- बृजेश कुमार यादव
शोध सार : कृष्णा सोबती हिंदी की महत्त्वपूर्ण साहित्यकार हैं। ये वर्ष (2025) उनका जन्मशताब्दी वर्ष है। साहित्यिक समाज उन्हें अपने तरह से याद कर रहा है। उनके साहित्यिक-सामाजिक अवदान पर चर्चा-परिचर्चा हो रही है। कहना न होगा कि ये चर्चाएँ उनके कथाकार व्यक्तित्त्व पर केन्द्रित हैं। प्रस्तुत आलेख में मैंने उनके यात्री व्यक्तित्त्व और उनके सहज प्राकृतिक आकर्षण एवं सौन्दर्यबोध को रेखांकित करने का प्रयास किया है।
बीज शब्द : यात्रा, यात्रा-साहित्य, यात्रा-आख्यान, स्त्री-चेतना, घुमक्कड़-शास्त्र, आधुनिक, भूमंडलीकरण, संस्कृति, भारतीय संस्कृति, वेद, हिमालय. लद्दाख़, तिब्बत।
मूल आलेख : हिंदी में स्त्री यायावर कम हुई हैं। अपनी यात्रा का आख्यान लिखने वाली तो और भी कम। मध्यकाल में मीराबाई ने घुमक्कड़ी की, जिसका प्रमाण उनका जीवन और साहित्य है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हरदेवी एक महत्त्वपूर्ण साहित्यकार हुई हैं, जिन्होंने चेतना सम्पन्न दृष्टि से न सिर्फ़ अपनी यात्राओं का वर्णन किया है बल्कि भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर भी विचार-विमर्श किया है। इसके बाद हिंदी साहित्य में स्त्री यात्री के द्वारा लिखे यात्रा-आख्यान का टोटा दिखाई पड़ता है। यह एक बड़ा कालखंड है जो रिक्त है। यह शोध का विषय है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं इक्कीसवीं शताब्दी में हिंदी स्त्री-यात्रियों के यात्रा-आख्यान की एक अनवरत परम्परा दिखाई देती है। आधुनिकयुग की नारी एवरेस्ट-चढ़ने से लेकर ‘नंदा देवी’ जैसी ‘स्त्री-वर्जित पहाड़ी’ की यात्रा करती है बल्कि तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए वह दुनिया भ्रमण पर निकल पड़ी है। धर्म रूढ़ियों, अन्धविश्वासी अन्याताओं, पितृसत्तात्मक वर्जनाओं को धता बताते हुए ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ का ठप्पा लगाये भटकती फिरती है! बहुत पहले राहुल सांकृत्यायन द्वारा देखा गया सपना धीरे-धीरे सच होता नज़र आ रहा है।
घुमक्कड़ी को राहुल सांकृत्यायन ने एक अलग ही धर्म की कोटि में रखा है, जहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव वर्जित है। राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़शास्त्र’(1948) में स्त्री यात्रियों की जिज्ञासाओं पर विचार करते हुए लिखा था,“कोई–कोई महिलाएँ पूछती हैं – क्या स्त्रियाँ भी घुमक्कड़ी कर सकती हैं, क्या उनको भी इस महाव्रत की दीक्षा लेनी चाहिए? इसके बारे में तो अलग अध्याय ही लिखा जाने वाला है, किन्तु यहाँ इतना कह देना है कि घुमक्कड़–धर्म ब्राह्मण धर्म जैसा संकुचित नहीं है जिसमें स्त्रियों के लिए स्थान नहीं हो। स्त्रियाँ इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं जितना पुरुष। यदि वह जन्म सफल करके व्यक्ति और समाज के लिए कुछ करना चाहती हैं, तो उन्हें भी दोनों हाथों इस धर्म को स्वीकार करना चाहिए। घुमक्कड़ी–धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्ते में लगाये हैं। बुद्ध ने सिर्फ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था |”1 इतना ही नहीं, वह तो घुमक्कड़ धर्म के वैश्विक रूप पर विचार करते हुए उसके स्वरूप