शोध आलेख : महात्मा गाँधी का साहित्यिक संस्कार : एक अवलोकन / सरिता कुमारी

महात्मा गाँधी का साहित्यिक संस्कार : एक अवलोकन
- सरिता कुमारी

शोध-सार : महात्मा गाँधी केवल भारतीय राजनीतिक आंदोलन के ही प्रेरणा-पुरूष के रूप में प्रसिद्ध नहीं थे बल्कि उनके महान व्यक्तित्व का प्रकाश सम्पूर्ण आधुनिक भारतीय साहित्य के रचनात्मक कर्म पर पड़ा है। उनकीचेतना, चिंतन और स्वप्न से तत्कालीन भारतीय साहित्यकार प्रभावित हुए हैं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, ठाकुर गोपाल शरण सिंह, मुक्तिबोध जैसे कई साहित्यकारों ने गाँधी के विचार और चरित्र का सर्जनात्मक उपयोग अपनी रचनाओं में किया है। महात्मा गाँधी जैसे महान तपस्वी, सत्य शोधक, साधक एवं युग पुरूष से साहित्य कैसे अछूता रह सकता है। युग पुरूष तो वही कहला सकता है जिसके दृष्टिकोण, चिंतन एवं वाणी में उस युग का सार तत्व परिलक्षित होता है। इस संदर्भ में यदि महात्मा गाँधी की बात की जाए तो सारी बातें अक्षरशः उन पर लागू होती हैं। महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू जिस पर देश के बुद्धिजीवी-चिन्तकों ने समझने का काम नहीं किया वह है- साहित्यिक संस्कार और सरोकार वाली छवि। साहित्यकारों, आलोचकों एवं पाठकों के समक्ष यह विषय हमेशा उपेक्षित रहा। महात्मा गाँधी केवल राजनीतिक चेतना के विचारक ही नहीं थे बल्कि साहित्यिक चेतना भी इनमें थी।

बीज शब्द : गाँधी, संस्कार, आंदोलन, अहिंसा, नैतिकता, साहित्य, चिंतन, आत्मानुशासन।

मूल आलेख : महात्मा गाँधी की कलात्मक चेतना का प्र्रस्फुटन कब, कहाँ और कैसे हुआ? इसका कोई निर्धारित केंद्र बिंदु का पता तो नहीं चला है लेकिन इतना अवश्य है कि विद्यार्थी जीवन में मध्यकालीन संतों एवं भक्ति-साहित्य को पढ़े होंगे। बचपन में गुजराती महाकवियों, संतों की मधुरवाणी का प्रभाव पड़ा। नरसी मेहता के भजन करोड़ों भारतीय कंठों में जीवित करने का श्रेय इन्हीं को जाता है। डा॰ भगवान सिंह अपनी पुस्तकगाँधी का साहित्य और भाषा चिंतन में लिखते हैं- साबरमती के संत, महात्मा, ‘सत्याग्रहके आविष्कारक, सत्य-अहिंसा के पुजारी, राष्ट्रपिता आदि रूपों में मोहनदास करमचंद गाँधी की जो छवि बनी हुई है, उससे यह कभी आभासित नहीं होता ऐसे व्यक्ति का काव्य, साहित्य, कला आदि से भी कोई सरोकार रहा होगा। यह सच है कि गाँधीजी ने कविता, कहानी, उपन्यास जैसी किसी साहित्यिक विद्या को अपनी लेखनी से कृतार्थ नहीं किया, किन्तु उससे बड़ा सच यह है कि उन्होंने साहित्य एवं कला के चाहे वह भारतीय हों या विदेशी- नाना अंगों-उपांगों का गहरा अध्ययन कर रखा था और जीवनपर्यंत उनकी दिलचस्पी इनमें बनी रही। उनके चिंतन को प्रभावित करने में जहाँ देश-काल परिस्थितियों और नाना सामाजिक-राजनीतिक चिंतकों के विचारों से गहरे परिचय का हाथ रहा, वहीं साहित्य-कला-संसार के लगाव ने भी उनकी सोच को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।1 जिस मानव के पास विराट मानवतावादी विचार हो, हृदय में दबे, कुचले, उपेक्षित, शोषित, अछूत, मजदूर, किसान की दीनता लाचारी को समाप्त करने वाली कल्याणकारी मानवीय दृष्टि हो वही मानव जाति का उद्धार कर सकता है वही मानव समाज और राष्ट्रीय जीवन में समरसता ला सकता है। महात्मा गाँधी ऐसे मानव थे।

