शोध आलेख : भक्ति काव्य की सांस्कृतिक परिधि और स्त्री दृष्टि / प्रोo डॉ. नीलम राठी

भक्ति काव्य की सांस्कृतिक परिधि और स्त्री दृष्टि
- प्रो. डॉ. नीलम राठी


        शोध सार : भक्ति काव्य पर भक्ति आंदोलन की छाप स्पष्ट है। विचार को आंदोलन का स्वरूप धारण करने और प्रवृत्तियों का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि भक्ति काल में ईश्वर के प्रति भक्ति केंद्रीय भाव है जो उस युग के संपूर्ण काव्य का मूल है। भक्ति काव्य सांस्कृतिक विरासत है। इसके अंतर्गत लिखी गई कविताओं में भक्ति के अलग अलग रूपों को व्यक्त किया गया है। इसके दार्शनिक आधार और सामाजिक विचार भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं। भक्ति काव्य में स्त्री दृष्टि के विषय में विभिन्न रचनाकारों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। जिनमें पुरुष भक्त कवियों और स्त्री भक्त कवित्रियों में भी दृष्टिकोण की भिन्नता है। 

बीज शब्द : भक्ति काव्य, सांस्कृतिक परिधि, भक्तिकालीन मतमतांतर, स्त्री दृष्टि

मूल आलेख : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार भक्ति काल का समय 1375 से 1700 तक का है। भक्ति काव्य भारतीय जनमानस में सदैव जीवित रहा है। भारतीय जनमानस ने इनके भक्त स्वरूप को इनके कवि रूप से सर्वोपरि माना। जार्ज गियर्सन ने भक्ति काल को 15 वीं शती का धार्मिक पुनर्जागरण कहा। मिश्र बंधुओं ने भक्ति काव्य की श्रेष्टता का कारण आध्यात्मिकता बताया। उनके अनुसारअपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की भक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?”1 ज्ञानाश्रयी शाखा और सूफी के कवियों के विषय में शुक्ल जी का कहना था किवे सगुण के खंडन में उसी जोश के साथ लगे रहे जिस जोश के साथ पैगम्बरी मत बहुदेवोपासना और मूर्तिपूजा के खंडन में रहते हैं”2  आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी ने भक्ति काल को भारतीय चिंतन का स्वाभाविक विकास बताया है आचार्य शुक्ल वेद विहित भक्तिकाव्य का समर्थन करते हैं जबकि हजारी प्रसाद दिवेदीवेदों के साथ साथ नाथ पंथ, बौद्ध मत आदि का भी योग भक्ति काव्य में मानते हैं। साथ ही वेद विरोधी विचारों को भी भारतीय परंपरा में मानते हुए भक्ति काव्य में उनकी स्वीकारोक्ति मानते हैं”3 अत:भक्ति काव्य में स्त्री दृष्टि पर बात करते हुए उक्त पंथ संप्रदायों में स्त्री की दृष्टि पर विचार भी आवश्यक होगा। डॉ राम विलास शर्मा का कहना था किभक्तिकाल का आधार केवल आध्यात्मिक ही नहीं है बल्कि संत साहित्य को समझने के लिए सामाजिक आधार को भी समझना होगा”4 उनके अनुसार विभिन्न वर्ग एक ही सामाजिक व्यवस्था में रहने के कारण एक दूसरे को प्रभावित करते और एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। इसलिए उन्होंने भक्ति काव्य को लोक जागरण का काव्य बताया उन्होंने निर्गुण कवियों के लिए संत और सगुण कवियों के लिए भक्त शब्द का प्रयोग किया। मुक्तिबोध के अनुसार निर्गुण मत में निम्न वर्गीय धार्मिक जनवाद पर जोर था डॉ हरबंस लाल ओबराय ने भक्तिकाल को भारतीय जीवन का अखंड प्रवाह कहा। भक्तिकाल के कवियों ने तत्कालीन समय में बनी हुई व्यवस्था को तोड़कर अपने कल्पना लोक के अनुसार यूटोपिया गढ़ने का प्रयास किया। मैनेजर पांडेय के अनुसारजायसी का सिंहलद्वीप और तुलसी का रामराज्य कल्पना लोक ही हैं। सूर का वृंदावन,जायसी का सिंहलद्वीप, तुलसी का रामराज्य और रैदास का बेगमपुरा उस काल (भक्तिकाल)के सामंती समाज की सीमाओं से अधिक स्वतंत्र है”5 हालांकि इस दृष्टि से विचार करेंगेतो पायेंगे कि कबीर इस दुनिया को ससुराल और उस दुनियां को 'बाबुल का देसकहते हैं या रैदास बेगमपुरा में ऊंच नीच,भेदभाव और अन्याय पूर्ण स्थितियों से मुक्त बताते हैं। तब वे अपने लोक को आदर्श लोक बनाने में ही प्रयत्नशील दिखते हैं तुलसीदास अपने समय की राजव्यवस्था देख रहे थे। उसके कटु अनुभव के कारण ही उन्होंने तत्कालीन शासक अकबर द्वारा प्रजा की उपेक्षा के बरक्कस राम राज्य का आदर्श अपने साहित्य के माध्यम से समाज के समक्ष रखा। लगभग यही स्थिति भक्तिकालीन अन्य कवियों की थी। वे अपने समाज को जैसा देखना चाहते थे वैसा अपनी रचनाओं के माध्यम से गढ़ रहे थे।

