शोध आलेख : भक्ति आंदोलन और नामवर सिंह / बजरंग बिहारी तिवारी

भक्ति आंदोलन और नामवर सिंह
- बजरंग बिहारी तिवारी

नामवर सिंह ने भक्ति आंदोलन या भक्तिकाव्य पर कोई स्वतंत्र किताब नहीं लिखी। ‘दूसरी परंपरा की खोज’ (1981) में प्रसंगतः उन्होंने भक्तियुग पर लिखा। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत विषय से संबंधित समय-समय पर उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। उनके भक्ति संबंधी लेखों को एकत्र कर प्रो. आशीष त्रिपाठी ने ‘भक्ति काव्य परम्परा और कबीर’ (राजकमल प्रकाशन, प्र.सं. 2023) शीर्षक से एक किताब संपादित की है। आशीष जी की सुचिंतित भूमिका को छोड़कर इस किताब के तीन खंड हैं। पहले खंड में भक्ति काव्य और आंदोलन से जुड़े निबंध हैं। दूसरे खंड ‘भक्त कवियों की दुनिया’ में तुकाराम, मीरा, तुलसीदास और रहीम पर लिखे निबंध शामिल किए गए हैं। लेख, समीक्षा, इंटरव्यू आदि के रूप में ‘विलक्षण अगिनपाखी : कबीर’ पर चौथे खंड में दस शीर्षकों के अंतर्गत सामग्री है। इस किताब का संपादन करके आशीष त्रिपाठी ने भक्ति संबंधी अध्ययन में नामवर जी के योगदान को समझने का बढ़िया अवसर प्रदान किया है।

भक्ति आंदोलन के संबंध में नामवर जी की प्रमुख स्थापनाएँ ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में आ गई हैं। उन्होंने भक्तिकाव्य की केन्द्रीय भावसत्ता के रूप में प्रेम की पहचान की। पुरोहितों और भक्त-कवियों के बीच निर्णायक अंतर को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेम के बलबूते ही भक्त-कवि पुरोहितों से मुक़ाबला कर सके। ‘काम’ को यद्यपि पुरुषार्थ-चतुष्ट्य में रखा गया है लेकिन पुरोहित वर्ग ने प्रेम को पाप-बोध से जोड़ दिया और इस तरह प्रेम अपराध की श्रेणी की ओर धकेल दिया गया- “इस पाप बोध जगाने वाले वर्ग से निपटने के लिए भक्तों के पास सबसे अमोघ अस्त्र था- प्रेम। आश्चर्य नहीं कि पुरोहिती हितों के पोषक पण्डितों ने सबसे अधिक कोप इस प्रेम पर ही प्रकट किया।” (‘दूसरी परंपरा की खोज’, पृ. 64, इस लेख में सर्वत्र 1983 संस्करण का उपयोग किया गया है।) कबीर पर लिखी एक किताब पर बोलते हुए नामवर जी ने भक्तियुगीन प्रेम भावना को सूफ़ियों की देन बताया। यह उनकी बहुत महत्त्वपूर्ण स्थापना है- “प्रेम जो मूल है, वह कैसे आया? प्रेम को सूफ़ियों के यहाँ सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त है। यह सूफ़ियों की देन है। लगभग सूफ़ियों के आगमन के साथ ही प्रेम भारत में कलाओं के केन्द्र में आया। सूफ़ियों के यहाँ शरीयत के ख़िलाफ़ ताकतवर भावना (प्रेम) है। सूफ़ियों के प्रेम तत्त्व का असर हमारी भक्ति में दिखता है।” (‘भक्ति काव्य परम्परा और कबीर’, राजकमल प्रकाशन, 2023, पृ. 280)

