- दो_सान (जसवंत सिंह)
बा (दादोसा), आप टीनएज में रहे होंगे जब रेगिस्तान के बीचों-बीच लकीर खींची गई और दो देश बने। जब इस लकीर का असर महसूस होने लगा तब भरपूर जवानी में थे यानी जवानी में उतरते ही आप उस लड़ाई का हिस्सा हो गए जिसमें दो देशों की आर्मी और पुलिस से लड़ते-भिड़ते हुए एक देश से दूसरे देश में शादियाँ की जाती थीं। जो बुड्ढा दोनों देशों के रिश्ते कायम रखना चाहता था उसे किसी कट्टर ने गोली मार दी, यह सोचकर कि अब रिश्ते भी खत्म हो जाएंगे पर रेगिस्तान के लोगों ने खींची हुई लकीर के बावजूद रिश्तों को कायम रखा। भारत से सीमा पार करते हुए ऊंटों से बारात पाकिस्तान जाती, रातोंरात शादी करते और फिर दोनों देशों की फौज से भागते-बचते, लड़ते-भिड़ते वापस लौट आते। शादियाँ अधिकतर हिंदुओं की होती थीं क्योंकि आपस में रिश्ते करने वाले हिंदू दो देशों में बंट गए थे पर शादियाँ करवाने के लिए जो लड़ाइयाँ होती थीं उनका नायक था शकूर खां नोहड़ी। आप शकूर खां के साथियों में से एक थे।
पिछले 25 अगस्त को आप इस दुनिया से विदा हो गए। मेरे पास बस आपके संस्मरण और किस्से ही बचे हैं। दादी जो किस्से सुनाती थीं उनमें कहीं-कहीं आप भी थे। पश्चिमी राजस्थान के हिंदुओं में सुबह का जमाया हुआ दही रात को खाने की परम्परा नहीं थी, पहले रात को सुबह की छाछ ही खाते थे। यह मैंने किस्सों में सुना था। बचपन में दादीसा रात को दही निकाल कर देते हुए कहते थे कि
"कामदार शकूरिए रे दही ले जाअतो उए मी पछे खाऊं प्आ।"
(कामदार शकूर खां के लिए दही लेकर जाता था तब से रात को हम भी खा रहे हैं।) (आपका घरेलू नाम 'कामदार' था, धाट क्षेत्र में सम्मान देने के लिए जीकारा देने का रिवाज़ नहीं है, दादीसा के आप देवर थे तो वो आपको नाम से ही पुकारते थे।) आप जब तक पाकिस्तान में थे तब तक लकीर खींचने से बने नए नियमों से लड़ते-झगड़ते रहे पर 1971 के युद्ध में रातों-रात निकलना पड़ा, विस्थापन के समय आप अपने भाइयों में से सबसे ज़्यादा जवान थे और नेतृत्वकर्ता थे। अपनी जमीन और घर छोड़े, बकरियों के दूध पीते मेमने छोड़े, साथ ले आ पाए होंगे तो ज़्यादा से ज़्यादा आटा पीसने की चक्की। इतना सब कुछ छूटने के बावजूद भी मेरी आँखों में आंसू इस बात के हैं कि आपने अपनी जवानी के दोस्त छोड़े, जिनके साथ महफिलें जमती थीं और दारू पीते थे, जो एक हकल (आवाज़) से दौड़े चले आते थे लड़ने के लिए, जिनके साथ भविष्य की योजनाएँ बनी हुई थीं, वो सब पीछे छूट गए, और बम और बंदूकों के धमाकों के बीच में निकल आए लकीर के इस पार।
मारवाड़ और माड़ (जैसलमेर) की थोड़ी-बहुत कट्टरता पर मुझे कोई संदेह नहीं। आज जब एक हत्या के बदले दुकानें और घर जलाए जा रहे हैं तो ऐसा नहीं कह सकते हैं कि उस समय कुछ नहीं हुआ होगा। इस इलाके के एक जागीरदार ने आजादी के समय जो लोगों के सर काटे उसके किस्से लोगों की ज़ुबानों पर हैं। पर धाट के लोग यहाँ आकर बसे तो समन्वय बिठाकर रहने की संस्कृति लेकर आए। धाट के हिंदुओं के लोक देवता पीर कहलाते हैं जिनके मंदिर में मुसलमान जागरण