शोध आलेख : काशी में आयुर्विज्ञान का ऐतिहासिक विकास : आधुनिक काल के परिप्रेक्ष्य में / डॉ. सत्यपाल यादव

काशी में आयुर्विज्ञान का ऐतिहासिक विकास : आधुनिक काल के परिप्रेक्ष्य में
- डॉ. सत्यपाल यादव

शोध सार : काशी प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक आयुर्वेद का प्रमुख केंद्र रही है जहाँ से वैद्य-विद्या का समस्त क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार होता रहा है। वाराणसी में चिकित्सा पद्धति के सभी स्वरूप मौजूद हैं। ये अलग बात हैकि आज एलोपैथ का वर्चस्व है फिर भी, चिकित्सा पद्धति की विविधता इसे मेडिकल हब के रूप स्थापित करती है। आज बनारस में योग, स्पा मसाज एवं आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक पद्धति से चिकित्सकीय लाभ प्राप्त करने के लिए सिर्फ पूरे भारत से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। आज बनारस में सामान्य से लेकर असाध्य रोगों तक  के उपचार सम्बंधित उच्च स्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध है। वर्तमान में मेडिकल पर्यटन की अवधारणा का तेजी से प्रसार हुआ है। बड़ी संख्या में स्वास्थ्य लाभ हेतु पर्यटक वाराणसी रहे हैं, जिसके फलस्वरूप यहाँ चिकित्सा सेवाओं के साथ ही पर्यटन का भी तेजी से विकास हो रहा है, जो वाराणसी की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है। परन्तु अभी भी इस दिशा में काफी सुधार की आवश्यकता है।

बीज शब्द : आयुर्विज्ञान, आयुर्वेद, होम्योपैथ, एलोपैथ, बनारस, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, चिकित्सा, काशी, आधुनिक।

मूल आलेख  : काशी की भूमि सदियों से हिन्दुओं के लिए परम तीर्थ स्थान रही है। यह नगरी हिन्दुओं के साथ ही अन्य धर्मानुयायियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। हिन्दुओं का मानना है कि काशी में मृत्यु का वरण करने से पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति अथवा मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशी मोक्ष, मंदिरों, गंगा घाटों और माधुर्य की अखिल भारतीय नगरी है। यह संस्कृति और साधन का संगम है। काशी चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की पुनीत नगरी है, जहाँ प्रचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक साधु संतों एवं सन्यासियों की सतत् परम्परा चली रही है। बाबा काशी विश्वनाथ एवं काल भैरव की आराधना, आध्यात्म एवं गंगा आरती के लिए विश्व प्रसिद्ध काशी के गंगा घाट सम्पूर्ण भारत वर्ष के सांस्कृतिक एकीकरण, उत्साह एवं उमंग का प्रतीक है। काशी अपनी पुरातनता, परम्पराओं तथा आध्यात्मिकता के लिए भारतवर्ष ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में एक विशेष एवं अनुपम स्थान रखता है। काशी नगरी को सभी लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं तथा इसकी पहचान को विभिन्न स्वरूपों में व्यक्त करते हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक नगरी, कुछ इसे ऐतिहासिक नगरी, कुछ सांस्कृतिक राजधानी तो कोई इसे आध्यात्मिक नगरी की संज्ञा देता है। अपने इन्हीं गुणों के फलस्वरूप वर्तमान समय में यह वैश्विक स्तर पर एक पर्यटन स्थल के रूप में तेजी से उभरा है।

काशी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर विद्वानों का बहुत कम ध्यान गया है; वह पक्ष है आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में इसका महत्व। काशी सदियों से शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र रही है तथा यहाँ शिक्षण के विषयों में आयुर्वेदिक चिकित्सा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन काल से ही काशी में आयुर्वेद की दोनों शाखाओं-शल्य एवं काय चिकित्सा साथ साथ फले-फूले हैं। ऐसा माना जाता है कि आयुर्वेद की उत्पत्ति वाराणसी में हुई और यहीं से भारत के अन्य भागों में इसका प्रचार-प्रसार हुआ। शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत और दिवोदास जैसे आयुर्वेदाचार्यों का कार्य क्षेत्र काशी ही रहा है। भागवत सिंह अपनी पुस्तक शार्ट हिस्ट्री ऑफ आर्यन मेडिकल साइंस में उल्लेख करते हैं कि आयुर्वेद के विकास में काशी का स्थान महत्वपूर्ण रहा है।1  काशी और तक्षशिला प्राचीन काल में आयुर्विज्ञान के शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र रहे हैं।2

