शोध सार -उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका इस्मत चुगताई की अप्रकाशित कहानी, कैफी आजमी और शमा जैदी की पटकथा और
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| प्रदीप कुमार पाण्डेय |
बीज शब्द – विभाजन, भारत ,पाकिस्तान ,त्रासदी
मुसलमान ,फिल्म
आलेख -बलराज साहनी ,शौकत आज़मी ,फ़ारुक शेख ,जलाल आगा और गीता सिद्धार्थ जैसे इप्टा के मजे हुए कलाकारोंके साथ यह फिल्म आगरा के मिर्जा परिवार की कहानी को बयां करती है। इसे विभाजन पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म माना जाता है। ‘गर्म हवा’ एमएस सथ्यू की पहली फिल्म थी और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिल्म को रिलीज होने में ग्यारह महिना लग गया था। सेंसर बोर्ड प्रमाण पत्र नहीं दे रहा था। विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर होने के कारण निर्देशक को रिलीज कराने में काफी समस्या आई। जब उन्होंने खुद फिल्म इन्दिरा गांधी को दिखाई तब जाकर सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र दिया। ‘गरम हवा का प्रीमियर पेरिस में हुआ था। फिल्म का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन पेरिस में ही हुआ था। फिर इसे कान फिल्म फेस्टिवल के लिए चुना गया। एक समीक्षक ने इसकी सिफ़ारिश की थी। इसे मुख्य फेस्टिवल में ही दिखाया गया। वहाँ अकादमी के लोग फिल्म देखने आए थे और उन्होंने गर्म हवा को गैर अँग्रेजी भाषा की फिल्म श्रेणी में ऑस्कर के लिए चुना। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना बन गई’।1
फिल्म के शुरुआती दृश्य में ही गांधी की
हत्या का दृश्य दिखाई पड़ता है और उसके तुरंत बाद सलीम मिर्जा अपनी बड़ी बहन को
कराची के लिए स्टेशन से विदा करते हैं। उनके बहनोई पहले ही पाकिस्तान जा चुके हैं।
फिल्म के इस शुरुआती दृश्य में ट्रेन की छुक -छुक आवाज के साथ कैफी आजमी की एक
नज़्म भी उन्हीं की आवाज में सुनाई पड़ती है। जो बंटवारे की त्रासदी को आँखों के
सामने चित्रित कर देती है-
‘तकसीम हुआ मुल्क तो दिल हो गए
टुकड़े
हर सीने में तूफान वहाँ भी था यहाँ
भी
हर घर में चिता जलती थी लहराते थे
शोले
शहर में शमशान वहाँ भी था यहाँ भी
गीता की कोई सुनता न कुरान की कोई
सुनता
हैरान सा ईमान वहाँ भी था यहाँ भी’ 2
‘विख्यात आधुनिकतावादी उर्दू लेखिका
इस्मत चुगताई द्वारा लिखी गई लघु कथा पर आधारित गरम हवा, आम सहमति
से, विभाजन की उस त्रासदी का सेल्यूलाइड पर सबसे रचनात्मक और
अंतरदृष्टिपूर्ण चित्रण है जिसे अंग्रेजों ने जाते-जाते हम पर मढ़ दिया था। जब इस
तरह की त्रासदी किसी देश पर आती है तो इसमें कोई शक नहीं कि तमाम लोगों को बिना
किसी गलती के कष्ट झेलना पड़ता है, लेकिन इसके साथ ही कुछ लोग
अमानवीय ताकतों के समक्ष झुकने के बजाय और मजबूत हो कर उभरते हैं। सलीम मिर्ज़ा और
उनके स्नातक बेटे सिकंदर (जिसका किरदार फारुक़ शेख़ ने निभाया है) दोनों को बाद
वाली श्रेणी में रखा जा सकता है जिन्होंने अपने जीवन में घटने वाली दुखद घटनाओं के
बाद भी आशा का दामन नहीं छोड़ा या फिर अपने आप को ‘पीड़ित’ के तौर पर नहीं देखा’।3
हलीम मिर्जा जो कल तक कसमें खा रहे
