साक्षात्कार : समाचार समिति (एजेंसी) की पत्रकारिता : मीडिया और समाज पर प्रो. के. जी. सुरेश से प्रो. नीलम राठी की बातचीत

साक्षात्कार : समाचार समिति (एजेंसी) की पत्रकारिता : मीडिया और समाज पर प्रो. के. जी. सुरेश से प्रो. नीलम राठी की बातचीत

[ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति, भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक साथ ही पीटीआई और दूरदर्शन में लंबे समय तक सेवाएं देने वाले प्रो. के. जी. सुरेश जी से हिन्दुस्थान समाचार समिति के पुनरुद्धार और समाचार समिति (एजेंसी) की पत्रकारिता: मीडिया और समाज विशेष के संदर्भ में बातचीत कर रही हैं प्रो. (डॉ.) नीलम राठी ]

 

आप हिन्दुस्थान समाचार समिति के जीर्णोद्धार से जुड़े रहे हैं। इस कार्य में आपके साथ और कौन -कौन संलग्न थे? इसके पीछे आप लोगों का क्या उद्देश्य था? 

के. जी. सुरेश - हिन्दुस्थान समाचार के जीर्णोद्धार के समय से श्रीकांत जी के साथ जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उस वक्त हम दो ही पत्रकार संवाद समिति वाले सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। पी.टी.आई. में मैं था यूएनआई में प्रमोद मजूमदार जी। मुझे आज भी याद है हम लोगों का कार्यालय हमने राजेन्द्र प्रसाद रोड़ पर रखा था। वहाँ बैठक अक्सर हुआ करती थी किकैसे हम इसका पुनरूद्धार करें। देश की प्रथम बहुभाषीय संवाद समिति को किस तरीके से सुचारू रूप से एक नए कलेवर में समाज और मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाए। इस विषय को लेकर कई बारबहुत विस्तृत चर्चाएं उस कार्यालय में हुई। शुरूआती दौर में राष्ट्रीय सहारा से रवीन्द्र अग्रवाल जी जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के आशुतोष भटनागर जी एवम् अन्य कई कार्यकर्ता सक्रियता से जुड़े। हमने सोचा था कि अन्य समितियों और हिन्दुस्थान समाचार में अंतर होना चाहिए। इसमें राष्ट्रीय विचारों का एक संवाद भी होना चाहिए। जिन समाचारों को तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में स्थान नहीं मिलता उन समाचारों को भी पाठकों तक पहुँचाने का दायित्व इस समिति का है। समाज में एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी हमारा दायित्व है। हिन्दुस्थान समाचार किसी पर निर्भर न हो। इस दिशा में सतत् प्रयास हुए। हिन्दुस्तान समाचार बदलते प्रौद्योगिकी के युग में जब समाचार संवाद समितियोंकी सार्थकता खत्म होती जा रही है ऐसा प्रतीत हो रहा था ये शायद अपने आपको संभाल नहीं पाएगी। लेकिन श्रीकांत जी के कुशल मार्गदर्शन के चलते और सभी पदाधिकारियों की निःस्वार्थ भावना से सब लोग जो जुड़े वे कोई मुनाफा देखकर नहीं जुड़े। अपनी जेब से पेट्रोल खर्च करते थे। अपने व्यस्ततम कार्यकम से समय निकालकर लोग आते थे और निःस्वार्थ भावना से उस यज्ञ में योगदान देते थे। लेकिन ये सम्भव नहीं हो पाता यदि श्रीकांत जी का व्यक्तिगत आकर्षण नहीं होता। उन्होंने जिस तरह से एक-एक व्यक्ति को जोड़ने का प्रयास किया। प्रतिबद्धता क्या होती है? सीखना क्या होता है? किसी भी एक विषय को सफलता तक पहुँचाने के लिए वो जो जज्बे की जरूरत है उस भावना की जरूरत है। ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो हमने उनसे सीखीं।

 

पी. टी. आई. समाचार समिति से आपका जुड़ाव रहा है। आपने किन - किन पदों पर रहते हुए कार्य किया?