              जहाँ तक उनकी काव्यात्मक चेतना या काव्यामक दृष्टि की बात आती है वह साहित्य की गद्य विधाओं में देखी जा सकती है। महात्मा गाँधी व्यक्ति, परिवेश, स्थितियों, प्राकृतिक दृश्यों का किसी मंजे हुए या परिपक्व साहित्यकार की तरह चित्रण करते हैं। यह उनकी सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि का बोध कराता है। गद्य-लेखन का सबसे बड़ा उदाहरण उनकी लिखित दो प्रसिद्ध पुस्तकहिन्द स्वराजऔरसत्य के साथ मेरे प्रयोगमें मिल जाता है। इसलिए इन्हें साहित्यकार पहले और बाद में महात्मा कहा जाता है। उनकी कलात्मक चेतना का दर्शन उनके यात्रा-वृत्तांत और संस्मरण में होता है। 4 सितंबर, 1888 को गाँधी जी लंदन के लिए समुद्री मार्ग की यात्रा किये थे। जीवन में पहली समुद्री यात्रा थी। इस समुद्री यात्रा का वर्णन उस समय अपनी एक डायरी में किया है। यह डायरी संपूर्ण गाँधी वाङ्मय के प्रथम खंड के पृष्ठ नौ पर प्रकाशित हुई।समुद्र यात्रा लगभग 5 बजे शाम को जहाज का लंगर उठा। यात्रा को लेकर मैं बहुत शंकित था परंतु सौभाग्य से वह मेरे अनूकूल पड़ी। सारी यात्रा में मुझे प्रवासजन्य कष्ट नहीं हुआ और उल्टियाँ हुईं। मेरे जीवन में यह पहली जहाज यात्रा थी। मुझे यात्रा में बड़ा मजा आया।2 यात्राएँ तो बहुत की चाहे दक्षिण अफ्रीका की यात्रा हो, चाहे लंदन की यात्रा हो या अन्य देशों की। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और जनकल्याण हेतु की गयी यात्रा में कभी भी असहज नहीं हुए और ही कभी उत्तेजित होकर जनता के बीच आए। दक्षिण अफ्रिका में रंग-भेद की नीति हो चाहे लंदन का सम्मेलन हो सभी से कई ऐसे अनुभव प्राप्त किए जिससे साहित्य जगत को लाभ मिला। बिल्कुल सरल भाषा में ऐसी यात्रा का अनुभव किया है जिसमें अपनी शारीरिक मनोदशा का उल्लेख किया है। प्रवास यात्रा का आराम और सुविधा का ही यह परिणाम हुआ होगा कि तकलीफ का जिक्र करने का मन हुआ होगा। जब सिंधु नदी के किनारे गाँधीजी पहुँचे तब वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित हुए और कह बैठेमैं महान सिंधु नदी के तट पर सुबह-सुबह एक वृक्ष के तले एकांत में बैठा हुआ हूँ। वृक्षों पर पक्षी गुंजन कर रहे हैं। दो-तीन स्वयंसेवकों के अतिरिक्त और कोई नजर नहीं आता। एक ओर दूर से कोटरी का पुल दिखाई देता है तो दूसरी ओर पानी के अलावा और कुछ दिखाई नहीं पड़ा। सामने के तट पर मैं वृक्ष और कुछेक घर देख पा रहा हूँ। नदी में दो-चार छोटी-छोटी नावें बिना किसी काम की खड़ी हुई हैं। मंद-मंद समीर बह रही है और समीर बहने के कारण नदी का जल अठखेलियाँ करता मंद-मधुर स्वर में गा रहा है। जल और रेत सूर्य की किरणों से मिलकर स्वर्ण समान दीप्त हो रहे हैं। सिंधी भाईयों ने मुझे अपेन प्रेम पाश में बांध रखा है।3

              दुनिया के कई महत्वपूर्ण देशों की यात्रा का अनुभव इन्हें रहा है। विभिन्न देशों की प्राकृतिक छटा से प्रभावित हुए थे। लेकिन भारत के पूर्वी क्षेत्र में उन्होंने जो प्राकृतिक सौंदर्य के दृश्य देखे उनकी तुलना में यूरोप के देश फीके लगते हैं। इन्होंने जो प्राकृतिक सौंदर्य का आकर्षक वर्णन किया है, इससे उनकी कलात्मक चेतना का पता चलता है। उनकी साहित्य में रूचि मात्र ही नहीं रही है बल्कि साहित्य का उद्देश्य क्या होना चाहिए, कविता कैसी हो ? इस पर भी स्वतंत्र विचार दिये हैं। साहित्य की कृतियों का अध्ययन के बाद अपने विचार प्रकट किया करते थे। प्राचीन साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य के अन्तर्गत क्या लिखा जा रहा है, इसके प्रति चिंतित रहते थे। देशी-विदेशी दोनों लेखकों को पढ़ने का काम करते थे। सहित्यानुरागी मन इससे कभी आलोचक तो कभी समीक्षक बन जाता था। कथा और साहित्य को लोकजीवन या जनता से जुड़ा होना पसंद करते थे। भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्यों ने जहाँरसात्मक वाक्यया साहित्यिक अनुभूति कोब्रह्मानंद सहोदर कह कर साहित्य का उद्देश्य स्थापित किया वहीं गाँधी जी मानव जीवन परिधि में ही साहित्य कला का सौंदर्य देखना पसंद करते थे। एक बार गाँधीजी को जब भारती नाम की एक लड़की ने पत्र लिखकर पूछाक्या उन्हें साहित्य में दिलचस्पी है, क्या वे कला के लिए कलाके सिद्धांत में विश्वास करते हैं ? गाँधीजी ने 15 जून 1932 को उसे एक पत्र लिखकर अपने विचारों से अवगत कराया था। उन्होंने लिखासाहित्य पढ़ना निश्चय ही अच्छा लगता है। कला के लिए कला का दावा करने वाले लोग भी वस्तुतः देखा जाये तो वैसा नहीं कर सकते। कला का जीवन में स्थान है लेकिन कला किसे कहा जाय, यही एक अलहदा सवाल है। लेकिन हम सबको जिस मार्ग का अनुसरण है उसमें कला आदि साधन मात्र है। यही जब साध्य हो जाती है तब वह मनुष्य के लिए बंधन बन जाती है और मनुष्य के पतन का कारण बनती है।4 आज समाज की दिशा भटकी हुई है। मानव का जीवन धनार्जन का उद्देश्य बनता जा रहा है। जबकि दूसरे की हित करना ही परमार्थ का सार है। सबकी भलाई करना पुण्य और बुराई करना पाप जैसे अमृत वाक्य है। भारतीय संस्कृति की परंपरा में गंगा-यमुना की धारा सनातन से चली रही है। यह धारा आज सामाजिक जीवन में सूखती चली जा रही है। मानव की सेवा करना, उसके उत्थान के लिए सीदैव अडिग रहना मानव का धर्म है। यही जीवन की कला है। गाँधी की वाणी में यह परम सत्य हमेशा निःसृत हुए हैं। 