उपलब्ध आयुर्वेदिक संहिताओं में चरक संहिता प्राचीनतम है, जिसका मूल भाग लगभग 3000 .पू. माना जाता है। इसके यञ: पुरुषीय परिषद् सूत्र 25 में काशीपति वामक विवेच्य विषय की स्थापना करते हैं। काशीराज वामक वमन विरेचन आदि पंचकर्म तथा काय चिकित्सा में निपुण थे।3 महान भारतीय शल्य चिकित्सक सुश्रुत काशी में ही शल्य चिकित्सा का अभ्यास करते थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना सुश्रुत संहिता को भी यहीं संकलित किया था।4

भारतीय इतिहास के मध्य काल में विदेशी आक्रमणों तथा मुस्लिम शासन की स्थापना से उत्पन्न हलचलों के बावजूद भी वाराणसी में आयर्वेद की समृद्धि बनी रही। भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद चिकित्सा की यूनानी पद्धति का भारत में आगमन हुआ तथा मध्य काल में बनारस के एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र होने के फलस्वरूप यहाँ भी यूनानी चिकित्सा पद्धति विकसित हुई तथा कालान्तर में आमजनों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में आयुर्वेद के साथ साथ यूनानी चिकित्सा पद्धति ने भी योगदान दिया।5 मध्यकालीन शासकों ने अनेकों आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सालयों की स्थापना की तथा उनमें वैद्यों एवं हकीमों को भी नियुक्त किया। इस दौरान मूल रूप से संस्कृत में लिखित अनेकों आयुर्वेदिक ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। इनमें सिकंदर लोदी के शासनकाल मेंफरहंग--सिकंदरी नाम से फारसी भाषा में अनुवादित प्रमुख आयुर्वेदिक ग्रंथ है।6 इटालियन यात्री निकोलियो मनूची ने अपनी पुस्तक स्टोरियो डी मोगरो में मुगलकालीन चिकित्सा व्यवस्था का वर्णन करते हुए बताया है कि इस समय वस्टि (एनिमा) का चलन नहीं था तथा उसके लिए तो कोई साधन उपलब्ध था और ही कोई इनका उपयोग जानता था।7

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल वंश एवं साम्राज्य का तेजी से पतन हुआ तथा भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्वतंत्र प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ। इसी दौरान अनेकों विदेशी कंपनियों का भारत में आगमन हुआ तथा उन्होंने विभिन्न प्रांतीय शक्तियों को आपस में लड़ाकर अपने साम्राज्य के स्थापना की नीति अपनायी जिसमें अंग्रेज अग्रणी रहे।

जैसा कि सर्वविदित है कि भारत में सैन्य शक्ति ही ब्रिटिश शासन की स्थापना एवं विकास का आधार थी। पाश्चात आयुर्विज्ञान का प्रवेश भी भारत में ब्रिटिश सेना के माध्यम से ही हुआ। डेविड अर्नाल्ड ने अपनी पुस्तक औपनिवेशिक भारत में विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं आयुर्विज्ञान में बताया है कि भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित करने में अंग्रेजों की विज्ञान एवं तकनीकी एवं आयुर्विज्ञान सर्वाधिक मददगार रही थी, जिसमें आयुर्विज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। अंग्रेजों ने आरम्भ में अपने पाश्चात आयुर्विज्ञान का प्रयोग अपने सैनिकों को चिकित्सकीय सुविधाएँ प्रदान करने तक ही सीमित रखा।8 1764 . में एक आयुर्विज्ञान विभाग की स्थापना की गई, जिसके माध्यम से ब्रिटिश भारतीय सेना को चिकित्सकीय सुविधा प्रदान किया जाता था।9 बाद में 1785 . में बंगाल, मद्रास और बम्बई तीनों प्रेसिडेंसियों में आयुर्विज्ञान विभाग की स्थापना की गई, जिसमें कुल 234 सर्जन नियुक्त किए गए थे।10 1796 . में अस्पताल विभाग को आयुर्विज्ञान विभाग के रूप में गठन किया गया, जिसका कार्यक्षेत्र सेना के साथ साथ नागरिकों को भी चिकित्सा सेवा देना था।

1868 . में एक स्वतंत्र नागरिक आयुर्विज्ञान विभाग की स्थापना बंगाल में की गई।11 1896 . में तीनों प्रेसिडेंसियों बम्बई, कलकत्ता एवं मद्रास में आयुर्विज्ञान विभाग को मिलाकर भारतीय आयुर्विज्ञान सेवा का गठन किया गया।12