भक्तिकालीन सांस्कृतिक परिधि और स्त्री दृष्टि -

        भक्ति आंदोलन में देश भर में सभी क्षेत्रों से स्त्रियाँ लेखन के क्षेत्र में आई। यह जन संस्कृति के जागरण का आंदोलन है। इस काल के सभी स्त्री पुरुषों ने जनजीवन में प्रचलित कथाओं (राम ,कृष्ण ,अथवा सूफियों द्वारा लोकजीवन की कथाएं) को ही रचनाओं और भक्ति के केंद्र में रखा। भक्ति काल में शगुन- निर्गुण दोनों प्रकार के भक्ति का एकमात्र आधार ईश्वर उपासना है। भगवान का स्मरण ही उनकी साधना का प्राण तत्व है। - किन्तु प्रो रोहिणी अग्रवाल के नजरिए से देखा जाए तोलोक और परलोक के बीच कवियों द्वारा स्वयं को स्थापित करने की द्वन्द्व ग्रस्तता भक्ति साहित्य में साफ झलकती है। उनकी यह द्वन्द्व ग्रस्तता एक और आत्मस्वीकृति चाहती है तो दूसरी ओर तत्काल आत्म निषेध की गूँजती हुंकार से भयभीत हो पीछे हट जाती है। इसलिए विद्रोह और यथा स्थितिवाद भक्तिकाल में साथसाथ चलें हैं” 6  निसंदेह सामाजिक, राजनीतिक ,आर्थिक परिस्थितियां विषम थी। इस्लामी शासको का शासन था जो अन्य धर्म के समाज को निकृष्ट वह हेय दृष्टि से देखते हुए उन पर अतिरिक्त कराधन लगा रहा था। स्त्रियों पर कुदृष्टि रखते थे, सुंदर स्त्रियों का अपहरण होने लगा था, बहु पत्नी प्रथा थी। समाज में स्त्रियों पर अनेक बंधन थे। समाज सामंतवादी व्यवस्था में जकड़ा हुआ था। 

        ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी की उक्ति लिख स्त्री विरोधी की छवि से जूझने वाले तुलसीदास अपने समाज की स्त्रियों की स्थिति से परिचित ही नहीं चिंतित भी थे। व्यक्तिगत स्तर पर एक समय पत्नी से अटूट प्रेम के आकांक्षी तुलसीदास स्त्री की सामाजिक स्थिति से अनभिज्ञ नही थे। तभी तो वे स्त्री की पराधीन स्थिति से चिंतित होकर प्रभु से पुकार कर बैठे – “कत विधि सृजि नारी जग माही, पराधीन सपनहुँ सुख नाहि” 7 यही नही अहिल्या उद्धार की घटना हो अथवा शबरी प्रसंग राम सदैव स्त्री के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। तुलसीदास स्त्री की तत्कालीन पराधीनता पर क्षोभ व्यक्त करते हैं। तुलसीदास के राम का चरित्र समस्त स्थितियों में एक पतिव्रत धर्म का पालन करता है। यही आदर्श वे अपने समाज के पुरुष वर्ग से भी चाहते थे।

