शोध आलेख : ‘प्लेग’ और ‘अमर देसवा’ : महामारी का तुलनात्मक अध्ययन / कुंदन

प्लेगऔरअमर देसवा’ : महामारी का तुलनात्मक अध्ययन
- कुंदन

 


शोध सार : महामारी को लेकर अलग-अलग भाषाओं में साहित्य रचे गए है जिसमें एक ओर पश्चात्य साहित्यकारअल्बेर कामूका उपन्यासप्लेग’ 1947 में प्रकाशित हुआ और हाल ही में आए कोविड-19 को आधार बना कर लिखा गयाप्रवीन कुमारका उपन्यासअमर देसवा यह दोनों उपन्यास अपने काल और स्थान के रूप में भिन्न हो सकते है लेकिन परिणाम के रूप में भिन्न नहीं है। यह दोनों उपन्यास इस बात में भी महत्त्वपूर्ण है कि दोनों उपन्यासों में अनेक बातों में समानता देखने को मिलती हैं। इन दोनो उपन्यासों में परिवेश अलग-अलग है किंतु दोनों की समस्या एक ही है। दोनों उपन्यासों के लेखन में सात दशकों से अधिक का अंतर है लेकिन इन दोनों ही उपन्यासों में अपने मूलभूत आवश्यकता को पाने के लिए संघर्ष एक से ही हैं। महामारी एक भयानक संक्रामक रोग है जिसे देखने ही देखते बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित होते हैं। प्रमाण हमारे सामने कोविड-19 के रूप में उपलब्ध है। महामारी का अपना इतिहास रहा है जिसमें लाखों लोग मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। एक छोटी-सी समस्या किस प्रकार व्यक्ति से होते हुए समाज, देश की समस्या बन जाती है, मनुष्य अपने आपको बचाने के लिए संवेदनशील से संवेदनहींन होता जा रहा है। 

बीज शब्द : माहामारी, अवसरवाद, मनुष्यता, अस्पताल, संवेदनशील, संक्रमण, भय, शमशान, मृत्यु, मुर्दागाड़ी, व्यापार, महँगाई, कोरोना, प्लेग, नागरिकता।  

मूल आलेख : कल तुम्हारी मृत्यु हो जाएगीये वाक्य किसी भी मनुष्य को विचलित कर देगा। यह केवल वाक्य नहीं है। लोगों ने महामारी के समय इसे महसूस किया है। लोग अपनी जान को हलक में लिए हुए पल-पल जीकर भी मर रहे थे। वह रोज दहाई की संख्या में अपने आस-पास मरते हुए लोगों को देखना, किसी भी मनुष्य को दशहत से भर देगा। कोई भी मनुष्य मरना नहीं चाहता, लेकिन मौत निश्चित है, अगर कोई मरना भी चाहेगा तो वह अपने परिवार से दूर नहीं मरना नहीं चाहेगा है। इस परअमृतलाल वेगड़अपने यात्रा वृतांतसौंदर्य की नदी नर्मदामें लिखते है किघर से दूर अपरिचितों के बीच मरना कैसा लगता होगा, मरना सुखद तो नहीं फिर भी अपने घर में कुटुंबियों के बीच मरना सुखद होता है[1] 

वैसे ही महामारी के समय में संक्रमित होते हुए भी लोग अस्पताल नहीं जाते थे उन्हें विश्वास हो गया था कि अस्पताल में भर्ती होने का अर्थ है मौत को निमंत्रण देना। उसके बाद लाश को पोस्टमार्टम करना जिससे शव को परिवार वाले के पास नहीं आना। इसलिए जो लोग संक्रमित होते थे वह अपने आप को एक रूम में बंद कर लेते थे। चाहे वह कामू का उपन्यास प्लेग हो या प्रवीण कुमार का उपन्यास अमर देसवा दोनों उपन्यासों में यह चीज़ देखने को मिलता है। कामू के उपन्यास में जब प्लेग फैलने लगा था तो लोग, कुछ दिन की बात है, समझकर जीवन व्यतीत करने लगे थे, लेकिन महामारी अपने काबू से बाहर जाने लगी। बाहर की दुनिया से संबंध टूटने लगा। देखते-देखते यह एक अंतराल लंबा होने लगा, लोगों का धैर्य जवाब देने लगा था। लोगों में ऊब होने लगी। लोग अपने रिश्तेदारों से बात करने के लिए परेशान होने लगे। अपने घरवालों से बात करने के लिए सरकारी टेलीफोन बूथों पर लोगों की लंबी भीड़ जमा होने लगी थी सरकार ने इस खतरे को देखते हुए टेलीफोन बूथ को बंद कर दिया। बात करने के लिए टेलीग्राम का सहारा लिया जाने लगा, टेलीग्राम के नियम हैं कि तार के दस शब्दों में ही अपने संदेश कहने पड़ते थे, जिस व्यक्ति के पास कहने के लिए इतनी सारी बात हों, वह कैसे अपनी बातों को तार की शब्द-सीमा में बाँध सकता है। लोग मानसिक रूप से कमजोर होने लगे थे। दूसरी ओर डॉक्टर पर वैक्सीन बनाने का दबाव बढ़ता जा रहा था उसे पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही थी। डॉक्टर प्लेग से संक्रमित लोगों पर शोध कर रहे थे कोई शोध के लिए अपने परिजनों को नहीं देना चाहते थे।

