शोध आलेख : वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में ‘महाभोज’ : एक पुनर्विश्लेषण / रविन्द्र दान

वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में  महाभोज’ एक पुनर्विश्लेषण
- रविन्द्र दान

शोध सार : ख्यातिलब्ध हिंदी उपन्यासकारमन्नू भंडारीकेमहाभोजउपन्यास में हमें भारतीय राजनीति का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। 1970 के दशक में भारतीय राजनीति का आंतरिक चरित्र कैसा था, उस समय की राजनीति में कौनसे मुद्दे हावी थे, सत्ताधारी एवं विपक्षी दल कौन-कौन से हथकंडों का प्रयोग कर सत्ता प्राप्ति की कोशिश करते थे; इन सभी बातों की गहराई से पड़तालमहाभोजमें की गई है।बिसूजैसे गरीब दलित युवक की मौत(हत्या) किस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए महाभोज का अवसर बन जाती है, जिसमें सभी पार्टियां अपना कुछ--कुछ भोज्य जुटाने के निर्लज्ज प्रयत्न करती हैं। किस प्रकार एक गरीब युवक की मौत को राजनेताओं एवं सरकारी अधिकारियों द्वारा एक तमाशा मात्र बना दिया जाता है। प्रस्तुत शोधकार्य में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इन सभी बातों की गहन पड़ताल करने की कोशिश की गई है। यह जानने का प्रयास किया गया है किमहाभोजकी रचना के चार दशक बाद भारतीय राजनीति का चरित्र कुछ बदला है या नहीं? अगर बदला है, तो कितना? और नहीं, तो क्यों? वर्तमान भारतीय राजनीति को जनहित के पैमाने पर कसकर यह देखने का प्रयास किया गया है कि हम वास्तव में कितने लोकतांत्रिक हो पाए हैं? ‘महाभोजमें अभिव्यक्त राजनीतिक यथार्थ से वर्तमान समय के राजनीतिक यथार्थ की तुलना कर भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को समझने का प्रयास प्रस्तुत शोधकार्य में किया गया है।

बीज शब्द : राजनीति, दलित, मौत, राजनीति का अपराधीकरण, अपराधों का राजनीतिकरण, मूल्यहीनता, गुंडागर्दी, जनविरोधी, विपक्ष, अविश्वास, अवसरवादी, वोटबैंक, शोषण, भ्रष्टाचार, अपराध, चापलूसी, मिलीभगत, राजनीतिक यथार्थ, सत्ता का मोह

मूल आलेख : किसी भी साहित्यिक रचना को महत्त्वपूर्ण बनाने वाले कारकों में एक प्रमुख कारक यह है कि वह रचना अपने समय के यथार्थ को कितनी बारीकी से पकड़ पाती है और उसे कितने प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करती है। इससे आगे बढ़कर यदि कोई रचना अपने समय की परिस्थितियों को आधार बनाकर मानव जीवन की शाश्वत समस्याओं को गहराई से अभिव्यक्त कर देती है तो फिर सोने पर सुहागा हो जाता है। मन्नू भंडारी कामहाभोजउपन्यास इसी तरह की रचना है। इस उपन्यास में 1960-70 के दशक की भारतीय राजनीति के कुरूप चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश की गई है लेकिन मूल्य के स्तर पर इसने राजनीतिक जीवन की शाश्वत समस्याओं को उठाकर एक कालजयी उपन्यास का गौरव भी हासिल कर लिया है।