बनारस में ब्रिटिश रेजिडेंट जॉनाथन डंकन ने ब्रिटिश हितों को पूरा करने के उद्देश्य से संग्रहित फंड से दो अस्पतालों का निर्माण करवाया, जिसमें बनारस के तत्कालीन राजा और जमींदारों ने पर्याप्त योगदान दिया।13 तत्पश्चात करीब 100 वर्षों बाद 1889 . में बनारस में विक्टोरिया अस्पताल की स्थापना की गई।14

बनारस में पाश्चात आयुर्विज्ञान के विकास के संदर्भ में डेविड अर्नाल्ड एवं मॉरिसन बताते हैं कि प्रारंभ में यहाँ के निवासियों ने पाश्चात आयुर्विज्ञान को नजरअंदाज किया तथा क्वारंटाइन व्यवस्था के साथ ही हैजा (कॉलेरा), प्लेग एवं चेचक जैसी गंभीर एवं जानलेवा बीमारियों के वैक्सीन का कड़ा प्रतिरोध किया।15 वहीं दूसरी ओर मधु शर्मा एवं माधुरी शर्मा ने अपने लेख पब्लिक हेल्थ एंड हिस्टोरिकल सिटी ऑफ बनारस में बताया है कि बनारस के निवासियों विशेषकर संभ्रांत वर्ग ने केवल पाश्चात आयुर्विज्ञान को स्वीकार किया बल्कि उसके विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में यहाँ के निवासियों ने पाश्चात आयुर्विज्ञान को संदेह की दृष्टि से देखा, जिसके फलस्वरूप वे इसका उपयोग करने से बचते रहे होंगे किन्तु धीरे-धीरे उन्होंने इसे अपने लिए लाभदायक मानकर स्वीकार कर लिया तथा समाज के संभ्रांत वर्ग ने इसे प्रोत्साहित भी किया।16

बनारस के राजा द्वारा 1894 . में ज्ञानपुर में महाराजा चेत सिंह अस्पताल, 1911 . में चकिया में महाराजा ईश्वरी नारायण अस्पताल, 1931 . में महाराजा आदित्य नारायण सिंह अस्पताल तथा 1932 . में गोपीगंज में बी.एन सिंह अस्पताल की स्थापना की गई।17

वर्ष 1916 . में लक्ष्मी नारायण मारवाड़ी हिन्दू अस्पताल की स्थापना मारवाड़ी सेठ लक्ष्मीनारायण द्वारा की गई। इसके अलावा, कई अन्य संगठनों द्वारा भी अनेकों अस्पतालों की स्थापना की गई। 1931 . में आर्य समाज ने हिन्दू सेवा सदन की तथा 1948 . में वल्लभ राव शालिग्राम चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की गई। इन अस्पतालों में सिर्फ एलोपैथ ही नहीं बल्कि होम्योपैथ एवं आयुर्वेदिक चिकित्सक भी नियुक्त किए गए।18 1951 . के जिला मेडिकल रिकॉर्ड के आंकड़ों के अनुसार उस समय चिकित्सा सेवा में 3144 व्यक्ति जुड़े थे, जिनमें 119 पुरुष और 21 महिला प्रेक्टिशनर, 20 डेंटिस्ट, 14 कंपाउंडर, 2 नर्स, 2 मिडवाइफ और 497 अन्य कर्मचारी विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत थे।19

बनारस में सिर्फ एलोपैथ का ही नहीं बल्कि होम्योपैथ का भी पर्याप्त विकास हुआ। 1865 . में प्रसिद्ध होम्योपैथ चिकित्सक बाबू लोकनाथ मित्रा बनारस आए तथा यहाँ होम्योपैथ का प्रैक्टिस प्रारंभ किया। वे राजेंद्र लाल दत्त के शिष्य थे, जो स्वयं होम्योपैथ चिकित्सा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित एवं जाने-माने नाम थे। बाबू लोकनाथ मित्रा ने आमजनों के बीच होम्योपैथ चिकित्सा के प्रति भरोसा कायम किया। आगे चलकर बाबू लोकनाथ मित्रा ने 1867 . में स्थापित बनारस होम्योपैथ अस्पताल का कार्यभार संभाला तथा उनके प्रयासों से आसपास के क्षेत्रों में होम्योपैथ चिकित्सा का काफी प्रचार-प्रसार हुआ। आगे जाकर बनारस से इलाहबाद, आगरा एवं उत्तर पश्चिमी प्रान्त के विभिन्न क्षेत्रों में होम्योपैथ का प्रचार-प्रसार हुआ।20

