शोध आलेख:पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का प्रारम्भिक विश्लेषणात्मक अध्ययन / राहुल कुमार एवं प्रो. (डॉ.) टी.सी. पाण्डेय


पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का प्रारम्भिक विश्लेषणात्मक अध्ययन


राहुल कुमार एवं प्रो. (डॉ.) टी.सी. पाण्डेय


शोध सार- पण्डित दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद भारतीय संस्कृति व धर्म की मूल भावना पर आधारित है। यह दर्शन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित एक स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण है। जो मानव के समग्र विकास पर केन्द्रित है। एकात्म मानववाद मनुष्य को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए सुनिश्चित करता है तथा प्राकृतिक संसाधनों के सतत् उपभोग का भी समर्थन करता है। एकात्म मानववाद व्यक्ति के व्यक्तित्व को विकसित करने का प्रयास करता है। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी का मानना था कि भारत को पश्चिमी विकासीय माडल पर पूर्णता निर्भर होने के बजाय स्वनिर्मित विकासीय माडल को विकसित किया जाना चाहिए। एकात्म मानववाद का प्रतिपादन 1964 में पण्डित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा किया गया जो कि एक सर्वकालिक और सार्वभौमिक सिद्धान्त है जो विश्व के सभी देशों, सभी समाजों द्वारा उनकी देशकाल और परिस्थिति के अनुसार स्वीकार्य किया जाता है। एकात्म मानववाद को भारतीय परम्परा के अनुसार एकात्म दर्शन कहा जाता है जिसका मूलमंत्र मानव कल्याण है।

मूल शब्द- पण्डित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म, मानववाद।

प्रस्तावनाः- विश्व में व्याप्त सभी मानववादियों का एकमात्र सर्वकालिक लक्ष्य मानव कल्याण है। मानव कल्याण की भावना से समय-समय पर कई नीति सिद्धान्त, उद्देश्य, लक्ष्य प्रतिपादित किये गये परन्तु ऐसा कोई भी वाद या मत नहीं जो सम्पूर्ण विश्व के बुद्धिजीवियों द्वारा सर्वकालिक मान्य हो क्योंकि वे सभी वाद या मत मानव कल्याण के सन्दर्भ में कहे गए हैं। इन सभी मतों या वादों का सार निकाला जाए तो एक ऐसे मानववाद का प्रस्फुटन होता है जिसका प्रत्यक्ष रूप एकात्ममानववाद के समान ही होगा। दीनदयाल उपाध्याय जी ने अपने बौद्धिक वर्गो तथा सिद्धान्त एवं नीति प्रलेख में एकात्म मानववादका विवेचन किया। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय प्राचीन विचारों के आधुनिक व्याख्याकार के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने भारतीय समाज को विभिन्न विरोधाभाषों से उबरने में सक्षम बनाया था।

वे एक ऐसे राजनीतिक दर्शन को तैयार करना चाहते थे जो प्रकृति और भारतीय संस्कृति के अनुभव हो तथा जिसमें राष्ट्र का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सके। दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववादशब्द का वर्णन सर्वप्रथम 11 अगस्त 1964 में भारतीय जनसंघ के प्रशिक्षण शिविर (ग्वालियर) में किया था। उसके उपरान्त 22, 23 24, और 25 अप्रैल 1965 में बम्बई में एकात्म मानववादचिंतन पर लगातार चार दिनों तक अपने विचार व्यक्त किये और भारतीय दर्शन में अपना विशेष योगदान दिया। यह एक सर्वकालिक व सार्वभौमिक सिद्धान्त है जो विश्व के सभी देशों व सभी समाजों द्वारा उनकी देशकाल, परिस्थिति के अनुसार स्वीकार्य किया जाता है। एकात्ममानववाद को भारतीय परम्परा के अनुसार एकात्म दर्शन कहा जाता है। जिसका मूल मंत्र मानव कल्याण है। वास्तव में यह केवल मानव दर्शन न होकर एकात्म दर्शन है। जिसका मूल उद्देश्य मानव और मानव के मध्य सम्बन्धों का ही नहीं अपितु मानव और मानवेत्तर प्रकृति के पारस्परिक मूल अर्थ मानव जीवन और प्रकृति के एकात्म सम्बन्धों का दर्शन है।

प्रस्तुत शोध अध्ययन का मुख्य उद्देश्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद और शिक्षा के विषय में एकात्म मानववाद की तत्वमीमांसा के साथ-साथ एकात्म मानववाद और पुरुषार्थ को जानना है।