विस्तार की बात करते हैं तथा देश-दुनिया में युवतियों पर लगे तरह – तरह के पाबंद और बंदिशों को तोड़ आगे आने के लिए आह्वान करते हैं, “घुमक्कड़–धर्म सार्वदेशिक विश्वव्यापी धर्म है। इस पंथ में किसी के आने की मनाही नहीं है, इसलिए यदि देश की तरुणियाँ भी घुमक्कड़ बनने की इच्छा रखें, तो यह ख़ुशी की बात है। स्त्री होने से वह साहसहीन है, उसमें अज्ञात दिशाओं और देशों में विचरने का अभाव है– ऐसी बात नहीं है– जहाँ स्त्रियों को अधिक दासता की बेड़ी में जकड़ा नहीं गया, वहां की स्त्रियाँ साहस यात्राओं से बाज नहीं आतीं। अमेरिकन और यूरोपीय स्त्रियों का पुरुषों की तरह स्वतन्त्र हो देश–विदेश में घूमना अनहोनी–सी बात नहीं है|”2
वह घुमक्कड़ी धर्म के लिए स्त्री और पुरुष को सामान अधिकार की वकालत करते हैं तथा लैंगिग या किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हुए लिखते हैं, “जहाँ तक घुमक्कड़ी करने का सवाल है, स्त्री का उतना ही अधिकार है जितना पुरुष का। स्त्री क्यों अपने को इतना हीन समझे? पीढ़ी के बाद पीढ़ी आती है और स्त्री भी पुरुष की तरह ही बदलती रहती है |”3 यह बदलाव आधुनिक हिंदी साहित्य में परिलक्षित है। आधुनिकता के दबाव और समाज में आये परिवर्तन ने स्त्री के जीवन-स्तर को बदला है। शिक्षा, तकनीक, आर्थिक निर्भरता ने स्त्री-जीवन को सुगम बनाया है। यह परिवर्तन यात्रा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। कृष्णा सोबती इसी विकास परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। ये वर्ष (2025) हिंदी के कई महत्त्वपूर्ण साहित्यकरों का जन्मशताब्दी वर्ष है। हिंदी अकादमिक जगत अपने तरीक़े से सभी को याद कर रहा। हिंदी की महत्त्वपूर्ण स्त्री-कथाकार कृष्णा सोबती का भी ये जनशताब्दी वर्ष है। उनके साहित्यिक अवदान पर विभिन्न दृष्टिकोण से चर्चा-परिचर्चा हो रही। उनके व्यक्तित्त्व की सहजता, उनके कृतित्त्व की व्यापकता एवं चिंतन की गहराई में, दिखाई देता है। उनके साहित्य में स्मृति का एक ऐसा स्वरूप झलकता है जिसमें सांस्कृतिक बिछोह, उजाड़ की कसक, जड़ से उखड़ने का दुःख, दिखाई देता है। उनके साहित्य में युगीन परिस्थियों और सामाजिक विडम्बनाओं का तो चित्रण मिलता ही है, स्त्री-समस्याओं, स्त्री-चेतना और सेक्सुअलिटी एवं स्त्री-अस्मिता के प्रश्न को उन्होंने बेबाकी से उठाया गया है।
कृष्णा सोबती ने जितनी यात्राएँ की हैं, उन सबका यात्रा-वृत्तान्त नहीं लिखा! कुछ ही यात्राएँ होती हैं, जो मन-मस्तिष्क पर प्रभाव छोड़ पाती हैं। कृष्णा सोबती के लिए लद्दाख़ यात्रा एक ऐसी ही यात्रा है, जिसने उनके सांस्कृतिक-बोध में इज़ाफा किया है। ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख़’ (2012)- कृष्णा सोबती का प्रकाशित अब तक का एक मात्र यात्रा-आख्यान है! कृष्णा सोबती हिंदी की एक महत्त्वपूर्ण बहु-पठित और बहु-चर्चित साहित्यकार हैं। साहित्य में उनकी ख्याति एक सशक्त कथाकार की है! उन्होंने संस्मरण और आलोचना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। किसी भी साहित्यकार की पहचान उसके प्रारंभिक लेखन से बन जाती है। यही कारण है कि कृष्णा सोबती के कथेतर साहित्य पर जितनी चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हुई। उनके