              कला के प्रति महात्मा गाँधी का दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है कि वे जीवन से कला को जोड़कर देखते हैं। कला को साध्य नहीं साधन मानते हैं।सेवाऔरआनंदका महत्व जीवन में एक जैसा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की लोकमंगल की भावना से काफी कुछ समानता दिखती है। जीवन की उपेक्षा जहाँ हो वह स्रोत कभी कला नहीं हो सकती है। इतना ही नहीं कला में पारदर्शिता के हिमायती भी थे। कला को काफी व्यापक दृष्टिकोण से देखते थे। यदि कला जीवन के सत्य या वस्तु सत्य को छिपाती है तो वह कला नहीं हो सकती है। साहित्य में पारदर्शिता पर भरोसा किया करते थे।सेवा में अपूर्व आनंद है, अतः कह सकते हैं विद्याध्ययन आंनद के लिए ही है लेकिन आज तक किसी व्यक्ति की सेवा किये बिना केवल साहित्य विलास से अंखड आनंद की अनुभूति होने की बात मैं नहीं जानता। कला पर किसी देश का अथवा व्यक्ति का एकाधिकार नहीं हो सकता। जिस चीज में छिपाने लायक कोई बात है, वह कला नहीं है।5

              गाँधी जी के चिंतन का केंद्र नैतिकता है। साहित्य हो या सामाजिक जीवन, नैतिकता का अहम स्थान होता है। कवि एवं कलाकार का दायित्व सामाजिक संदर्भ में ही संभव है। यही कारण है कि बिना नैतिकता के कला, साहित्य एवं सौंदर्य का कोई बड़ा मूल्य नहीं हो सकता है। गाँधी वैश्विक संस्कृति एवं साहित्य का अध्ययन करते रहे साथ ही साथ भारतीय सनातन परंपरा के मूल्यों से संचालित रहे। कोई भी साहित्यकार युगीन संदर्भों को उपेक्षित करके बड़ी कृति दे नहीं सकता है। नैतिकता साहित्यकार को बहकने से रोकती है और लेखन की दिशा को परिष्कृत करती है। इसलिए तो सच्ची कला नैतिक कार्यों और उसके प्रभावों के छिपे सौंदर्य को देखने में है। गाँधीजी सौंदर्य शास्त्र को स्वीकार करते तो थे लेकिन साहित्य में अश्लीलता स्वीकार नहीं थी। स्त्री पुरूष के प्रेम संबंधों से लेकर श्रृंगार वर्णन तक में सेश्रृंगार रस को स्वीकार किया गया। कवियों ने तो संभोग श्रृंगार तक का चित्रण कर डाला। यह श्रृंगार विश्व की हर भाषा के साहित्य में मिलता है। गाँधी जी इस तरह के साहित्य का बेबाक विरोध करते थे। मानव की काम-वासना को उद्दीप्त करने वाला साहित्य को अनावश्यक और हानिकारक मानते थे। हिन्दी मेंश्रृंगारकोरसराजकहा गया है। साहित्य में इसका काफी महत्व है। साहित्य की गरिमा के अनुसार इसे सही नहीं मानते थे। 2 मई, 1936 को नागपुर में अखिल भारतीय साहित्य परिषद की बैठक में अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा थाआजकल श्रृंगार युक्त अश्लील साहित्य की बाढ़ सब प्रांतों में रही है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि श्रृंगार को छोड़कर और कोई रस है ही नहीं। श्रृंगार इस को बढ़ाने के कारण ऐसे सज्जन दूसरों को (व्यंग्य) त्यागी कहकर उनकी पेक्षा और उपहास करते हैं। जो सब चीजों का त्याग कर बैठते हैं वे भी रस का त्याग तो नहीं कर पाते हैं। किसी किसी प्रकार के रस से हम सब भरे हैं।6