पी. टी. आई. में- उपसम्पादक प्रशिक्षु से लेकर मैं मुख्य राजनीतिक संवाददाता तक की एक यात्रा तथाकथित मुख्यधारा की एजेंसी में मैंने की।

 

एजेंसियों के प्रारंभ का उद्देश्य आपकी दृष्टि में क्या था?

एजेंसी पत्रकारिता इसलिए शरू हुई थी कि शायद किसी भी समाचार पत्र छोटे अथवा बडे़, के लिए ये सम्भव नहीं था कि वे देशभर में अपने संवाददाता नियुक्त करें और देशभर से या विश्वभर से समाचार एकत्रित करें। इसीलिए सम्भवतः समिति के बारे में सोचा गया। विश्वयुद्ध हुआ तो में महसूस किया गया कि दुनियाभर के अखबारों के लिए प्रायोगिक स्तर पर सम्भव नहीं है कि वो अपने प्रतिनिधि विश्व की हर राजधानी में नियुक्त करें। इसलिए संभवत: समितियों का प्रारंभ किया गया। जिसके माध्यम से अखबारों, रेडियो स्टेशनों टी.वी. को निर्यामत तौर पर समाचार मिलते रहें और जब सब मिलकर उसका पेमेंट करेंगे तो सबको सस्ता पड़ेगा। 

 

क्या समाचार समिति समाचारों के लोकतंत्रीकरण में भी सहायक हैं? 

समाचार समिति के माध्यम से ही समाचार की दुनिया में समाचारों का लोकतंत्रीकरण संभव हुआ है। समाचार का लोकतंत्रीकरण हो इसके लिए आवश्यक है कि बड़े समाचार पत्र जैसे न्यूयार्क टाइम्स या वाशिंगटन पोस्ट सिर्फ अपने कुछ नुमांइदे विश्व के देशोंऔर राजधानियों में नियुक्त कर अपने ही समाचार पत्र में प्रकाशित कर दें और बाकी समाचार पत्रों के पास समाचार ही न होंतो कैसे संभव है? उसके लिए आवश्यक हैं समाचार समितियाँ जो कि समाचार संकलित कर पूरी दुनिया को समाचार दें और सबको समाचार मिले। इसीलिए कहा जाता है कि समाचार समितियाँ समाचारों के लोकतंत्रीकरण में सहायक हैं। 

 

स्वतंत्र भारत में समाचार समितियों के विकास पर प्रकाश डालिए। 

स्वतंत्र भारतवर्ष में 1948 में पहली समाचार समिति अस्तित्व में आई। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया(PTI) जो कि स्वतंत्रता पूर्व( राइटर्स)भारतीय एजेंसी थी,को नए नाम और नए कलेवर में प्रस्तुत किया गया। बाद में द्वितीय प्रेस आयोग की सिफारिश परएक अकेली संवाद समितिका वर्चस्व रहेगाजो उचित नहीं है। लोकतंत्र औरलोकतांत्रिक मूल्यों को सुनिश्चित करने के लिए एक और समाचार एजेंसी गठित की जाए। इसलिए UNI (यनाइटिड न्यूज ऑफ इण्डिया) को गठित किया गया। पी. टी. आई. और यू एन आई दोनों ही अंग्रेजी भाषा में समाचार प्रेषित करती थीं। 

 

भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को सीधे भारतीय भाषाओं में समाचार मिलें ,इसके लिए क्या प्रयत्न हुए? हिन्दुस्थान समाचार समिति की स्थापना पर भी प्रकाश डालिए? 

उस दौरान स्वर्गीय आप्टे साहब ने ये तय किया कि भारतीयों के लिए भारतीय भाषा में भारतीय भाषायी समाचार पत्रों को उनकी अपनी भाषा में समाचार पहुंचे और इस दृष्टिकोण से उन्होंने बहुभाषीय हिन्दुस्थान समाचार समिति की स्थापना की और बहुत सालों तक हिन्दुस्थान समिति की बहुत बड़ी पहचान थी।

 

आपातकाल में समाचार समितियों को भी संकट का सामना करना पडा ,इस विषय में आपके क्या विचार हैं? 