थे कि ‘हिंदुस्तान हमारा वतन है, ये ताजमहल ये फतेहपुर सीकरी ये
सलीम चिश्ती की दरगाह जो लोग अपनी मुकद्दर को छोड़कर सियासत के कारण भाग रहे हैं वह
बुज़दिली के शिकार हैं। उन्हें अपने खुदा पर भरोसा नहीं। सारे मुसलमान देश छोड़कर
चले जाएँ लेकिन एक मुसलमान कभी नहीं जाएगा। जब तक जिंदा है यही रहेगा। उस मुसलमान
का नाम है हलीम मिर्जा’4 लेकिन फिल्म में कुछ ही समय बाद उनका निर्णय बदलते हुए दिखाई देता है। जब
उनकी बीवी कहती हैं कि उनका बेटा काजिम मिर्जा बीए कर लिया है तो वह कहते हैं कि
वह बीए कर ले या एम.ए अब किसी मुसलमान को
हिंदुस्तान में नौकरी नहीं मिलेगी। बीवी पूछती है तब कहाँ मिलेगी तब वह कहते हैं
कि पाकिस्तान में मिलेगी। नए पाकिस्तान के लोभ में अपने भाई सलीम और उसके परिवार
को भारत छोड़कर चले जाते हैं।
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| फिल्म निर्देशक एम .एस सत्थ्यु एवं शमा जैदी फिल्म शूटिंग के दौरान |
दूसरा दृश्य और भी अधिक
ह्रदयविदारक है- जब मृत्यु के अंतिम क्षण में वह चाहती हैं कि उन्हें उनकी हवेली
लेकर चला जाए, सलीम मिर्जा हवेली के मालिक
आजमानी से जाकर बात करते हैं। फिर अपनी माँ को डोली में उठाकर हवेली ले जाते हैं।
डोली में जाते वक्त जब दुल्हन बनकर आई थी तब का दृश्य सोचने लगती हैं। शहनाई की
ध्वनि बैकग्राउंड से आती है। फिर हवेली में जाते ही उन्हें असीम सुकून मिलता है और
वे प्राण त्याग देती हैं। यह दृश्य मन को
विचलित करता है। न जाने कितने लोग सरहद से इधर से उधर, उधर से
इधर अपना सबकुछ छोड़कर आए होंगे। उनकी व्यथा भी अपने घर को लेकर ऐसी ही रही होगी।
जब बड़ा लड़का हलीम मिर्जा घर छोड़कर पाकिस्तान जाने के लिए कहता है तो वह कहती हैं
कि ‘एक बात कान खोलकर सुन लो।
यहाँ क़ब्र में तुम्हारे अब्बा जी की हड्डियां दफ़न है। यहाँ से छोड़कर मैं नहीं जा
सकती’।6
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| फिल्म निर्देशक एमएस सत्थ्यु शूटिंग के दौरान |
यहाँ निर्देशक खुद
स्वीकार करते हैं ‘असल में बलराज जी की ज़िंदगी
में भी ऐसा ही हुआ था उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। बलराज उस समय शूटिंग से
लौटकर आए थे उन्होंने कुछ इसी तरह सीढ़ियाँ चढ़ी थी जैसा फिल्म में था। बलराज उस समय
इतने अवसन्न हो गए थे कि रो भी नहीं पाए। उस वक्त उनके पारिवारिक रिश्ते के कारण
वही था। फिल्म बनाते समय मेरे जेहन में वही घटना थी पर मैं बलराज जी से सीधे -सीधे
नहीं कह सकता था इसलिए मैं सिर्फ इतना कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है’।7 बलराज साहनी मेथड एक्टिंग के जनक रहे हैं। किसी
भी दृश्य को फिल्माने से पहले उसे अपने भीतर जीते थे फिर पर्दे पर प्रस्तुत करते
थे। इसके वह बहुत माहिर कलाकार थे। इसलिए इस दृश्य को देखकर दर्शक की आत्मा रो
देती है।
इस फिल्म में तांगे वाले का छोटा सा रोल है लेकिन वह फिल्म की महत्वपूर्ण
कड़ी है। इस फिल्म के आरंभ में जब सलीम मिर्जा अपनी बड़ी बहन को कराची के लिए स्टेशन
छोड़कर लौटता है तो सलीम मिर्जा कहता है ‘कैसे हरे -भरे दरख्त कट रहे हैं इस हवा में तब तांगे वाला कहता है –‘बड़ी गर्म हवा है मियां जो उखड़ेगा
नहीं वह सुख जाएगा’।8
