शोध आलेख : बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी : नामवर सिंह, हिन्दी आलोचना और अस्मिता-विमर्श के अंतर्विरोध / प्रियंका सोनकर

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी
नामवर सिंह, हिन्दी आलोचना और अस्मिता-विमर्श के अंतर्विरोध
- प्रियंका सोनकर

 

हिन्दी साहित्य में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल व्यक्ति नहीं रह जाते, बल्कि संस्था का रूप ले लेते हैं। नामवर सिंह ऐसा ही एक नाम है। वे आलोचक, वक्ता, शिक्षक और बहस के केन्द्र रहेऔर यह केन्द्रता इतनी प्रबल रही कि हिन्दी आलोचना के बड़े हिस्से ने स्वयं को उनके इर्द-गिर्द परिभाषित करना शुरू कर दिया। उनके पक्ष में बोलना प्रगतिशीलता का प्रमाण माना गया और उनसे असहमति अक्सर अपरिपक्वताया पूर्वाग्रहके खाते में डाल दी गई। लेकिन आलोचना का धर्म यह नहीं कि वह प्रतिष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाए; आलोचना का मूल स्वभाव प्रश्नाकुलता है। नामवर सिंह के अनुसारआलोचना औजारों का बक्सा नहीं, जिसे पाकर कोई आलोचक बन जाए। अक्ल हो तो एक पेचकश ही काफी है!’’[1]

नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को आधुनिक तर्कशीलता, संरचनात्मक समझ और वैचारिक बहस से जोड़ायह उनका ऐतिहासिक योगदान है। जहां कुछ लोग पुस्तकों की छपास की पीड़ा से गुजर रहे हैं वहीं वे मौखिकवाचिक परम्परा का निर्वाह करते हुए हिन्दी आलोचना में अलख जगाये हुए थे। बकौल नामवर सिंह – ‘पुस्तक के रूप में प्रकाशन करने के लिए कुछ लोग हर साल, हर महीने दनादन, दनादन किताबें निकालते रहते हैं। अपना ये कभी स्वप्न नहीं रहा। आलोचना मैंने हिन्दी में हस्तक्षेप के रूप में की है। जहां जरूरी लगा कि साहित्य में जो चल रहा है, उसमें मैं हस्तक्षेप करूं, बदलूं, साहित्य की किसी धारा या प्रवृत्ति को। कोई नई चीज उभर रही है और उसकी उपेक्षा हो रही है तो उस पर बल दूं। सार्थक आलोचना वही होगी।’’[2] किंतु इसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि उनके विचारों, विशेषतः स्त्री विमर्श और दलित साहित्य पर दिए गए वक्तव्यों को आलोचनात्मक निगाह से देखा जाए। क्योंकि यहीं वह बिंदु है जहाँ उनकी प्रगतिशीलता बार-बार एक सीमा पर आकर ठहर जाती है।

हिन्दी आलोचना में कुछ लोगों ने उन्हें `आलोचना के शिखर पुरुष[3] से नवाजा, तो किसी ने हिन्दी आलोचना का  प्रोमेथ्युस माना, किसी ने उन्हें सबसे बड़ा संवादक माना और कुछ लोगों ने क्रांतिकारी विचारों का आलोचक भी। खगेन्द्र ठाकुर नामवर जी के बारे में कहते हैं – “नामवर सिंह ने देश भर में विशेष कर हिन्दी क्षेत्र में घूम-घूमकर क्रांतिकारी विचारों के बीज बोये हैं।...नामवर जी ने जिस तरह से जिन विचारों के बीज बोये हैं, वे इतिहास से सम्बन्ध रखते हुए भी भारतीय विचार-परम्परा का अंग होते हुए भी इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे वर्तमान में वैचारिक लड़ाई में शामिल हैं। उनका व्याख्यान कराना वास्तव में लड़ाई का मोर्चा खोलना है।’’[4] लेकिन उनकी इस क्रांतिकारिता के असल बीज को देखे जाने की जरूरत है कि उसकी शाखाएं किस रूप में फैली।

नामवर सिंह का विवादों से बड़ा गहरा नाता रहा है, ये विवाद हमेशा उन्हें चर्चित बनाए रहते थे। ‘’नामवर सिंह हिन्दी साहित्य जगत में हमेशा चर्चा के केंद्र बने रहते हैं। कभी स्वप्रस्तुत विवादास्पद एवं विचारोत्तेजक मंतव्यों के कारण तो कभी किसी अन्य आलोचक के द्वारा उनके किसी साहित्यिक पोलिमिक्स  खुलासे के कारण। वैसे आम हिन्दी वालों के बीच यह धारणा पैठ सी गई है कि नामवर जी को चर्चा के केंद्र में बने रहने के सभी गुर आते हैं।’’[5] नामवर सिंह की किस्मत में विवाद एकअनिवार्य प्रश्नकी तरह है।[6] तभी तो उन्हें कहना पड़ा, ‘’जब मैं लिखता हूँ तो विवाद, जब मैं बोलता हूँ तो विवाद और यहाँ तक कि जब मैं खामोश रहता हूँ तब भी विवाद।’’[7] यह अकारण नहीं कि साहित्य जगत में नामवर जी का नाम हर दूसरे-तीसरे के मुख पर यूंही नहीं रहता है। अपने एक लेखहिन्दी आलोचना के प्रोमेथ्युस डॉ. नामवर सिंहमें सूरज बहादुर थापा लिखते हैं – “लम्बे समय से या तो नामवर जी ने स्वयं विवाद खड़े किए हैं अथवा उनके विरोध में लिखे गए आक्रामक लेखों के कारण वे चर्चा के केंद्र में आते रहे हैं। ऐसे में नामवर जी के इर्द-गिर्द शंकाओं के घने बादल घिरने लगते हैं और इस बात की जरूरत आन पड़ती है कि सत्य की पड़ताल की जाए।’’[8] यहाँ गौरतलब है क्या उस सत्य की पड़ताल की गयी जिसकी बात सूरज बहादुर थापा जी कर रहे हैं।

इस लेख के अध्ययन के दौरान कई ऐसे लेखों और पुस्तकों से गुजरना पड़ा जहां नामवर जी के विवादों में घिरे रहने की बात आई हो। कई ऐसे साक्षात्कारों की पुस्तकों में उनकी इस विवादों की बातों को लोगों ने साझा किया है- “वैसे तो हिन्दी में विवादास्पद होने को विरुद की तरह बरता जाता है लेकिन नामवर सिंह शायद हिन्दी साहित्य के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनका बोलना-और- बोलना भी नित नए विवादों को जन्म देता रहता है। हिन्दी परिदृश्य में उन्हें दुर्लभ केन्द्रीयता हासिल है। अरुण कमल के शब्दों में, “पूरे वातावरण को स्फूर्ति से भरे हुए, जाफरान की खुशबू से तर किए, भोर की तंद्रा को दोपहर की गहमागहमी में बदलते, आपको हमेशा अपने चौबों पर तैयार रहने को बाध्य करते, बेचैनी और तड़प से भरते द्वंद्व के लिए ललकारते कभी निः शास्त्र करते, कभी वार चूकते-डॉ. नामवर सिंह हमारे सबसे बड़े संवादक रहे हैं ’’[9] वाद-विवाद-संवाद की यह यात्रा उनकी बड़ी लम्बी यात्रा है जिसमें बहुत से लोगों की उनसे शिकायतें भी दर्ज हैं। सुधीश पचौरी कहते हैं कि, “आप हर सूरत में अनिवार्य हैं, हर सूरत में प्रासंगिक हैं, हर सूरत में विवादी हैं, इसलिए आपसे सबसे ज्यादा शिकायतें हैं।’’[10] उनकी इन शिकायतों के लिए ही कमलानंद झा कहते हैं किअगर शिकायतों की फेहरिश्त बनायी जाए तोनामवर के प्रति शिकायत कोशतैयार हो जाए। जिस निर्मल वर्मा के लिए  वे कहीं भी कभी भी कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं, उन्होंने कहानामवर सिंह साहित्य के धर्मक्षेत्र को राजनीति का कुरुक्षेत्र बनाना चाहते हैं; अशोक वाजपेयी ने उन्हें अचूक अवसरवादिता का आलोचक घोषित किया तो राजेन्द्र यादव ने तिकड़मी आलोचक कहा। कहा गयानामवर में कंसिस्टेंसी नहीं है, वे अपने विचार बदलते रहते हैं तो किसी ने कहा कि वे राजनीति का विमर्श करते हैं सत्ता का डिस्कोर्स इन सारी शिकायतों को आप मंद-मंद मुस्काते सुनते हैं और कहते हैं ‘’मैं कठघरे में खडा एक मुजरिम हूँ|”[11]