              महात्मा गाँधीहरिजन-सेवकमें लिखते हैंआश्चर्य तो यह है कि पुरूषों के सौंदर्य की प्रशंसा में पुस्तकें बिल्कुल नहीं लिखी गयी। तो फिर पुरूष की विषय-वासना को उत्तेजित करने के लिए ही साहित्य क्यों हमेशा तैयार होता रहे ? यह बात तो नहीं कि पुरूष ने स्त्री को जिन विशेषणों से भूषित किया है, उन विशेषणों को सार्थक करना उसे पसंद है। स्त्री को क्या यह अच्छा लगता होगा कि उसके शरीर के सौन्दर्य का पुरूष अपनी भोग-लालसा के लिए दुरूपयोग करे ? पुरूष के आगे अपनी देह की सुंदरता दिखाना क्या उसे पसंद होगा। यदि हाँ, तो किसलिए ? मैं चाहता हूँ कि ये प्रश्न सुशिक्षित बहने स्वयं अपने दिल से पूछे। यदि ये अश्लील विज्ञापनों और साहित्य से उनका दिल दुखता है तो उन्हें इनके विरूद्ध अविराम युद्ध चलाना चाहिए।7 कहा जाता है जब व्यक्ति का चरित्र अधम अवस्था  को प्राप्त करने लगता है तो उसके भीतर की श्रद्धा नष्ट होने लगती है फिर ऐसी स्थिति में सत्य के सारथी का साथ होना चाहिए। गाँधी स्त्री आंदोलन के भी मानों सारथी बन गये थे। यह गौरव, सम्मान भारतीय, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक इतिहास में किसी भी महापुरूष को प्राप्त नहीं हुआ था।

              साहित्य में स्त्रियों के प्रति कामुकता का चित्रण के कारण ऐसा कहते हैं। लेखकों को सचेत करते हैं स्त्री के अंगों उसके रूप एवं सौंदर्य के चित्रण को चारित्रिक दृष्टिकोण से अलग नहीं समझते थे। उनकी कला पारखी दृष्टि साहित्य में सौंदर्य को किस रूप में पसंद करते थे इस संबंध में 31 अक्टूबर 1936 को गुजरात की साहित्य परिषद् में रवि शंकर रावल की चित्रकला पर बोलते हुए कहे थे कि उनका चित्र ऐसा हो कि मुझसे बोले। स्पष्ट अर्थ है कि चित्र जीवंत और जिन्दगी के संदर्भों से युक्त हो। श्री भगवान सिंह सही कहते हैंसाहित्य का हर पाठक जरूरी नहीं कि उसका समीक्षक भी हो। किन्तु गाँधी के साथ ऐसी बात नहीं थी। वे साहित्य के गहरे अध्येता थे। जागरूक पाठक थे, साथ ही एक कुशल समीक्षक भी थे। पूर्व विवेचन में हमने देखा कि साहित्य एवं कला के संबंध में गाँधीजी का अपना दृष्टिकोण बन चुका था। जिसमें नैतिकता एवं सत्यनिष्ठा का प्रबल आग्रह था। केवल मानव-जगत में, अपितु समस्त सृष्टि में प्रेम, समता, सौहार्द, दया, करूणा जैसे गुण कैसे संवर्द्धन हो, यह गाँधीजी के विचार ओर आचरण के मुख्य सरोकार रहे हैं। उनका पूरा जीवन-दर्शन इसी सोच के इर्द-गिर्द खड़ा है। इसमें प्राचीन साहित्य से लेकन आधुनिक साहित्य तक, देशी साहित्य से लेकर विदेशी साहित्य तक जहाँ अनुकूल लगे, एक सतर्क पाठक एवं सामाजिक के रूप में गाँधीजी ने उनका उपयोग किया।8