प्रस्तुत शोध अध्ययन के लिए ऐतिहासिक शोध विधि और वर्णनात्मक शोध विधि का चयन किया गया है। इसके साथ ही दार्शनिक शोध विधि और विषयवस्तु विश्लेषण का भी प्रयोग किया गया है।

एकात्म मानववाद और शिक्षा:-

देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप मानव जीवन अवस्थाओं तथा मानव प्रकृति के विभिन्न रूपों में विविधता होती है और यह विविधता आन्तरिक मूल स्वरूप के ही विभिन्न रूपों की अभिव्यक्ति होती है। हम सभी लोगों में पारस्परिक अनुकूलता और पूरकता होती है। यही मानव का स्वभाविक गुण है। मानव व्यक्तिगत रूप से शरीर, मन और बुद्धि का समेकित रूप है। मानव के व्यक्तित्व के उपरोक्त चारों आयामों की पूर्णता प्राप्त करने के लिए मानव के सम्मुख चतुष्टय पुरुषार्थ का मार्ग प्रस्तुत किया गया है। मानव के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है। इनमें धर्म आधारभूत पुरुषार्थ है, अर्थ और काम पुरुषार्थ की प्राप्ति के आधार पर करने से भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। यह पुरुषार्थ मानव के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं जिससे अन्ततः मानव मोक्ष रूपी अन्तिम पुरुषार्थ अर्थात् जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के अधिकारी होते हैं।

व्यक्ति और समाज एकात्मता के बंधन से एक-दूसरे से जुड़े हो एक स्वस्थ, विकसित समाज की स्थापना हेतु व्यक्ति और समाज की पुरुषार्थ साधना एक दूसरे के पूरक होती है। एकात्ममानववाद में मानव को एकात्ममानव की संज्ञा दी गई है जो चारों पुरुषार्था के अनुसार विचार करने वाला, उसके लिए प्रयत्नशील रहने वाला और साथ ही व्यक्ति से लेकर विश्व मानव तक परिवार, राष्ट्र, विविध एकात्म समूहों ओर उनसे भी परे जाकर परसे तादात्म्य स्थापित करने की क्षमता रखने वाला है। यह एकात्म मानव ही एकात्मवाद या दर्शन का आदर्श है। एकात्म मानववाद या दर्शन में मानव को शिक्षा द्वारा समग्र और समन्वित व्यक्तित्व का निर्माण करने हेतु एक विचार दिया हैं जिसके माध्यम से श्रेष्ठ आदर्श की स्थापना करने हेतु विश्व मानव आपसी अन्तर्विरोध को दूर कर एक-दूसरे के पूरक बनेंगे और मानव का उद्देश्यपूर्ण सुखी जीवन प्राप्त कर एकात्म मानव के रूप में परिलक्षित होंगे।

एकात्म मानववाद की तत्व मीमांसाः-

एकात्म मानववाद के सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण के आधार पर मानव सम्बन्धी अधूरे व अपुष्ट विचारों के मुकाबले विशुद्ध भारतीय विचारों पर आधारित मानव कल्याण का सम्पूर्ण विचार को सूत्रबद्ध करके किया जा रहा है। एकात्म मानववाद के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों में यह चर्चा बनी रही कि यह वाद है या दर्शन। चूंकि वाद शब्द का वर्णन पश्चिमी दर्शन का द्योतक है जबकि एकात्म मानव का भाव विशुद्ध भारतीय है।

भारत आध्यात्मिक तत्व को मानवता का विशेष अंग मानता है। भारत ईश्वरीय सत्ता के किसी एक रूप या पूजा प्रणाली का अनुयायी नहीं है वरन् आध्यात्मिक उत्कर्ष के विविध आयामों का यहाँ उदय व विकास हुआ है। फिर भी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का भी निवास है जिसके फलस्वरूप जीव दया का भाव अहिंसा आदि गुणों का प्रादुर्भाव मानव में हुआ है। एकात्मतावाद, समन्वित मानववाद, परिपूर्ण मानव, समग्र मानव का विचार भी एकात्म मानववाद के रूप में किया गया है। इसके अतिरिक्त संघ के शिक्षा वर्ग के एक बौद्धिक वर्ग में पण्डित दीनदयाल जी ने इसे षड्पदीवाद भी कहा है। लेकिन सिद्धान्त और नीति प्रलेख में वर्णित अपनी एकात्ममानव की अवधारणा को एकात्म मानववाद के रूप में ही वर्णित किया है। युगधर्म पुस्तक में पण्डित जी ने वादप्रत्यय को अपने विचार दर्शन के नामकरण में जोड़ा। सही अर्थ में यह केवल मानव दर्शन न होकर एक पूर्णरूपेण एकात्म दर्शन है।