नामवर सिंह की आलोचना का एक बड़ा हिस्सा मौखिक रहा। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे लिखने से अधिक बोलते रहे। यह शैली उन्हें निरंतर चर्चा में बनाए रखती है, लेकिन इसके साथ ही एक समस्या भी जुड़ी हैउत्तरदायित्व की अस्पष्टता। लिखित शब्द प्रतिबद्धता माँगता है; वह स्थायी होता है, उस पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं, उसे उद्धृत किया जा सकता है। मौखिक वक्तव्य में यह सुविधा नहीं होती। यही कारण है कि उनके कई विवादास्पद वक्तव्य गलत रिपोर्टिंग’, ‘गलत समझया संदर्भ से काटकरकहे जाने के बहाने सुरक्षित रह जाते हैं। एक साक्षात्कार में कहते हैं, “यह मेरी विवशता है कि पिछले वर्षों से बोलने का काम अधिक कर रहा हूँ, उसकी तुलना में लिखने का कम। और इससे साहित्य का क्या बना-बिगड़ा ये तो दूसरे जानते होंगे लेकिन मेरी दृष्टि में, बहुत सी बातें हैं जो सुरक्षित नहीं कहीं जा सकतीं; जिसे जीवन की अंतिम घड़ी में कह सकूं कि ये कुछ छोड़े जा रहा हूँ। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि कुछ लोग मिथ गढ़ते हैं। किम्वदन्ती एक गढ़ दी गई है कि ये तो बोलते हैं, लिखते नहीं ! और उसका एक तर्क भी ढूंढ लेते हैं कि बोलने से जुबान नहीं कटती है, लिखने से हाथ कट जाते हैं। आप लिखते इसलिए नहीं कि लिखने से आपका एक कमिटमेंट हो जाता है। बोलने में आप अपनी बात बदल सकते हैं, मुकर सकते हैं उस ब्यौरे में जाने से पहले मैं यह कह दूं कि गोष्ठियों में मैं बोलता रहा हूँ, अखबारों में उसकी सही गलत रिपोर्टिंग भी होती है और मैंने उसमें किसी बात का खंडन नहीं किया क्योंकि राजनीतिज्ञों की जवाबदेही एक ख़ास तरह की होती है; बल्कि फैशन भी है-राजनीतिज्ञ कहकर मुकर जाते हैं, लेकिन साहित्य में मैं यह मानकर चलता हूँ कि मैंने जो कुछ कहा, रिपोर्ट करने वाले ने जैसा समझा उसने लिख दिया। इसका, मतलब है कि मेरी बात इसी रूप में पहुँची होगी उस तक, उसने वही समझा होगा और हो सकता है बहुत सी महत्वपूर्ण बातें रिपोर्टिंग में छूट गई होंगी।’’[12]

लेकिन, बहुत से बड़े-बड़े साहित्यकार इस बात को कहते रहे हैं कि नामवर जी अपनी ही कही गई बात से कई बार मुकर जाते हैं- बकौल अशोक वाजपेयी, “आलोचना में डॉ.नामवर सिंह को यह सुविधा हासिल है कि वे एक स्थान पर जो बोल कर जाते हैं, दूसरे स्थान पर उस को नकार देते हैं।[13] एक साक्षात्कार में वे इस बात को खुद कहते हैं, “राजेन्द्र यादव की शिकायत है कि नामवर मेंकंसिस्टेंसीनहीं है। वे अपने विचार को बदलते रहते हैं। चिंतन के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में|’’[14] यहां होना तो यह चाहिए था कि इस तरह के क्रिया पर प्रतिक्रया व्यक्त की जाय जबकि नामवर सिंह के इस रवैये को हिन्दी लेखन मेंनामवरीकह कर महिमामंडित किया गया। कमालानन्द झा लिखते हैं, “नामवर सिंह के बारे में उनके आलोचकों का एक बड़ा आरोप यह है कि उनके विचार बदलते रहते हैं। आज जिस मत की स्थापना डंके की चोट पर करते हैं, कुछ दिनों के बाद डंके की दुगुनी चोट से उसी मत का खंडन कर देते हैं। बनारसी ढब में गए तो मामूली और साधारण रचनाकारों को भी निराला बना देंगे और अपनी जादुई वक्तृत्व से अच्छी से अच्छी रचना को भी दो कौड़ी का सिद्ध कर देंगे-‘राई को पर्वत करे पर्वत राई माहिही तो नामवरी है।’’[15] लेकिन यह विशेषाधिकार हर लेखक को प्राप्त नहीं होता। हाशिए के लेखकों से हर वाक्य का प्रमाण माँगा जाता है, जबकि केन्द्रीय आलोचक को अस्पष्टता का अवकाश मिल जाता है। यह असमानता भी आलोचना के भीतर मौजूद सत्ता-संबंधों की ओर संकेत करती है।

साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श के आने की स्वीकार्यता को नामवर सिंह ने स्वीकार किया लेकिन कहीं-कहीं साक्षात्कार और भाषणों में इन विमर्शों को लेकर उनकी अन्यमनस्कता भी रही। नामवर सिंह स्त्री विमर्श को पूरी तरह नकारते नहीं हैं। वे इसे वामपंथी आंदोलन की उपज मानते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि स्त्री प्रश्न आधुनिक राजनीति और साहित्य का महत्वपूर्ण प्रश्न है। वे गांधी और मार्क्स से प्रेरित समाजवादी आंदोलनों में स्त्रियों की भूमिका को स्वीकार करते हैं। किन्तु वे कुछ लेखिकाओं द्वारा रचनाओं में खड़े किये गए स्त्री के अधिकारों के कई सवालों पर उनके उग्र रूप को लेकर अपनी बेरुखी प्रकट करते हैं, तथा उन्हें संयमित होने तक की बात करते हैं- “कुछ लेखिकाएं और कवयित्रियाँ स्त्री-अधिकारों को लेकर बहुत उग्र दिखाई देती हैं। उनकी उग्रता से प्रतीत होता है कि वे सभी पुरुषों के खिलाफ हैं। इसका कोई अर्थ नहीं है। मैं मानता हूँ कि औरत ही पुरुष को मुक्त कर सकती है पर ऐसा वह उसमें भय पैदा करके नहीं कर सकती। स्त्री आज आक्रामक मुद्रा में है। उसके लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में उसकी भागीदारी बढ़ रही है। शायद इसलिए उसे अधिक संयमित होने की जरूरत है।[16] अब यह कैसे बताया जाय कि स्त्रियों से पुरुष कब भयभीत होने लगे। यदि स्त्रियों को यहां तक आने में इतना वक्त लगा है तो भय पैदा करने का जो सवाल है वो कौन और किसके लिए कर रहा था, यह विचार करने वाली बात है। लेकिन समस्या यह है कि वे स्त्री विमर्श को एक स्वायत्त ज्ञान-परंपरा के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके वक्तव्यों में यह झलकता है कि स्त्री विमर्श उनके लिए मुख्य धारा नहीं, बल्कि एक उप-धाराहै। यह वही सीमा है जहाँ वामपंथी आलोचना भी पितृसत्तात्मक हो जाती है। वामपंथ ने आर्थिक शोषण पर तो गहराई से बात की, लेकिन घरेलू श्रम, देह पर अधिकार, यौनिक हिंसा और निजी क्षेत्र की राजनीति जैसे प्रश्नों को लंबे समय तक गौण माना। स्त्रीवादी आलोचना ने इसी रिक्ति को भरा। लेकिन जब नामवर सिंह जैसे आलोचक इसे वामपंथ की देनकहकर सीमित करते हैं, तो वे अनजाने में स्त्री अनुभव की स्वायत्तता को कमतर कर देते हैं।