              गाँधी की जो राजनीतिक और सामाजिक दिशा और दृष्टि रही है उसे स्वच्छ करने में मध्यकालीन हिन्दी, गुजराती कवियों एवं संतों का अहम योगदान रहा है। नरसी मेहता का भजन-वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जानी रेको जीवन का महामंत्र मानकर अपने दैनिक भजनों एवं सामूहिक प्रार्थनाओं में अंतकाल तक गाते रहे। दूसरों की दुःख, पीड़ा, तकलीफों को जाने वाले व्यक्ति को वैष्णव कहा गया है। इसमें प्रेम और अहिंसा की चेतना है। नरसी मेहता जैसे कवियों की ज्ञानमयी वाणी को ग्रहण कर सामाजिक स्तर पर व्याप्त छुआछूत, वैषम्य और अमानवीय को जड़ से समाप्त करने का आधार बनाया है। 9 सितम्बर, 1930 को नारायण दास गाँधी को अस्पृश्यता उन्मूलन पर बल देते हुए गाँधीजी ने लिखाअस्पृश्यता निवारण का यह व्रत अस्वाद व्रत की तरह नया है और कुछ विचित्र भी लगेगा। यह जितना विचित्र है, उससे ज्यादा कहीं गहरी है। अस्पृश्यता यानी अछूतपन और अखा भगत ने ठीक ही कहा किअमऽहेत अदकेरूं अंग अर्थात अछूतपन, तो शरीर की छठी अंगुली के समान व्यर्थ हैं। यह किसी काम में रूकावट तो डालता ही है और धर्म को भी बिगाड़ता है। अगर आत्म एक ही है, ईश्वर एक ही तो अछूत कोई नहीं।9

              यहाँ प्रतीत होता है कि साहित्य और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। बौद्धिक ज्ञान के विकास में एक-दूसरे से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। नरसी मेहता के भजनों के सार तत्व को ग्रहण करके अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए कार्यरूप में बदलते हैं। अछूतोद्धार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। गाँधीजी दीनता, हीनता को जगाने वाले साहित्य की जगह पौरूष, शरीर, बल एवं आत्मबल जगाने वाले साहित्य को बेहतर समझते थे। गाँधीजी का भक्ति-भाव भी कर्म आधारित रहा है। भले वह सनातनी परंपरा के समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि तुलसीदास से अधिक कबीरदास को महत्व देते हैं। कबीर का चरखा कर्म गाँधी के चरखा-कर्म से काफी साभ्य रखता है। कबीर स्वयं वस्त्र बुनने का काम करते थे। उनकी कविता ताना-भरनी चदरियाशब्द इस शब्द का प्रमाण है। भारतीय समाज को मानव मूल्य आधारित समतामूलक बनाने के प्रयास में स्वतंत्रता आंदोलन का एक हिस्सा बने। इस संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकरभगवान बुद्धशीर्षक लेख में लिखते हैं- “बुद्धदेव के समय भारत में दो विचारधाराएँ समानांतर रूप से बहती रही है। एक तो वह जो शास्त्रों का भय दिखाकर जाति-प्रथा और अस्पृश्यता को कायम रखना चाहती है और यह विश्वास करती है कि ब्राह्मण, सदा ब्राह्मण, अन्त्याज सदा अन्त्यज और शूद्र सदा शूद्र है और दूसरी वह जो शास्त्रों को प्रमाण नहीं मानती तथा जिसका आग्रह है कि मात्र वंश के कारण एक मानव बड़ा और दूसरा छोटा नहीं हो सकता। इनमें पहली विचारधारा वह है, जिसके विरूद्ध गौतम बुद्ध ने क्रांति का झंडा उठाया था और दूसरी वह जो स्वयं बुद्ध के कमंडल से निःसृत होकर हमारे पास आई है। यह भी पहली धारा के संत शंकराचार्य हैं तथा दूसरी धारा के संत महात्मा गाँधी और कवि कबीर हैं।10 भारतीय परंपरा के पूर्व संतों-ऋषियों, मुनियों के विषय में चर्चा करें तो वहाँ शांति का पाठ चलता दिखता है। परंपरा से  क्षीण होती मानवीय दीप्ति को शांति और प्रेम के पाठ से ही बचाया जा सकता है। इस परंपरा के अंतिम महापुरूष महात्मा गाँधी रहे हैं। जो अहिंसा और शांति का मंत्र कुटिया के अंदर धुनी तक सीमित थे। गाँधी उसे विश्वव्यापी बनाकर सर्वश्रेष्ठ संतों एवं महापुरूषों की पंक्ति में गये। 

              महात्मा गाँधी की विचारधारा से दिनकर काफी प्रभावित रहे। सत्य को आत्मसात करने की योग्यता इनमें अतुलनीय थी। ओज गुण के काव्य को अधिक पसंद करते थे। राष्ट्रीय आंदोलन के लिखे गीत जो गाये जाते थे उसमें इतिहास की चर्चा पसंद करते थे। 1907 मेंइंडियन ओपिनियनसमाचार पत्र मेंएक पौंड का इनामशीर्षक से विज्ञापन निकाला गया था। यह इनाम देने के लिए या जो जेल के प्रस्थान के संबंध में सरस गीत लिखकर भेजेगा। कोई भी राग हो लेकिन वीर रस की लाविनी अधिक पसंद की जायेगी। इस गीत में बहादुरी के वर्तमान और प्राचीन उदाहरण दिये जाएं। दूसरे होंगे तो वे भी चल सकेंगे।11 गाँधी जिस समय भारत को आजाद करने की लड़ाई लड़ रहे थे, उस समय उनका शरीर अधिक हृष्ट-पुष्ट नहीं था। रक्तहीन, मांसहीन, अस्थिमात्र वाले शरीर के थे। इस क्षीण तन में मात्र आत्मबल था। उसी दृष्टि ने भारत के निर्माणकारी संस्कृति, बलवान योद्धा को भी आकार दी। वीर रस की कविता के साथ-साथ एक बेहतर भीष्म विभीषण, विदुर, कुंती, सुमति, देवकी, नंदजी, यशोदा आदि के चारित्रिक गुण अधिक पसंद थे।

