- निशान्त
(एक)
पिता
ने
चप्पल
खोली
होगी
छाता
खड़ा
किया
होगा
अभी
बैठे
ही
होंगे
कि
जोर
से
चिल्लाया
होगा
बच्चा
केहा
केहा
केहा
करके
बड़े
नामवर
ढंग
से
चिल्ला
रहा
है
किसका
बच्चा
है?
नामवर
है
आपका
ही
है।
(दो)
किसी
को
लगता
उम्र
ज्यादा
हो
गई
है
स्मृति
क्षीण
हो
गई
है
किसी
को
‘कुछ’
किसी
को
‘कुछ’
कोई
कह
रहा
है
सठिया
गया
है
वह
खड़ा
है
‘कबिरा खड़ा
बाजार
में’
‘लिए
लुकाठी
हाथ’
की
तरह
वह
एक
झूठ
है
वह
एक
सच
है
आपकी
क्या
राय
है?
(तीन)
उसे
खैनी
पसंद
है
पसंद
है
तम्बाकूवाली
पान
पसंद
है
'कुछ' कविताएँ
पसंद
है
'कुछ' सामान
इसी
‘कुछ’
का
तो
लफड़ा
है
इसी
‘कुछ’
में
है
सारी
फसाद।
(चार)
इधर
उसने
संवाद
नहीं
विवाद
फैलाए
है
एक
ने
कहा
दूसरा
ले
उड़ा
सी.बी.आई.
की
तरह
इस
वक्तव्य
का
हुआ
इस्तेमाल
राजा
बदला
प्रजा
बदली
मंत्री
बदला
नीति
बदली
वह
अभी
तक
चुप
है।
(पाँच)
उसने
एक
झूठे
को
देखा
वह
अंदर
तक
सिहर
गया
एक
सच्चे
को
देखा
वह
भी
अंदर
तक
सिहर
गया
एक
लबाड़िए
को
देखा
वह
भी
अंदर
तक
सिहर
गया
एक
आँख
से
उसने
सबको
देखा
‘दु अँखी
करना’
इसी
को
सब
कहते
रहे
शामिल
है
इसमें
झूठा
भी
सच्चा
भी
लबाड़ियाँ
भी।
(छह)
अब
तो
उसकी
महफिल
में
सलमें-
सितारे
जुटते
हैं
नहीं...
नहीं...
ये
थोड़े
सस्ते
उपमान
हैं
फिल्मी
किस्म
के
वह
तो
अकबर
की
तरह
बैठा
था
पारस
पत्थर
लेकर
नौ
रत्नों
की
तलाश
में
बैठा
था
बैठा
था
उठ
ही
नहीं
रहा
कि
दूसरे
अकबर
को
मौका
मिले।
(सात)
वह
पान
खाए
मंच
पर
चिंतित
बैठा
है
बूढ़े
गुस्सा
हैं
जवान
नतमस्तक
औरतें
ध्यानमग्न
दलित
विचारमग्न
हैं
पाठक
चुप
हैं
हॉल
में
बूढ़े
हैं
जवान
हैं
औरते
हैं
दलित
हैं
कुछ
पाठक
हैं
वह
पाठकों
की
कम
उपस्थिति
से
चिंतित
हैं
उसने
पान
थूका
गला
खखारा
और
चिंतत
हो
पूछा-
और
पाठक
कहाँ
हैं?
हॉल
में
सन्नाटा
छा
गया
उसकी
आवाज
दीवारों
से
टकरा
कर
बाहर
निकली
और
फैल
गयी।
(आठ)
तुम्हें
जब
भी
देखता
हूँ
गालिब
के
शेर
में
देखता
हूँ-
‘हुए तुम
दोस्त
जिसके
दुश्मन
उसका
आसमाँ
क्यों
हो?’
xxx
*नामवर सिंह
जब
अस्सी
के
आसपास
रहे
होंगे,
तब
एक
दिन
अचानक
ये
कविताएँ
लिखी
गई
थी।

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