अस्मितामूलक विमर्श लेखन को लेकर नामवर सिंह का यह तर्क कि दलित के बारे में दलित ही बेहतर तरीके से लिख पाएगा। महिलाओं के बारे में महिलाएं ही लिख पाएंगी, अगर ऐसा मानेंगे तो सारा का सारा साहित्य ही खारिज करना पड़ेगा, क्योंकि किसान तो कहीं नहीं लिखता[17]अस्मिता-विमर्श की मूल भावना को गलत ढंग से प्रस्तुत करता है। डॉ. नामवर सिंह ने मजदूरवर्ग की चेतना से दलित चेतना की तुलना करते हुए कहा किलेनिन ने सिद्धांत दिया कि मजदूर वर्ग में पैदा होने से ही कोई मजदूर चेतना का वाहक नहीं हो जाता। यह वैज्ञानिक विचारधारा है।’’[18](नया पथ-२६, जनवरी, १९९८, पेज नं१३) इसी तरह वह अपने एक वक्तव्य में कहते हैं..’’अब जो सचमुच और बड़ा सवाल है अंग्रेजी में भी जिसको लेकर बहस चल रही है रिप्रेजेंटेशन की। जहां ये समझा जा रहा है कि औरतों को औरतें ही रिप्रजेंट कर सकती हैं , उनको कोई दूसरा रिप्रेजेंट नहीं कर सकता। रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी बनी हुई है। जरूरी नहीं कि हमें हमारे बीच का आदमी रिप्रेजेंट करें। अगर ऐसा होता है तो पूरे राष्ट्रीय आन्दोलन में किसी और को कोई और रिप्रेजेंट करता रहा है। आज भी लोकतंत्र में हमारे जो प्रतिनिधि हैं वे किनके प्रतिनिधि हैं, किन लोगों के प्रतिनिधि हैं, जिन लोगों के नाम पर वो गए हैं उनको रिप्रेजेंट करते हैं कि नहीं करते हैं। साहित्यिक रिप्रेजेंटेशन का एस्थेटिक्स क्या होगा? इससे जुड़ा हुआ सवाल है कि क्या दलित जीवन को चित्रित करने का अधिकार केवल दलितों को ही है ।उन्हीं तक सीमित रहे या दूसरे लोगों के लिए भी वह खुला हुआ है और खुला होना चाहिए ’’[19]  दलित और स्त्री विमर्श यह नहीं कहते कि अन्य कोई नहीं लिख सकता; वे यह कहते हैं कि जिनके अनुभव को सदियों तक चुप कराया गया, उन्हें बोलने का अधिकार प्राथमिकता से मिलना चाहिए। इस सम्बन्ध में चंचल चौहान का ठीक मानना है कि ..’’हमारे आलोचक यह भूल जाते हैं कि कोई व्यक्ति मजदूर जन्म से नहीं बनता, बड़ा होकर ही वह मजदूर बनता है, जबकि दलित और स्त्री के प्रति जन्म से ही एक भिन्न प्रकार का रवैया बन जाता है। यह रवैया उन्हें हीन और नीचा मानने का सामंती रवैया होता है और सामन्तवाद हमारे समाज में बहुत गहरे तक बैठा हुआ है, सामन्तवाद के खिलाफ हमारे समाज में कोई निर्णायक संघर्ष हुआ भी नहीं।’’[20] आंबेडकरवादी आलोचना के अनुसार ज्ञान अनुभव-निरपेक्ष नहीं होता। अनुभव से उपजा ज्ञान ही उत्पीड़न की वास्तविक संरचना को उजागर कर सकता है। जब सवर्ण आलोचक दलित अनुभव पर अंतिम निर्णय देने लगते हैं, तो यह वही वर्चस्व है जिससे दलित साहित्य मुक्ति चाहता है। नामवर सिंह का तर्क वस्तुतः इसी वर्चस्व को बचाने की कोशिश करता दिखाई देता है।

नामवर सिंह स्वयं स्वीकार करते हैं कि भारत में वामपंथ जाति के प्रश्न पर कमजोर रहा है। उसने जातिवाद को मेयरली कल्चरलमानकर उसकी गहराई को नहीं समझा। नामवर सिंह ने  ‘अस्मिता की राजनीतिजैसे ज्वलंत विषय पर बात करते हुएअस्मिताके अनेक अर्थ बताये हैं और अस्मिता को ऐतिहासिकता के साथ देखने पर जोर दिया है। दलित अस्मिता, स्त्री अस्मिता जैसी अनेक अस्मिताओं का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करते हुए उन्होंने भारतीय समाज के आज के परिवर्तन विकास को समझने-समझाने का विशद प्रयत्न किया है। वे बताते हैं कि आज भी भारत में कबीर, गांधी, अम्बेडकर प्रभृति दिग्गजों के होते हुए जातिवाद की चूल हम ढीली नहीं कर पाए क्योंकि वामपंथ यहां कमजोर है। वामपंथ ने आर्थिक प्रश्नों और मुद्दों पर जोर दिया पर वे जातिवाद कोमेयरली कल्चरलमानते रहे। वामपंथ की उपेक्षा से दलित वर्ग का झुकाव कांशीराम और मायावती की तरफ हुआ। अगर वामपंथ ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो आज तस्वीर दूसरी हो सकती थी। पर स्त्री अस्मिता और आन्दोलन को वे वामपंथ की उपज मानते हैं। वे कहते हैं-“कायदे से स्त्री विमर्श वामपंथी आंदोलन से पैदा हुआ (बात बात में बात, पेज नं 276)[21]

            लेकिन इसके बावजूद, जब दलित साहित्य उसी कमी को उजागर करता है, तो वह उन्हें पॉपुलिज़्मया सस्ती लोकप्रियताकी श्रेणी में दिखाई देता है। यह विरोधाभास केवल वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। दलित साहित्य वामपंथ से यह सवाल करता है कि क्या वर्ग-संघर्ष जाति-संघर्ष के बिना संभव है? नामवर सिंह इस प्रश्न से असहज दिखाई देते हैं। वे दलित साहित्य की आलोचना करते समय बार-बार साहित्यिक गुणवत्ताकी बात करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि गुणवत्ता के मानदंड किसके अनुभव से निर्मित हैं।समाज में जो सब से पिछड़ा तबका है, दलित है, यद्यपि कि दलितवाद नाम की भी चीज अलग है और उस में भी ..उस की भी जांच करने की जरूरत है, आँख मूँद कर के करने की जरूरत नहीं है। उस में भी कई तहें हैं, सारा का सारा दलित साहित्य लिखा हुआ। उसी दलित में मायावती भी दलित हैं  और कैसी दलित हैं कि बड़े बड़े गैर-दलित जो हैं, जो उन से रश्क करें?”[22]

नामवर सिंह के विचारों का सबसे विवादास्पद पक्ष दलित स्त्री विमर्श को लेकर सामने आता है। आठ अक्टूबर 2011 को लखनऊ मेंप्रगतिशील लेखक संघके दो दिवसीय हीरक जयन्ती समारोह में दिए गए उनके वक्तव्य-कि दलित हैसियतदार हो गए हैं। सवर्णों से बेहतर हो गए हैं[23] और यदि यही स्थिति रही तो ब्राह्मण-ठाकुर के लड़के भीख माँगेंगे[24]-ने हिन्दी के बहुजन समाज को झकझोर दिया। यह वक्तव्य केवल एक असावधान टिप्पणी नहीं था, बल्कि उसमें एक गहरी वैचारिक प्रवृत्ति निहित थी। यह कथन जाति को केवल आर्थिक श्रेणी में सीमित कर देता है। जबकि जाति केवल गरीबी या अमीरी का प्रश्न नहीं है; वह सम्मान, सामाजिक दूरी, श्रम-विभाजन और ऐतिहासिक अपमान की संरचना है। कुछ दलितों का आर्थिक या राजनीतिक रूप से सशक्त होना उस संरचना को समाप्त नहीं करता। मायावती का उदाहरण देकर दलित समाज की समग्र पीड़ा को खारिज करना दरअसल अपवाद को नियम बना देने की रणनीति है।

लखनऊ में दिए गए विवादास्पद भाषण से नामवर सिंह का बहुजन समाज द्वारा विरोध होना लाजिम था। आरक्षण को लेकर उनकी सोच उनकी प्रगतिशीलता और मार्क्सवादी होने को बहुत सीमित कर देती है। नामवर सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि-“और यही बात समाज में पुरानी जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था के कारण दबे-कुचले हुए लोग हैं, उन लोगों में भी दो वर्ग पैदा हो गए हैं। काफी संपन्न नौकरी पेशा लोग .. पद मिलने लगे हैं...रिजर्वेशन के कारण आप देखें, तो बहुत बड़ा असर पड़ा है। वही नहीं रह गए हैं दलित। जाति से जरूर दलित हैं, लेकिन हैसियत बहुत सारे ब्राह्मणों से बेहतर है, यह हकीकत है। सवर्ण लोगों से बेहतर है, और यही हाल रहा तो आज देखा जाएगा कि भीख मांगता हुआ गरीब ब्राह्मण, और बाकी ठाकुर, जूते फटकारता हुआ मिलेगा...जो ऊंची जाति का होगा। इसलिए, बहुत गहराई से केवल इस को कहें कि पापुलिज्म, सस्ती लोकप्रियता के दायरे में प्रगतिशील लेखक अगर गए तो उन्हीं घिसी-पिटी चीजों को दोहराएंगे और तमाम चीजों को कहने के बाद भी, दलित लेखक, आप को दलित का पक्षधर नहीं मानेगा। अगर आज ये ब्राह्मण अपनी सारी चीजों को, गांठो को संस्कारों को, आत्मा समीक्षा करते हुए उन को सहानुभूति देता हो और उन के बारे में कहे तब भी आप देखेंगे कि वो शक की नजर से देखेगा कि....साकी जो कुछ मिला दिया हो शराब में-नहीं मानेगा ’’[25]

