कविताएँ: स्वर्णलता ठन्ना

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
          वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-अगस्त,2014                       
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वरदान

उँगलियों के पोरों से
रातरानी की सुगंध से लबरेज
मालती गंध से सराबोर
कुछ नीले-पीले
गुलाबी फूलों को चुनते हुए
सीख लूँगी
सतरंगे पँखों वाली
तितलियों से उड़ना
आवारा हवा की तरह
तब टाँक दूँगी
पूर्णिमा के
झक सफेद चाँद को
रात के तारों वाले
लहराते आँचल से ढँके
माथे पर
और सुबह होते-होते
बिखरा दूँगी
मखमली मोरपंख
की मृदुलता
रेतीले किनारे पर
जहाँ बिखरे होगे
दिवाकर की
सुनहरी रश्मियों  से आलोड़ित
अनगिनत नन्हें कंचों से
चमकते सैकत के कण
शामिल हो जाऊँगी तब
पक्षियों के
कलरव करते झुंड में
आकाश के
नीलाभ छोर को नापने
तिनका&तिनका चुन
एक नव नीड़ के
निर्माण में----
सूर्य की चढ़ती
तेजस्विता को
उतारने अपने भीतर
बन जाऊँगी
सूरजमुखी
भर लूँगी अनन्त किरणें
अपने अंतस में
और ढाल लूँगी
उन्हें चमकते
हरे पीले रंगों में
और इस तरह
जब अस्त हो जाएगा सूर्य
तब सृष्टि की
सारी पवित्रता को
समेट लूँगी
समर्पित करने
किसी देवालय की
देवमूर्ति के समक्ष
रातरानी के फूल]
शुभ्र चाँदनी
नन्हें चमकते कंचे
टूटे तिनके
और ढेर सारी
पीतवर्णी सूरजमूखी
और माँग लूँगी
देव से
इनकी सहजता]
सौन्दर्य]
समर्पण,
सृष्टि के प्रलय होने तक
वरदान स्वरूप---
     
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दिन की फसल

समय काट रहा है
हाथ में हंसिया लेकर
दिनों की फसल
सुबह की किरणों में
जगमागते लम्हें
गेहूँ की सुनहरी
बालियों के समान
दिखाई देते हैं
और चलने लगता है
समय का हंसिया
उन पर-----

नहीं सहे जाते समय से
पतझड़ के बाद बचे
ठूँठ वृक्ष
और तेजी से काटने में
तल्लीन हो जाता है
वह वसंत के पहले के
बचे हुए दिनों को
और इस तरह
छा जाता है वसंत
धरा के आँगन में
तब भी समय
अपनी आदत के अनुसार
चलाता रहता है
अपना हंसिया

चैत के लम्बे और
वैशाख के तपते-झुलसते
दिनों को भी
अपना पसीना बहाता समय
काटता ही जाता है
धीरे-धीरे
ठेलता जाता है वह
ऋतुएँ और
मिट्टी की सोंधी महक के साथ
पहुँच जाता है
सावन की रिमझिम में
नम आर्द्र दिनों को सेंतने
चाहे उसके सामने
कैसे भी दिन क्यों हो
किसी उत्सव त्योहार
खुशी या गम
सभी दिनों को वह
उसी गति से
काट-काट कर
लगा देता है
अतीत के मैदान में ढेर
ठिठुरते हुए दिनों पर
जमी बर्फ को हटाते
जम जाते हैं उसके हाथ
और बढ़ जाती हैं
ठंडे दिनों की अवधि
पर समय-----!
समय रूकता नहीं
कभी किसी कारण
और धीरे-धीरे
बदल जाते हैं सारे मौसम
ऋतुएँ आती है
और काट ली जाती है
समय से----------
प्रश्न घुमड़ता है कई बार
मन में
समय ! तुम्हारे विश्राम के लिए
कोई समय नियत नहीं क्या---------\\\
क्या तुम
कभी नहीं थकते---?
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गीत खामोशी का

तमाशों और
आडम्बरों से भरी
इस बंजर भूमि पर
रोप दिए है
घुन खाए
कुछ उम्मीदों के बीज
और
हहराती
एक पारिजात की
नन्हीं डाली
सींचना चाहती हूँ
जिसे मैं
पलकों पर ठहर आई
एक चमचमाती
नन्हीं बूँद से
जो इंतजार में है
सपनों की बदली के
जो आकर
रख ले जाए
हथेलियों में इसे
और बरसा दे
मेरे आँगन की
बंजर धरा पर
तब शायद
फूट पडे
कोमल कोपलें
कल्पनाओं की
और वीरान होती
बगीची में
गा उठें
कोयल] पपीहा]
भ्रमर] कोई गीत
झुलस चुकी
किरणों की तपिश से
अनछुई खामोशी का-----

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स्वर्णलता ठन्ना
पी-एचडी.(समकालीन प्रवासी साहित्य और स्नेह ठाकुरविक्रम वि.वि. उज्जैन
नेट-हिन्दी,वैद्य-विशारद, आयुर्वेद रत्न (हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद)
सितार वादन, मध्यमा (इंदिरा संगीत वि.वि. खैरागढ़, ..) 
84, गुलमोहर कालोनी, रतलाम .प्र. | 457001,मो. - 9039476881,-मेल - swrnlata@yahoo.in 
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