- प्रभाकर सिंह
हिन्दी
आलोचना
की
परम्परा
में
नामवर
जी
समकालीनता
को
सबसे
अधिक
तवज्जो
देते
हैं।
समकालीनता
की
चिन्ता,
बहस-मुबाहिसा
उनकी
आलोचना
के
केन्द्र
में
है।
यह
उनकी
आलोचकीय
प्रतिभा
की
क्रियाशीलता
ही
है
कि
पाँच
दशक
से
भी
अधिक
समय
तक
वह
हिंदी
आलोचना
के
प्रतिमान
बने
रहे।
नामवर
सिंह
मूलतः
कविता
के
आलोचक
हैं
लेकिन
कहानी,
उपन्यास,
आलोचना
और
इतिहास
में
गहरी
दखल
रखते
हैं।
नवीनतम
जानकारियाँ,
साहित्यिक
बहस,
सृजन
और
वैचारिकी
की
गहरी
समझ
के
साथ
वह
जितने
संवादी
हैं,
उतने
ही
विवादी
भी।
खास
बात
यह
कि
समसामयिकता
की
गहरी
पैठ
के
साथ
उनमें
परम्परा
का
गहरा
बोध
भी
है।
इस
मायने
में
वह
आचार्य
रामचन्द्र
शुक्ल,
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
और
रामविलास
शर्मा
से
जुड़ते
हैं
लेकिन
वह
सहचर
तो
मुक्तिबोध
के
ही
हैं।
आलोचना
को
'सभ्यता-समीक्षा' मानने
वाले,
मार्क्सवाद
के
प्रति
प्रतिबद्ध,
प्रगतिशील
बौद्धिकता,
जनतांत्रिक
मूल्यों
से
लैश,
सच्ची
ईमानदार
आलोचना
और
संवादी
दृष्टि
से
दोनों
आलोचकों
नें
हिन्दी
की
सैद्धान्तिक
और
व्यावहारिक
समीक्षा
को
विकसित
किया।
हिन्दी
आलोचना
की
सैद्धान्तिकी
को
नये
प्रतिमान
और
नये
टूल्स
प्रदान
कर
व्यावहारिक
धरातल
पर
उसे
रूपायित
भी
किया।
विचार
और
संवाद
की
इसी
प्रक्रिया
को
नामवर
जी
'इतिहास और आलोचना'
और
‘वाद
विवाद
संवाद’
जैसी
पुस्तकों
में
बड़ी
शिद्दत
से
रचते
हैं।
‘इतिहास
और
आलोचना’
छठे
दशक
के
वैचारिक
संघर्ष
आलोचना
के
विवाद
और
संवाद
का
दस्तावेज़
हैं
तो
‘वाद
विवाद
संवाद’
पुस्तक
के
निबंधों
में
सातवें,
आठवें
और
नौवें
दशक
के
वैचारिक
और
आलोचनात्मक
संघर्षों
का
लेखा
जोखा
प्रस्तुत
करने
का
उपक्रम
है।
‘वाद
विवाद
संवाद’
पुस्तक
के
निबंधों
से
गुज़रते
हुए
नामवर
सिंह
के
आलोचना
संघर्ष
और
वैचारिक
पृष्ठभूमि
को
बख़ूबी
देखा
जा
सकता
है।
पुस्तक
में
दर्ज
निबंध
‘आलोचना
की
संस्कृति
और
संस्कृति
की
आलोचना’,
‘प्रगतिशील
साहित्य
में
अंध
लोकवादी
रुझान’,
‘युवा
लेखन
पर
एक
बहस’
‘जनतंत्र
और
आलोचना’,
‘आलोचना
की
स्वायत्तता’,
‘आलोचना
और
संस्थान’
जैसे
निबंध
इस
बात
की
ताक़ीद
करते
हैं।
इन
निबंधों
में
नामवर
सिंह
आलोचना
की
स्वायत्तता
और
उसके
जनतांत्रिक
मूल्यों
की
गहरी
शिनाख्त
करते
हैं।
आलोचना
की
संस्कृति
और
संस्कृति
की
आलोचना
में
वह
आलोचना
के
सांस्कृतिक
दायित्व
और
सभ्यता
विमर्श
का
विवेचन
करते
हैं।
उनका
मानना
है
कि
आलोचक
को
संस्कृति
समीक्षक
भी
होना
चाहिए
तभी
वह
अपने
समय
की
पहचान
कर
पाएगा।
नामवर
सिंह
की