नामवर जी के इस भाषण का मुखर विरोधबहुरि नहीं आवना पत्रिकामें किया गया। बहुत से दलित लेखको ने लेख लिख कर प्रतिरोध व्यक्त किया। मूलचंद सोनकर लिखते हैं कि -“मैं पूरे दावे के साथ इस बात को कह रहा हूँ कि नामवर सिंह ने आरक्षण विरोधी बात कही थी।उन्होंने अपने लेख में बिना किसी सम्पादन के उसे उद्धृत किया है। वे नामवर सिंह के अपने बात से मुकरने तथा स्मृति मेधा पर लिखते हैं, - “अब सवाल उठता है कि आखिर नामवर सिंह अपनी बात से मुकरे क्यों ? वह अपनी स्मरण शक्ति के लिए विख्यात हैं। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि उन को अपनी कही हुई बातें याद नहीं रही। वह जानेमाने सिद्धहस्त वक्ता हैं। पूरा जीवन व्याख्यान देते-देते गुजरा है। इसलिए, यह नहीं माना जा सकता कि उन की जबान फिसल गई होगी। वह किसी दलित विरोधी-मंच से भी नहीं बोल रहे थे, जहां उन्हें यह भय रहा हो कि दलित-विरोधी  वक्तव्य देने से उन का मानदेय पचड़े में पड़ जाएगा। संविधान-विरोधी वक्तव्य होने के बावजूद, किसी प्रकार के संकट की आशंका नहीं थी, क्योंकि संविधान की अवहेलना इस देश के वर्चस्वशाली वर्ग का शौक है। दलित साहित्यकारों को कोई भाव देते नहीं, इसलिए उन के भय की भी बात नहीं थी’, यही तो नामवर सिंह की अदा है। यहाँ नामवर उवाच नाम की चीज बिलकुल अलग है। इस में अनेकानेक तहें हैं। इस की जांच करने की जरूरत अगर किसी को है तो वे दलित हैं। गैर-दलित तो उन की धुन पर आँखमूँद कर थिरकने लगते हैं।’’[26]

मूलचंद सोनकर आगे लिखते हैं ‘’इन पुरोधाओं ने यह भी नहीं सोचा कि नामवर सिंह ने बंद कमरे में नहीं, बल्कि प्रलेस के मंच से आरक्षण-विरोधी वक्तव्य दिया था , जिसे इस संगठन से जुड़े हुए साहित्यकारों ने सुना था। श्यौराज सिंह बेचैन को गलत साबित करने की जिद में ये लोग अपने ही सैकड़ों साथियों को झूठा सिद्ध करने में क्यों तुले हैं ? क्या इस से यह नहीं सिद्ध होता कि प्रलेस में केवल नामवर सिंह की चलती है। उन की गलत बात पर भी कोई ऐतराज करने की हिम्मत नहीं कर सकता। यदि वह कोई गलत बयानी करते हैं तो उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी कुछ सिपहसालारों की है। वे पूरी जिम्मेदारी से इस का निर्वहन करते हैं, कोई चूं भी नहीं बोल सकता। इस बार भी यही हुआ है। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है। उन की मठाधीशी की परवाह किये बिना अनेक लोग विरोध में खड़े हो गए हैं। फिर भी, विश्वनाथ त्रिपाठी से सवाल है कि क्या साहित्य का जनतंत्र यही है जिस में जिस एक व्यक्ति की पीड़ा और दुःख को स्थान मिलता है, उस का नाम नामवर सिंह है? आप के साहित्य का जनतंत्र कहीं प्रलेस से जुड़े साहित्यकारों को बंधुआ मजदूर तो नहीं समझता?[27] इसमें कोई दोराय नहीं कि नामवर सिंह की प्रसिद्धि का दायरा बड़ा था। इसीलिए तो विवादों में घिरे रहने और उससे बेफिक्र रहने का उनका अंदाज निराला था। साहित्य में यह उनकी नामवारीयत थी।

नामवर सिंह जी के आरक्षण वाले वक्तव्य का विरोध प्रलेस के ही अनेक साहित्यकारों द्वारा आयोजन के दौरान ही किया गया। इस बात को समाचार पत्रों ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया। प्रलेस की .प्र. इकाई के अध्यक्ष मंडल के सदस्य एवं आयोजन में उपस्थित वीरेन्द्र यादव ने इस विरोध में दो लेख भी लिखे जो साप्ताहिक पत्रिका शुक्रवार के 28 अक्टूबर से 3 नवम्बर , 2011 और 11 से 17 नवम्बर, 2011 के अंक में प्रकाशित हुए। बाद वाले अंक में नामवर सिंह का स्पष्टीकरण भी छपा है जिस में उन्होंने वक्तव्य का खंडन करते हुए कहा था किश्री यादव ने मेरी बात को तोड़ मरोड़ कर पेशा किया। मैंने साहित्य में आरक्षण का विरोध किया था, कि नौकरियों में।’’[28] प्रश्न यह है कि जिस आरक्षण के सवाल पर हमेशा नाक-भौं सिकोड़ा जाता रहा है, उसकी जड़ें कहाँ से शुरू होती हैं। सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक साहित्यिक क्षेत्रों में आरक्षण पर एकाधिकार तो सदियों से वर्चस्वशाली लोगों का रहा है, इस सम्बन्ध में अपने लेखलेखन में आरक्षण तो अब भी हैमें प्रसिद्द पत्रकार और कथाकार प्रियदर्शन जी लिखते हैं, “लेखन में एक तरह का आरक्षण अभी भी जारी है। यह अघोषित आरक्षण मूलत: मुख्यधारा के हिन्दी लेखन को मिल रहा है जिससे मोटे तौर पर पिछड़े, दलित, मुस्लिम और महिलाएं बेदखल हैं। प्रकाशन और पुरस्कारों की सूची इसकी तस्दीक करती है। ..मुश्किल यह है कि ये आरक्षित, विशेषाधिकार प्राप्त जन ही नजरिया बदलने की इस अपील को लेखन में आरक्षण करार देते हैं।’’[29]   आज भी कमोवेश वही स्थितियां हैं, फिर संविधान द्वारा एक तबके को दिए गए सामाजिक-राजनैतिक आरक्षण से कुछ बौद्धिक चिंतनशील लोग इतने आहत क्यों हो रहे हैं। जिस साहित्य में आरक्षण के सवाल को लेकर बहस चली उसकी तफ़्तीश करनी भी जरूरी है। यहां हिन्दी आलोचना में प्रगतिशील माने जाने वाले आलोचक नामवर जी के विचारों पर थोड़ा गौर कर लेना सही होगा कि उनकी प्रगतिशीलता का दायरा क्या है उनका मानना है किसाहित्य का अपना नियम है, उसका अपना संविधान है। साहित्य भारतीय संविधान के नियमों से नहीं चलता है ... हमारे यहां लेखन में कोई बंदिश नहीं है। आरक्षण के बने हुए नियम कि कितने प्रतिशत आरक्षण दिया जाए, किनको दिया जाए, ये हमारे मात्र राजनीतिक सिद्धांत हैं। राजनीति के इन नियमों को साहित्य नहीं मानता है।’’[30] ध्यातव्य है कि साहित्य को संविधान की कसौटी से कब माना ही गया है। साहित्य तो क्या समाज भी संविधान के नियमों का पालन करता नहीं दिखाई देता। साहित्य तो समाज का दर्पण है- यह परिभाषा हम बचपन से पढ़ते आए हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि वह समाज कौन-सा है, जिसका प्रतिबिम्ब इस दर्पण में दिखाई देता है ? दर्पण के पीछे छिपे अनाम चेहरों को जब स्वर मिलने लगा है, तब तथाकथित और पूर्वाग्रही लोगों के बीच में हलचल होना स्वाभाविक है। इन अनाम चेहरों के द्वारा ठहरे हुए साहित्य में पत्थर फेकने का काम हुआ है, साहित्य में हलचल हुई है। ऐसे में साहित्य के पुरोधाओं की भाषा और विचार को देखने की जरूरत है ..’’पिछले कुछ सालों में अधिक उग्र रूप में ये लोग आग्रह करने लगे हैं, कि दलित साहित्य नाम की श्रेणी अलग बना दी जाए, तो वो अलग श्रेणी तो नहीं बनाई जा सकती। तब तो ये होगा कि ब्राह्मण साहित्य होगा, क्षत्रिय साहित्य होगा। जातियों के अनुसार सवर्ण और अवर्ण का  साहित्य होगा। ये लोग कहते हैं कि दलित के बारे में दलित ही लिख सकते हैं। दलित के बारे में सवर्ण नहीं लिख सकते हैं, अगर लिखेंगे तो वो प्रामाणिक नहीं होगा। वे इसे भोगा हुआ यथार्थ कहते हैं। साहित्य इस सिद्धांत को नहीं मानता है।’’[31] नामवर जी की आलोचना दृष्टि भाषा को सूक्षमता से समझने की जरूरत है आखिर उनकी नजर में दलित साहित्य का क्या स्थान है। दलित साहित्य का प्रश्न उसके स्थान और उसकी स्वीकृति से जुड़ा हुआ है। दलित लेखक जब अपने दुखों, अपने जीवन के कटु यथार्थों को साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं तो उनके लेखन को उग्र स्वर कहकर चिन्हित किया जाता है। नामवर सिंह की चिंता भी यहीं से जन्म लेती है कि दलित साहित्य के आगमन से कहीं साहित्य में बंटवारे की स्थिति उत्पन्न हो जाए। परन्तु क्या इसे साहित्य का विभाजन कहा जाएगा, या फिर उस लम्बे समय से चले रहे वर्चस्व को चुनौती देना, जो समाज की असंख्य अस्मिताओं को अब तक हाशिये पर ढकेलता आया है? यह तर्क ऐसा ही है मानो पहले से उपस्थित व्यक्ति यह आशंका करने लगे कि नए के आगमन से उसे अपने हिस्से की वस्तुएं बांटनी पड़ेगीं; और इसी भय से वह नए आगंतुक के प्रवेश को ही रोक देना चाहे। यह सोच अपने आप में सत्ता और नियंत्रण की राजनीति को उजागर करती है। ऐसे में साहित्य और समाज के संबंधों को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। साहित्य में वर्चस्व (hegemony) और श्रेणीबद्धता (hierarchy) का टूटना अनिवार्य है।