              भारतीय वेदांत और ईरानी सूफियों के चिंतन में काफी समानता है। सूफी जलालुद्दीन रूमी के बारे में गाँधीजी, एक पुस्तक की समीक्षा के क्रम में लिखते हैंसच्चा ज्ञान क्या है- इस संबंध में जलालुद्दीन कहते हैं- खून का दाग पानी से धोया जा सकता है, परंतु अज्ञान का दाग तो केवल ईश्वर के प्रेम रूपी जल से ही मिटाया जा सकता है। इसके उपरांत कवि कहते हैं कि सच्चा ज्ञान तो केवल ईश्वर का ज्ञान है। ईश्वर कहाँ हैं? इस प्रश्न के उत्तर में कवि कहते हैं- मैंने क्रूस तथा ईसाई लोगों को देखा। किरात और कंदहार में भी वह नहीं मिला और ही मिला कंदरा में। अंत में मैंने उसे अपने हृदय में ढूंढा तो मुझे वहाँ दिखाई दिया। अन्यत्र कहीं नहीं। यह पुस्तक बहुत पठनीय है। यदि उससे ऊपर के जैसे बहुत से वाक्य उद्धृत किए जाएँ तो भी वे खत्म होने वाले नहीं हैं। हम इस पुस्तक को मंगवाने की सबसे सिफारिश करते हैं। इसे पढ़कर हिन्दू तथा मुसलमान बहुत लाभ उठा सकते हैं।12

              ऐसी साहित्य में लिखी बातों से काफी प्रेरित होते थे। सामाजिक एकता की संदेश परक रचनाएँ काफी प्रिय थीं। उनकी साहित्यिक कसौटी किसी विचारधारा पर केंद्रीत नहीं रही है। भक्ति और मानवीय एकता को प्रतिष्ठित करने वाले विचारों पर बल देते थे। यही कारण है गाँधीजी तुलसीदास से प्रभावित तो थे लेकिन साम्प्रदायिक एकता, प्रेम और ज्ञान संबंधी चिंतन कबीर और गुरूनानक में अधिक दिख पड़ता था। इनकी वाणी साम्प्रदायिक चेतना से आगे बढ़कर मानवीय धरातल पर एक मानव का संदेश देती है। कबीर का काम स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष के लिए प्रेरक की तरह रहा है। महात्मा गाँधी इसके प्रतिनिधि के रूप में रहे हैं। गाँधी के लिए कबीर का संदेश मार्गदर्शन के रूप में रहा है। मैथिलीशरण गुप्त की रचनासाकेतको भी बहुत महत्व नहीं दिया।