कथेतर साहित्य पर बहुत कम लिखा – पढ़ा – बोला गया! जबकि उनका वह पक्ष उनको जानने, उनकी साहित्यिक अभिरुचि, साहित्य-कला विषयक समझ, को जानने-समझने में अधिक सहायक है! सन् 2012 में उनका बहुत महत्त्वपूर्ण और बेहद खूबसूरत यात्रा-वृत्तान्त प्रकाश में आया—‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख़’। जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह उनकी लद्दाख़ यात्रा पर केन्द्रित है। यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उन्होंने यात्राएँ तो बहुत कीं; देश – दुनिया घूमती रहीं, लेकिन यात्रा - वृत्तांत केवल अपनी लद्दाख़ यात्रा का ही क्यों लिखा? क्या इसके पीछे लद्दाख़ की संस्कृति, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं आध्यात्मिक वातावरण तो नहीं!, जिसने लेखिका को लिखने के लिए बाध्य किया? अन्य स्थान यह कार्य करने को बाध्य न कर पाए! कृष्णा सोबती की लद्दाख यात्रा उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विकास करने वाली थी।
कृष्णा सोबती ने लद्दाख यात्रा की कोई पूर्व योजना नहीं बनायी थी। लद्दाख घूमने की उनकी योजना अकस्मात् बनी! वह पुस्तकालय में कुछ पुस्तकें खोजते हुए। वह जिन क्षेत्रों की यात्रा करने वाली थीं, उस सूची में लद्दाख का नाम तक नहीं था। उन्होंने लिखा कि —“देश के बहुत-से पर्वतीय स्थान— शिमला, चैल, कसौली, मंसूरी, चकराता, नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा, मुक्तेश्वर, धर्मशाला, पालमपुर, कौसानी, इम्फाल, शिलांग, दार्जिलिंग, गंगटोक देख लेने के बाद मैं अब दक्षिण भारतीय पहाड़ों पर जाने का मन बना रही थी। जानकारियाँ इकट्ठा कर रही थी कि संयोग से एक दुपहर शास्त्री भवन की लाइब्रेरी में यूनेस्को द्वारा प्रकाशित और मदनजीत सिंह द्वारा लिखित ‘हिमालय आर्ट’ की प्रति मेरे हाथ लगी। शुरू के कुछ पन्ने पलटे। सरसरी निगाह से चित्र देखे तो लद्दाख़ के अध्याय पर अटक गयी। अद्भुत लैंडस्केप। पहाड़ों का अनोखा विस्तार।”4 प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति खिंचा चले जाना ही तो साहित्यिक मनोवृत्ति के यायावर की मुख्य पहचान है! हिमालय का सौन्दर्य और आध्यात्मिक वातावरण ही ऐसा है कि महानगरीय जीवन से त्रस्त मनुष्य को आकर्षित करता है, और उसे मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। इस आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक शांति और सार्थकता प्रदान करता है लद्दाख में बौद्ध धर्म एवं दर्शन। यह प्रकृति की निर्मिती है। मानव सभ्यता चाहे जितना विकास कर ले लेकिन वह इस तरह का मन-मस्तिष्क को शांति प्रदान करने वाला आध्यात्मिक परिवेश का निर्माण नहीं कर सकता। मनुष्य के वश की बात नहीं कि वह दूसरा हिमालय बना सके-“हिमालय की स्वायत्तता अदम्य है। प्रकृति द्वारा सिरजित हिमालय एक ऐसा पाठ है, जो न किन्हीं हाथों द्वारा लिखा जा सकता है, न निर्मित ही किया जा सकता है। हिमालय देश की चारों दिशाओं में फैले भारतीय जनमानस का भौगोलिक आध्यात्मिक स्रोत है। शिखरों पर स्थित तीर्थों का पवित्र प्रतीक है। भारतीय मन की रूचियों को उद्वेलित करती कलात्मक अभिव्यक्तियाँ इसी उद्गम से निकली नदियों के साथ – साथ प्रवाहित होती रही हैं। भारत भूमि और उसके नागरिकों के मानस को सींचती रही हैं। हिमालय हमारे भूगोल और इतिहास का महानायक है। हमारी संस्कृति और इतिहास की महागाथा है।”5