साहित्य का कार्य केवल स्थापित स्वरों को पुष्ट करना नहीं, बल्कि वंचितों की आवाज को भी स्थान देना है। इसी चेतना को आगे बढाते हुए वरिष्ठ कवि आलोचक विजय कुमार लिखते हैं-“जाति, नस्ल, लिंग, सांस्कृतिक अस्मिता, विस्थापन और स्थानीयताओं को उभारने वाले ये स्वर लगातार प्रतिरोध की भूमिका में हैं। इस तरहआत्मऔरअन्य’, ‘हमऔरवेकी नई आत्मपरकताएं निर्मित हुईं हैं। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में स्त्री विमर्श की बहसों में हमारे समय का यह सबसे आकर्षक नारा गूंजा था किपर्सनल इज पोलिटिकल आज इस उक्ति के बहुत व्यापक आशय बन चुके हैं। एकल का वह अब तक छिटका हुआ स्वर, प्रत्यक्ष हुआ भोगा वह क्लेश, हजारों सालों से हाशिये पर धकियाई हुई खामोशियाँ उपेक्षित रह गईं और दबी हुई अनसुनी आवाजें, विलोपन की स्थितियां, अदृश्य और वंचित की पीड़ाएं आज अपने इतिहास, अपनी सामाजिक अवस्थिति और अपनी मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को सामने रखकर अपने आत्मसत्य का प्रतिनिधित्व चाहती हैं, वे अवबोध के लादे गए सामान्यीकरणों के खिलाफ अपनास्पेसऔर अपनी दावेदारी चाहती हैं। यह प्रतिनिधित्व बुर्जुआ उदारता से जन्मी मूल्यदृष्टि, सौन्दर्य चेतना, एकरूपता, नियोजन और संरक्षण पर सवाल उठाता है। सच तो यह है कि यह स्थिति, राजनीति, संस्कृति और कला-एस्थेटिक तीनों जगहों पर वर्चस्ववाद की छिपी हुई भूमिकाओं की शिनाख्त कर रही है। अस्मिताओं की यह राजनीति हमारे समय का सबसे बड़ा सच है। क्या यह कहना गलत होगा कि वैश्विक पूंजी, बाजार, टेक्नोलोजी और संचार के इस नए समय में वर्ग-संघर्ष की उस एक सदी पुरानी राजनीति की जगह अबअस्मिताओं और पहचान की नई राजनीति आकार ले चुकी है? हम चूंकि अभी इन अस्थिरताओं को झेलना नहीं चाहते इसलिए हमारी तुरंत प्रतिक्रिया यह होती है कि यह सारा झमेला साहित्य और कलाओं में आरक्षण की मांग को लेकर है।’’[32] नामवर सिंह ने साहित्य में जिस आरक्षण को नकारा उसपर विभिन्न साहित्यकारों और आलोचकों ने वैचारिक और सुचिंतित हस्तक्षेप करते हुए अपना महतवपूर्ण  बयान दर्ज किया। साहित्य में जिस वंचित समाज के लेखन को नामवर सिंह ने आरक्षण करार दिया उसे वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव जनतांत्रीकरण कहते हैं। उनका मानना है किदरअसल वास्तविक मुद्दा साहित्य के जनतांत्रीकरण का है। प्रेमचंद, निराला, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल नागार्जुन सरीखे लेखकों ने अपने लेखन में वर्चस्ववादी और अभिजन मूल्यों को प्रश्नांकित करके साहित्य का जनतांत्रीकरण किया था। उन्होंने स्वयं को वर्ण से मुक्त भी किया था लेकिन हाल के वर्षों में इस परम्परा का क्षीण होते चले जाना चिंता की बात है। यह महज संयोग नहीं है कि पिछले कुछ समय से ज्यों-ज्यों  हिन्दी साहित्य में हाशिये के समाज और दलित विमर्श की चर्चा तेज हुई, त्यों-त्यों उच्च सवर्ण पृष्ठभूमि के लेखकों ने इन मुद्दों से किनाराकशी करना शुरू कर दिया है। यह तथ्य विचारणीय है कि पिछले डेढ़-दो दशक में जितना विपुल लेखन साम्प्रदायिकता को लेकर इन लेखकों द्वारा किया गया, उसका दसवां हिस्सा भी सामाजिक-उत्पीड़न या जातिगत भेदभाव को लेकर नहीं। विशेषकर तब जबकि जाति आधारित सामाजिक भेदभाव गावों में ही नहीं बल्कि महानगरों में जीवन के रोजमर्रे का भी हिस्सा हो और साम्प्रदायिक उन्माद जब-तब उभरने वाली परिघटना हो। [33]इस बहस-मुबाहिसे में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह ने भी अपना प्रतिरोध दर्ज करते हुए कहा कि ‘’स्त्री लेखन और दलित लेखन नए पाठ की गंभीर मंशा लेकर हिन्दी साहित्य की दुनिया में सक्रिय है और उनके प्रयत्नों को `आरक्षणका अनाम देकर उनकी स्वायत्त होती हुई दुनिया की विलक्षणता को उनके दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखना और समझना चाहिए ... स्त्री और दलित जो साहित्य रच रहे हैं उससे शायद ही कोई अब तटस्थ रह सकता है लेकिन इसे समझाने के लिए उन परआरक्षणका दोष लगाकर इसे संकीर्ण बनाने का उपक्रम इसे अस्वीकार करने जैसा है।’’[34]  इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्री और दलित विमर्श का फलक इतना विस्तृत है कि अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर ही साहित्य की मशाल को जीवित रख सकते हैं। साहित्य में अपनी हिस्सेदारी की तस्दीक करती हुई; साहित्य में आरक्षण क्यों? के मसले पर अनिता भारती का कहना है किसाहित्य में अपनी हिस्सेदारी, भागीदारी या प्रतिनिधित्व और सम्मान की मांग कर रहे दलित साहित्यकारों पर सामाजिक सत्ताधारी तबकों की ओर सेक्या साहित्य ,में भी आरक्षण चलेगा? जैसी कटूक्तियों और व्यंग्यबाणों की वर्षा होती रही है। पता नहीं क्यों, एक जायज और हक़ के सवाल को बार-बार आरक्षण से जोड़ कर छोटा करने की कोशिश की जा रही है या फिर उसे नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। दरअसल, सवाल आरक्षण का नहीं है बल्कि साहित्य में वंचित वर्ग की आवाज की हिस्सेदारी और अधिकार का है।’’[35]आज दलित साहित्य ने साहित्य के सत्ता प्रतिष्ठानों, गढ़ो, मठों के सामने कड़ी चुनौती पेश की है। वर्चस्ववादियों की ब्राह्मणवादी मानसिकता पर प्रहार किया है, ‘सब कुछ अच्छा था और हैकी अतीतजीवी धारणा के किले को धवस्त किया है, इसलिए तिलमिलाहट स्वाभाविक है। तिलमिलाहट के इस स्वर में वंचित समाज की स्वस्थ भागीदारी को आमंत्रण तरजीह नहीं देकर उन्हें दुरदुराते हुएआरक्षणका नाम देकर परोक्ष रूप से उनका विरोध करना, हंसी उड़ाना या नकारना उसी सोच का परिणाम है। आज जब कई देशों में वंचित वर्ग की भागीदारी को लेकर सकारात्मक पहल हो रही है, तब भारत में बार-बार हिस्सेदारी के सवाल को `आरक्षण बनाम ...के नाम पर क्यों दबा दिया जाता है?’’[36] इन्हीं स्वरों में एक महत्वपूर्ण स्वर युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय का है जोसाहित्य में आरक्षणजैसे सवाल बहस को बहुत ही पैनी निगाह से देखते हैं उनका कहना है कि –“ ’लेखन में आरक्षणयह जूमला शायद तभी अस्तित्व में गया, जब से दलित रचनाशीलता प्रकाश में आई या फिर जब दलित रचनाकारों ने अपने लिखे को मुख्यधारा से तिरस्कृत या उपेक्षित पाकर उसे अलग से पहचान या रेखांकित किये जाने का दावा करना शुरू किया। इस जुमले में इस घृणा (या तंज कह लीजिए) के अलावा और कोई बोध नजर नहीं आता कि भाई, चलो नौकरियों या नामांकनों में तो आरक्षण हमने दे दिया, अब साहित्य में भी आप आरक्षण मांग रहे हैं, यह तो नहीं चलेगा। यह तो विद्दता प्रर्दर्शित करने का महकमा है, यहाँ आप आरक्षण मांगोगे तो यह तो हास्यास्पद है। यहां आप नहीं चलेंगे।’’[37]