इस उपन्यास मेंमन्नू भंडारीने राजनीति का घिनौना रूप अत्यंत बारीकी से प्रस्तुत किया है। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक गतिविधियों के यथार्थ को गहराई से नापा है। आज के दौर में इस प्रकार की बेबाक रचनाएँ बहुत कम देखने को मिलती है। इसका कारण चाहे राजनीतिक दबाव को माना जाए या फिर रचनाकारों में देश की राजनीतिक समस्याओं के प्रति उदासीन रहकर सरकारों की चापलूसी करने की प्रवृत्ति को। महाभोज की रचना करने के विचार के विषय में मन्नू भंडारी लिखती हैं कि, “अपने व्यक्तिगत दुःख-दर्द, अंतर्द्वंद्व या आंतरिक नाटक को देखना बहुत महत्त्वपूर्ण, सुखद और आश्वस्तिदायक तो मुझे भी लगता है; मगर जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना, या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं होने लगता? संभवतः इस उपन्यास की रचना के पीछे यही प्रश्न रहा हो। इसे मैं अपने व्यक्तिगत और नियति को निर्धारित करने वाले परिवेश के शोध के रूप में देखती हूँ।1 मन्नू भंडारी के इस कथन के माध्यम से हम एक साहित्यकार की सामाजिक प्रतिबद्धता को देख सकते हैं। वर्तमान समय में यही प्रतिबद्धता हमें पाला बदलती नज़र रही है। आज ऐसे साहित्यकारों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है, जो स्वयं को समाज अथवा जन-साधारण के प्रति प्रतिबद्ध मानकर सत्ता एवं राजनीतिक पार्टियों के प्रति प्रतिबद्ध होते जा रहे हैं।

महाभोज उपन्यास में हमें राजनीति के कई चेहरे देखने को मिलते हैं। एक राजनेता किस तरह से अपने राजनीतिक हितों को सर्वोपरि समझकर जनता के हितों को ताक पर रखता है, इस बात की गहराई से पड़ताल महाभोज की लेखिका करती है। सत्ता प्राप्त करने के लिए राजनेताओं द्वारा कौन-कौनसे हथकंडे अपनाएं जाते हैं, भोली-भाली जनता को भ्रमित करने के लिए नेताओं द्वारा जन-हितैषी होने के मुखौटे पहनने, वोट बैंक की राजनीति के खातिर अपराधियों को सह देने इत्यादि सभी बातों की गहन पड़तालमहाभोजउपन्यास में की गई है। इनकी बानगी हम निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से समझ सकते हैं-

राजनीति में बढ़ती मूल्यहीनताज़ादी के बाद भारतीय राजनीति में मूल्यहीनता की प्रवृत्ति अत्यंत तेजी से बढ़ने लगी और आज तो यह स्थिति गयी है कि आम जनता की नज़र में मूल्यहीनता और राजनीति एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। आम जनमानस में यह बात गहराई से पैठ गयी है कि वर्तमान समय में मूल्यों से समझौता किए बग़ैर राजनीति करना असंभव कार्य है। राजनीति में विद्यमान इसी मूल्यहीनता के शुरुआती चरण की एक प्रभावशाली बानगी हमें महाभोज उपन्यास में दिखाई देती है।

उपन्यास का पात्र काशी विपक्ष के नेता सुकुल बाबू से कहता है कि, “देखो सुकुल बाबू राजनीति हमारी विचार-शून्य तो थी हीइधर कुछ सालों से आचार-शून्य हो गयी है। पर राजनीति के नाम पर यह मारपीट और हुड़दंग मचाने वाली गुंडागर्दी हमारे बस की नहीं।2

सरकारों का जन-विरोधी चरित्र - जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिएकी परिभाषा से स्वयं को महिमामंडित करने वाली आधुनिक सरकारें किस प्रकार अपने चरित्र में जन-विरोधी होती है। इस बात की सशक्त अभिव्यक्ति हमें महाभोज उपन्यास में देखने को मिलती है।

दा साहब जैसे घटिया नेताओं के वर्चस्व को देखकर उपन्यास का पात्र बिंदा अपने मित्र बिसु से कहता है कि, “जब सरकार ही सारी बात को दाब-ढाँक रही है तो तेरे-मेरे भाग-दौड़ करने से क्या होगा? जैसी यहाँ की सरकार वैसी दिल्ली की सरकार।3