बनारस में आयुर्विज्ञान के विकास में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसकी स्थापना औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान वर्ष 1916 . में पंडित मदन मोहन मालवीय जी के द्वारा की गई थी। इस शैक्षणिक संस्थान ने आयुर्विज्ञान चिकित्सा के क्षेत्र में बनारस को एक नई पहचान दी। पंडित मदन मोहन मालवीय जी के पास सर्वोत्तम आयुर्वेदिक और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों को एकीकृत करने का दृष्टिकोण था। इसके फलस्वरूप वर्ष 1922 . में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राच्य और धर्मशास्त्र संकाय के अंतर्गत एक विभाग के रूप में आयुर्वेद के पठन एवं प्रशिक्षण की शुरुआत की गई।21 प्रशिक्षुओं को प्रायोगिक ज्ञान देने के साथ ही आमलोगों को उच्च कोटि की चिकित्सकीय सेवा प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 1924 . में 96 बिस्तरों से युक्त काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही सर सुन्दरलाल चिकित्सालय की स्थापना की गई।22 यह प्रयास आयुर्वेद में शोध एवं वैज्ञानिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ। वर्ष 1927 . में मेडिसिन एंड सर्जरी फैकल्टी (आयुर्वेद) के अंतर्गत और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दोनों में पठन-पाठन एवं प्रशिक्षण देने के लिए एक अलग आयुर्वेदिक कॉलेज शुरू किया और साथ ही मेडिसिन एंड सर्जरी (.एम.एस) के साथ 6 वर्ष का आयुर्वेद का कोर्स प्रारंभ किया गया।23 इस प्रकार, 1927 में आयुर्वेद को एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में स्थापित किया गया और ऐसा करने वाला काशी हिन्दू विश्वविद्यालय देश का प्रथम विश्वविद्यालय बना।24

वर्ष 1960 में आयुर्वेदिक कॉलेज को मेडिकल साइंसेज कॉलेज में परिवर्तित कर दिया गया तथा यहाँ एम.बी.बी.एस की पढ़ाई शुरू हुई। इस कार्य में आयुर्वेदिक कॉलेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य प्रोफेसर के.एन.उडुपा की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। वर्ष 1963 . में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया मेडिसिन की स्थापना की गई तथा इसी वर्ष भारतीय चिकित्सा स्नातकोत्तर संस्थान को चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के अभिन्न अंग के रूप में स्थापित कर विभिन्न स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किया गया तथा आधुनिक चिकित्सा में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुए।25

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के चिकित्सा शिक्षा एवं सेवा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन को देखते हुए सरकार द्वारा गठित एक समिति की अनुशंसा पर वर्ष 1971 . में इस आयुर्विज्ञान महाविद्यालय को संस्थान का दर्जा दिया गया।26 इस प्रकार, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का विकास हुआ, जो उच्च कोटि की चिकित्सा सेवा प्रदान करने वाले केंद्र के तौर पर आज भी अपनी सेवाएँ दे रहा है। यहाँ एक ही छत के नीचे आयुर्वेद के साथ ही आधुनिक आयुर्विज्ञान के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा एवं सेवा दी जाती है। आई.एम.एस., बी.एच.यू. केवल वाराणसी, बल्कि सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार, मध्य प्रदेश, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ की 20 करोड़ की आबादी को कम खर्च में उच्च कोटि की चिकित्सकीय सुविधाएँ उपलब्ध कराता है।27

आजादी के बाद आयुर्विज्ञान के विकास को सीलन अम्बू ने अपने शोध लेख हेल्थ केयर सिस्टम इन इंडिया : एन ओवरव्यू में तीन चरणों में वर्गीकृत किया है।28

प्रथम चरण (1947 . से 1983 .) : इस चरण में ज्यादातर अस्पताल सार्वजनिक क्षेत्र के थे और स्वास्थ्य सेवा को सरकार की जिम्मेदारी माना जाता था। इस दौरान वाराणसी में भी चिकित्सा सेवा सरकारी चिकित्सालयों एवं चिकित्सकों पर ही निर्भर था।