पूरे देश में लेकिन 1975 मेंदेश में आपातकाल लगा दिया गया। जिसके चलते कई संवाद समितियों को मर्ज कर समाचार भारती का गठन हुआ। जिस कारण हिदुस्थान समाचार भी अपने वजूद को खो बैठा। 

 

आपातकाल के पश्चात हिन्दुस्थान समाचार समिति की भूमिका पर आपके क्या विचार हैं? 

आपातकाल के पश्चात श्रद्धेय श्रीकांत जी के प्रयास से वो पुनर्जीवित हो उठा और आज पूरे देश भी में हिन्दुस्थान समाचार से कई समाचार पत्र, प्रसार भारती इत्यादि जुड़े हुए हैं। जब मैं दूरदर्शन में था तो मैं उस समिति कासदस्य था जिसमें ये तय किया गया कि हिन्दुस्तान समाचार समिति की सेवाएं दूरदर्शन के लिए ली जाएं। माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में भी हिन्दुस्थान समाचार का जो सक्रिय क्रियशन बंद कर दिया गया था उसको प्राथमिकता देकर मैंने रिवाइव किया। आज पूरे देश में हिन्दुस्थान समाचार समिति का सम्मान है। हाँ, बहुत सारी अपेक्षाएं हैं, बहुत सारी सम्भावनाएं हैं। इस पर मुझे विश्वास है कि वर्तमान नेतृत्व इस दिशा में काम कर रहा है। 

 

आज के सोशल मीडिया के दौर में समाचार समितियों की क्या सार्थकता है? 

एजेंसी पत्रकारिता टेलीविजन के आने के बाद भी(जब तक ब्रेकिंग न्यूज नही आई थी) टेलीविजन पत्रकारिता एजेंसी के पत्रकार ही किया करते थे। उनके तीन ध्येय थे- सत्य, निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता। संवाद समिति मुनाफे के लिए स्थापित नहीं की गई थी। न पीटीआइ ना यूएनआइ । आज का सोशल मीडिया संपादक के अनुशासन से तो निकल गया है किन्तु खुद का अनुशासन भुला बैठा है। समाचार समिति की पत्रकारिता ने आज भी इन मूल्यों से समझौता नहीं किया हैं। यही इसकी सार्थकता भी है। 

 

समाचार समिति की कोई संपादकीय लाइन नहीं होती। इससे आपका क्या तात्पर्य है? 

चूँकि हमारी कोई भी सम्पादकीय लाइन नहीं है, यानि कि हम किसी राजनीतिक लाइन के हिसाब से नहीं चलेंगे। और क्यों? उसका कारण ये था कि जब पीटीआईया यूएनआईका समाचार जाता है तो वो अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें भी लेती हैं। अलग-अलग राजनीतिक दल लेते हैं, अलग-अलग राजनीतिक दलों के समाचार पत्र, मुखपत्र लेते हैं। इसलिए अगर आपने कोई लाइनलेली तो दूसरे को वो मंजूर नहीं होगा। इसलिए हम समाचार को निष्पक्ष रूप से देते हैं। उसमें विचार मिश्रित नहीं करते। इस सोच के साथ एजेंसी ने काम करना शुरू किया था। और काफी समय तक एजेंसीज ने उसका प्रालन भी किया।

 

आज के समय में एजेंसियां भी अपने उद्देश्यों से भटक रही हैं। इस विषय में आपके क्या विचार हैं? 

हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों से दृष्टिकोण बदल रहा है, जो चिंताजनक है। विशेषकर तथाकथित बड़ी संवाद समितियों के संदर्भ में। पत्रकारिता से हटकर पक्षकारिता की दिशा में जा रहे हैं। मैं जब कभी इन्हीं एजेंसी के कुछ पुराने मित्रों से मिलता हूँ तो वे कहते हैं कि बड़ा दुख होता है कि जब एक दल विशेष के समाचार को जान-बूझकर डिले किया जाता है। उसको रिलीज नहीं किया जाता, विलम्ब किया जाता है, संवाद समिति से वो समाचार इतना लेट भेजा जाता है कि तब तक समाचार पत्र के समाचारों का फाइनल चयन हो जाता है और वह समाचार पत्र में प्रकाशित होने से वंचित रह जाता है। कुछ इस प्रकार के भी साक्षात्कार हुए जिनसे एजेंसी के ऊपर पक्षपात का आरोप लगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। समाचार समितियां विवादों से बचती रही हैं। समाचार समिति ने अपने सब्सक्राइबर का हमेशा सम्मान रखा है। चाहे वो प्रसार भारती हो या अन्य कोई। लेकिन कुछ ऐसे समाचारों को प्रमुखता देना जो व्यापक राष्ट्रहित में नहीं हैं या ऐसा एंगल देना शरारतपूर्ण। ये समाचार समितियों के स्वभाव में नहीं है। लेकिन अब ये दिखने को मिल रहा है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। 

 

आपकी दृष्टि में समाचार समितियों का भविष्य कैसा होगा? 