स्थिति आज भी वैसी की वैसी ही है। वर्तमान सरकारें भी आए दिन अपने पक्ष के लोगों को संरक्षण देने के लिए कई बार संगीन से संगीन मामलों को दबा देती है। वर्तमान समय की सरकारों को भी सत्ता का मोह सर्वोपरि होता है; उसके लिए चाहे उन्हें दंगा-फसाद करवाना पड़े या वोट-बैंक की राजनीति करनी पड़े, वे बिल्कुल भी नहीं झिझकती हैं।

पुलिस की नेताओं से साठ-गाँठ - किसी भी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में पुलिस की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है। समाज में कानून-व्यवस्था बनाये रखने एवं आम जनता तक न्याय की पहुँच सुनिश्चित करने में पुलिस बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन यदि यही पुलिस सरकार एवं नेताओं के हाथ की कठपुतली बनकर जन-विरोधी चरित्र अख्तियार कर ले तो फिर गरीब जनता का जीना मुहाल हो जाता है। आज़ादी के 75 साल बाद आज भी हमें पुलिस ज्यादतियों एवं पुलिस अधिकारियों द्वारा नेताओं की चापलूसी की घटनाएं देखने-सुनने को मिलती हैं। 1970 के दशक के आस-पास पुलिस एवं सत्ताधारियों की साठगाँठ की परतें उधेड़ने में मन्नू भंडारी पूरी तरह सफल हुई है। महाभोजमें उन्होंने बारीकी से इस बात को परत-दर-परत खोलकर पाठक के सामने रख दिया है। उदाहरण के लिए-

सरोहा गाँव में आगजनी की घटना के बाद जब हरिजन टोले के लोग पुलिस को सूचित करने थाने जाते हैं, तब पुलिस के रवैये का बयान लेखिका ने इस प्रकार से किया है- “दौड़े-दौड़े थाने पहुँचे, पर थानेदार साहब उस दिन छुट्टी पर थे, उन्होंने यह कहकर बात टाल दी कि थानेदार साहब के आने पर ही मौके पर आएँगे और तहकीकात होगी।4 पुलिस वालों के इस रवैये की पड़ताल करती हुई लेखिका कहती है कि, “पुलिस वालों का काम है कि बयानों और प्रमाणों के आधार पर रिपोर्ट करें और ईमानदारी से करें। इसी बात की तनख्वाह दी जाती है उन्हें। ऊपर से आदेश जाएगा तो न्याय कैसे होगा।5 ऊपर से आदेश जाने के कारण न्याय नहीं मिल पाने की यह प्रक्रिया आज भी उसी तरह जारी है या यूँ कहे कि और बढ़ गयी है। सुधार की तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस द्वारा कमजोर तबकों के लोगों की समय पर एफआईआर दर्ज़ नहीं करना आज भी आम बात है।

राजनेताओं द्वारा ईमानदार अफसरों को हतोत्साहित करना एवं चापलूस अफसरों को प्रोत्साहित करना - महाभोज उपन्यास में लेखिका ने बहुत बारीकी से इस समस्या को उठाया है। पुलिस विभाग के दो अधिकारियों एस.पी. सक्सेना और डी.आई.जी. सिन्हा नामक दो अफसरों के प्रति मुख्यमंत्री दा साहब के व्यवहार को इस संदर्भ में देखा जा सकता है, जैसे- ईमानदार पुलिस अफ़सर सक्सेना को दा साहब द्वारा हतोत्साहित करना- “पुलिस वालों में जैसी अंतर्दृष्टि, व्यवहार कुशलता और व्यक्तित्व का ओज होना चाहिए, वैसा कुछ नहीं है सक्सेना में।……….इन्हें जब-जब महत्त्वपूर्ण काम सौंपा गया, परिणाम असंतोषजनक ही रहा। इसीलिए प्रमोशन के हर मौके पर तबादला करके इधर-उधर भेज दिया गया है इन्हें।6

इसके विपरीत सरकार की चापलूसी करने वाले एवं सरकार के मन-मुताबिक झूठी रिपोर्ट्स बनाने वाले पुलिस अधिकारी सिन्हा की मुख्यमंत्री दा साहब भरपूर तारीफ करते हैं हुए कहते हैं कि- “तुम्हारी रिपोर्ट भी देखी है मैंने! मेहनत से तैयार की गई लगती है।7