              हिन्दी के अलावा अंग्रेजी साहित्य के प्रति भी रूचि रखते थे। अंग्रेजी कवियों की रचनाएँ काफी पसंद थीं। गद्यकार और धार्मिक प्रवृत्ति के लेखक जॉन बनियन थे। इनके बारे में 1906 में गाँधीजी ने लिखाजॉन बनियन एक साधु पुरूष था। उसे भगवान की प्रार्थना के सिवाय कोई दूसरा व्यसन   था। उसने उस समय के अर्थात 17वीं सदी में धर्मों का भारी अत्याचार देखा। उसे धर्माध्यक्ष की आज्ञा के अनुसार कार्य करना ठीक नहीं मालूम हुआ। वह सिर्फ खुदा की आवाज को ही मानता था। वह अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर बेडफोर्ड की जेल में 12 वर्ष रहा। वहाँ उसने अंग्रेजी भाषा की एक अच्छी पुस्तक लिखी। उस पुस्तक को पढ़कर लाखों लोग समाधान प्राप्त करते हैं। वह इतनी सरल भाषा में लिखी गयी है कि बच्चे और बड़े सभी उसको सावधानी से पढ़ सकते हैं। जहाँ बनियन ने जेल भोगी, वह अब अंग्रेजों के लिए तीर्थस्थान बन गया है।13 स्वयं गाँधीजी की दृष्टि से पता चलता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के थे। राष्ट्रीय प्रवृत्ति की दृष्टि रखने वालों के प्रति भी संवेदनशील रहते थे। साहित्य में यथार्थवाद को स्वीकार करते थे लेकिन यथार्थ चित्रण का अर्थ यह नहीं हो कि किसी निम्न स्तरीय साहित्य की रिपोर्ट बनकर रह जाय। यथार्थ चित्रण में विकृति जाय तो वह यथार्थ कभी साहित्य में स्थान नहीं पा सकता है। यूरोप में 19वीं सदी में अति यथार्थवाद का दौर आया लेखक विकृतियों को फूहड़ तरीके से साहित्य में चित्रण करने लगे। इन्हें प्रकृतिवादी लेखक कहा जाता था। यह गाँधीजी को पसंद नहीं था। वे कला और साहित्य के सच्चे साधक थे। गाँधीजी के जीवन में टॉल्सटॉय का प्रभाव बहुत पड़ा। उनकी कृतिकिंगडम ऑफ हैवन इज विदिन यूने हिंसा की चेतना से अहिंसावादी बना दिया। स्वयं स्वीकार करते थे कि विदेश जाते समय मुझे हिंसा में विश्वास होता था लेकिन टॉल्सटॉय की इस कृति ने मुझे नयी सोच और दिशा की ओर प्रेरित करने लगी। इतना ही नहीं उनके सरल और सहज व्यक्तित्व का काफी प्रभाव पड़ा। गाँधीजी कहते हैंउनके जीवन में मेरे लिखे दो बातें महत्वपूर्ण थीं। वे जैसा कहते थे वैसा करते थे। वे अमीर वर्ग के व्यक्ति थे, इस जगत के सभी भोग उन्होंने भोगे थे। धन-दौलत के विषय में मनुष्य जितने की इच्छा रख सकता है, वह सब उन्हें मिला था। फिर भी भरी जवानी में उन्होंने अपना ध्येय बदल डाला। उन्होंने सत्य को जैसा माना उसके अनुसार चलने का उत्कट प्रयत्न किया, सत्य को छिपाने या कमजोर करने का प्रयत्न नहीं किया। लेागों को दुःख होगा या अच्छा लगेगा, शक्तिशाली सम्राट को पसंद आयेगा कि नहीं, इसका विचार किये बिना ही उन्हें जो वस्तु जैसी दिखाई दी उन्होंने कहा वैस ही। जहाँ तक मैं जानता हूँ, अहिंसा के विषय में पश्चिम के लिए टॉल्सटॉय ने जितना लिखा है उतना मार्मिक साहित्य दूसरे किसी ने नहीं लिखा।14

              ऐसा नहीं कि टॉल्सटॉय के पहले किसी ने ऐसी बातें नहीं कही हैं लेकिन भाषा का ऐसा चमत्कार किसी में पहले नहीं देखा गया था। सारे ऐशो-आराम, सुविधा प्राप्त करने वाले खेती में जुट गये। शरीर-श्रम को अपनाने के बाद उनका साहित्य और सुशोभित होने लगा। आठ घंटे मजदूरी का काम करते रहे और साहित्य-साधना में लीन रहे। टॉल्सटॉय की तरह मैक्सिम गोर्की से भी काफी प्रभवित थे। गोर्की का जीवन-संघर्ष को बड़ी आत्मीयता से स्वीकार करते हुए उन्होंने यूरोप के श्रेष्ठ लेखकों में रखा। गाँधीजी टिप्पणी करते हैंरूस के लोगों और हमारे देश के लोगों के बीच एक हद तक तुलना की जा सकती है। जैसे हम गरीब हैं, वैसे ही रूसी जनता भी गरीब हैं। जैसे हमें राजकाज चलाने का कुछ भी अधिकार नहीं है और चुपचाप कर चुकाने पड़ते हैं उसी प्रकार रूस के लोगांे को भी करना पड़ता है। रूस में ऐसे कष्टों को देखकर कुछ अत्यंत वीर पुरूष सामने जाते हैं। कुछ समय पहले रूस में विद्रोह हुआ। उसमें जिन्होंने मुख्य रूप से भाग लिया, उनमें मैक्सिम गोर्की थे। वे बहुत गरीबी में पले थे। शुरू में उन्होंने एक मोची के यहाँ काम किया।15

              देशव्यापी राष्ट्रीय-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। 1922 में असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया था। इससे पूरे देश में अनिश्चितता की स्थिति गयी थी। स्वतंत्रता पास होकर भी दूर नजर रही थी। जनता में निराशा थी। गाँधीजी इस अनिश्चितता की स्थिति में भी साहित्य अध्ययन करते रहते थे। उनका ध्यान रचनात्मक कार्यों में लगा रहता था। इसी तरह जर्मन कवि गेटे से भी प्रभावित रहते थे। उनका ध्यान रचनात्मक कार्यों में लगा रहता था। इसी तरह अनुभव एवं चितन से वह साहित्य पूरा होता जिसमें नैतिकता और आत्मबुद्धि के तत्व मिलते थे। बांग्ला साहित्य के महान कवि रवींद्रनाथ ठाकुर से काफी अंतरंग संबंध था। चिंतन के क्रम में हर नई बात इनसे चर्चा करते। हालाँकि असहयोग आंदोलन के विषय पर वैचारिक मतभेद भी हुआ। फिर भी साहित्य से प्रभावित हुए। गाँधीजी कहते हैं- “गुरूदेव (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का आदर्श चाहे कितना ऊँचा हो, यदि कोई ऐसा व्यक्ति निकले जो उनके इस आदर्श को क्रियान्वयन कर सके तो उनका यह आदर्श युग के गहन अंधकार में पड़ा रहेगा। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति उस आदर्श को कार्यान्वित करने वाला निकल आया तो वह कई गुणा प्रकाश फैला सकेगा। आदर्श को कार्यान्वित करने वाला मार्ग तप है। उस तप, अनुशासन को बालक के जीवन में उतारना कितना आवश्यक है, यह समझ लेना चाहिए।16