मध्यकाल के सामंती समाज में सूरदास विरले कवि हैं जिनकी स्त्रियां सामाजिक बंधनों में कैद स्त्री नही हैं। सूरदास के ब्रज की गोपियाँ सूरदास की स्त्री दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। उनके काव्य में स्त्री कृष्ण की मुरली की धुन पर दौड़ी चली आती है। वे स्वतन्त्र निर्णय ले सकती हैं। सूरदास की गोपियां अपनी अस्मिता बनाए रखने के कारण ही कृष्ण से अन्यतम प्रेम करते हुए भी मथुरा नही जाती। सूरदास की स्त्री मात्र प्रेम की पहचान ही नही बल्कि अध्यात्म,तर्क क्षमता और विवेक से ही सराबोर हैं जो उद्धव प्रसंग में दिखाई देताहै सूरदास की गोपियाँ उद्धव को एकनिष्ठ प्रेम का महत्व बताते हुए कहती हैं उधो मन नाही दस बीस एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधे ईश”8 प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। भक्तिकालीन समाज में प्रेम की वैसी स्वतंत्रता तो छोड़िए आज के भारतीय समाज में भी वैसी स्वतंत्रता दृष्टिगोचर नही होती। सूरदास अपने काव्य के माध्यम से स्त्री स्वतंत्रता के आकांक्षी थे। 

कबीर ने जहां एक ओर धार्मिक कर्मकांड का खंडन किया है वहीं दूसरी तरफ भगवान के साथ संबंध स्थापित कर एकात्मकता भी स्थापित की है। हम घर आवा राजा राम भरतार” 9  जैसी पंक्तियों में राज सत्ता व्यवस्था,ब्रह्म बोध और पारिवारिक  संबंधों की ऊष्मा एक साथ देखने की कल्पना की गई है। मध्यकालीन समाज में कर्तव्य परायणता,एकनिष्ठता, सहिष्णुता, त्याग आदि उच्चादर्शों में बांधकर स्त्री की परिधि पर तो विचार किया गया। उसे कुल मर्यादा के लिए जीना सिखाया गया, उसे पुरुष की अनुगामी बनाया गया किन्तु भक्तिकाल का पुरुष स्त्री के प्रति अनुदार और कर्तव्य हीन ही बना रहा। उसमें पत्नी के प्रति एकनिष्ठता का अभाव रहा। समस्त सूफी काव्य में आदर्श पत्नी को छोड़कर सुंदरी प्रेमिका के लिए निकल जाना जिसे उन्होंने ईश्वरीय प्रेम की अभिव्यक्ति कहा। हालांकि सूफी काव्य में नागमती की मनोदशा के चित्रण में स्त्री के उस दुख उस पीड़ा को भी अभिव्यक्ति मिली है। पति के चित्तौड़ लौटने के मार्ग को जोहती हुई नागमती के हृदय की व्यथा अवलोकनीय है.

नागमती चित्र पथ हेरा.पिउ जो गए फिर कीन्ह फेरा .... 
सुवा काल होइ लेइगा पीउ. पीउ नहिं लेत लेत बस जिउ।। 10 
 

  किन्तु सूफी काव्य में कहीं भी पुरुष के इस आचरण की निन्दा या भर्त्सना नहीं मिलती। उस पर कहीं आक्षेप नहीं मिलता ही पुरुषों में एकनिष्ठता की आवश्यकता ही उन्हें लगती। बल्कि दूसरी स्त्री के आकर्षण को ईश्वरीय बताकर उसे मान्यता ही प्रदान कर दी गई है। ऐसा लगता है लौकिक कथाओं को लेकर स्त्री की यथार्थ स्थिति का ज्यों का त्यों चित्रण है। केवल सूफी सिद्धांतों की व्याख्या भर कर दी गई है। कबीर मध्यकाल की समाज व्यवस्था में जहांपतिव्रता मैली भली’11 कहकर स्त्री को पति धर्म के पालन की सीख दे रहे थे वहीं 

दुलहनी गावहूँ मंगलाचार,हम घर आए हो राजा राम भरतार। 
      तन रति करी मैं मन रति करिहूँ ,पंचतत  बराती    
      राम देव मोरे पाहुने आए मैं जोबन मदमाती।। 12  