‘सुबह-ए-बनारस’ तो लोगों ने सुना और देखा है लेकिन क्या आपने कभी सुबह-ए- लद्दाख भी देखा-सुना है? नहीं, न! कृष्णा सोबती ने देखा और उसकी विशिष्टता को पहचाना है। लद्दाख में हिमालय की सुबह इतनी खूबसूरत और आकर्षक है कि लेखिका को ऋग्वेद में वर्णित हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का आख्यान रचती ऋचाएं याद हो आयें तो कोई आश्चर्य नहीं, “सीमांतों को पार कर भारत आने वाले आर्य समूह ने विराट हिमालय की शान्त मगर रोमांचकारी छवियाँ देख इसे देव-स्थल मानकर ऋग्वेद में काव्यात्मक रिचाओं को ध्वनित किया है। प्रशंसा में जो उच्चारण किया है, वह अद्भुत है। सूर्य, धरती, आकाश, अग्नि, वायु, उषा की ऋचाएं अतुलनीय हैं। स्तुति में यह भी कहा गया है उनके निकट महान हिमालय बड़ा सगुण है।”6 पहाड़ों में चलने वाली तेज़ हवाएँ वहां के एकांत एवं शांति को तोड़ती हैं। गैर-पहाड़ी व्यक्ति के लिए एकदम चमत्कारिक अनुभव। लद्दाख़ में चलने वाली सनसनाती तेज़ हवाओं को कौन नज़रंदाज़ कर सकता है। ये हवाएँ उसकी भिन्न भौगोलिक संरचना की पहचान हैं, “यह हवाएँ भी यहाँ की प्रकृति का चमत्कार हैं। सरद - गरम हवाएँ सुबह हल्की और कभी सूरज के तेज ताप से तूफ़ानी बन जाती हैं। इनके रूखे भँवर अपने शोर के साथ अंधड़ की शक्ल में बदल जाते हैं और पहाड़ों से लगे सन्नाटों को झंझोड़ते चले जाते हैं।”7
लद्दाख़ के भूगोल में भौगोलिक विविधता सर्वत्र दिखाई देती है। प्रकृति ने जैसे उसे सृजा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है, “लद्दाख़ की प्रकृति का अंकन आख्यान कुछ ऐसे कि विभिन्न रंग-रूप तुलनात्मक शैली में अभिव्यक्त हुए हैं। ऊँची बर्फीली चोटियाँ हैं तो मँझोली पहाड़ियां भी। आकाश को छूते शिखर हैं तो आराम से पसरी चट्टानें भी। हिमशिखर जमे हैं मजबूती से मगर पानी की जलधाराएँ बूँद-बूँद रिसती हैं। ठंडक पिघलती है तो धूप में और धूप उसे सोख लेती है। घतिभर में सन्नाटे पड़े हैं मगर रात में तूफ़ानी हवाओं का जबर शोर होता है। प्रकृति के इस भौगोलिक आकाश के विस्तार की नीलाहटें हैं तो हिमालय का बर्फ़ीला ठाठ भी।”8 लद्दाख़ की धार्मिक एवं सांस्कृतिक छवि में बौद्ध धर्म-दर्शन अनुस्यूत है। बौद्ध धर्म-दर्शन एवं साधना पद्धति यहाँ की विशेषता है। लद्दाख़ में बौद्ध संस्कृति की प्रधान है। इस लोक के अस्तित्व में आने की सभी धर्मों में परिकल्पनाएं हैं। बौद्ध धर्म इसका अपवाद नहीं। लद्दाख़ के अस्तित्त्व की बौद्ध परिकल्पना प्रकृति से कितनी जुड़ी हुई है –
“यह पृथ्वी पहले-पहल एक झील पर उभरी थी।
उस झील के पानी पर भला क्या उगा?
उस झील के पानी पर हरित उग आया।
उस हरित पर भला फिर क्या हुआ?
उस पर खड़े हो गए तीन शिखर।
उन तीन शिखरों का नाम क्या?
एक नाम हुआ–श्वेतमणि
दूसरे का नाम हुआ– लालमणि
तीसरे का नाम हुआ– नीलमणि
उन तीन पर्वतों पर क्या उगा?
उन पर उग गए तीन वृक्ष
इन तीन वृक्षों के नाम भला क्या?
पहले का नाम हुआ– श्वेत सन्दल वृक्ष।
दूसरे का नाम हुआ – लाल सन्दल वृक्ष
तीसरे का नाम हुआ – नील सन्दल वृक्ष
फिर इन पेड़ों पर किन पक्षियों का बसेरा हुआ?