              महात्मा गाँधी के साहित्यिक दृष्टिकोण एवं रूचि से यह ज्ञात होता है कि इनके चिंतन को परिपक्व करने और आंदोलन को गति देने में साहित्य का विशेष योगदान रहा है। इनके जीवन और व्यक्तित्व को आधुनिक साहित्यकारों के साथ-साथ प्राचीन कवियों, लेखकों एवं संतों की वाणियों ने प्रभावित किया है। साहित्य कैसा होना चाहिए, उसकी कसौटियों को स्व अनुभव एवं चिंतन के आधार पर बनाई है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी साहित्यकार की कृतियों का अध्ययन करके अपना विचार बेबाक ढंग से रखते थे। उनकी आलोचना व्यावहारिक अधिक और सैद्धांतिक कम होती है। भक्त कवियों से अधिक प्रभावित होने के बावजूद साहित्य के लक्ष्य को जनता के सरोकार से जोड़ते हैं। कहा जा सकता है कि विभिन्न कलाओं के पारखी थे, साहित्य के गहरे अध्येता थे। उनकी साहित्यिक समझ और सौंदर्य दृष्टि किसी साहित्यिक समालोचक से कम परिपक्व थी।

निष्कर्ष : गाँधी के जीवन-दर्शन और मानव-मूल्य प्रासंगिक है। इनका युगीन महत्व है। आत्मसंयम, आत्मानुशासन इनके जीवन का संस्कार है। वस्तुओं के भोग के प्रति। विशेष आग्रह का प्रतिकार है। इनके साहित्यिक संस्कार की उपादेयता मानवीय चेतना को समग्र रूप से संकीर्ण बंधनों से मुक्त होकर उदात्त बनाने में है। सत्य, अहिंसा, प्रेम, करूणा, दया, ममता, क्षमता आदि के बल पर आने वाली पीढ़ियों को बौद्धिक भावनात्मक, वैज्ञानिक एवं संवेदनात्मक ज्ञान से सशक्त करने में सक्षम है। साहित्यकारों, चिंतकों, विचारकों राजनीतिज्ञों को भी प्रेरित करने में सक्षम हैं। मानव की दुर्बलताओं और शक्तियों को गाँधी ने पहचाना था। सदियों से भोग-विलास में डूब जाने के कारण एक समय लोग उदासीन हो गये थे। आचरण और वाणी का स्पर्श पाकर पुनः जीवित हो उठा था। यदि किसी कविता का स्वर भारतीय सभ्यता, संस्कृति, आचरण आदि से दूर है तो वह आम जनता को तो प्रभावित कर सकती है और ही हृदय में स्थान बना सकती है लेकिन जब गाँधीवादी साहित्यकारों की प्रेरणा पर दृष्टि डालें तो विश्व मानस को पथ-प्रदर्शित करता रहेगा। शोध-आलेख में दर्शाए गए इनके साहित्यिक संस्कार के अनुसार कहा जा सकता है कि स्वानुभूति और उनके व्यक्तित्व से रागात्मक संबंध स्थापित करते हुए साहित्यकार आगे बढ़े हैं।

संदर्भ :
1. सिंह, श्री भगवान: गाँधी का साहित्य और भाषा चिंतन, सर्वसेवा संघ प्रकाशन, राजघाट वाराणसी, प्रथम संस्करण-2014, पृ॰ 13.
2. संपूर्ण गाँधी वाङ्मय, खण्ड-1, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृ॰ 09.
3. वही, पृ॰ 28.
4. वही, पृ॰ 35.
5. वही, पृ॰ 335.
6. वही, पृ॰ 229.
7. सिंह, श्री भगवान: गाँधी का साहित्य और भाषा चिंतनसर्वसेवा संघर प्रकाशन, राजघाट वाराणसी, प्रथम संस्करण-2014, पृ॰ 35.
8. सम्पूर्ण गांधी, पृ॰ 35.
9. वही, खण्ड-44 पृ॰ 134.
10. दिनकर, पृ॰ 68-69.
11. संपूर्ण गाँधी, खण्ड-07, पृ॰ 05.
12. वही, पृ॰ 265.
13. वही, पृ॰ 592.
14.  वही, पृ॰ 121.
15. वही, खण्ड-13, पृ॰ 41-42.
16. वही, खण्ड-63, पृ॰ 338.
 
सरिता कुमारी,
सहायक शिक्षिका, परियोजना बालिका उच्च विद्यालय, इचाक, हजारीबाग (झारखण्ड)

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati), चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

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