देते हैं। दरगाह में हिन्दू अगरबत्ती करके हाथ जोड़कर शीश नवाते हैं। हिंदुओं में कुछ शव को जलाते हैं तो कुछ दफनाते हैं। आप इस संस्कृति के वाहक थे। भारत में आकर शुरुआती संघर्ष के बाद जब गाँव गोहड़ का तळा में आकर बसे तो ओतारे (घर के बाहर बना मेहमानों के लिए स्थान) में आपकी महफिलें चौबीसों घंटे चलती थीं, चाय का बर्तन कभी नीचे नहीं उतरा। पाकिस्तान में जो छोड़कर आए थे उसे फिर से स्थापित कर दिया। धर्मेले (खून के इतर भाईचारे के बने रिश्ते) कायम हुए, खुशियों में एक-दूसरे के गले मिले और दुःखों में एक-दूसरे के साथ-साथ ठंडी श्वास छोड़ी और उनके समाधान निकाले, मिलकर दिवाली और ईद मनाई। सिल और हंझतल (पाकिस्तान के गाँव) की जमीन पीछे छूट चुकी थी पर जीने का तरीका साथ लेकर आए थे, गोहड़ का तळा में उसी तरह से जिया जाने लगा। पर आपको पुनर्विस्थापित होना था।
पाकिस्तान से आकर बसे बाड़मेर में थे पर जब सरकार जमीन दे रही थी तो ली बीकानेर में। (बीकानेर में नहर आती थी और आप और आपके भाइयों को लगता था कि वहाँ आम उगते हैं।) आप बीकानेर चले गए अपनी और भाइयों की जमीन की देखभाल करने के लिए। भाई फिर से पीछे छूटे और दोस्त भी। पर आपको स्थापित होना आता था, दोस्त बनाने भी। जाते ही वहाँ के लोगों के केंद्र में आ गए। विस्थापित होकर आने वाले बहुत से परिवार बाड़मेर और बीकानेर दो हिस्सों में बंट गए थे। बाड़मेर के किसी भी गाँव से कोई धाटी बीकानेर जाता तो आपके पास कई दिनों तक रुकता, चाय के बर्तन वहाँ भी चूल्हे पर ही रहते, पंचायतों के मुखिया वहाँ भी बने रहे। चौहटन से पूंगल लगभग 500 km की दूरी में कई सालों से रात को बस चल रही है। इस बस को विस्थापितों की बस भी कह सकते हैं। बस की क्षमता से तीन गुणा ज्यादा लोग हर रात को इधर से उधर होते, सुलगती बीड़ियों के साथ जो चर्चाएँ होतीं वो लिखी भले ही न गई हों पर साहित्य का भंडार हैं। जब कभी आप इस बस में होते तो लोग अपनी सीट छोड़कर आपके अगल-बगल इकट्ठे हो जाते, पाकिस्तान में भुट्टो परिवार की राजनीति से लेकर गाँवों के सरपंचों की राजनीति पर गंभीर चर्चा होती। कौन-कौन से गाँवों में विस्थापित होकर आए लोगों और पहले से स्थापित लोगों में तनाव चल रहा है। पहले जब पाकिस्तान में थे तब कौनसे गाँव का कौन सरपंच था। किसकी शादी में पुलिस से झड़प हुई थी। अभी और पहले की घास में क्या-क्या अन्तर आया है। जो मर गया है उसकी बातें, जो रूठ गया है उसकी यादें... जिस किसी को बस से पहले उतरना होता वो अगले स्टेशन तक अपना उतरना टाल देता, कोई नया बस में चढ़ता तो खुशी से पागल हो जाता कि आज तो आप यानी बा सरूपिंग इस बस में हैं। वे लोग जब उतर कर जाते तो अपने गाँवों के ओतारों में कई दिनों तक इस बात की चर्चाएँ छेड़ते रहते कि जब हम आ रहे थे तो बस में सरूपिंग साथ में थे।
नियति को तो माना नहीं जा सकता पर परिस्थितियों ने आपको एक बार फिर विस्थापित किया। 2018 में बीकानेर छोड़कर वापस बाड़मेर आ गए। अब तक देश में कट्टरता थोड़ी और बढ़ गई थी, थोड़ी क्या कट्टरता परिपक्व हो गई थी, एकीकरण भी अपने उच्चतम स्तर पर आ गया था। पर आप वही पहले वाले थे, दोस्ती और धर्मेलों के बीच में धर्म नहीं आता था। धर्म के नाम पर वोट देना तो बिल्कुल ही नागवार था।