कहकर ईश्वर से भक्त का स्त्री  के रूप में संबंध स्थापित कर निकटता का बोध करते हैं मानवीय संबंधों के उल्लेख में स्त्री पुरुष और आध्यात्मिक सत्ता में अभेद स्थापित करते हैं   कबीर स्त्री के आकर्षण को बेहद कमनीय कहते हैं उसके आकर्षण में अंधा होकर पुरुष विवेक हीन हो जाता है। इसलिए स्त्री को वे माया महा ठगनी हम जानी”13 की संज्ञा भी देते हैं और स्त्री को नाग की भांति विषयुक्त कहकर उसकी निंदा भी करते हैं। वे पुरुष को भी नारी की झाईं परत अंधा होत भुजंग। कबीरा तिन की कौन गति जे नित नारि के संग 14 कहकर सूफी काव्य से दो कदम आगे बढ़कर पुरुष को भी पतिव्रता के प्रति वफादार रहने और पर स्त्री संसर्ग से दूर रहने का असफल सा प्रयास करते नजर आते हैं। कबीर पुरुष को भी एक निष्ठा और एक पति व्रत का पालन करने को प्रेरित करते हुए कहते हैं.

पर नारी के राचनैं. औगुण है गुण नाहिं .
षर समंद में मंछला केता बहि बहि जाहिं” 15  

संतो के पूर्ववर्ती नाथ साहित्य में स्त्री विरोधी दृष्टि मिलती है और काफी हद तक संत साहित्य नाथों की साधना पद्धति से प्रभावित नजर आता हैं। किन्तु वही कबीर साधना की पराकाष्ठा में स्वयं स्त्री बन जाते हैं अपने को राम की बहुरिया कहते हैं. राम मेरे पिउ मै राम की बहुरिया 16 यही नही वे राम को अपने दूल्हे के रूप में भी देखते हैं  दुल्हिन गावहु मंगलाचार मोरे घर आए राजा राम भरतार” 17 वे सामान्य प्रेमिका की भांति विरह और मिलन के आध्यात्मिक अनुभव के क्षणों का एहसास करते हैं वह बालम आव हमारे गेह रे .तुम बिन दुखिया देह रे” 18  -“सामंती समाज के परिपेक्ष में जब हम कबीर की स्त्री दृष्टि पर विचार करते हैं तो हम यह पाते हैं कि वह समग्रत: स्त्री विरोधी नहीं बल्कि स्त्री के हक में खड़े होते दिखते हैं”19 ऊपरी दृष्टि से कबीर की स्त्री विषयक दृष्टि में अंतर विरोध दिखता है किन्तु वास्तव में कबीर अपने मत में स्पष्ट थे। वे स्वयं गृहस्थ थे। सामाजिक क्षेत्र के अंतर विरोधों से उपजी पीड़ा ही कबीर की वाणी में भक्त और भगवान के संबंधों का आधार बनी। 

भारत में भक्तिमय  वातावरण उत्पन्न करने में तथा भक्ति आंदोलन को जन आंदोलन का व्यापक रूप प्रदान करने में छठी शताब्दी में आलवार भक्तों का ही विशेष हाथ रहा है इन सब की आध्यात्मिक वृत्ति एक जैसी ही थी। उनके गीतों में प्रेम भक्ति के दिव्य उदाहरण प्राप्त होते हैं इन संतों ने भक्ति धारा में शूद्र और नारी के भेदभाव का परहेज नहीं किया क्योंकि इनमें से कई शूद्र और स्त्रियां थी। कवित्री आन्डाल स्त्री थी। आन्डाल की रचनाओं से ज्ञात होता है कि उनकी भक्ति में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना अंतर्निहित थी.आन्डाल को भक्ति काव्य की प्रथम स्त्री कवयित्री का स्थान प्राप्त है। लेकिन इससे भी पूर्व तमिल संगम साहित्य में भी स्त्रियों की अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं का उल्लेख मिलता है।        