भक्ति कविता की प्रेम भावना के अनेक रूप हैं। सभी को सूफ़ी मत (मतों) की प्रेम भावना से प्रभावित मानना मुश्किल है। यह अवश्य है कि नामवर जी ने कबीर की कविता में मौज़ूद प्रेमतत्त्व पर सूफ़ियों के असर की बात की है वह कई अध्येताओं द्वारा पहले से प्रमाणपुष्ट है। प्रो. मैनेजर पांडेय ने भक्तिकाव्य की मूल विशेषता का प्रश्न उठाते हुए प्रेमभाव को उसका केन्द्रीय तत्त्व माना है और इस तरह नामवर जी की स्थापना को समर्थन देते हुए उसका विस्तार किया है। उनका यह विश्लेषण ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ नामक पुस्तक में शामिल है। हमें समझना चाहिए कि इतिहास के जिस मोड़ पर हिंदी का भक्ति साहित्य रचा गया वह विचार और भाव में तीव्र संक्रमण का था। एक तरफ़ भीतर उथल-पुथल मची हुई थी दूसरी तरफ़ इस्लाम के अनुयायियों से सघन संवाद हो रहा था। सार्थक संवाद प्रीतिपूर्ण वातावरण में होता है। संत और भक्त ऐसा ही माहौल बनाने की कोशिश में लगे थे। कबीर की एक साखी है, “पाड़ोसी सूं रूसणां तिल तिल सुख की हानि। पंडित भये सरावगी पाणी पीवै छानि।।” पड़ोसी से रोषपूर्ण संबंध धीरे-धीरे सुख-सुकून छीन लेता है। इसी व्यावहारिक ज्ञान के तकाज़े से जैन श्रावक परिवार के पड़ोस में रहने वाला पंडित परिवार भी पड़ोसी जैसा बन जाता है और उस परिवार की तरह पानी छानकर पीने लगता है। सद्भाव-स्थापन की इसी आकांक्षा के तहत संत दादूदयाल ने लिखा- ‘दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान। दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान।।’ अन्य बहुत से संतों की बानियाँ इसी सद्भाव की कामना करती हैं। इसी विशेषता के कारण संत या भक्त होने का मतलब ही हो गया मिलजुल कर रहने का संदेश देने वाला जनकवि। ये संत दूसरे सिरे पर तमाम धर्म-मतों को उनकी जड़ताओं के लिए फटकार भी रहे हैं। उन जड़ताओं से बाहर आकर एक नए मार्ग पर चलने को प्रेरित भी कर रहे हैं। विभिन्न धर्मों की सीमाएँ इन संत कवियों की बानियों में पूरी निर्ममता से उद्घाटित हुई हैं। इसी वज़ह से संस्थाबद्ध धर्मों के समान्तर भक्ति एक वैकल्पिक राह बन गई। उसका नाता अपने पिछले धर्ममत से बना रहा लेकिन उसकी ‘रहनी’ पिछली चौहद्दियों से आगे निकल गई। दादूदयाल के प्रमुख शिष्य रज्जब जिनका कई मसलों पर स्वतंत्र चिंतन चमत्कृत करता है ने लिखा, ‘द्वे पख बीजक दालि है, बिच अंकूर अतीत। रज्जब सोइ ऊँचा चल्या, यह तीजी रस रीत।।’ बीज के दोनों हिस्सों (दाल) से जीवन रस लेता हुआ अंकुर ऊपर बढ़ जाता है। अपने अतीत से उसका कटाव नहीं है। जीवन रस वह दोनों स्रोतों (हिंदू-मुसलमान/ सगुण-निर्गुण) से लेता है लेकिन वहीं तक सीमित होकर नहीं रह जाता। रज्जब जिस नए उन्नत मनुष्य की कल्पना कर रहे हैं वह अपने साझे अतीत से पोषण ले रहा है लेकिन उसके आगे बढ़ा हुआ भी है। भक्ति का तात्त्विक अर्थ अपनी जगह क़ायम है किंतु इतिहास उसमें नया अर्थ भी भारत है। यह अर्थ सामाजिक सद्भाव है। भक्तिकाव्य को अपने तरीके से विस्तार देने वाले साकेतकार मैथिलीशरण गुप्त ने कवि को सूर्य बताते हुए लिखा है कि किसी भी समाज में सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने का ज़िम्मा कविता उठाती है। इसे उन्होंने ‘सुकविता’ कहा है- ‘है अंध सा अंतर्जगत कवि रूप सविता के बिना। सद्भाव जीवित रह नहीं सकते सुकविता के बिना।।’ आंदोलन के रूप में भक्तिधारा ने भारतीय समाज में इसी सौहार्द या सद्भाव की साधना की। सद्भाव की यह पूँजी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को मिली। महात्मा गाँधी, महात्मा फुले, मौलाना आज़ाद, डॉ. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू आदि मुक्ति आंदोलन के नायकों ने इस पूँजी का सदुपयोग अपने-अपने तरीके से किया। हिंदी साहित्य में आधुनिकता के प्रथम हस्ताक्षर भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र ने बलिया मेले में जब ‘भारतवर्षोन्नति’ की अपनी कामना, परियोजना को साकार करने की राह बनाने वाले सुझाव प्रस्तुत किए थे तो उसमें प्रमुख था कि देश में रहने वालों में परस्पर सौहार्द हो। सब एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलें- “भाई हिंदुओं! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो। जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग, जाति का क्यों ना हो, वह हिंदू। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़ै, तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहै वह करो।”