सरपंचों के चुनाव आए और गाँव में सीट ओबीसी की। इस बार आप गाँव में थे तो एक मुसलमान उम्मीदवार को खड़ा होना ही था। आप वही थे, कोई भी कट्टरता की लहर आप को बदल नहीं पाई थी पर आपके कुछ भाइयों के बेटे व्हाट्सएप के संदेशों की चपेट में आ चुके थे। पहले फुसफुसाहट हुई और बाद में खुले तौर पर मोहल्ले के कुछ लोगों ने कह दिया कि मुसलमान को वोट नहीं देंगे। मोहल्ला बंट गया, गाँव को तो बंटना ही था। चुनाव हार गए। यह पहला मौका था जब आपके सामने कट्टरता जीत गई। पर आप को हरा नहीं पाई, आप वही के वही रहे, धर्म किसी भी मामले में बीच में नहीं आ पाया।
आप एकीकरण के कितने खिलाफ और स्थानीयता के कितने पक्षधर थे, वो याद रखने के लिए मेरी स्मृति में कुछ किस्से हैं। कुछ वर्ष पहले गाँव में समर्थींग पीर का मंदिर बन रहा था। समर्थींग स्थानीय पीर हैं पर जब बात मोहल्ले की हो जाती है तब उनसे भी ज्यादा स्थानीय खानजी हो जाते हैं। समर्थींग आस-पास के गाँवों में ज्यादा लोकप्रिय हुए, खानजी उतने लोकप्रिय नहीं हुए। पर जब मंदिर बनाने की बात हो रही थी तब आप लोकप्रियता के नहीं, स्थानीयता के पक्ष में थे, आप चाहते थे कि मंदिर बनते वक्त खानजी की भी मूर्ति रखी जाए।... एक रंग में रंगे हुए धर्म, एक रंग के ईश्वर के आप खिलाफ थे। एक मंदिर पर वोट नहीं दिए जा सकते हैं।
आप चले गए समय से पहले ही, शायद समय पर ही पर मेरी गति धीमी रही आपके रहते हुए मुझे जहाँ तक पहुँचना था वहाँ तक पहुँच नहीं पाया। आपका पौत्र दो_सान जिस तरह से घर-मोहल्ले से अलग-थलग रहने लगा था, आपने तो सोच रखा होगा कि आपके रहने न रहने से दो_सान के सपनों का क्या लेना-देना पर यक़ीन मानिए आपके चले जाने से मेरे बहुत कुछ सपने टूट गए हैं। (सपनों के साथ टूटना शब्द शायद पहली बार प्रयोग में ला रहा हूँ वो भी गलत तरह से, मुझे कहना चाहिए कि सपने खत्म हो गए हैं।) मुझे आपकी उंगली पकड़ कर सिल में प्रवेश करना था। वही सिल जो अब पाकिस्तान में है और पहले आपका गाँव हुआ करती थी। पर यह सपना नहीं था मेरी यूटोपिया है। आपके बचपन और जवानी की गवाही देता गाँव सिल मेरा आदर्श गाँव है। मुझे कविता की भाषा में विश्वास है (और तरह की भाषाओं से अब विश्वास ध्वस्त होता जा रहा है।) कि लोग उकता जाएँगे कट्टरता के ठेकेदारों से और दो देशों के बीच की तारबंदी को उखाड़ फेकेंगे। दो देश, देशों के अर्थ में अपना अस्तित्व खो देंगे। जाति के नाम पर गुट बनाकर एकजुट रहने का स्वार्थ फीका पड़ जाएगा। बच्चे के रूप में मैं आपकी उंगली पकड़कर और जहाँ आप बुजुर्ग जान पड़े वहाँ आपको सहारा देता हुआ सिल में प्रवेश करूँगा। धर्म की कट्टरता को खत्म करने के लिए मैं आपकी उंगली पकड़कर चलूँगा पर सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था को उखाड़ने के लिए आपको सहारे की जरूरत पड़ती, मैं सहारा देता। मेरे जैसे