साहित्य में आरक्षण के सवालपर हिन्दी आलोचना के शलाका पुरुष और प्रगतिशील विचारों से लैस समझे जाने वाले नामवर सिंह जी की प्रगतिशीलता की सीमा को बहुत ही स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है। नामवर जी की पूर्वाग्रही दृष्टि उनकी प्रगतिशीलता का दायरा रेखांकित करती है, उनके बयान पर स्त्री और दलित साहित्यकारों द्वारा घेरना उचित ही था। उनके लखनऊ वाले भाषण के बाद उनकी प्रगतिशीलता पर संदेह किया जाने लगा, इस सन्दर्भ में श्यौराज सिंह बेचैन लिखते है, “प्रो. नामवर सिंह की आलोचना लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय स्वरूप की कभी नहीं रही। मार्क्सवाद को भरपूर ओढ़ लेने के बावजूद, दलित साहित्य का मूल्यांकन करने में वे सदैव असमर्थ रहे हैं। इतना ही नहीं, वे दलित साहित्य के विरोधी भी रहे हैं। यदि उन के दूरदर्शन के दुरुपयोग का रिकार्ड ही आर.टी.आई. के मार्फ़त मांग लिया जाए तो यह जाना जा सकता है कि कितनी गैर-दलित कृतियों पर चर्चा की और कितनी दलित कृतियों पर?”[38] ध्यातव्य है कि नामवर जी ने अपने जीवन काल में बहुत वक्तव्य दिए। 70-80 की उम्र तक वह कई संगोष्ठियों में बुलाये गए। उनके भाषणों और साक्षात्कारों का सम्पादन और संकलन भी किया गया लेकिन दलित साहित्य पर उनका लेखन-वक्तव्य उस महत्वपूर्ण लेखन और वक्तव्यों में उतना जगह नहीं घेर पाया, जितना एक बड़े आलोचक होने के नाते उन्हें लिखना और बोलना चाहिए था।

हर एक व्यक्ति की सीमा होती है।सीमाओं से परे कोई नहीं होता। ईश्वर हो सकता है। और नामवर सिंह ईश्वर नहीं थे। इसलिए स्वभावतःउनमें भी कई कमियां थीं। और उन कमियों पर भी बातचीत होनी चाहिए। बात हुई भी है। प्रणय कृष्ण उनकी वैचारिक कमियों की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं, ‘’वे मंडल कमीशन द्वारा संस्तुत 27 प्रतिशत पिछड़ा आरक्षण के विरोध में उतरे, वे दलित साहित्य के नए यथार्थवाद को स्वीकार नहीं कर सके। वामपंथ उनके बदले हुए रुख के समर्थन में नहीं आया। उन्होंने ख़ास कर मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा को जातिवाद का पक्ष लेने और अम्बेडकरवादी झुकाव के लिए जिम्मेदार नहीं माना। वे यह नहीं समझ सके कि जाति और वर्ग सिर्फ अध्ययन की कोटियाँ नहीं, बल्कि परस्पर-व्यापी अवधारणा है।’’[39] जबकि वे अपने वक्तव्य में विमर्शों (दलित और स्त्री विमर्श)के सीमित होने पर अपनी असहमति जताते हुए इन विमर्शों के बीच परस्पर संवाद की वकालत करते हैं ‘’ इससे जुड़ा हुआ सवाल है कि क्या दलित जीवन को चित्रित करने का अधिकार केवल दलितों को ही है ।उन्हीं तक सीमित रहे या दूसरे लोगों के लिए भी वह खुला हुआ है और खुला होना चाहिए। यह एक बुनियादी समस्या है और इस समस्या पर संवाद दलितों और गैर-दलितों के बीच होना बहुत जरूरी है। यह दलित साहित्य के लिए जरूरी है और जो गैर दलित साहित्य है उसके उत्कर्ष के लिए, उत्थान के लिए भी जरूरी है। और मैं समझता हूँ सारे भारत की जनता के लिए, अवाम के लिए बहुत जरूरी है।’’[40] लेकिन नामवर जी अपने कहे हुए पर कितने खरे उतरते थे इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए।

नामवर सिंह जी का अध्ययन-अध्यापन वाराणसी में हुआ। मीडिया विजिल से एक साक्षात्कार में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के विषय में बताते हुए नामवर सिंह कहते हैं कि, “उदय प्रताप कॉलेज एक बहुत ही अच्छा पब्लिक स्कूल था अगर यह स्कूल या कॉलेज नहीं होता तो मैं पढ़ नहीं पाता, क्योंकि यहां फीस नहीं लगती थी और फर्क यह था कि सारे राजपूत लड़के ही उसमें पढ़ते थे। तो मेरी पूरी पढाई बनारस में उदय प्रताप कॉलेज से हुई।’’[41] मध्यावधि चुनाव था, पार्टी ने कहा कि तुम चुनाव लड़ो, वो सीट राम मनोहर लोहिया की थी, पार्टी ने कहा कि आप चुनाव हार जायेंगे, ये पूरा इलाका राजपूतों का है, चुनाव जाति के आधार पर होता है तो उनकी जगह उन्होंने कहा कि राजपूत को ही चुनाव लड़ना चाहिए मैं चुनाव लड़ा।’’[42]  गोरखपुर के रेलवे ऑफिसर्स क्लब में 29 जुलाई, 1994 को प्रेमचंद साहित्य संस्थान की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में नामवर सिंह का धन्यवाद व्यक्तव्य हुआ। गोरखपुर से प्रकाशित पत्रिका कर्मभूमि ने इसेमैं भूला नहीं हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और किन लोगों के बीच सेशीर्षक से प्रकाशित किया है, नामवर सिंह अपने जीवन का एक दिलचस्प वाकया सुनाते हैंमहाराणा प्रताप कॉलेज में हिन्दी के अध्यापक के लिए जगह थी और यहां से शाहीजी (स्वर्गीय हरिप्रसाद शाही) का टेलीग्राम आया। मेरे गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास कि अध्यक्ष के लिए एक आदमी भेज दीजिए। पंडित जी ने वो तार मुझे दिखाया, बोलेक्या लिखें? जाओगे? फिर कुछ दिनों बाद नाम लेकर तार आया कि नामवर सिंह को भेज दीजिए। वो दूसरा तार जो नाम के साथ आया वही वज्रपात था मेरे लिए। कारण छः साल मैंने क्षत्रियों के स्कूल और कॉलेज में छात्र जीवन बिताया और बी.. में पढ़ने के लिए महेंद्रवी छात्रावास में रहा वह भी एक जाति विशेष जिसे ठाकुर कहते हैं, उनका था और इसके बाद फिर महाराणा प्रताप कॉलेज में अगर आता तो वो जो अनुभव थे आठ साल के उन्हें याद करकेमैंने पंडित जी के चरण पकड़ लिए कि क्या आप मुझे इस योग्य नहीं समझते कि मैं आपके चरणों में बैठकर शोधकार्य करूँ। आप क्यों मुझे दूर ले जाना चाहते हैं।’’[43] जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण भी आते हैं जब आपको नमक अदायगी करनी पड़ती है। यहाँ नामवर जी के लखनऊ वाले भाषण को गंभीरता से लिया जाय और यह देखा जाय नामवर जी की राजपूत और ब्राह्मणों की स्थिति के प्रति चिंतित होना कहीं उनके जीवन के छात्र धर्म की ऋण अदायगी से मुक्ति का ख्याल तो नहीं है।