अपने भक्ति-संबंधी अध्ययन में नामवर जी महत्त्वपूर्ण स्थापना देते हैं- “इस प्रकार मध्ययुग के इतिहास का मुख्य अंतर्विरोध शास्त्र और लोक के बीच का द्वंद्व है, न कि इस्लाम और हिन्दू धर्म का संघर्ष।” एकबारगी देखने में यह स्थापना बड़ी स्पष्ट प्रतीत होती है लेकिन जब हम दोनों बीज शब्दों ‘लोक’ और ‘शास्त्र’ का वांछित अर्थ समझने की कोशिश करते हैं तो समस्या आती है। संत कवियों के यहाँ ‘लोक’ और ‘वेद’ को साथ-साथ रखा देखा जा सकता है। ये दो दृष्टियाँ हैं, दो मार्ग हैं। कहीं परस्पर पूरक हैं लेकिन अधिकतर प्रयोगों में परस्पर विरोधी। कबीर ने तो दोनों को फटकार लगाई है। तुलसीदास के यहाँ तीन स्थितियाँ दिखती हैं- वेदमार्ग श्रेष्ठ है, वेद और लोक दोनों ही बराबर महत्त्व के हैं (इन दोनों के साथ अन्य मत भी हैं जैसे संत/साधुमत, राजमत), और इनके बीच पदानुक्रम असमंजस भरा सवाल है- “लोक कि बेद बड़ो रे”। क्या नामवर जी वेद के स्थानापन्न के रूप में शास्त्र का प्रयोग कर रहे हैं? कई बार ऐसा ही संकेत मिलता है- “ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के पण्डितों को लोकजीवन की ओर झुकने को बाध्य होना पड़ा था।” अक्सर वेद और शास्त्र साथ-साथ प्रयोग में लाए जाते हैं। नामवर जी तब वेद शब्द ही क्यों न प्रयोग करते? आशय यही निकलता है कि शास्त्र स्थानापन्न शब्द नहीं है। नामवर जी का विवेचन इस तरफ ले जाता है कि ये दोनों सगुण और निर्गुण की विशेषताएं हैं। निर्गुण लोकमत की राह पर चलता है और सगुण शास्त्रमत की राह पर। सामान्य समझ है कि सुसम्बद्ध ज्ञान ही शास्त्र कहा जाता है। अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि इसके रूप हैं। कुण्डलिनी जागरण के, सहस्रार चक्र भेदन हेतु मूलाधार से ऊर्ध्वमुखी यात्रा के सभी पड़ावों के उल्लेख कबीरादि संतों में मिलते हैं। ‘इड़ा पिंगला सुषमन नारी। बेगि बिलोइ ठाढ़ि छछिहारी’ जैसे कथन क्या तंत्रशास्त्र, हठयोग के ज्ञान के बिना समझे जा सकते हैं? नामवर जी ने लिखा है, “संत कागद की लेखी न कहकर आँखिन देखी के विश्वासी थे।” यह स्थापना ‘रस गगन गुफा में अझर झरै’ जैसी अभिव्यक्तियों पर लागू नहीं की जा सकती। कई विमर्शकार यह कहकर छुट्टी पा लेते हैं कि ऐसी पंक्तियाँ बाद में जोड़ी गई हैं, प्रक्षिप्त हैं। नामवर जी प्रक्षिप्त वाला तर्क नहीं देते। वे संभवतः इसे रहस्यानुभूति मानते होंगे। तब भी यह दावा आंशिक रूप से ही सच है कि संत ‘आँखिन देखी के विश्वासी थे।’