मैं नहीं चाहती कि वे लोग मेरे पति पर अपने प्रयोग करे[2] 

अमर देसवा उपन्यास में लेखक पाठकों को पहले ही चेतावनी दे देना चाहते हैं कि इस उपन्यास को मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने उस घटना को देखा है, उसे जाना है, महसूस किया है, वे लिखते है- "यहाँ वर्णित चरित्र और घटनाएँ काल्पनिक नहीं हैं। चरित्रों और घटनाओं का संबंध जीवित और मृत व्यक्तियों से जितना मेल खाता है उतना ही उनकी परिस्थितियों से भी। इसे संयोग समझा जाए। यह वर्तमान की नोक पर छटपटाती-हाँफती एक देश की ताजा सच्चाइयाँ हैं, जिन्हें आप उपन्यास मानकर पढ़ने की भूल कर सकते हैं। [3]

यह सिर्फ़ इस उपन्यास के विषय में ही नहीं कहा जा सकता है बल्कि प्लेग के विषय में कहा जा सकता है कि यह कोई झूठी कल्पना के आधार पर नहीं लिखा गया है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। जो कुछ भी समाज में घटित होता है, वही साहित्य में देखने को मिलता है। अगर धर्म के आधार पर व्याख्या की जाए तो ऐसा माना जाता है कि यह महामारी का जो प्रकोप है, वह ईश्वर हमें हमारे कर्मों फल देते हैं। इसलिए यह प्रकोप होता है। यह हमारे ग़लत कामों की सज़ा है। यह बात दोनों ही उपन्यसो में देखने को मिलती है। प्लेग से बचने की कोई उम्मीद दिखने के कारण लोग धर्म की शरण में जाने लगे थे। फादर पैनलो जो जेसुइट पादरी हैं। वह प्लेग को मनुष्य के पापों का ईश्वरीय दंड बताते है। लेखक लिखते हैं कि-महीने के अंतिम दिनों में हमारे शहर का पादरी वर्ग अपने विशिष्ट हथियारों से प्लेग का मुकाबला करने का फैसला करते है, एक प्रार्थना सप्ताह मानने की घोषणा करते हैं। यह जाहिर है कि लोगों के इकट्ठे होने पर प्लेग का खतरा बढ़ेगा लेकिन फिर भी लोग प्लेग को  देवता के रूप में पूजने लगे। गिरिजाघर हर समय उपासकों से खचाखच भरा रहता था। लोगों को जगह मिलने पर वे आम और अनार के वृक्ष के नीचे खड़े होकर दूर से ही प्रार्थना करने लगते। लोग आपस में बात करतेप्लेग उनके गुनाहों की सज़ा देने के लिए परमेश्वर की तरफ़ से भेजी गई है[4] स्पेनिश बुढ़िया कहती हैदुनिया में इतना ज़्यादा पाप है, अगर लोग मरेंगे नहीं तो और क्या होगा?” [5] ये सिर्फ़ कथन नहीं है, लोगों को विश्वास भी है कि यह उनके कर्मों का ही फल है। जहाँ सरकार एक जगह इकट्ठा होने से लोगों को मना करती है लेकिन जनता चर्च में इकट्ठी हो रही है। जिससे प्लेग में और वृद्धि हो रही है।