चापलूसी, भाई-भतीजावाद, पक्षपात आदि की प्रवृतियाँ आज भी राजनीतिक क्षेत्र में एक अनिवार्य बुराई के रूप में मौजूद हैं, जो हमें भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के विषय में सशंकित कर देता है।

विपक्ष के नेताओं की सिद्धान्त-विहीन अवसरवादी राजनीति - वर्तमान समय में राजनीति को अवसरवादी लोगों का गढ़ माना जाने लगा है। सत्ता के लिए बेझिझक पार्टियां बदलना, सरकारें गिरना, साठगांठ करना तो आज आम हो गया है। जो व्यक्ति इन कामों में जितना माहिर होता है, वो स्वयं को उतना ही सफल राजनेता मानता है। महाभोजउपन्यास में भी लेखिका ने गहराई से इस बात को उठाया है। जिस विपक्ष पर सत्ता-पक्ष की तानाशाही एवं जन-विरोधी नीतियों पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी होती है, वही विपक्ष जब इन नकारात्मक प्रवृत्तियों की दौड़ में सत्ता-पक्ष से आगे निकलने की कोशिश करने लगता है तो फिर जनहित हमेशा के लिए गौण हो जाता है और सत्ता-प्राप्ति के हथकंडों का वीभत्स खेल शुरू हो जाता है।

सरोहा गाँव के दलित युवकबिसूकी मौत के बाद विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुकुल बाबू की मनोस्थिति का वर्णन करते हुए लेखिका कहती है कि, “बिसू की मौतलगता है जैसे थाली में परसकर मौका गया है उनके सामने। अपनी हार को जीत में बदलना है उन्हें इस मौके का फायदा उठाकर।8

राजनीति का बढ़ता अपराधीकरण - आजकल तो राजनीति और अपराध चौली-दामन के साथी हो गए हैं। कब कौन अपराधी बड़ा राजनेता बन जाए और कब कौन राजनेता बड़ा अपराधी बन जाए, कहा नहीं जा सकता। ये दोनों वर्ग एक-दूसरे को संरक्षण देकर अपने हितों को साधने की कोशिश करते हैं। राजनीति के अपराधीकरण और अपराधों के राजनीतिकरण के इस दुष्चक्र में गरीब जनता पिस कर रह जाती है। उनके शोषण का कहीं निवारण नहीं हो पाता है। जनता में अपराधियों का भय सिर चढ़कर बोलने लगता है। अगर कोई व्यक्ति इस गठबंधन के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसका अंजाम वही होता है जो महाभोज मेंबिसुका होता है। महाभोजमेंबिसुकी मौत केवल बिसु की मौत है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की मौत की शुरुआत को भी दर्शाती है।

राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण की प्रवृति को लक्षित करते हुए लेखिका कहती है कि, “राजनीति गुंडागर्दी के निकट चली गई है। जिस देश में देव-तुल्य राजनेताओं की परम्परा रही हो, वहाँ राजनीति का ऐसा पतन!”9

जनता का पुलिस पर बढ़ता अविश्वास - इस संदर्भ मेंबिसूके दोस्तबिन्दाऔर एस.पी. सक्सेना का इस विषय में वार्तालाप बहुत ही कम शब्दों में बहुत कुछ कह देता है। बिन्दा एस.पी. को कहता है कि, “कुछ नहीं करेगी यहाँ की पुलिस....कभी कुछ नहीं करेगी। करना होता तो पहले ही नहीं करती?...कानून और पुलिस के हाथ तो बहुत लंबे होते हैं। केवल गरीबों को पकड़ने के लिए?”10