संवाद समितियों का भविष्य मैंने हमेशा उज्ज्वल माना है। जब टेलीविजन आया तो समाचार चैनल बड़े तादाद में खुले और हमे बताया गया कि समाचार समितियां अब बंद हो जाएंगी क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज तो अब इनके हाथ में चली गई है। मैंने कहा कि नहीं वो आपका दृष्टिकोण हैं,जो सही नहीं है। याद रखिए कि आज देश में जितने समाचार चैनल खुल रहे हैं जो कि 900 के करीब हैं, जिसमें 300 से ज्यादा समाचार चैनल हैं। भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा समाचार चैनल, समाचार पत्र, डिजीटल प्लेटफार्म खुल रहे हैं। इन सबको समाचारों के लिए सूचनाओं की भूख है। ये भूख कौन मिटाएगा? इनके लिए आवश्यक है कि लगातार समाचारों की सप्लाई मिलती रहनी चाहिए, और ये सिर्फ समाचार समिति ही दे सकती है क्योंकि उसका इतना बड़ा स्ट्रिंगर्स का नेटवर्क है। मुझे याद है जब मैं लोकसभा चुनाव कवर किया करता था तो तब राजमाता जी के लोकसभा क्षेत्र में गुना में मैं एक बार गया और उस बीहड़ क्षेत्र में मैंने पाया कि एक बंदूक की दुकान चलाने वाला व्यक्ति वहाँ एजेंसी कास्टिंगर हुआ करता था। इसी प्रकार जब मैं बड़ौदा पहुँचा तो बड़ौदा में एक बैंक का मैनेजर अपने अतिरिक्त समय में समिति के लिए कार्य करता था। उस समय लोगों को इस कार्य का 200-250 रुपये प्रतिमाह मिलता था और काम का एक कार्ड मिलता था जिसे दिखाकर वो टेलीग्राम ऑफिस में जाकर वहाँ से समाचार भेजते थे। इसके लिए उन्हे200-250रुमासिक मिलते थे। रुपये उनके लिए उतने महत्वपूर्ण नहीं थे वो पत्रकारिता करने का एक जज्बा उनके लिए महत्वपूर्ण था कि हम छोटे गांव में होते हुए भी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। इतनी बड़ी समाचार समिति से जुड़े हुए हैं। मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि आप तो बैंक में मैनेजर हो आपको किस चीज की कमी है? आप क्यों ये करते हैं? दिनभर का काम करके आप घर क्यों नहीं जाते। 