भक्तिकाल में स्त्री भक्त कवियों की दृष्टि से भी विश्लेषण करना अपेक्षित है. या यूं भी कह सकते हैं कि स्त्री विमर्श की जड़ें भक्ति काव्य में खोजने के सार्थक प्रयास किये जा सकते हैं। भक्ति काव्य की मूर्धन्य भक्त कवित्रियों के काव्य पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि भक्ति आंदोलन की अनेक कवित्रियों ने पतियों और घरों को छोड़कर पारंपरिक स्त्री की भूमिकाओं और सामाजिक मानदंडों को अस्वीकार कर दिया और भक्त बनने का विकल्प चुना। भक्ति आंदोलन की स्त्रियों ने अपने काव्यपदों और गीतों के माध्यम से ही नहीं अपितु अपनी जीवन शैली के माध्यम से भी पितृसत्ता को चुनौती दी। कुछ उदाहरणों में उन्होंने अन्य कवि संतों के साथ मिलकर समुदाय बनाया। कुछ ने अपने आराध्य को ही पति मानकर पूर्ण भक्ति और पूजा पर ध्यान केंद्रित किया। भक्ति काल में भारत के भिन्न भिन्न क्षेत्रों में कवित्रियों ने अपने काव्य के माध्यम से दस्तक दी। आन्डाल तमिलनाडु से भक्ति में स्त्री स्वर की अग्रणी थीं। अक्का महादेवी और कश्मीर की ललदेह जैसी महिला भक्ति संतों ने इन मानदंडों को चुनौती दी। अक्का महादेवी अपनी शादी से बाहर चली गईं. शुरुआती कश्मीरी रहस्यवादी कवियों में से एक, ललदेह ने भी घरेलू अत्याचार के विरोध में अपना घर छोड़ दिया। सभी भौतिक बंधन तोड़ दिए। जनाबाई का जन्म महाराष्ट्र में एक निम्न जाति के शूद्र परिवार में हुआ था। गुजरात में गंगासती अपने भजनों के लिए जानी जाती थीं। मराठी अभंग लिखने के बाद सखुबाई, मुक्ताबाई और बहिणाबाई ग्रामीण महाराष्ट्र में लोक पहचान बन गई थी। स्त्रियों के लिए परिश्रम के समय खेतों में गाए जाने वाले अभंगों के रूप में लिखे गए गीत उनकी विशेष पहचान बने। उनका लेखन विशेष रूप से आत्मकथात्मक है। अक्कमहादेवी कर्नाटक के दक्षिणी क्षेत्र की एक भक्त थीं और शिव भक्त थीं। संत सोयराबाई ने विवाह से इंकार नहीं किया या सांस्कृतिक मानकों की खुले तौर पर अवहेलना नहीं की। उन्होंने अपने परिवार, दैनिक जीवन और भगवान विठोबा के प्रति समर्पण के साथ-साथ पंढरपुर की अपनी यात्रा, विवाहित जीवन और इन सबके बीच स्वतंत्रता की खोज के बारे में लिखा। उनके अभंग उनकी लिंग जागरूकता को प्रदर्शित करते हैं। अतुकुरी मोल्ला पहली तेलुगु रामायण की लेखिका थीं, जिसने उन्हें कृष्णदेव राय के दरबार में बहुत लोकप्रियता दिलाई। मोल्ला की रामायण उल्लेखनीय है क्योंकि उन्होंने इस कालजयी महाकाव्य को बोलचाल की तेलुगु में फिर से बनाने का जोखिम उठाया। यह पद्य और गद्य दोनों में लिखी गई। वे वाल्मिकी की रामायण में से अनावश्यक रूप से लंबे हिस्सों को काटते हुए मूल कहानी में काल्पनिक कहानियां जोड़ती है, फिर तेलुगु में अपने विवरण लिखती है जो कि चुटीले होते हैं।कन्होपात्रा एक वेश्या थी जो अपनी प्रसिद्ध सुंदरता और आकर्षण के बावजूद धर्मनिष्ठ जीवन की आकांक्षा रखती थी। बादशाह ने कान्होपात्रा को आत्मसमर्पण को मजबूर करने के लिए अपने आदमी भेजे कन्होपात्रा ने अपहरण से पहले विठोबा से अंतिम मुलाकात की इच्छा जताई थी।

        हे नारायण, आप स्वयं को पतितों का उद्धारकर्ता कहते हैं, मेरी जाति अशुद्ध है, मुझमें प्रेमपूर्ण विश्वास का अभाव है

        मेरा स्वभाव और कार्य नीच हैं पतित कन्होपात्रा स्वयं को आपके चरणों में अर्पित करती है आपके दया के दावों के लिए एक चुनौती” 20  