मीडिया का सत्ता से गठजोड़ - लेखिकामन्नू भंडारीने महाभोजउपन्यास मेंमशालपत्र एवं उसके संपादक दत्ता बाबू के क्रियाकलापों के माध्यम से मीडिया के बदलते हुए स्वरूप को प्रकट करने का प्रयास किया है। इस बात की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है कि किस प्रकार आजादी से पहले जो मीडिया जनता की आवाज़ बना हुआ था, वही आज सत्ता की आवाज़ बन चुका है। सरकार से विज्ञापन प्राप्त करने, अखबारी कागज़ का कोटा बढ़ाने जैसे प्रलोभनों में आकर मीडिया किस तरह बिकाऊ हो गया है, इसकी एक बानगी लेखिका नेमशालपत्र से सत्ताधारी दल से संबंधों के माध्यम से दिखाई है।

आधुनिक मीडिया संस्थानों की बदलती हुई प्रतिबद्धताओं को लक्षित करते हुए डॉ. शशि जैकब भी कहती हैं कि, “आज लगभग सभी पत्र किसी--किसी पार्टी से संबंधित है एवं उनके पक्ष में प्रचार करते हैं। पार्टी के विरुद्ध उठाई गई आवाज़ को पूर्णतः पलटकर उनमें फेर-बदलकर झूठी खबरें प्रसारित कर, जनता के साथ अन्याय करते हैं।11

आज तो स्थिति और खराब है। आज तो किसी भी अखबार या मीडिया संस्थान के तटस्थ होने का दावा करना नामुमकिन-सा हो गया है। अधिकतर मीडिया संस्थान तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारों या उनके नुमाइंदे उद्योगपतियों के हाथों में चले गए हैं। इन संस्थानों में सरकार की चापलूसी करने एवं सरकार के विरोधियों को नीचा दिखाने की होड़-सी मची रहती है। जनहित के मुद्दों को निष्पक्षता से उठाना और उन पर संजीदगी से बात करना तो मानो भूल ही गए हैं।

राजनेताओं का पाखंडपूर्ण चरित्र - उपन्यास के प्रमुख पात्रों में से एक मुख्यमंत्री दा साहब का चरित्र-चित्रण करने के क्रम में उनके कमरे के वातावरण का वर्णन करते हुए लेखिका बताती हैं कि, “सजावट के नाम पर केवल दो बड़ी-बड़ी तस्वीरें टँगी हैं दीवार पर- गांधी और नेहरू की। इन्हें अपना पथ-प्रदर्शक और अपनी प्रेरणा मानते हैं दा साहब। गीता का उपदेश उनके जीवन का मूल-मंत्र है। घर के हर कोने में गीता की एक प्रति मिल जाएगी।12

इस वर्णन को देखकर तो यह लगता है कि दा साहब कोई उच्च-सिद्धांतों को मानने वाले महापुरुष होंगे, पर हक़ीक़त में वे इन चीजों का इस्तेमाल अपने चारों ओर झूठा प्रभामंडल बनाने के लिए करते हैं। बिसू की हत्या के मामले में उनके रवैये से उनके पाखंडपूर्ण, सत्ता-लोलुप और बनावटी रूप से पर्दाफाश हो जाता हैं।

एक थैली के चट्टे-बट्टे के गुणों वाली राजनीति - आजादी के बाद भारतीय राजनीति में मूल्यों और सिद्धांतों का तेजी से लोप होने लगा। ऊपर से देखने पर हमें अलग-अलग पार्टियां, विचारधाराएं एवं नेता दिखाई देते हैं, पर भीतर से सभी का चरित्र एक जैसा है। मतदाताओं को इन्हीं भ्रष्ट नेताओं में से ही चुनाव करना है, उनके पास अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। महाभोजउपन्यास मेंमन्नू भंडारीने त्रिलोचन सिंह(लोचन भैया) नामक पात्र के माध्यम से इस मुद्दे को उठाया है। लोचन भैया के विषय में लेखिका कहती है कि, “क्या इसी परिवर्तन के लिए सुकुल बाबू की पार्टी और विधानसभा छोड़ी थी उन्होंने? इसी क्रांति का सपना देखा था? और क्या इसी टुच्चेपन की सौदेबाजी के लिए मंत्रिमंडल गिराने की बात सोच रहे हैं वे? नाम, चेहरे, लेबुल भले ही अलग-अलग हो-पर अलगाव है कहाँ-सुकुल बाबू…..दा साहब…..राव-चौधरी…..13