गर्म हवा’ फिल्म के नामकरण का निहितार्थ पता चलता है। फिल्म में एक दूसरे तांगे वाले का दृश्य भी
मौजूद है। सलीम मिर्जा जब बैठते हैं, तो वह कहता है कि दो रुपया लगेगा मियां ,तब मिर्जा कहते हैं कि आठ आना किराया लगता है। तब वह बड़ी
तल्ख लहजे में कहता है कि आठ आना में जाना है तो पाकिस्तान चले जाओ’। तब सलीम मिर्जा कहते हैं कि चलो
प्यारे लाल नई -नई आजादी मिली है सब अपने
अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं।9
यह संवाद आज की राजनीति में भी
कितना मौजू है।
एक दूसरे दृश्य में जब अपने बड़े
बेटे और बहू को स्टेशन छोड़कर तांगे पर सवार होते हैं तो
तांगे वाला पूछता है कि ‘आज किसे छोड़ आए मियां ? सलीम मिर्जा कहते हैं -बाकर
मिर्जा को ... तांगे वाला -वाह मियां वाह! बड़ी हिम्मत है जिगर के टुकड़ों को एक -एक कर के छोड़ आए और
खुद यहाँ डटे हो ,कैसा जालिम जमाना आ गया है’।10
अंतिम दृश्य में जब सलीम मिर्जा
भारत में तंग आकर खुद पाकिस्तान जाने के लिए तांगे पर सवार होते हैं तब तांगा वाला
कहता है कि ‘मेरा मन तो पहले ही कहता था कि एक दिन तुम भी जाओगे जरूर’।11
फिल्म का अंतिम दृश्य बहुत ही
मार्मिक है। सलीम मिर्जा अपनी पत्नी और बेटे सिकंदर के साथ रास्ते में जाते हुए
देखते हैं कि जनता का हुजूम रोजी -रोटी और मकान के लिए आंदोलन कर रहा है। तांगा
भीड़ में रुक जाता है और सलीम मिर्जा बेटे सिकंदर से कहते हैं आखिर ‘अकेले इंसान कब तक जी सकता है, तुम भी जाओ सिकंदर’। और खुद भी यह कहते हुए आंदोलन
में शामिल हो जाते हैं कि ‘मैं अकेले
घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आ गया हूँ’।12 यही पर पाकिस्तान जाने की योजना खत्म हो जाती है। फिल्म का
यह अंत वास्तविक लगता है। क्योंकि भारत हो या पाकिस्तान हर कहीं संघर्ष करना ही
पड़ेगा। इसलिए वह जनता के साथ आंदोलन में जुड़कर अपने हक की लड़ाई में शामिल हो जाता
है।
एक तरफ मिर्ज़ा का व्यवसाय डूब रहा है और दूसरी तरफ उसके
रिश्तेदार एक-एक कर के पाकिस्तान के लिए रवाना हो रहे हैं। इसके साथ ही परिवार पर
भी दुःख के पहाड़ टूट रहे हैं। अंत में मिर्ज़ा अपनी पत्नी और अपने शिक्षित
बेरोजगार बेटे सिकंदर के साथ ही रह जाते हैं। अनेक सलाहों के विपरीत सिकंदर यह तय
करता है कि वह यहीं रुकेगा और पूर्वाग्रह और अराजकता के माहौल के बीच ही अपने लिए
एक जगह बनाएगा।
संदर्भ ग्रंथ -
1. द वायर, एमएस सथ्यू और सिद्धार्थ भाटिया
की बातचीत,जुलाई 2020
2. विद्यार्थी चटर्जी, जनपथ पत्रिका, जुलाई 2020
3. गर्म हवा,निर्देशक एमएस सथ्यु, 1973
4. फिल्म संवाद, ‘गर्म हवा’, निर्देशक
एमएस सथ्यू
5. अतिथि संपादक प्रहलाद जोशी
वसुधा पत्रिका, सिनेमा विशेषांक, अंक 81, पृष्ठ 352
6. फिल्म संवाद, ‘गर्म हवा’, निर्देशक
एमएस सथ्यू, 1973
7. वही
8. वही
9. वही
10.वही
11वही
1 विद्यार्थी चटर्जी, जनपथ पत्रिका,2020
प्रदीप कुमार पाण्डेय
प्राचार्य, सकलडीहा
पी.जी.कॉलेज
सकलडीहा चंदौली
मो. 9793914542
जितेंद्र यादव
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
सकलडीहा पी. जी. कॉलेज,सकलडीहा चंदौली
मो. 9001092806, ईमेल -jitendrayadav.bhu@gmail.com





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