जिन लोगों पर धर्म का जोर नहीं था। वह अपना जीवन मस्तमौला रूप में जी रहे थे। उनका ध्यान महामारी की ओर नहीं था। लोग खूब शराब पीते और पैसा पानी की तरह बहाते थे, वहीं अमर देसवा उपन्यास में धर्म की आड़ में महंत रातों रात अस्पताल का निर्माण कर देता है, लोगों का इलाज कराया जा रहा है, लोगों की इतनी भीड़ है कि उन्हें बेड नहीं मिल रहा है। लोग पैसे देकर बेड ख़रीद रहे हैं। जो गरीब हैं, वे गेट के बाहर तड़प रहे हैं, रो रहे हैं, बिलबिला रहे हैं, कोई सुननेवाला नहीं है। यहाँ पर किस प्रकार अस्पताल को आस्था के साथ जोड़ देते हैं। प्रसाद वितरण किया जा रहा है। इस उपन्यास में लेखक ने नागरिकता का प्रश्न भी उठाया है। महामारी से बचने के लिए लोग भटक रहे है। लोग शहर से गाँव की तरफ़ पलायन कर रहे हैं। लोगों के पास पैसे नहीं हैं तो पैदल या साइकिल से निकल गए, जिसे पुलिस, सरकार रोक रही है, राज्य में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। वही दूसरी तरफ़ जापान से आए एक व्यक्ति की किस प्रकार से एक फ़ोन करने पर उसे अच्छा ट्रीटमेंट भी दिया जाता है और उसे उसके देश भी भेज दिया जाता है। महामारी में जान बचाने के लिए प्रयास तो किए ही जा रहे थे, साथ-साथ पूरी व्यापार व्यवस्था चरमरा गई थी। 

ओरान शहर का व्यापार बन्द हो गया था। ओरान आनेवाले जहाज़ों को वापस भेजा जाने लगा। व्यापार भी प्लेग से मर चुका था। लोग में पहली प्रतिकिया यह हुई कि लोग अधिकारियों को गालियाँ बकना शुरू कर दिया, राशन की चीज़ें चोरी से बाहर से मँगाई जाने लगी और उसे ऊँचे दामों पर बेचना शुरू कर दिया। व्यापार का नया रूप देखने को मिलने लगा था। लेखक लिखता है-कीमतें दिन--दिन बढ़ने के बावजूद लोगों ने इतनी फिजूलखर्ची अभी नहीं की थी, लेकिन आवश्यक चीज़ों पर इससे पहले कभी इतना पैसा नहीं लुटाया गया था, फुर्सत के सारे मनोरंजन सौ गुना बढ़ गया[6] 

            जबकि 21 वीं सदी में आए करोना में व्यापार का रूप बदल गया था जो महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं थे, उन्हें छुट्टी दे दी गई थी लेकिन जो कार्य घर रहकर किया जा सकता था उसे वर्क फ्रॉम होम से करने लगे फिर भी व्यापार पर बड़ा असर हुआ जिसका आम जनता पर साफ़ देखा जा सकता था। कीमत आसमान छूने लगी थी, कोई चीज़ बाज़ार में मिलती नहीं थी अगर मिलती भी थी तो उसका दाम दो गुणा, तीन गुणा होता था। उपन्यास में लेखक ने उस तबके को उठाया है जिसे समाज और सत्ता ने भुला दिया है। जिनके लिए कोई नियम-कानून नहीं बनाए गए थे।  लेखक लिखता है, महामारी में शहीद हुए अग्रणी रक्षादल के योद्धाओं को, तमाम सफाईकर्मियों को; और मसान-कब्रिस्तान में दिन-रात खटनेवाले उन लोगों को जिनकी सुध महामारी में किसी को थी। पूरे उपन्यास में अमृत ही लड़ रहा है, वह जानता है, जिंदा रहना है, तो लड़ना पड़ेगा। अमृत नागरिकता को केंद्र में रखकर चलता है। उसे बचाने के लिए हर संभव प्रयास करता है। डॉ. मंडल कहते है-आज नागरिकता का संकट नहीं मनुष्यता का संकट है। मनुष्यता नागरिकता को तो बचा सकती हैं पर नागरिकता मनुष्यता बचाने से रही[7] इस उपन्यास में तेंदुआ, बाघ, हिरण और विक्रमादित्य की प्रतीक रूप में कथा चलती रहती है जो पाठक को पढ़ने में रोचकता बनाए रखती है। 