पहले पेड़ पर दूरदर्शी बाज।
दूसरे पेड़ पर जबर मुर्गी।
और तीसरे पेड़ पर काली चील।
जल, पृथ्वी, पहाड़, फूल, वृक्ष, पशु – पक्षी और धरती के प्राणी – यही है इस लोक की कहानी।”9
लेह की प्राकृतिक सुषमा देखते बनती है। आकाश ऐसे दिखाई देता है मानो अवर्णीय “लेह के निर्मल आकाश पर सूरज का सुनहला आलोक। बादलों के छोटे-बड़े गुच्छे कहीं पीले, कहीं ग्रे और कहीं हल्के-से गुलाबी-जामुनी। कुदरत के कठोर वैभव का अनूठा लैंडस्केप। देर तक सूर्यास्त का प्रकाश मद्धम गति से अंधेरों में बदलने लगा तो बाज़ार में चलते हुए कुछ ऐसा भासा कि लोग आकाश की वीथि में चल रहे हैं।”10 बौद्ध धर्म और अन्य लद्दाखियों में भी भूत-प्रेत एवं शक्तियों की मान्यता है। उनका मानना है कि “ हर देवता अपने-अपने आकार में विशेष रंग और गुण का प्रतीक है। लद्दाखी दैवीय शक्तियों में विश्वास रखते हैं। इनकी भाषा में ‘लाह’ देवता है।
लाहमिन असुर है
मी मनुष्य है
दुरबी शैतान है
मथाल नरकवासी
शिखरों के देवता शिव और उनकी धर्मिणी महिषासुर-मर्दिनी के रूप में यहाँ चित्रित हुई हैं। इसी तरह बाहुल्य की देवी और महासरस्वती और लक्ष्मी भी। लद्दाख़ की सीमान्त धरती कुदरत के विशाल मंच की तरह है।”11 किसी भी देश और समाज में पशु-पक्षियों का अपना महत्त्व होता है। लद्दाख़ जैसे शुष्क एवं बर्फ़ीले भौगोलिक क्षेत्र में ख़ास तरह की वनस्पति और जीव पाए जाते हैं। पहाड़ी घोड़े, याक, हिरण, पहाड़ी बकरी, हुनिया बकरी, मार्कोर बकरी, शईन बकरी, बर्फ़-चीते इत्यादि जीवों का वहां पाया जाना वहां के पारिस्थितिक तंत्र की विशिष्टता को दर्शाता है।
लद्दाख को लद्दाख़ के अलावा भी अन्य कई नामों से जाना जाता है – “मारयुल (लाल धरती ), मांगयुल (बहुत से लोगों का घर), की – खाछान – पा (बर्फ की धरती )।... इसे बुद्ध का कमण्डल भी कहा जाता है। बुद्ध थान भी कहा जाता है।”12 बुद्ध ने संघ, संयम और परिश्रम को महत्त्व दिया है। कृष्णा सोबती ने लद्दाख़ में इसका साक्षात्कर किया। उन्होंने लद्दाख़ में बौद्ध धर्म-दर्शन का जो साक्षात्कर किया, उसे उन्होंने जिन शब्दों में अभिव्यक्त किया है, उसे इस धर्म-दर्शन के सार कहा जा सकता है। वह लिखती हैं,
“मैं भी किसान हूँ।
मैं श्रद्धा का बीज बोता हूँ। उस पर परिश्रमी प्रयत्नों की वृष्टि होती है।
प्रज्ञा मेरा हल है।
लज्जा हल का मूठ है।
चित्त रस्सियाँ हैं।
जागृति हल की फाल और चाबुक है।
शरीर और वाणी से मैं संयम रखता हूँ।
नियमित आहार में रहकर सत्य द्वारा मन के दोषियों की गोड़ाई करता हूँ।
संतोष मेरी आवश्यकता है।
उत्साह मेरे बैल हैं।
मेरा वाहन ऐसी दिशा में जाता है जहाँ दुःख नहीं, शोक नहीं।”13
कृष्णा सोबती लद्दाख़ में आ बसे उस आदिम क़बीलों की जाँच-पड़ताल करती हैं तो पाती हैं कि ‘मोन’ और ‘दरद’ यहाँ के सबसे प्राचीन जातियां हैं जो तिब्बत से आकर यहाँ बसे हैं। तिब्बत से पहले वह सिन्धु सभ्यता से जुड़े थे। वह अपनी आदिम प्रार्थनाओं में उन्हें आज भी याद करते हैं। वह लिखती हैं, “मोन और दरद लद्दाख़ में आकर बसने वाली प्राचीनतम जातियों में कहे जाते हैं। ये लोग पहले तिब्बत में बसे फिर लद्दाख़ की ओर, सुनसान विस्तारों की ओर बढ़ते चले आये. लद्दाख़ में ‘दरद’, ‘द्रास’ और ‘दाह’ में इनके कबिले बसे हैं।