मुझे आज भी याद है कि वो शास्त्री शलेश पांड्या जी हुआ करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि सर मुझे एक रूपया नहीं चाहिए लेकिन जब मैं जाकर डिप्टी कलेक्टर से बताता हूँ कि सर मैं पीटीआई का डिस्ट्रीक्ट कोरसपोडेंट हूँ तो मुझे कुर्सी मिल जाती है एक कप चाय मिल जाती है। मैं इस मान-सम्मान के लिए ये करता हूं। ये एजेंसियों का मान-सम्मान है। मुझे याद है अमेरिकी राष्ट्रपति बिल् क्लिंटन जब भारत में आए उत्तर-प्रदेश में एक जगह है रामपुर मनिहारन वहां वो गए थे। और मुझे उनकी कवरेज की जिम्मेदारी दी गई थी। मैं जब वहां पहुंचा तो अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सुरक्षाकर्मियों और भारतीय पुलिसकर्मियों ने पूरा रास्ता ब्लॉक कर रखा था हम लोग पीबीआइ की तरफ से बस में गए थे। पीबीआइ के अधिकारी लड़ते रहे पुलिसवालों से कि ये पीबीआइ( प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो) सेहैं पत्रकारों को साथ लेकर आए हैं हमें एलाउ करिए। परन्तु उन्होंने इजाजत नहीं दी। मैं उतरा और मैं उस अधिकारी के पास पहुंचा और मैंने कहा कि देखिए मैं पीटीआईमें हूं मेरे लिए वहां पहुंचना अनिवार्य है तो उन्होंने कहा कि अरे आप पीटीआई से हैं आप जाइए। बाकी किसी को हम नहीं छोडेंगे। यानि की एजेंसी के पत्रकारों का इतना सम्मान होता था सरकारी संस्था पीआईबी( प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो) सूचना कार्यालय को मना कर दिया और कह दिया कि  प्रेस - माने पीटीआई। वो समय भी हमने देखा है।किन्तु उसके बाद टेलीविजन पत्रकारिता और बाकी आने के बाद नेता और ये जितने भी सलीब्रेटी- इन लोगों ने एजेंसी के लोगों से बात करना बंद कर दिया क्योंकि एजेंसी में चेहरा दिखाई नहीं देता। सबको अपना चेहरा देखना, अपनी आवाज सुनना बहुत पसंद आता है तो वो टेलीविजन चैनल को प्राथमिकता देते हुए साक्षात्कार देने लगे। किन्तु समाचार, टेलीविजन और प्रिंट मीडिया के लोगों को सोर्स के नाते आज भी और भविष्य में भी सदैव प्राथमिकता एजेंसी को ही मिलेगी। 

 

समाचार समिति की असली ताकत क्या है? उसके समक्ष कौन सी चुनौतियाँ हैं? 

एजेंसी की एक बहुत बड़ी ताकत रही हैफील्ड रिपोर्टिंग। एजेंसी के लोग संवाद-समिति के लोग जमीन पर उतरकर काम करते हैं क्योंकि उनके पास समाचार का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं है। समाचार पत्रों ,रेडियो टेलीविजन के पास तो समाचार समिति से समाचार आ जाएगा लेकिन समाचार एजेंसी कहां से लाए समाचार? तो सही मायने में पत्रकारिता समाचार समिति के पत्रकार किया करते हैं। क्योंकि उनके पास कोई वैकल्पिक समाचार का स्रोत नहीं है। वो खुद मेहनत करके समाचार निकालते हैंऔर यही उनकी ताकत है। एजेंसी पत्रकारिता बहुत ही चुनौतिपूर्ण है और आज भी मेरा ये मानना है कि जो डिजीटल प्लेटफार्म डक्सटॉप पत्रकारिता करते हैं। यानि कि लैपटॉप खोल दिया और इधर-उधर से उठा लिया और उसको चला दिया। उनके पास सूत्र नहीं है कि कहां से समाचार लेकर आना है। आज भी उनकी निर्भरता संवाद समिति पर है।

 

समाचार समिति पत्रकारिता में वैविध्य को किस दृष्टि से देखते हैं? 

आज समाचारों में विविधता आ गई है। और विविधता के चलते आज सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक या खेल-कूद के समाचार ही नहीं आज हमारे पाठक वर्ग में हर प्रकार के समाचार जैसे मनोरंजन, खान-पान, यात्रा-वृत्त, ऐसे बहुत सारे समाचारों को लेकर उत्साह है, उत्सुकता है, वो चाहता है कि इस तरह की भी खबरें मुझे मिलें और ये हमारे लिए एक स्वर्णिम अवसर हैं। जब हम मात्र राजनीतिक, आर्थिक पक्ष की ही नहीं,बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से सम्बंधित, संस्कृति से सम्बंधित, लोककलाओं से सम्बंधित, यात्रा वृतांत, भक्ति, अध्यात्मिकता में लोगों की रूचि बढ़ रही है। लोगों को कन्टेंट चाहिए, और कन्टेंट जब चाहिए तो कन्टेंट की डाइवरसिटि (विविधता) में चाहिए। जितना हम दे सकते हैं समाचार समिति में (क्योंकि हमारे प्रतिनिधि गांव-गांव में हैं, हमारे प्रतिनिधि कस्बे में हैं) उतना अन्य कोई स्रोत नहीं दे सकता। मैं ये कतई मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि समाचार समितियों का समय खत्म हुआ है। ऐसा जो बोलते हैं मैं समझता हूं कि बिल्कुल गलत बात बोलते हैं। संवाद समितियों का समय तो अभी शुरू हुआ है। आज कन्टेंट की इतनी मांग है आज जिसके पास कंटेन्ट है वो उतना ही बादशाह है। 

 

समाज के प्रति समाचार समितियों की क्या भूमिका होनी चाहिए? 