नामवर जी का मानना था कि, “साहित्य का मंदिर बड़ा पवित्र मंदिर होता है। यह सरस्वती का मंदिर है। इसमें आप जाएँ तो अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर, अपनी ग्रंथियों को छोड़ करके देखें कि आपको क्या मिलता है।’’[44] विचार करने की बात है कि नामवर जी साहित्य में जिस आरक्षण को नकारने लगे थे उस सवाल को किस आग्रह से वो देखने की बात कर रहे थे। नामवर सिंहसदगति, ठाकुर का कुंआ, दूध का दाम’ (प्रेमचंद की कहानियां) पर कहते हैं...’’इन तीनों दलित कहानियों के साथ प्रेमचंद की यथार्थवादी कला अपने शिखर पर पहुँच गई थी। अंतिम दृष्टि में मेरी प्रेमचंद की ये कथाकृतियाँ उपन्यास और कहानियां सभी तथाकथित दलित साहित्य के लिए चुनौती हैं। लिखें दलित साहित्य। दलित अच्छी कहानियां लिखकर के दिखाएँ। क्योंकि  ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर।ज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान से लड़ाई होती है। लाठी, डंडे, तलवार, बन्दूक से नहीं होती है। अब तक जितने लोगों ने लिखा है। उन्होंने अच्छी कहानियां कौन-कौन सी लिखी हैं? उन अच्छी कहानियों को चुनौती के रूप में आप दिखाइये। ...‘केवल दलितों के लिए सहानुभूति या दलितों के लिए बोल जाने से कुछ नहीं होता। मजदूरों के हक़ के लिए किसी जमाने में बहुत कविताएं लिखी गयी थीं, दो कौड़ी की अब कोई नहीं पढ़ता उन्हें। दलितों पर लिखी हुई दलित कथाकारों की रचनाओं से कलात्मक चुनौती दीजिए। साहित्य के क्षेत्र में पूर्व साहित्य से अच्छी कहानियां आप लिखें। साबित करें और दलित के बारे में प्रेमचंद से बेहतर कहानी लिखिए, बेहतर उपन्यास लिखिए। इसे निराला ने कहा है –‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर।आराधन का उत्तर आराधन से होता है, लाठी डंडों से नहीं होता है।’’[45] नामवर सिंह जी को ऐसा क्यों लगता है कि दलित साहित्य में लाठी डंडे लेकर अपनी बात कहने गए हैं। आक्रोश और प्रतिरोध की भाषा की तुलना क्या लाठी-डंडे से करना उचित है। इसी वक्तव्य में वो आगे कहते हैं, “तो इसलिए सवाल सिर्फ विमर्श का नहीं, दलित विमर्श बहुत हो रहा है। सवाल सर्जना का है। क्रिएटीविटी का। क्रिएटीविटी-चुनौती दो कि ऐसा कोई लिखकर दिखाए। दलित विमर्श तो बहुत हो चुका स्वयम दलितों द्वारा लिखा साहित्य सृजन कहाँ है, ये पक्ष मैं छोड़े जा रहा हूँ। उनके लिए भी जो दलित नहीं हैं और उनके लिए भी जो स्वयं दलित हैं। कपोल, कपोल से मसला जाता है। कपोल आटा की तरह गूंथा नहीं जाता है। किसी का कपोल आप मसल दें और उसको दर्द होने लगे ...कपोल कपोल से मसला जाता है। साहित्य की लड़ाई सृजन से होती है।[46] इसमें कोई दो राय नहीं साहित्य के वर्चस्वशाली लोगों या यूं कहें मठाधीशों ने दलित लेखन को हमेशा कमतर या के बराबर माना, जबकि दलित साहित्य ने पूरे अखिल भारत में अपने लेखन से क्रान्ति के बीज बो दिए हैं। नामवर सिंह जी के दलित साहित्य और स्त्री साहित्य के बारे में जो विचार हैं वो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं जब वो कहते हैं कि साहित्य में आरक्षण की जरूरत नहीं। हालांकि बाद में वो अपनी कही गई बात से ही मुकर जाते हैं। आरक्षण का मुद्दा तो ऐसा मुद्दा है जहां कुछ सवर्णों की प्रगतिगामी सोच भी एक सीमित दायरे में आकर अपना रूप ग्रहण करती है। भारतीय समाज का ताना-बाना जाति की महीन धागों से बुना हुआ है। जाति की श्रेष्ठता प्रगतिशीलता के समस्त सूत्रों को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ कर अपना स्वार्थ सिद्ध करती है।  दलित और स्त्री लेखन पर नामवर जी के विचारों को इसी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।

शेक्सपियर का प्रसिद्ध कथन—“What is in a name?यह कोटेशन भारतीय सामाजिक संरचना में आकर अपना अर्थ बदल लेता है। यहाँ नाम ही सब कुछ हो जाता है। कांचा इलैया के शब्दों में कहें तोEverything is in the name. कोई नाम, जाति श्रेष्ठता से सत्ता की कुर्सी पर पदासीन है और कोई है जिसे कुर्सी नसीब नहीं। यह नाम अकादमिक जगत में कैसे चलता है इसे भी देखे जाने की जरूरत है। नामवर सिंह का नाम स्वयं एक बौद्धिक पूँजी बन चुका था। मुझे याद है कि जब मैं JNU से एम.फिल. कर रही थी तो उस समय मेरे साथ-साथ बहुत से सहपाठियों को शोध हेतु गाइड ढूंढना था तो मेरी कक्षा के आधे से ज्यादा सहपाठी नामवर सिंह जी के निर्देशन में शोध करने के लिए उनसे बातचीत करने गए, ताकि  साक्षात्कार में या कहीं जब पूछा जाय तो वह गर्दन ऊंची करके बता सकें कि  उनके शोध-निर्देशक प्रो. नामवर सिंह हैं। यह अन्यथा नहीं है कि नामवर सिंह के JNU से सेवानिवृत्ति बाद भी उनकी तूती बोलती थी। वह JNU के भारतीय भाषा केंद्र के अमेरिट्स प्रोफ़ेसर थे। इस तरह देखा जाए तो जे.एन.यू. जैसे संस्थानों में उनके नाम के साथ जुड़ना लोगों के लिए अकादमिक गौरव का प्रतीक भी था। शोधार्थियों के लिए यह केवल मार्गदर्शक चुनने का प्रश्न नहीं था, बल्कि सामाजिक-बौद्धिक प्रतिष्ठा का भी था।

यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। भारत जैसे जाति-आधारित समाज में बौद्धिक क्षेत्र भी जाति और सत्ता से अछूता नहीं रहता। प्रतिभा किसी एक वर्ण में जन्म नहीं लेती, लेकिन मान्यता, मंच और स्थायित्व प्रायः उन्हीं को मिलता है जो पहले से सत्ता-संरचना के भीतर होते हैं। नामवर सिंह की आलोचनात्मक केन्द्रीयता को इस सामाजिक यथार्थ से काटकर नहीं देखा जा सकता।

अकादमिक दरबार और लेखक की गरिमा का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण सवाल है। इसी सवाल को शिवमंगल सिद्धांतकार जी अपने जीवन के निजी अनुभव से बताते हुए लिखते हैं, “दिल्ली पुस्तक मेले के समय राजकमल प्रकाशन के यहां नामवर सिंह जी का दरबार लगता था और दिल्ली के बहुत से छोटे-बड़े लेखक वहां विराजमान मिलते थे। मैं कभी इसमें नहीं गया। एक प्रतिष्ठित साहित्यकार को नामवर सिंह से मिलाने जाना था तो मैंने उनका साथ देने के लिए जब आनाकानी की तो उन्होंने कहा कि चलिए नामवर सिंह जी तो आपका बहुत सम्मान करते हैं। उनके आग्रह पर बेमन से ही सही मुझे जाना पड़ा तो नामवर सिंह ने पहुंचते ही कहा आइये सिद्धांतकार जी बैठिये। मैंने उनको नमस्कार करके बैठने के बजाए सेल्फ में तब तक किताबें देखता रहा जब तक कि जिन साहित्यकार के साथ मैं आया था उन्होंने नामवर सिंह जी से अपनी बात पूरी नहीं कर ली। उस दिन मैंने देखा हिन्दी के लेखक नामवर सिंह के सामने और राजकमल प्रकाशन के दरबार में कितने दयनीय लगते हैं। दरअसल मैं किसी भी लेखक को बड़े से बड़े प्रकाशक से बड़ा मानता हूँ। इसलिए पुस्तक प्रकाशन के लोभ-लालच में प्रकाशक के सामने अवनत होते देखता हूँ तो मुझे ग्लानि का अनुभव होता है।’’[47] राजकमल प्रकाशन में लगने वाला दरबार-हिन्दी साहित्य की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। बड़े आलोचक, बड़े प्रकाशक और उनके इर्द-गिर्द मंडराते लेखक-यह दृश्य साहित्य के लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जब लेखक प्रकाशक के सामने अवनत होता है और आलोचक उस व्यवस्था का केंद्र बन जाता है, तो साहित्य सत्ता का उपकरण बन जाता है। नामवर सिंह स्वयं इस व्यवस्था के अकेले निर्माता नहीं थे, लेकिन वे इसके सबसे प्रभावशाली प्रतीक अवश्य थे। उनकी आलोचना करते समय इस संरचना को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के एक अनिवार्य अध्याय हैंइससे इंकार नहीं। लेकिन वे अंतिम अध्याय नहीं हैं। उनकी आलोचना की सीमाओं को चिह्नित करना हिन्दी साहित्य को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे अधिक लोकतांत्रिक बनाता है। स्त्री और दलित विमर्श ने हिन्दी साहित्य को जो नया दृष्टिकोण दिया है, वह किसी पॉपुलिज़्मका परिणाम नहीं, बल्कि सदियों के मौन का टूटना है। आज आवश्यकता नामवर सिंह की मूर्ति-स्थापना की नहीं, बल्कि उनकी आलोचना की आलोचना की है। क्योंकि साहित्य तभी जीवित रहता है, जब वह अपने सबसे प्रतिष्ठित नामों से भी सवाल पूछने का साहस रखता है।और सच ही कहा गया है-