नामवर जी ने लोक और शास्त्र के सर्वथा पृथक होने को स्वीकारा नहीं है। उनमें आपस में आवाजाही रही है। इस आवाजाही से दोनों समृद्ध होते रहे हैं। नामवर जी ने लिखा है, “लोक के दबाव में शास्त्र ने कभी-कभी अपने आपको लचीला बनाकर लोक की बहुत-सी विशेषताओं को अंतर्भुक्त कर लिया। ... किन्तु यदि एक ओर शास्त्र ने झुककर लोक की विशेषताओं को अंतर्भुक्त किया तो दूसरी ओर शास्त्र वंचित लोक भी अपने अनुभव संचित विचार खंडों को सुसंगत और समृद्ध बनाने के लिए शास्त्र का सहारा लेता रहा है।” नामवर जी अगर इस लेनदेन का कोई उदाहरण देते तो स्पष्ट हो जाता कि शास्त्र से उनकी मुराद क्या है। ‘काव्यदर्पण’ के आरंभ में आचार्य दंडी ने लिखा है शास्त्र और शास्त्रेतर को मिलाकर ही लोकयात्रा अग्रसर होती है। यहाँ शास्त्र का आशय व्याकरण से है। किसी भी भाषा में सारे शब्द व्याकरण द्वारा अनुशासित नहीं होते। लोक शब्दानुशासन से मुक्त रहकर अभिव्यक्तियाँ रचता है, शब्द गढ़ता है। वैयाकरण इनमें से कुछ को ही संस्कार या शोधन के दायरे में ला पाते हैं। इसी तरह काव्यशास्त्र का मसला है। कवि रचते समय सापेक्षिक रूप से मुक्त होता है। काव्यशास्त्री बाद में उसे अपने लक्षणों के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है। महाकाव्य के लक्षण और स्वरूप आचार्य विश्वनाथ सहित कई काव्यशास्त्रियों ने निरूपित किए हैं। महाकवि अगर उस साँचे में ढालकर अपनी रचना प्रस्तुत करे तो सारे महाकाव्य समान दिखाई पड़ें। ऐसा कहना भी सही नहीं है कवि पर काव्यशास्त्र का प्रभाव नहीं पड़ता। छन्दःशास्त्र के नियम ऐसे ही हैं। उन नियमों के उल्लंघन में भी नियम का ज्ञान उपस्थित रहता है। दोहा छन्द के नियम कबीर के यहाँ उनकी साखियों में स्थगित-से हैं फिर भी साखी दोहे से एकदम भिन्न नहीं है। सभी संतों की बानियों में राग का निर्देश रहता है। ‘गुरुग्रंथ साहब’ में रचनाओं की पहचान का यह प्रमुख आधार है। राग का अपना शास्त्र होता है। उनके गायन के समय इसका ध्यान रखा जाता है। ‘भक्ति काव्य परम्परा और कबीर’ में नामवर जी का कथन है, “इस देश की परम्परा रही है कि लोक और शास्त्र लगातार संवाद करते रहे हैं। वेद और लोक इन दोनों के बीच संवाद के द्वारा भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है। कभी तनाव भी रहा है, द्वंद्व भी रहा है ...एक संवाद बना रहा है।” तब नामवर जी जिसे मुख्य अंतर्विरोध कह रहे हैं उसे ही मुख्य सहयोग भी बता रहे हैं।