आलोचक सत्यप्रकाश कहते है, “अमृत तेंदुआ नहीं बाघ है जो खुले में प्रशासन से लड़ता है, लेकिन जब तक अमृत बाघ है, तब तक तो मारा नहीं जाएगा। मारे तो तेंदुए जाएँगे जो लड़ने में सीमाओं को नहीं जानते[8] अमृत तब तक बचा है जब तक वह बाघ है जब काला तेंदुआ बनता है तो विक्रमादित्य उसे मरवा देता है। सत्यप्रकाश के शब्दों को काटते हुए डॉ. राजेश कुमार कहते हैं किसामूहिकता, नागरिकता, समाज और जनांदोलनों के अभाव में काला तेंदुआ ही नहीं अपितु बाघ, शेर, हाथी, हिरण सब मारे जाएँगे या फिर सत्ता के चिड़ियाघर में पालतू हो जाएँगे। [9] अमृत जिस व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहा होता है, आखिर में उन्हीं के सामने घुटने टेक देता है। मानो उपन्यासकार कहना चाहता है कि मृत्यु के समक्ष सब छोड़ा जा सकता है। डॉ. राजेश कुमार लिखते है किबड़ी सरलता से यह आरोप लगाया जा सकता था कि विपक्षी राजनीतिक दलों ने लेखक से यह उपन्यास लिखवाया है। एक उपन्यास लिखने का श्रेय भी लेखक से छीनकर विपक्षी राजनीतिक दलों को दे दिया जाता अर्थात लेखक ने इसे राजनीतिक घटनाओं को अपदस्थ करके उपन्यास कीमोदी विरोधीहिंदू विरोधीहोने के आरोपों और राजनीतिक नारों से बचा लिया है लेकिन बहुत कुछ खो दिया है। [10]  

कथा का प्रवाह नदी की धारा की तरह है जहाँ पाठक बहते चला जाता है। इस बहाव में सी.पी और चंदा की प्रेम कथा पाठक को बाँधे रखती है। भाषा सहज, सरल और प्रवाहमय है इसमें आमतौर देशज शब्दों का इस्तेमाल उपन्यास को रोचक बनता है। लेखक ने उपन्यास को रोचक बनाने के लिए चित्र प्रतीक फैंटेसी शैली का प्रयोग किया है। लेखक में प्रतीक रूप में बताया है कि समाज में हिरण बनकर नहीं जिया जा सकता। विचारों से समाज को नहीं बदला जा सकता। समाज मे निरतंर संघर्ष अनिवार्य है नहीं तो सत्ता नागरिक को जादुई तिलिस्म में भटकाते रहेगी। आए दिन अखबार के आँकड़ों के अनुसार मृत्यु का ग्राफ दिन पर दिन बढ़ता दिखाई दे रहा था। लोग जो पहले डरे हुए थे, वे अब सामान्य हो गए थे। उनके लिए यह आम बात हो गई थी, लेकिन उन्होंने यह ख्याल बराबर मन में बनाए रखा था कि अगला कौन? रोज़ सैंकड़ो की संख्या में मौत होती थी। हजारों की संख्या में संक्रमित।जिस रफ़्तार से मुर्दे दफनाये जाते थे उसे देखकर हैरानी होती थी। सारी औपचारिकताएँ धीरे-धीरे खत्म हो गई थी और साधारण तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसी तमाम रस्मों पर, जो जटिल और विस्तृत थी पाबंदी लगा दी गई थी”[11] ताबूतों को मुर्दागाड़ी से घसीटकर उतारे जाने लगा, रस्सियों से घसीटकर कब्र तक लाकर एक के ऊपर एक लाशों का ढेर करके दफनाया जाता था। लेखक लिखते हैं-मुर्दो को लपेटने के कफनों की और क़ब्रिस्तान में जगह की कमी हो गई”[12] ऐसी अनेक लाशें थी जो लावारिस थी। जिनकी पहचान नहीं की जा सकी थी। ये वे लोग थे, जो किसी काम से इस शहर आए हुए थे। प्लेग फैलने के कारण यहीं रुकना पड़ा। वैसे ही लेखक एक व्यक्ति का जिक्र करता है-बहार के मौसम में एक दुरिंग ओपेरा कंपनी इस ओपेरा को कुछ दिनों के लिए पेश करने ओरान शहर आई थी इसी बीच प्लेग फैल गई और कंपनी को यही रुकना पड़ा। उन्हें बहुत-सी दिक्कतें पेश आई इसलिए उन्होंने ओपेरा हाउस के प्रबंधन के साथ एक समझौता कर लिया जिसके मुताबिक उन्हें अगली सूचना मिलने तक हफ्ते में एक दिन ओपेरा खोलने के लिए कहा गया”[13] 