            कवित्री मीराबाई भक्ति काव्य की बड़ी कवित्री है। ऐसे समय (भक्ति काल)जब अधिकांश स्थान महिलाओं के लिए प्रतिबंधित थे, उन्होंने समाज, राजनीति, रिश्तों और धर्मों में सुधार के लिए अपनी सच्चाई को परिभाषित करने के लिए भक्ति को अपनाया। उन्होंने सभी सामाजिक नियमों और रूढ़ियों को तोड़ा और अपनी इच्छानुसार अपना जीवन व्यतीत किया। भक्ति काव्य में सामाजिक संबंधों से उपजी पीड़ा भक्त और भगवान के संबंधों का आधार बनी और मीरा पुकार उठी हेरी म्हा प्रेम दीवाणी म्हारा दरद जाण्या कोय” 23 मीरा भक्तिकालीन कविता की सशक्त हस्ताक्षर रही है। वे सीसोदिया राजवंश की विधवा थी तत्कालीन सामंती समाज में मीरा की भक्ति की राह आसान नहीं थी। मीरा की भक्ति दृष्टि स्त्री के अंतर्मन की घुटन, पीड़ा और तड़प का प्रतिनिधित्व करती हैं तत्कालीन लोक के रीति रिवाज मान्यताओं और मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए कृष्ण भक्ति में लीन होकर अपने मन की पीड़ा को अभिव्यक्ति देती है। समाज से विद्रोह कर देती है। इसलिए मन की पीड़ा दर्द भक्ति के आवरण में अभिव्यक्ति पाता हैं. मीरा ने विधवा होने की भूमिका को अस्वीकार कर दिया। वह तो शोक की पोशाक पहनेंगी और ही मृत पति का शोक मनाने हेतु  अपेक्षित किसी भी रीति-रिवाज का पालन करेंगी। मीरा एक ऐसी सशक्त स्त्री का उदाहरण है जिसने डरने से इनकार कर दिया। आधी राणा की फौज ,आधी मीरा एकली रे उन्होंने अपने गीतों और कविताओं के माध्यम से युगों-युगों तक भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अत्यधिक भक्ति और प्रेम का वर्णन किया है। उनके पद अपने सांवरिया को निवेदित हैं .उन्होंने स्त्री जाति की अव्यक्त वेदना को वाणी दी। चाहे उसके लिए उन्हें कुल की मर्जादा अर्थात कुल कानि को ही छोड़ना पड़ा .

लोकलाज कुल काण जगत की.दइ बहाय जस पाणी। 
अपने घर का परदा करले .मैं अबला बोराणी।। 24   

        वे स्त्री को संकीर्ण बंधनों को त्यागकर मुक्त वातावरण में विचरण करने का सन्देश देती है।वे अपने काव्य में अपने मनोजगत की रचना करती हैं। मीरा स्त्री के निर्णय लेने की स्वतंत्रता की पक्षधर हैं। 

        भक्ति आंदोलनों में, महिलाएं वे गुण अपनाती हैं जो पारंपरिक रूप से पुरुषों में होते हैं। ---उदाहरण के लिए, एक सम्मानित महिला को अकेले या बाहर रहने या अपने पति को यौन संबंध बनाने से मना करने की अनुमति नहीं है- लेकिन महिला संत अकेले भटकती और यात्रा करती हैं, पति, बच्चों और परिवार को छोड़ देती हैं”21  

        यही नहीं कबीर की पुत्री कमाली भी उत्कृष्ट रचनाकार थी वे अपनी कविता में पत्नी की उपेक्षा से मिल वैवाहिक जीवन से कुँवारे जीवन को श्रेयस्कर मानती हैं। 

दस दरवाजे बंद कर सोई, जानूं कोई खिड़की खुली थी, श्याम निकस गये,
कहत कमाली कबीर की बेटी, इस ब्याही से तो कुंवारी भली थी”22 

        इनके अतिरिक्त सहजोबाई, दया बाई, सुंदर कुंवरि बाई आदि अन्य अनेक संत रचनाकार हुईं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में स्वयं प्रवेश कर स्त्रियों के लिए स्वतंत्रता की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। इन महिला संतों ने अपने आराध्य को ही अपना पति मानकर अपने प्रेम को व्यक्त करते हुए और अपने उत्पीड़न और स्वतंत्रता की इच्छाओं की अभिव्यक्ति करते हुए कविताएँ और गीत लिखे। 

