जोड़कर इसे उपन्यास का रूप देकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। वास्तविकता तो यह है कि यह व्यंग्य लेखों का एक उत्कृष्ट संकलन है । आज हास्य और व्यंग्य के नाम पर जो फूहड़पन और छिछेरापन परोसा जा रहा है ऐसे संक्रामण के दौर में रवीन्द्र प्रभात का यह उपन्यास व्यंग्य विधा को बड़ी सात्विकता के साथ प्रस्तुत करता है। आज व्यंग्य लेखक तो बहुत हैं लेकिन व्यंग्य के गूढ तत्व उनके लेखन से गायब हैं। यह कम संतोष की बात नहीं कि रवीन्द्र प्रभात ने अपनी इस कृति के माध्यम से अपने पाठकों को व्यंग्य के गूढ्तत्व से वाकिफ कराया है। कुल मिलाकर यह कृति पाठकों को प्रारंभ से अंत तक बांधे रखती है।

डॉ. रामबहादुर मिश्र
संपादक: अवध ज्योति
हैदरगढ़, बाराबंकी (ऊ. प्र.)
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