निर्गुण सगुण का विवाद कबीर और तुलसी संबंधी झगड़े में आकार लेता है। नामवर जी की लोक-शास्त्र वाली बायनरी भी इससे असम्बद्ध नहीं है। उन्होंने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में लिखा है, “शुक्ल जी के लोक धर्म के प्रतीक तुलसीदास हैं; द्विवेदी जी के कबीर। भक्ति के स्तर पर बहुत कुछ समान, व्यवहार के स्तर पर एकदम विरुद्ध। यों स्वयं तुलसी कबीर का बिना नाम लिए स्पष्ट विरोध करते हैं और शुक्ल जी की इसमें सहमति है।” इस मान्यता का स्रोत स्वयं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का वह विवेचन है जिसमें उन्होंने ‘रामचरितमानस’ बालकाण्ड के शिव-पार्वती संवाद का अंश ‘तुम्ह जो कहेहु राम कोउ आना’ उद्धृत किया है और इसे तुलसी द्वारा कबीर (दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना। राम नाम का मर्म है आना।।’) का प्रत्युत्तर बताया है। यह प्रसंग निर्गुण-सगुण या कबीर-तुलसी विवाद में इतनी बार दुहराया गया है हिंदी साहित्येतिहास के सामान्य बोध का हिस्सा बन गया है। इसने वह ऐतिहासिक सच विस्मृत करा दिया है कि ‘अग्य अकोबिद अंध अभागी’ कहकर लगभग सभी वैष्णव आचार्यों ने अद्वैतवादी आचार्य शंकर का विरोध किया था। इनमें सबसे ऊँचा स्वर द्वैतवाद के संस्थापक मध्वाचार्य का था। वल्लभाचार्य और उनके पुष्टिमार्ग के आचार्यों-कवियों ने भी सघन आंदोलन छेड़ रखा था। भ्रमरगीत इसी की एक अभिव्यक्ति थी। भ्रमरगीत में जिस निर्गुण पर हमला है वह कबीर से पहले शंकराचार्य के अभेदवादी दर्शन पर है। स्वयं तुलसीदास ने मानस के अंतिम सोपान (7/100/1-4) में अपने प्रतिपक्ष को स्पष्ट कर दिया है-

पर त्रिय लंपट कपट सयाने।
लोभ मोह ममता लपटाने।
तेइ अभेदवादी ग्यानी नर।
देखा मैं चरित्र कलिजुग कर।
आपु गये अरु तिनहूं घालहिं।
जे कछु सत मारग प्रतिपालहिं।
कलप कलप भरि एक एक नरका।
परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।

इसी तरह के खंडन-मंडन से पुष्टिमार्गी आचार्य विट्ठलनाथ ने ‘विद्वन्मंडन’ ग्रंथ तैयार किया था। इसमें शांकर-दर्शन का खंडन किया गया है। ऐसा कहना कि तुलसीदास ने कबीरादि संतों की आलोचना नहीं की है, सही नहीं होगा। लेकिन, यह ऐतिहासिक तथ्य है कि उनका और अन्य वैष्णव आचार्यों-कवियों का मुख्य दार्शनिक प्रतिपक्ष अद्वैतवाद ही था।

बजरंग बिहारी तिवारी
प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव 

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