           मध्यकालीन भारत में अत्यधिक भेदभाव का माहौल था, जिसमें पितृसत्ता को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता था। इसलिए, स्त्रियों ने प्रतिबंधित घरेलू स्थानों से बाहर निकलने और पितृसत्ता और सामंतवादी  आधिपत्य का विरोध करने के लिए भक्ति की मांग की। पुरुष छवि की शक्ति की अस्वीकृति की, जिनके साथ वे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में बंधी थी उन्हें अस्वीकार और दैवीय सत्ता से संबंध उन्होंने वैकल्पिक स्थिति के रूप में स्वीकार किया।

भक्तिमय महिलाओं ने भारत में स्त्री स्वातंत्र्य की जड़ें जमायीं। सरासर बहादुरी, दृढ़ता और ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति के साथ, उन्होंने अपने लिए एक स्वायत्त स्थान बनाया और सामाजिक मानदंडों से बंधे होने से इनकार कर दिया। उन्होंने अकथनीय कार्य किया और एक महिला की भावना की सच्ची ताकत प्रदर्शित की। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपना मार्ग स्वयं बनाया, और अन्य स्त्रियों की प्रेरणा स्रोत बनी। उन्होंने सामाजिक पहचान और भौतिक वास्तविकताओं को पार कर एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश किया। उनका काव्य  आध्यात्मिक और लौकिक अनुभवों का सामाजिक दस्तावेज़ है। ये भावुक स्त्रियों की रचनाएँ हैं जो खुद को बहुत ही व्यक्तिगत रूप से अभिव्यक्त करना चाहती थीं। क्योंकि उन्होंने अपनी समस्त लालसाओं को ईश्वर के अधीन कर दिया, फिर भी उनकी बातें मानवीय और अंतरंग हैं।वे सभी उच्च दैवीय शक्ति की खोज में अपने नीरस अस्तित्व को पार कर गईं, और वे वास्तविक मुद्दों के बारे में शक्तिशाली, ऊंची आवाज में बोलने वाली वास्तविक महिलाएं बन गईं। 

निष्कर्ष : भक्तिकाल में स्त्री दृष्टि पर गहनता से विचार करने पर हम पाते हैं कि भक्त कवित्रियों की भक्ति काल के पुरुष कवियों से कोई समानता नहीं है। भक्ति का अर्थ महिलाओं और पुरुषों के लिए दो अलग-अलग आयाम हैं। पुरुष भक्त अपनी इच्छानुसार अपने चुने हुए मार्ग का अनुसरण कर सकता था और गृहस्थ बना रह सकता था, स्त्रियों के लिए यह संभव नहीं था। अधिकांश स्त्रियों को अपनी भक्ति और अपने घरेलू जीवन के बीच किसी एक का चयन करना पड़ता था। वे अपने वैवाहिक संबंधों को पूरी तरह से त्यागकर ही अपने चुने हुए मार्ग पर आगे बढ़ सकती थी। भक्ति में स्त्रियों को लैंगिक कठोरता को भी दरकिनार करना पड़ा। अधिकांश भक्त कवित्रियों द्वारा नश्वर व्यक्ति से शादी से इंकार किया गया। वास्तव में तत्कालीन समय में पुरुष और महिला भक्तों के अनुभव बिल्कुल विपरीत थे। वे समृद्ध, दरिद्र, विवाहित, अविवाहित कुछ भी हों वे अपने काव्य में समाज के अनेक पक्षों पर बात कर रहे थे। आध्यात्मिकता में ईश्वर आराधना थी लेकिन समाज व्यवस्था भी थी ,लोक कथाएं भी थी। उनमें स्त्री निंदा भी थी। स्त्री के केवल पतिव्रता रूप की स्वीकारोक्ति थी जिसके लिए केवल और केवल अपने पति पर अगाध विश्वास बनाए रखना ही उसके जीवन की सार्थकता का द्योतक माना गया था। एक स्त्री अर्थात मानव के रूप में उसकी इच्छा अनिच्छा या पति के इतर उसके जीवन के किसी पक्ष पर पुरुष भक्त कवियों ने विचार नहीं किया था। जैसे जायसी ने नागमती के विरह का वर्णन तो किया किन्तु अपने इतने बड़े महाकाव्य में वे रत्नसिंह के नागमती और राज्य को छोड़कर निकलने के कृत्य के विरोध में कलम नहीं चला पाए। वे मध्यकालीन व्यवस्था से आगे बढ़कर अपना कोई सुविचार(सूरदास को छोड़कर) जो स्त्रियों के पक्ष में हो नहीं दे सके। किन्तु अपनी युग सीमा में रहते हुए भी कबीर और तुलसीदास ने स्त्रियों को अपने काव्य में सीमित ही सही लेकिन वाणी देने का प्रयास अवश्य किया है। लेकिन स्त्री भक्त कवित्रियां बिना रुके,बिना किसी डर के पुरुष गढ़ों को भेदते हुए समाज की तत्कालीन सामंती व्यवस्था को नकारते हुए आगे बढ़ी। स्त्री भक्त कवित्रियों ने अपने उत्पीड़न, मुक्ति की लालसा और भगवान, के प्रति उनके प्रेम के बारे में कविताएँ और गीत लिखे। भजन, कीर्तन, अभंग, और पद सभी की रचना सस्वर गाए जाने के इरादे से की गई थी। पाठ, सत्संग, मंत्र और संकीर्तन में इन गीतों को प्रत्यक्ष अनुभवों के रूप में गाया गया था। स्त्री चिंतन और विमर्श के अनेक इंदु भक्ति काल के काव्य में मिलते हैं।  