      महामारी से बचने के लिए हमें बहुत चीजों का त्याग करना पड़ेगा। तभी जाकर हम महामारी से जीत सकते है इस विषय पर प्रतिमान पत्रिका में प्रमोद रंजन लिखते हैं “विश्वभर के सूचना देने वाले तमाम तंत्र एक सुर में संकेत कर रहे है कि कोविड-19 इतिहास की सबसे भयंकर बीमारी है। हजारों लोग रोज़ इससे संक्रमित हो रहे है। सैंकड़ों की जान जा रही है। इसलिए हमें इससे बचने के लिए मनुष्य की आज़ादी को सीमित करने, उसके अधिकारों को छीनने और व्यवस्था को अधिक क्रूर बनाने वाले प्रतिबंधों को स्वीकार करना होगा।”[14] 

निष्कर्ष : महामारी का अंतराल कितना भी बड़ा क्यों हो उसकी समस्याएँ लगभग समान होती हैं। कामू द्वारा लिखा गया उपन्यासप्लेगऔर प्रवीण कुमार द्वारा लिखा गया उपन्यासअमर देसवादोनों के काल में लगभग आठ दशकों का अंतर है लेकिन समस्या समान है। जो भिन्नता देखने को मिलती है वह देश, काल और मनुष्य के स्तर पर ही मिलती है। दोनों ही उपन्यास का जो मूल समस्या है वह मनुष्यता को जीवित रखने का है। दोनों ही उपन्यासों में हल्का दिखाई देता युग कोई भी मनुष्य धर्म से इत्तर नहीं चल सकता है। धर्म मनुष्य के छाया की तरह होता है। कामू का उपन्यास हो या प्रवीण कुमार का दोनों ही उपन्यासों में धर्म किस प्रकार जीवन में बाधा बनकर सामने आता है। होना तो यह चाहिए कि धर्म हमारे उन्नति के मूल में है।भारतेंदुने अपने निबंधभारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?’ में उन्नति का मूल धर्म को ही मनाते है लेकिन आज लोगों ने इसे अनुचित दिशा में लेकर जा रहे है। दोनों ही उपन्यासों में किस प्रकार महामारी से व्यापार व्यवस्था चरमरा गई थी। साथ ही मनुष्य के लिए जो मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता होती हैं। वह भी उपलब्ध नहीं हो पा रही थी। जो उच्च वर्ग के लोग थे, उनकी पहुँच से बाहर हो गई थी तो आम लोगों की क्या बात की जा सकती है। कोई भी महामारी आती है तो उसका दायित्व मनुष्य को खुद लेना होगा। हम पूरी तरह सरकार पर निर्भर नहीं रह सकते। मनुष्यता को जिंदा रखना है तो हमे मनुष्य बनना होगा शैतान नहीं।

संदर्भ :

1.अमृतलाल,वेगड़,सौंदर्य की नदी नर्मदा,पेंगविन,2006 पृष्ट संख्या 64 
2.अल्बेर,कामू,प्लेग, राजकमल प्रकाशन,1961,पृष्ठ संख्या 72
3.प्रवीण कुमार,अमर देसवा,राधाकृष्णा,2021,पृ संख्या 7,
4अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,पृष्ठ संख्या100
5. अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,,पृष्ठ संख्या100
6. अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,पेज 203
7 प्रवीण,कुमार,अमर देसवा,राधाकृष्णा,2021 पृष्ठ संख्या119
8.हंस पत्रिका -डॉ सत्यप्रकाश जनवरी 2023
9.तद्भव पत्रिका - डॉ राजेश कुमार जनवरी 2023 पूर्णाक 46,9 
10 तद्भव पत्रिका - डॉ राजेश कुमार जनवरी 2023 पूर्णाक.पृष्ठ संख्या9
11 अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,,पृष्ठ संख्या180
12. अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,पृष्ठ संख्या 182
13. अल्बेर,कामू,प्लेग,राजकमल प्रकाशन,1961,पृष्ठ संख्या 185
14. प्रतिमान पत्रिका, कोरोनाकाल, प्रमोद रंजन, पेज 12

 

कुंदन
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविध्यालय, दिल्ली
7042990083, Kun1996dan@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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