धाट के तमाम बच्चे धाट के तमाम बुजुर्गों को सहारा देने के लिए तैयार हैं ताकि जाति अपने भेदभावों को लेकर समाप्त हो जाए। धर्म विहीन, जाति रहित सिल में हम प्रवेश करते और उस ठंडी हवा का स्वाद लेते जो हर बसंत पर गाँव में प्रवेश करती थी और गाँव के पुरुष-महिलाएँ नम आँखों से कहते थे कि सिल से हवा आ रही है। वहाँ हम जाळों से पीलू खाते और खेजड़ियों से खोखे। वही सिल जो मेरा आदर्श गाँव बनने से पहले जीता-जागता गाँव था, जहाँ आपका बचपन बीता। वही सिल जिसका निर्माण हंझतल की लड़ाई के बाद आपके और मेरे बुजुर्गों ने ध्वस्त हो चुकी हंझतल से उखड़ कर एक शिलाखंड के पास किया था। वही सिल जिसके बनने से पहले लड़ाई के सारे पैमाने टूटे कि लड़ाई सिर्फ़ आदमी लड़ते हैं। आपकी-मेरी दादी ऋजू भटियाणी ने हाथ में तलवार लेकर लड़ाई का नेतृत्व किया और लड़ाई जीतने के साथ-साथ लड़ाई में पुरुषों के एकाधिकार को छीन लिया। उसी सिल में दुबारा पीली डायरी खुलती। आपको ग्यारहवीं कक्षा का वह दो_सान याद होगा जो आपके पास डायरी लेकर आया था, पीली डायरी, सिल का इतिहास लिखने के लिए पर लिख नहीं पाया। सिल में पहुँच कर उस पीली डायरी में अतीत के दुखों को लिखा जाता ताकि वे दुःख भविष्य में लौट न पाएँ। 1971 में आपने जब सिल और पाकिस्तान छोड़ा उसके बाद की घटनाओं से उपजी आपकी संवेदनाओं को उस डायरी पर उकेरना था। आपको कैसा लगता था जब किसी की शादी करवाने या खो चुकी भेड़-बकरियाँ, ऊँट-ऊँटनियाँ खोजने पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश करते थे। क्या आप मन ही मन पीर से दुआ नहीं मांगते थे कि कोई बकरी का बच्चा चला जाए सीमा पार और आपको उसे लेने जाने का बहाना मिल जाए जैसे दो_सान छूट चुकी दोस्त कम प्रेमिका ज्यादा के पास लौटने के असंभव बहाने तलाशता है। उन घटनाओं की संवेदनाओं को भी डायरी में उतारता जिनको आपके साथ-साथ मैंने भी महसूस किया है। जब सरकारों ने दोनों मुल्कों के बीच चलने वाली ट्रेन को बंद कर दिया तब आपके गुस्से का स्तर कैसा था! जब पाकिस्तान से निकल कर हिंदुस्तान के हिस्से आ चुके धाट में आकर आदिवासी भीलों ने अस्थाई घर बनाए और सरकार ने उन घरों पर बुलडोज़र चला दिया तब आपको कैसा लगा था। क्या आपका मन नहीं हुआ कि सभी बुजुर्ग अपना डंडा लेकर सरकारों को ललकारें कि लौटा दो हमें हमारा अविभाजित देश। कहें कि हमारे शब्दों ने नहीं उगला था जहर, धाट में नहीं हुए थे दंगे, आपकी अपनी कट्टरता और सत्ता की लालसा की वजह से हमारे धाट के बीचों-बीच क्यों खींच रखी है लकीर। यह सब कुछ डायरी में उतारना मेरी यूटोपिया का हिस्सा था सपनों का नहीं, संवेदना में इतना गहरा उतरने की मुझमें हिम्मत नहीं है कि इस तरह के सपने देख सकूं।
सपने तो बहुत छोटे थे, जिस तरह से मैं सीखने की प्रक्रिया में था लगता था जल्द ही परिणति तक पहुँचते। सपनों में था कि आप अपना डंडा उठाकर मेरी आज़ादी की पैरवी करते। कहते कि दो_सान की मर्ज़ी कि ईश्वर को माने या न माने, शादी करे या न करे उसकी मर्ज़ी। धर्म और जाति का बंधन क्यों। आपकी कही हुई बात घर-परिवार और मोहल्ले में कोई काट नहीं पाता। वो अलग बात है कि आपकी मृत्यु के बाद आपकी कही बातों को धड़ल्ले से काटा गया पर आपके जीवित रहते ऐसा संभव नहीं था।