बात निकलेगी, तो दूर तलक जाएगी।

सन्दर्भ :

[1]  वाद-विवाद-संवाद : नामवर सिंह , राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण -१९८९, पेज नं .१४४
[2] बात बात में बात : नामवर सिंह  (संकलन-सम्पादन समीक्षा ठाकुर, वाणी  प्रकाशन, २००६  ,  वाचिक विमर्श क्यों (आशुतोष दुबे और रवीन्द्र व्यास के साथ ), पेज नं.
[3] कमालानन्द झा , www.deshajman.blogspot.com
[4] नामवर सिंह- जमाने से दो-दो हाथ , नामवर सिंह, सं. आशीष त्रिपाठी , लेख नामवर सिंह -मुक्त स्त्री की छद्म छवि, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण :2010, पेज नं.- 6-7
[5] लेख ) हिन्दी आलोचना के प्रामेथ्यूस डॉ. नामवर सिंह , डॉ सूरज बहादुर थापासृजन संवाद , पेज नं ४० 
[6]  कमलानंद झा, आलोचक से संवाद : मैं कठघरे में खडा एक मुजरिम हूँ : नामवर सिंह, देशज मन , अप्रैल 21 , २०१९ , www.deshajman.blogspot.com (कमलानन्द झा का यह लेख नामवर विशेषांक , बहुवचन पत्रिका , जुलाई-सितम्बर २०१६ में प्रकाशित हुआ था |
[7] बात बात में बात , पेज नं. १९-20
[8] लेख ) हिन्दी आलोचना के प्रामेथ्यूस डॉ. नामवर सिंह , डॉ सूरज बहादुर थापासृजन संवाद ,21 वीं सदी , आलोचना पर विशेष, सं.ब्रजेश, अंक -10, अगस्त -2010 ,  लखनऊ, पेज नं ४० 
[9] बात -बात में बात : नामवर सिंह  , संकलन-सम्पादन समीक्षा ठाकुर, वाणी प्रकाशनवाचिक विमर्श क्यों (आशुतोष दुबे और रवीन्द्र व्यास के साथ ), पेज नं.,
[10] बात बात में बात , नामवर सिंह , सं समीक्षा ठाकुर, वाणी प्रकाशन , २००६ , पेज नं . ४१
[11] कमलानंद झा , www.deshajman.blogspot.com
[12] बात- बात में बात : नामवर सिंह , वाचिक विमर्श क्यों (आशुतोष दुबे और रवीन्द्र व्यास के साथ ), पेज नं.10 , संकलन-सम्पादन समीक्षा ठाकुर, वाणी प्रकाशन
[13] बहुरि नहीं आवना , संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर -7 , सम्पादकीय :लखनऊ में क्षत्रिय आलोचना का मार्क्सवादी उद्घोषश्यौराज सिंह बेचैन  
[14] बात -बात में बात : नामवर सिंह  , संकलन-सम्पादन समीक्षा ठाकुर, वाणी प्रकाशन , २००६  वाचिक विमर्श क्यों (आशुतोष दुबे और रवीन्द्र व्यास के साथ ), पेज नं.,
[15] आलोचक से संवाद : मैं कठघरे में खड़ा एक मुजरिम हूँ : नामवर सिंह , कमलानंद झा , अप्रैल 21, २०१९, www.deshajman.blogspot.com
[16]  जमाने से दो-दो हाथ , नामवर सिंह, सं. आशीष त्रिपाठी , लेख नामवर सिंह -मुक्त स्त्री की छद्म छवि, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण :2010, पेज नं.- १२४
[17]  लेख नामवर सिंह : वाद, विवाद और दलित संवाद : अटल तिवारी , बहुरि नहीं आवना, संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर -३४
[18] साभार : साहित्य का दलित सौंदर्यशास्त्र , चंचल चौहान  दलित साहित्य विवादों के घेरे पेज नं : २४७ , राधाकृष्ण पेपरबैक्स , नई दिल्ली -२०२४
[19]दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद का साहित्यनामवर सिंह ,कर्मभूमि, अंक : , पेज नं. ४५  जनवरी २०२१ , प्रेमचंद साहित्य संस्थान , प्रेमचंद पार्क , बेतियाहातागोरखपुर द्वारा प्रकाशित
 
[20]  साहित्य का दलित सौंदर्यशास्त्र , चंचल चौहान  दलित साहित्य विवादों के घेरे पेज नं : २४७ , राधाकृष्ण पेपरबैक्स , नई दिल्ली -२०२४
[21]  लेख ) हिन्दी आलोचना के प्रामेथ्यूस डॉ. नामवर सिंह , डॉ सूरज बहादुर थापासृजन संवाद , पेज नं  
[22] बहुरि नहीं आवना , अक्टूबर २०११, मार्च २०१२ , पेज . 24
[23] बहुरि नहीं आवना , प्रधान सम्पादक श्यौराज सिंह बेचैन  संयुक्तांक , अक्टूबर २०११, मार्च २०१२ , , नई दिल्ली , पेज नं . 24
[24] बहुरि नहीं आवना , अक्टूबर २०११, मार्च २०१२ , पेज . 24
[25] वही
[26] बहुरि नहीं आवना , संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर – 27
[27] बहुरि नहीं आवना , संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर -27
[28] बहुरि नहीं आवना , संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर -27
[29] लेखन में आरक्षण तो अब भी है: प्रियदर्शन , शुक्रवार साहित्य, वार्षिकी २०१३, पेज .18-१९
[30] लेख : लेखन में आरक्षण : नामवर सिंह , संप. विष्णु नागर : शुक्रवार साहित्य, वार्षिकी २०१३, पेज .6
[31] दलित विमर्श से दलितों का भी भला नहीं होगा, नामवर सिंह , शुक्रवार साहित्य वार्षिकी, २०१३ पेज नं 6
[32] यह साहित्य में सिर्फ आरक्षण का मामला नहीं हैविजय कुमार , शुक्रवार , साहित्य , वार्षिकी, २०१३, पेज नं.14
[33] क्या सवर्ण लेखक अपने वर्ण में लौट गए हैं ?: वीरेन्द्र यादव , शुक्रवार , साहित्य , वार्षिकी, २०१३, पेज नं.16
[34] लेखन में आरक्षण की बात ही क्यों : सविता सिंह , शुक्रवार , साहित्य वार्षिकी, पेज नं 18
[35] सवाल आरक्षण का नहीं, हिस्सेदारी और हक़ का है: अनिता भारती , शुक्रवार साहित्य, वार्षिकी २०१३, पेज .१९
[36] वही |
[37] तंज कसने की बजाए उन्हें समझा जाए : हरे प्रकाश उपाध्याय , शुक्रवार साहित्य, वार्षिकी २०१३, पेज .20
[38] बहुरि नहीं आवना , संयुक्तांक : अक्टूबर , २०११मार्च , २०१२ , पेज नंबर -10 , सम्पादकीय :लखनऊ में क्षत्रिय आलोचना का मार्क्सवादी उद्घोषश्यौराज सिंह बेचैन  
[39] कमलानंद झा : अपने-अपने नामवर www.deshajman.blogspot.com
[40] दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद का साहित्यनामवर सिंह ,कर्मभूमि, अंक : , पेज नं. ४५  जनवरी २०२१ , प्रेमचंद साहित्य संस्थान , प्रेमचंद पार्क , बेतियाहातागोरखपुर द्वारा प्रकाशित
[41] मैं जीवन से एक-चौथाई असंतुष्ट हूँ : नामवर सिंह का अनकट और अन्तरंग इंटरव्यू mediavigil.com २०१३ सं . पंकज श्रीवास्तव से बातचीत , 20 फरवरी २०१९ को प्रकाशित
[42]  मैं जीवन से एक-चौथाई असंतुष्ट हूँ : नामवर सिंह का अनकट और अन्तरंग इंटरव्यू mediavigil.com २०१३ सं . पंकज श्रीवास्तव से बातचीत , 20 फरवरी २०१९ को प्रकाशित
[43] मैं भूला नहीं हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और किन लोगों के बीच सेनामवर सिंह ,कर्मभूमि, अंक : , पेज नं.६५ जनवरी २०२१ , प्रेमचंद साहित्य संस्थान , प्रेमचंद पार्क , बेतियाहातागोरखपुर द्वारा प्रकाशित
[44] प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान : प्रो.नामवर सिंह , www.sahbdankan.com
[45] वही
[46] वही
[47] (लेख) नामवर सिंह : शिवमंगल सिद्धांतकार , समालोचन : सम. अरुण देव , जनवरी 18, 2021
www.samalochan.com

 

प्रियंका सोनकर
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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