संदर्भ :
1 हिन्दी साहित्य का इतिहास,रामचन्द्र शुक्ल34 वन संस्करण , पृ 341 
2 कबीर ,हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय , बंबई 
3 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी  आलोचना, डॉ रामविलस शर्मा राजकमल प्रकाशन , प्रथम संस्करण 2009 
4 वही   
5 तकनीकी माध्यमों द्वारा हिन्दी साहित्य शिक्षण , डॉ नीलम राठी , भक्तिकाल, प्रो मैनेजर पाण्डेय,स्वराज प्रकाशन,नई दिल्ली पृ 102   
6 मीराबाई के काव्य में स्त्री प्रश्न,प्रो रोहिणी अग्रवाल, पाठशाला  
7 रामचरित मानस , गोस्वामी तुलसीदास, बालकाण्ड , गीता प्रेस गोरखपुर 
8 सूरदास और भ्रमरगीतसार, डॉ किशोरीलाल , अभिव्यक्ति प्रकाशन ,इलाहबाद , पृ 125  
9 कबीरदास ग्रंथावली ,इंडियन प्रेस लिमिटेड ,प्रयागराज ,पृ 87  
10 जायसी ग्रंथावली,पद्मावत , नागमती वियोग खंड ,सम्पादन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी , लोकभारती प्रकाशन 
11 कबीरदास ग्रंथावली , ,इंडियन प्रेस लिमिटेड ,प्रयागराज, पतिव्रता को अंग  
12 वही ,पृ 87 
13 कबीर,हजारी प्रसाद द्विवेदी,पृ 284, हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय , बंबई,प्रथम संस्करण  
14 वही 
15 वही,पृ 39  
16 वही ,पृ 125 
17 वही,पृ 87  
18 वही,पृ 192  
19 स्त्री के हक में कबीर, अनिल राय, हंस प्रकाशन भूमिका से
20 अलवर भक्तों का तमिल प्रबंधन और हिंदी कृष्ण काव्य ले डॉक्टर मलिक मोहम्मद पृ 4 सेलरग्रेन: 1996:227
21 रामानुजन, .के. "भगवान से मातृभाषा में बात करना।" भारत अंतर्राष्ट्रीय केंद्र त्रैमासिक 19.4 (1992): 53-64
22 भक्ति आंदोलन और स्त्री विमर्श, मेधा, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रालि , अंसारी रोड़, दरियागंज , प्रथम संस्करण 2014 , पृष्ठ 52 पर उद्धृत
22 मीरा बाई की पदावली ,देशराज भाटी ,पृ 158,
23 मीरा संचयन ,नन्द चतुर्वेदी ,वाणी प्रकाशन,दिल्ली,पृ 139 ,संस्करण 2006 



प्रोडॉनीलम राठी 

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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