राजनेताओं की अंधविश्वास-पूर्ण सोच - जिन नेताओं पर समाज को अंधविश्वासों, कुप्रथाओं, रूढ़ियों आदि से मुक्त करने की जिम्मेदारी होती है, वे ही लोग जब इनके पोषक बन जाएं तो फिर समाज की स्थिति शोचनीय होना तय है। महाभोजमें सुकुल बाबू के उदाहरण द्वारा इस बात को भली-भांति समझा जा सकता है। उपन्यास में वर्णन आता है कि, उँगली आँखों के सामने लाकर सुकुल बाबू मुग्ध भाव से नीलम को देखते रहे……बस! अब तेरा ही भरोसा है…..तू ही पार लगाना! फिर उठे और सीधे बैठकर जोर-जोर से एक मंत्र का जाप करने लगे।14

इस उपन्यास के महत्व की बात की जाए तो रजनी गुप्त ने ठीक ही कहा है कि, “इस उपन्यास के लघु कलेवर में राजनीति के वृहत् और जटिल जीवन की चुनौतियों के साथ अपना हित साधने की दुरभिसंधियों और साजिशों को बड़ी बारीकी से बुनकर पूरे साहस से निरावृत्त करने का रचनात्मक कौशल देखते ही बनता है।15

देश के वर्तमान राजनेताओं में भी स्वयं को विपक्षी नेताओं से बढ़कर धार्मिक व्यक्ति दिखाने का नया ही चलन शुरू हो गया है। आजकल के राजनेता स्वयं को ज्यादा धार्मिक दिखाने और धर्म-विशेष के मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कई कर्मकांडों, धार्मिक-पाखंडों एवं अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं। एक स्वस्थ एवं लोकतांत्रिक समाज के विकास को ऐसे चलन अत्यंत नकारात्मक ढंग से प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष : यह कहा जा सकता है किमहाभोजजैसे एक लघु उपन्यास में लेखिकामन्नू भंडारीने भारतीय राजनीति की सच्चाईयों को बिना लाग-लपेट के परत-दर-परत उधेड़कर रख दिया है। किसी भी रचना की सबसे बडी खूबी यह होती है कि वह अपने समय के यथार्थ को कितना गहराई से पकड़ पाती है और उसे कितने प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है।महाभोजइस पैमाने पर पूरी तरह से खरा उतरने वाली रचना है। इसमें लेखिका ने केवल अपने समय की राजनीति के यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है, बल्कि भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा के प्रति भी संकेत कर हमें समय रहते सचेत करने का कार्य भी किया है।

संदर्भ :
1) मन्नू भंडारी,म्पूर्ण उपन्यास (महाभोज), राधाकृष्ण प्रकाशन,दिल्ली,पृष्ठ संख्या 295
2) मन्नू भंडारी, महाभोज, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2011, पृ.सं. 81
3) वही, पृ.सं.126
4) वही, पृ.सं.07
5) वही, पृ.सं.20
6) वही, पृ.सं.150
7) वही, पृ.सं.151
8) वही, पृ.सं.25-26
9) वही, पृ.सं.26
10) वही, पृ.सं.126-127
11) शशि जैकब, महिला उपन्यासकारों की रचनाओं में वैचारिकता, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा, संस्करण 1989, पृ.सं.170
12) मन्नू भंडारी, महाभोज, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2011, पृ.सं.14
13) वही, पृ.सं.62
14) वही, पृ.सं.36
15) डॉ.शशि जैकब, महिला उपन्यासकारों की रचनाओं में वैचारिकता, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा, संस्करण 1989, पृ.सं
.170

रविन्द्र दान
शोधार्थी, पीएचडी तृतीय वर्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati), चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

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