एकात्म मानववाद मे न केवल मानव और मानव के मध्य सम्बन्धों का समावेश होता है बल्कि मानव और प्रकृति के पारस्परिक एकात्म सम्बन्ध का भी समावेश सुनिश्चित होता है। मानव जीवन और सम्पूर्ण प्रकृति के एकात्म सम्बन्धों के दर्शन के रूप में एकात्म मानववाद को वर्णित किया जाता है। मानव जीवन के विभिन्न अवस्थाओं और मानव प्रकृति की विभिन्न शक्तियों में विविधता होती है परन्तु यह विविधता आन्तरिक एकता के ही विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। इसी के परिणाम स्वरूप इनमें पारस्परिक अनुकूलता और पूरकता होती है।

एकात्म मानववाद में निम्नलिखित मूल तत्व हैं-

Ø व्यष्टि,  समष्टि

Ø चतुष्टय, पुरुषार्थ

Ø चतुर्विध, सुख

 

मनुष्य(व्यष्टि) चार मूलभूत तत्वों शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के संयोग से बना है। समाज (समष्टि) देश (जन, भूमि), धर्म, संकल्प, जीवन आदर्श (लक्ष्य) के संयोग से बनता हैं अन्योन्य क्रियायें-कर्म, योगक्षेम, यज्ञ और शिक्षा के माध्यम से व्यष्टि और समष्टि के अन्तर्सम्बन्ध स्थापित होते हैं।

व्यष्टि = शरीर + मन + बुद्धि + आत्मा

व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति को सर्वांगीण विकास करने के लिए इन चारों का विकास एकात्म शिक्षा के द्वारा किया जाना चाहिए। व्यष्टि और समष्टि चतुर्विध सुख की प्राप्ति चतुष्टय पुरुषार्थ के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं, इस प्रकार व्यक्ति और समाज को जोड़ने वाली शिक्षा, कर्म, योगक्षेम और यज्ञ चार वस्तुएं व्यष्टि और समष्टि को एकात्म कर सकती है।

एकात्म मानववाद और पुरूषार्थः-

     पुरूषार्थ का उद्देश्य सही तरीके से मानव जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना है। पुरूषार्थ वास्तव में मानव जीवन के लिए आधार उपलब्ध कराता है एवं ऐसे मार्ग की ओर प्रशस्त करता है कि व्यक्ति का जीवन सार्थक सिद्ध हो सके। पंडित दीनदयाल उपाध्याय धर्म पुरूषार्थ को अतीत के प्रयासों का अधार मानते हैं। धर्म के अनुसार प्रयास किया जाना चाहिए, लेकिन सामान्य ज्ञान मे ंदीनदयाल की धर्म अवधारणा लिए गए पंथ से अलग है। उनकी राय में धर्म जीवन का एक तरीका है, न कि पूजा पद्धति। पंथ या सम्प्रदाय के लिए एक निश्चित पुस्तक है, धर्म की नहीं बल्कि पंथ की सर्जक या उद्घोषक या पैगम्बर धर्म का नहीं है। धर्म के पास कानूनी विशेषज्ञ नहीं हैं लेकिन पंथ में है। इस तरह, वे मानते है कि धर्म बहुआयामी है और इसके व्यापक निहितार्थ हैं। प्रकृति के नियमों, कर्तव्यों आदि को धर्म द्वारा व्यक्त किया जाता है। जैसे बहते पानी का प्रवाह, जलती हुई आग की सुगन्ध और शीतलता चंदन का धर्म है। धर्म शब्द नीति नियमों के आधार पर कर्तव्यों का सूचक भी है। जैसा पितृ धर्म, मातृत्व धर्म, राज धर्म आदि। इस प्रकार के धर्म को पंथ या सम्प्रदाय की सीमा से अधिक व्यापक और उदात्त माना जाता है। दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन में कार्य, प्रयास में इंद्रियों द्वारा प्राप्त खुशी का प्रकटीकरण है, लेकिन वे काम की इच्छा करते हैं यहाँ तक कि जैसे ही हम अपने सभी सांसारिक व्यवहार को स्वीकार करते हैं, वही काम उनके पीछे है यहाँ मनु के बारे में यह भी कहा गया है कि काम और क्रिया इस प्रकार मानव मन में उत्पन्न होती हैं इच्छाओं की आकांक्षाओं, आकांक्षाओं की विविधता, इस प्रयास में है। धर्म और अर्थ के बिना, मोक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती। मतलब प्रयास काम की प्राप्ति और अन्य प्रयासों के लिए आवश्यक साधनों को जुटाना अर्थ पुरूषार्थ है।

     पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन में, अर्थ का अर्थ केवल मुद्रा है, मुद्रा का प्रचलित अर्थ प्रतिनिधि का अर्थ केवल उन वस्तुओं से है जो आवश्यक भी हैं और उद्यम से प्राप्त की गई हैं यदि कोई नहीं है, तो वस्तु को अर्थ नहीं कहा जा सकता है। जैसे हवा, पानी, धूप महत्वपूर्ण है जो बिना प्रयास के पाया जाता है, इसलिए उन्हें अर्थ नहीं कहा जा सकता है। उनका मानना है कि प्रयास की प्राप्ति का अर्थ है व्यावसायिक रूचि जिनके अनुसार काम करना चाहिए, अन्यथा व्यक्तित्व में विरोधाभास होगा और व्यक्ति का विकास रूक जाएगा। यह व्यक्ति के लिए अर्थ के प्रभाव और अभाव दोनों के लिए अनावश्यक है।

     पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुक्ति की अवधारणा वेदान्त से प्रभावित है, उनके अनुसार पहले मैं और मेरे को स्वयं के रूप में अनन्त स्वयं की सहायता से पहचानता हूँ जो कि मन और बुद्धि से परे है। बोधवी शिक्षा देते समय, व्यक्ति सर्वांगीण दुनिया में प्रचलित दिव्य भगवान के साथ एकजुट होकर इस प्रयास की वास्तविक प्रकृति को प्राप्त कर सकता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मनुष्य को मोक्ष के माध्यम से इस जीवन से परे देखने के लिए प्रेरित करते हैं। मानव में आध्यात्मिकता पैदा करना है और एक नैतिक जीवन जीने का आदर्श प्रस्तुत करना है क्योंकि यदि मनुष्य इस जीवन को सब कुछ मानता है तो उसके जीवन का लक्ष्य एक मूल्यवान जीवन के बजाय एक फलदायी जीवन होगा। वे कहते हैं जिन साधनों से हमें प्रसन्नता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, उन्हें हमारे यहाँ पुरूषार्थ कहा गया है। यह चार प्रकार के पुरूषार्थ होते हैं। ये चार पुरूषार्थ के लिए कार्य हो सकते हैं और समाज के लिए मुक्ति के लिए प्रयास है।

निष्कर्षः-

शिक्षा समाज से व्यक्ति की ओर होती है समाज अपने अनुकूल शिक्षा व्यक्ति को देता है। उस शिक्षा के माध्यम से मनुष्य कर्म करने के लिए प्रेरित होता है और फिर कर्म की दिशा व्यक्ति से समाज की ओर होती है। जब व्यक्ति समाज के लिए कर्म करता है तो समाज का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वह व्यक्ति के योगक्षेम का संरक्षण करे। योगक्षेम की दिशा समाज से व्यक्ति की ओर होती है। तत्पश्चात् व्यक्ति धर्म के वहन हेतु मोक्ष के लिए यज्ञ करता है। इस प्रकार दिशा पुनः व्यष्टि से समष्टि की ओर हो जाती है। अतः समष्टि से व्यष्टि, व्यष्टि से समष्टि की ओर प्रक्रिया चलती है जिसके परिणामस्वरूप दोनों परमेष्ठी को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए एकात्म शिक्षा देनी चाहिए जिससे उच्च कोटि के समाज की स्थापना हो सके और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव हो। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा निर्मित एकात्म मानववाद न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि समाज, राष्ट्र और संस्कृति के लिए अद्वितीय दर्शन है। इसका लाभ तभी लिया जा सकता है जब पण्डित जी के दार्शनिक विचारों को वर्तमान पीढ़ी आत्मसात करे एवं उनके विचारों व मार्गदर्शन को अपना पथ-प्रदर्शक माने।

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राहुल कुमार

शोधार्थी, बी.एड. विभाग

एम.बी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हल्द्वानी, कुमाऊँ वि.वि., नैनीताल, उत्तराखण्ड.

प्रो॰ (डॉ॰) टी॰सी॰ पाण्डेय

प्रोफेसर, बी.एड. विभाग,

एम.बी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हल्द्वानी,  कुमाऊँ वि.वि., नैनीताल, उत्तराखण्ड.


                                   अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-39, जनवरी-मार्च  2022

UGC Care Listed Issue चित्रांकन : संत कुमार (श्री गंगानगर )


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