इस बदलते हुए परिवेश में समाज के प्रति समितियों का क्या दृष्टिकोण और दायित्व होना चाहिए? संवाद समितियों की क्या भूमिका होनी चाहिए? एक नकारात्मक पहलू था कि आदमी को कुत्ता काटता है ये खबर नहीं है कुत्ते को आदमी अगर काटता है तो वह खबर है। ये समाचार की परिभाषा थी अब समाचार की परिभाषा बदल गई है। ऐसा कोई विषय नहीं है जिसके बारे में लोग जानना नहीं चाहते और ऐसे में जिस समय इन्फोडैमिफ के चलते मिस इन्फोर्मेशन और फेक न्यूज, फेक आख्यान के चलते, छद्म आख्यान के चलते, फेक नैरेट्विस के चलते, संवाद समितियों का एक विशेष दायित्व है कि निष्पक्ष समाचार, सत्यता के आधार पर, तथ्यों के आधार पर जन-जन तक पहुंचे। उसका ये विशेष दायित्व बनता है। समाचार में जो हमारी सांस्कृतिक विविधता, हमारी विरासत, हमारा इतिहास, हमारी आध्यात्मिक विरासत इन सबको भी युवा पीढ़ी को अवगत कराना है। ऐसे समाचार जो दूसरे लोग आम तौर पर प्रचार-प्रसार नहीं करते ऐसे समाचार को हमारे गांव से लेकर, हमारे जन-जातीय क्षेत्रों से लेकर, हमें ऐसे समाचार संकलित करके उसको प्रेषित करना है। ताकि हमारे देश की विविधता उसके बारे में हमारी युवा पीढ़ी को पता चले। उत्तर पूर्व में क्या हो रहा है? उत्तर-पूर्व की विशेषताएं क्या हैं? मात्र पर्यटन की दृष्टि से नहीं उनकी जीवन शैली से, उनकी लोक कलाओं से, उनके लोक वाद्यों, लोक संगीत से, युवाओं की प्रतिभा को लेकर भी। 

ऐसे बहुत सारे विषय हैं, हमारे इतिहास के ऐसे कई पहलू हैं जिससे लोग अनजान हैं लेकिन जिस पर पूरे देश भर में निःस्वार्थ भावना से कई कार्यकर्ता कार्य कर रहे हैं उन विषयों को कौन सामने लाएगा? उनको सामने लाने का दायित्व निसंदेह समाचार समिति को करना चाहिए। ऐसे न जाने कितने स्वतंत्रता वीर हैं जिनकी गाथाएं हमारे सामने कभी नहीं आईं। हाल ही में भोपाल में हमने जो देखा कि माननीय प्रधानमंत्री आए थे और उन्होंने स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन कर दिया। शायद उससे पूर्व अधिकतर लोगों ने रानी कमलापति के विषय में सुना ही नहीं था कि वह गोंड राजवंश की एक महारानी थी उनकी क्या भूमिका रही। लेकिन आज धीरे-धीरे कई ऐसे योद्धाओं के बारे में, स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में धीरे-धीरे ही सही बाते पता चल रही हैं। इन बातों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा कर एक राष्ट्रीय जागरण करने का दायित्व भी संवाद समिति के नाजुक कंधों पर है। 

 

राष्ट्रीय एकत्व एवं भाईचारा विकसित करने में समाचार समितियों की क्या भूमिका हो सकती है?

राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए ऐसे समाचार को प्रस्तुत करना जो राष्ट्रीय एकता और समाज में भातृत्व की भावना को बढ़ाएं क्योंकि आज ऐसे समाचार प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है जिससे सनसनी फैले, जिससे समाज में विद्वेष फैले। लेकिन समाज में जातियों से ऊपर उठकर, भाषाओं से ऊपर उठकर, एकता के सूत्र में बांधकर एक साथ हजारों सैंकड़ों स्वयं सेवीसंस्थाएं दूर दराज के इलाकों में इस निःस्वार्थ भावना से राष्ट्र सेवा में समर्पित हैं। उन कथाओं को भी जन-जन तक पहुंचाने का विशेष दायित्व हिन्दुस्थान समाचार जैसी समाचार समितियों के सामने है। जब मैं दूरदर्शन का सम्पादक था तो हमने एक कार्यक्रम शुरू किया था गुड न्यूज इण्डिया। हर रविवार को आधे घण्टे देश भर से हम ऐसे समाचार संकलित करते थे जिसमें हम सरकार का महिमामंडन नहीं करते थे। अपितु आम नागरिक किस तरह पहल करके समाज में परिवर्तन का कार्य करता है उसको लेकर ये समाचार संकलित होते थे उस श्रृंखला में दिखाए गए लगभग एक दर्जन लोगों को भारत सरकार ने बाद में पद्मश्री से भी सम्मानित किया। आज एक चैनल पूरा का पूरा इण्डिया टूडे ग्रुप ने शुरू किया है जिसका नाम है गुड न्यूज। शुभ समाचार को प्रेषित करना। यानिकि आज शुभ समाचारों के बहुत बड़ी संख्या में उपभोक्ता हैं। लोग नकारात्मकता से परेशान हो चुके हैं, तंग हो चुके हैं। 

सच्चाई के नाम पर परोसे जाने वाले विद्वेष से ऊब चुके हैं। हम यह नहीं कह रहे कि सच्चाई को नहीं दिखाना लेकिन समाज में जो अच्छे काम हो रहे है। वो भी तो सच्चाई है। वो झूठ नहीं है। पूरे विश्व में कोरोना से सड़क पर निकलकर हजारों पलायन करते मजदूरों के लिए स्वार्थ भावना सेऊपर उठकर भोजन की व्यवस्था की गई। गुरुद्वारेखुले, मंदिर खुले लोगों के लिए भोजन की, अस्पताल की, अन्त्येष्टी की व्यवस्थाएं की गईं। क्या ये समाचार समाज में नहीं जाना चाहिए। या सिर्फ अपराध ही जाना चाहिए या सिर्फ भ्रष्टाचार ही जाना चाहिए या सिर्फ अत्याचार ही जाना चाहिए। वो भी जाना चाहिए। ये भी जाना चाहिए। पूरे देश के कोने-कोने मेंक्या हो रहा है? ये एकमात्र समाचार समिति का संवाददाता बेहतर समझ सकता है। उनको मात्र प्रेस कॉन्फ्रेंस एटेंड करना और प्रेस रिलीज जारी करना नहीं बल्कि जमीन पर उतरकर पूरे परिवेश को राष्ट्र के सामने प्रस्तुत करना भी ध्येय होना चाहिए। समाचार समिति के पत्रकार राष्ट्र की आंतरिक ऊर्जा को जगा सकते हैं। 

 

समाचार समितियों को समस्या केंद्रित पत्रकारिता नहीं अपितु समाधान परक पत्रकारिता करनी चाहिए। इस कथन से आपका क्या तात्पर्य है? 

समस्याएं हैं, किन्तु समस्या केंद्रित पत्रकारिता नहीं समाधान परक पत्रकारिता करनी है। समस्या भी समाज में है समाधान भी समाज में है। समाज को समाधान ढूंढ़ने के लिए मददगार साबित करना है। हमें ढूंढ़कर नहीं देना है लेकिन समाज की आंतरिक ऊर्जा को हमें तैयार करना है ताकि वो अपना समाधान ढूंढ़ ले। ये बदलाव हमको लाना है। मैं समझता हूं कि आने वाले दिनों में समाचारसमिति की प्रासंगकिता और सार्थकता बढ़ेगी और विशेषकर हिन्दुस्थान समाचार जैसे राष्ट्र के लिए समर्पित राष्ट्रहित में कार्य करने वाले समाचार समिति की। 

धन्यवाद।

 

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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