दूसरा चरण (1983 . से 2000 .) : इस चरण में 1983 . में सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषण की गई और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में निजी उद्यम को प्रोत्साहन देने पर बल दिया गया। इसके फलस्वरूप देश में तेजी से चिकित्सा सेवाओं का विस्तार होने लगा। बनारस के सन्दर्भ में हम देखते हैं कि इस दौरान यहाँ अनेक निजी चिकित्सालयों की स्थापना की गई। उदहारण के तौर पर देखें तो वर्ष 1994 . में हेरिटेज अस्पताल तथा 22 दिसम्बर 1996 . को एपेक्स अस्पताल की स्थापना की गई। यह दोनों अस्पताल अपने स्थापना के समय से ही वाराणसी में चिकित्सा सेवा देने में अपनी महत्ती भूमिका निभा रहे हैं। इसी चरण में आई.एम.एस., बी.एच.यू. में वृहत स्तर पर शैक्षणिक एवं चिकित्सा सेवाओं का विस्तार हुआ। वर्ष 1999 . में आयुर्वेद में साढ़े चार साल की अवधि के स्नातक पाठ्यक्रम के बाद एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप की शुरुआत की गई, जो सेन्ट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन की सिफारिशों के अनुसार, बी..एम.एस. की डिग्री प्रदान करने के लिए आवश्यक थी।2

तृतीय चरण (2000 . के बाद से) : इस चरण में चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में सार्वजनिक एवं निजी संयुक्त उद्यम को प्रोत्साहन मिला। देशभर में इस मॉडल पर अनेक चिकित्सालयों एवं चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना की गई तथा स्वास्थ्य बीमा आदि क्षेत्रों को भी प्रोत्साहन दिया गया। वर्ष 2006 में आई.एम.एस., बी.एच.यू. में चिकित्सा शिक्षा एवं सेवा का विस्तार करते हुए 6 नए विभागों का गठन किया गया।30 इसी कड़ी में वर्ष 2012 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय ने केरल आयुर्वेदिक लिमिटेड कंपनी के साथ मिलकर पंचकर्म पद्धति की शुरुआत की, जो आयुर्वेदिक पद्धति से दर्द निवारण की एक कारगर विधि के रूप में प्रसिद्ध है।31

निष्कर्ष : हम यह पाते हैं कि बनारस में प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक आयुर्वेदिक चिकित्सा सेवाओं का एक लम्बा इतिहास रहा है। यहाँ पर आयुर्वेदिक शिक्षा एवं चिकित्सा प्रणाली की उपस्थिति लगभग सभी कालखंडों में विद्यमान रही है तथा यहाँ से शिक्षा प्राप्त करने वाले आयुर्वेदाचार्यों ने इस पद्धति को भारत के अन्य भागों में भी फैलाया। औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान एलोपैथ चिकित्सा पद्धति पर बल दिए जाने के कारण आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के प्रयोग में कमी आई तथा भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी इसके विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। वर्तमान में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का पुनरुत्थान हो रहा है तथा साथ ही सरकार भी इसके विकास पर ध्यान दे रही है किन्तु फिर भी इसके समक्ष अनेकों चुनौतियाँ विद्यमान हैं।

वर्त्तमान समय में वाराणसी सहित देश के अन्य भागों में भी गुणवत्तापूर्ण आयुर्वेदिक दवाओं का अभाव हो रहा है। अच्छी देशी दवाओं का मिलना और इनकी पहचान करना कठिन हो गया है। इस दौरान एलोपैथिक चिकित्सा के विस्तार से आयुर्वेद की विश्वसनीयता में भी कमी आयी है। कुछ आयुर्वेदिक चिकित्सक भी मरीजों को आयुर्वेदिक दवाओं के स्थान पर एलोपैथिक दवाएँ देने लगे हैं। इससे आयुर्वेदिक चिकित्सा सेवाओं एवं इसकी विश्वसनीयता में कमी आई है। वाराणसी में आयुर्वेदिक चिकित्सा का अस्तित्व बना रहे तथा इसका विस्तार हो, इसके लिए एक उच्च स्तरीय शोध केंद्र की स्थापना की जानी चाहिए, जहाँ नई- नई दवाओं और जड़ी-बूटियों की खोज और निर्माण हो। आयुर्वेद के उत्थान की इस कड़ी में जड़ी-बूटियों की खेती को प्रोत्साहन एवं इससे होने वाले लाभों की जानकारी देने की व्यवस्था भी अपरिहार्य हो जाता है।