द्रास के कबीलों ने तीन सदियों पहले इस्लाम कबूल कर लिया।
दाह में रहने वाले दरद अपनी मूल जातीय अस्मिता को आज तक बनाये हुए हैं। उन्होंने धर्म-परिवर्तन नहीं किया, न इस्लाम स्वीकार किया और न ही बौद्ध-धर्म।”14
दरद के सम्बन्ध में एक रोचक जानकारी यह है कि “ये लोग हर तीन बरस में एक ऐसा त्योहार मनाते हैं जो एक साथ अद्भुत और अनोखा है। देशांतरण और धर्मांतरण के पहले कालखंड की स्मृति को मौखिक स्मरण-स्तोत्र में दोहराते हैं। सदियों देशांतरण से पहले सिंध घाटी में अपने पूर्वजों और उनकी बस्तियों की याद वो आज भी दोहराते -गाते हैं। सिन्धु घाटी से अपने ऐतिहासिक विस्थापन के बाद भी जातीय स्मृति अपने अतीत को भूलना नहीं चाहती। दरद कबीलों का यह स्मृति-समारोह अपने अतीत को आख्यान की वाचन संगत के रूप में आज भी जीवित रखे हुए है। ...विस्थापन और देशांतरण की त्रासदी द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी, शताब्दियों तक अपने अपरिवर्तनीय अतीत को गाते चले जाना ही शायद मानवीय इतिहास लिखने की शुरुआत होगी।”15
निष्कर्ष : ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख़’ न सिर्फ़ भाषा और शिल्प सौष्ठव की दृष्टि से अनूठा यात्रा-आख्यान है बल्कि हर स्थिति को दर्शाते अनूठे चित्रों के संयोजन के लिए भी। ऐसा लगता है दो वृत्तान्त एक साथ चल रहे हों – एक शब्दों में तथा दूसरा दृश्यों में! शब्द शिल्पी कृष्णा सोबती हैं तो दृश्यशिल्पी सिद्धार्थ एवं सरबजीत सिंह बावरा। एक शब्दों के माध्यम से भौगोलिक स्थितियों की कल्पना को साकार करता है तो दूसरा दृश्यों के माध्यम से शब्दों को प्राणवान बनाता है। छायाचित्रों के माध्यम से शब्दों में प्राण प्रतिष्ठापित करता है। इसीलिए यात्रा-साहित्य में छायाचित्रों की महत्ता रेखांकित होती है। ओम थानवी ने ठीक ही कहा, ‘इसका प्रकाशन इतना सुरुचिपूर्ण है कि हिंदी में शायद ही कोई और यात्रा-संस्मरण इस रूप में छपा होगा।
हर पन्ने पर रंगीन तस्वीरें, रेखांकन, वाक्यांश कृष्णाजी के गद्य की शोभा बढ़ाते हैं। वे अपनी पैनी और सहृदय नज़र से लेह के बाज़ार, महल, दुकानें, लोग, गुरुद्वारे, पुस्तकालय, प्रशासन, प्रकृति सबको निहारती चलती हैं।’16
सन्दर्भ :
- घुमक्कड़शास्त्र, राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, पृ. 9
- वही, पृ. 50
- वही, पृ. 50
- बुद्ध का कमंडल लद्दाख़: कृष्णा सोबती, राजकमल प्रकाशन (2012), पृ.11
- वही, पृ.5
- वही, पृ. 22-23
- वही, पृ. 25
- वही, पृ. 29-31
- वही, पृ. 39-40
- वही, पृ. 45
- वही, पृ. 46
- वही, पृ. 132-133
- वही, पृ.132-133
- वही, पृ.164
- वही, पृ.164-166
- हिंदी के 10 श्रेष्ठ यात्रा संस्मरण, https://www.bbc.com/hindi/india/2013/09/130915_hindi_special_travelogue_akd
बृजेश कुमार यादव
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
इलाहाबद डिग्री कॉलेज, प्रयागराज
bkyjnu@gmail.com, 9968396448

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