इस बार जब मेरा जेआरएफ क्लियर हुआ और गाँव आया और आपको बता रहा था कि पैसे अगले वर्ष से आना शुरू होंगे। तब आपने गाली के साथ कहा था कि
"भाड़ीया तिना ड्यूटी दईंए कोथा।"
मुझे लगा विश्वविद्यालयों में चल रहे घपलों और एडमिशन की धांधलियों के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलनों में आपको चलना चाहिए। आप में अंतिम हद तक लड़ाई लड़ने की ताकत थी। पंचायतों में जब मजबूरीवश कोई समझौता होने वाला होता था तो आप अपनी पगरठी (जूती) पहन कर निकल आते थे। हार कर समझौता करने वालों में से आप नहीं थे। आपके जाने के बाद मेरे सीखने की प्रक्रिया धीमी हो गई है, अब मैं सपने नहीं देख पाता हूँ। इतनी धीमी कि पानी में हाथ-पैर मारता हूँ पर तैर नहीं पाता हूँ। मैंने घोषणा कर दी है दो_सान की मृत्यु की। पीली डायरी ज्यों की त्यों पड़ी है। अब उसमें आपकी संवेदनाएँ नहीं उतर पाएंगी। उस पर शायद उकेरी जाए अकेलेपन से घबराए हुए बिस्तर पर सिकुड़ते शरीर की ठंडक या प्रेमिका के हाथों की गर्माहट या चिड़ियों के लिए, खरगोशों के लिए लड़ने की आवाज़ या बंधनों को तोड़ने की ललकार। लेकिन अभी सिर्फ़ इंतजार किया जा रहा है, दो_सान के जीवित होने का। आप अब इस दुनिया में नहीं हैं। दूसरी, तीसरी और चौथी दुनिया में मेरा विश्वास नहीं है। आप अगर अब कहीं हैं तो मेरे दिल में हैं। आपको खुश होना चाहिए कि प्रेतयोनि, नरक और स्वर्ग जैसी काल्पनिक जगहों से कहीं ज़्यादा खूबसूरत है मेरा दिल, आप एक खूबसूरत जगह पर हैं। आप और आप जैसे कईयों की उपस्थिति के कारण मेरी जिम्मेवारी बढ़ जाती है कि दिल को साफ़ और खूबसूरत रखूँ। जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग की संकीर्णताओं को जगह न दूँ, सीखने की प्रक्रिया में दिल को लगातार खूबसूरत बनाता जाऊँ। अगर आप अपने विश्वासों की बदौलत किसी दूसरी-तीसरी दुनिया में गए भी होंगे तो वहाँ के लफंगे लोगों ने सर पीटते हुए कहा होगा कि अब जीने नहीं देगा। अपने आस-पास प्यार की दुनिया बसाने की चाह रखने वालों में उम्मीद जगी होगी कि अब बा हमारे पास हैं। ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान से बाड़मेर और बाड़मेर से बीकानेर गए तब वहाँ के लोगों में उम्मीद जगी थी। हम आपको याद करेंगे और कट्टरता के ख़िलाफ़ लड़ेंगे, आपको स्मृति में रखते हुए एकीकरण के खिलाफ युद्ध करेंगे। आपकी स्मृतियाँ ताकत देती हैं स्थानीयता के पक्ष में बोलने के लिए, अपने आदर्शों पर कायम रहने के लिए। पश्चिमी राजस्थान इन दिनों कट्टरता में फँसा हुआ है, हत्याएँ हो रही हैं, घर और दुकानें जलाई जा रही हैं। हम आपको स्मृति में रखते हुए स्पष्ट रूप से कहते हैं, कट्टर लोगों हम तुम्हारा साथ नहीं दे पाएंगे, बा इसके ख़िलाफ़ थे। अलविदा बा, धाट आपसे सीखता रहेगा।

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