सन्दर्भ :
1. भागवत, सिंह, 1896, शार्ट हिस्ट्री ऑफ आर्यन मेडिकल साइंस, न्यूयार्क: मैकमिलन कंपनी. ताबिश, एस. ., 2000, हिस्टोरिकल डेवलपमेंट ऑफ हेल्थ केयर इन इंडिया, https://www.researchgate.net/publication/290447383_Historical_Development_of_Health_Care_in_India  
2. https://Kashikatha.com/Varanasi-me-Ayurved-ki-parampara
3. www.bhu.ac.in/site/unit Home template/1-52-1118-Institute of Medical Sciences-Faculty of Ayurveda.
4. ताबिश, एस. ., 2000, हिस्टोरिकल डेवलपमेंट ऑफ हेल्थ केयर इन इंडिया, https://www.researchgate.net/publication/290447383_Historical_Development_of_Health_Care_in_India  
5. इम्पिरिअल गजेटियर ऑफ इंडिया, प्रोवेंसिअल सीरीज: यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एंड अवध, अंक 2, 1908, कलकत्ता: सुप्रीटेंडेंट ऑफ गवर्नमेंट प्रिंटिंग.
6. विद्यालंकार, अत्रिदेव, 1976, आयुर्वेद का वृहत् इतिहास, इलाहाबाद: युनिवर्सिटीज प्रेस, पृ.सं. 293-94.
7. अर्नाल्ड, डेविड, 2005, औपनिवेशिक भारत में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आयुर्विज्ञान’, नर्इ दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 84.
8.  सुपर, , एंड अंशु, 2016, एवोल्युसन ऑफ मेडिकल एजुकेशन इन इंडिया: इम्पैक्ट ऑफ कोलोनियलिस्म, जर्नल ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिसिन, अंक 62, संख्या 4, पृष्ठ. 255-59.
9. नेगढ़ी, एच, शर्मा, के, एंड  जोडपे, एस. पी., 2012, : हिस्ट्री एंड एवोल्युसन ऑफ पब्लिक हेल्थ एजुकेशन इन इंडिया, इंडिया जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ अंक 56, संख्या 1,
पृष्ठ. 12-16.
10. वही.
11. मुस्ताक, वी.एम., 2009, पब्लिक हेल्थ इन ब्रिटिश इंडिया: ब्रीफ अकाउंट ऑफ मेडिकल सर्विसेज एंड डिजीज प्रिवेंशन इन कोलोनियल इंडिया, इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन, अंक 34, संख्या 1, पृष्ठ. 6-14.
12.शर्मा, एम. एंड शर्मा, एम., 2002,  "पब्लिक हेल्थ एंड हिस्टोरिकल सिटी ऑफ बनारस:  एमरजेंस ऑफ कंसर्न: प्रोसेडिंग ऑफ इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, अंक 63, पृष्ठ. 987-94.
13. वही.
14. वही.
15. वही.
16. वही.
17. वही.
18. वही.
19.  बनारस होम्योपैथिक हॉस्पिटल एंड डिस्पेंसरी, 1896, कलकत्ता जर्नल ऑफ मेडिसिन, अंक 1,  संख्या 1, पृष्ठ. 28.
20.  तूली, एस.एम., 1991, इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, बी.एच.यू. वाराणसी, नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया, अंक 4, संख्या 3, पृष्ठ. 144-147.
21. वही.
22.  www.bhu.ac.in/site/unithometemplate/1-52-1118-Institute of medical science-faculty of Ayurveda.
23.  तूली, एस.एम., 1991, इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, बी.एच.यू. वाराणसी, नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया, अंक 4, संख्या 3, पृष्ठ. 144-147.
24. www.bhu.ac.in/site/unithometemplate/1-52-1118-Institute of medical science-faculty of Ayurveda.
25. तूली, एस.एम., 1991, इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, बी.एच.यू. वाराणसी, नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया, अंक 4, संख्या 3, पृष्ठ. 144-147.
26. वही.
27. अनबू, एस. एंड शीबा, , 2000, हेल्थ केयर सिस्टम इन इंडिया: एन ओवरव्यू, रिसर्च गेट https://www.researchgate.nat/publication/340085233.
28. www.bhu.ac.in/site/unithometemplate/1-52-1118-Institute of medical science-faculty of Ayurveda.
29. वही.
30. मिश्रा, एस., 2012, मेडिकल टूरिज्म इन इंडिया: केस स्टडी ऑफ लखनऊ एंड वाराणसी, थीसिस ऑन शोधगंगा.

 

डॉ. सत्यपाल यादव
असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश- 221005.

   अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका, अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

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