आलोचना
के
जनतांत्रिक
और
प्रगतिशील
मूल्यों
की
पहचान
के
लिए
इन
पुस्तकों
से
गुजरना
दिलचस्प
होगा।
फ़िलहाल
कुछ
बाते
‘इतिहास
और
आलोचना’
पुस्तक
के
हवाले
से
यहाँ
विवेचित
हैं।
'इतिहास और आलोचना'
पुस्तक
का
प्रथम
संस्करण
1957 में
प्रकाशित
हुआ।
नामवर
जी
की
यह
पुस्तक
छठे
दशक
के
उनके
वैचारिक
और
आलोचनात्मक
संघर्ष
का
दस्तावेज
है।
प्रगतिविरोधी
विचारों
से
मुठभेड़
करते
हुए,
जवाब
देते
हुए,
विवाद
और
संवाद
करते
हुए
यह
पुस्तक
रूपायित
हुई।
साहित्य
के
प्रगतिशील
मूल्यों
की
प्रतिष्ठा
है
इस
पुस्तक
में।
आरम्भिक
निबन्धों
में
नामवर
जी
वास्तविकता
बनाम
अनुभूति,
वस्तु
बनाम
रूप
और
व्यापकता
बनाम
गहराई
के
द्वन्द्व
और
महत्त्व
का
उद्घाटन
करते
हैं।
अन्तिम
निबन्धों
में
साहित्य
के
इतिहास
के
नये-दृष्टिकोण
का
विवेचन
है
तो
साहित्येतिहास
पुनर्लेखन
और
पुनर्मूल्याकंन
के
बिन्दुओं
की
सजग
पड़ताल
भी
है।
छायावाद
और
नयी
कविता
के
तले
हिन्दी
की
व्यावहारिक
आलोचना
को
इस
पुस्तक
में
नये
सिरे
से
परखा
गया
है।
छठे
दशक
में
आरम्भ
हुआ
नामवर
जी
का
वैचारिक
आलोचनात्मक
संघर्ष
संवादी
स्वर
कहीं
वाचिक
तो
कहीं
लिखित
रूप
में
जारी
रहा।
'इतिहास और आलोचना'
से
आरम्भ
इस
सिलसिले
को
'वाद-विवाद-संवाद'
और
'आलोचना और विचारधारा'
में
दर्ज
निबन्धों
में
देखा-परखा
जा
सकता
है।
अभी
कुछ
बातें
'इतिहास और आलोचना'
को
केन्द्रित
कर
ही
किया
जाए।
नामवर
जी
की
यह
मान्यता
है
कि
किसी
भी
लेखक
में
गहराई
और
व्यापकता
की
चेतना
तभी
आती
है
जब
वह
व्यापक
सामाजिक
बोध
और
समग्र
जीवन
बोध
से
जुड़ता
है।
अनुभूति
की
प्रामाणिकता
जीवन
के
व्यापक
और
गहन
बोध
से
ही
सम्भव
हैं।
अनुभूति
की
यह
गहराई
इतिहास
से
अलग
होकर
भी
सम्भव
नहीं
है।
इतिहास
से
जुड़ना
माने
मनुष्य
से
जुड़ना।
नामवर
जी
के
शब्दों
में,
"अनुभूति
की
गहराई
की
परीक्षा
करते
हुए
हम
अनिवार्य
रूप
से
इसकी
व्याप्ति
में
जा
पड़ेंगे।
किसी
को
गहराई
तक
प्रभावित
करने
का
अर्थ
है
उसके
सम्पूर्ण
अस्तित्व,
व्यक्तित्व
और
भाव
सत्ता
को
प्रभावित
करना
और
बहुत
देर
तक
प्रभावित
किये
रहना।
अनुभूति
की
गहराई
का
निर्णय
एक
व्यक्ति
और
एक
क्षण
से
नहीं
किया
जा
सकता
है।
गहराई
का
निर्णय
दिक्
और
काल
सापेक्ष
है।"(इतिहास
और
आलोचना,
पृ.12)
'व्यापकता
और
गहराई'
निबन्ध
नामवर
जी
के
वैचारिकी
का
उत्स
है
जिसमें
वह
अनुभूति
की
गहराई
को
एक
ओर
इतिहास
से
जोड़कर
विवेचित
करते
हैं
वहीं
अनुभूति
की
व्यापकता
पर
उनका
कहना
है
कि,
"अनुभूति
की
गहराई
हर
हालत
में
अनुभूति
की
व्यापकता
से
निर्धारित
होती
है।
व्यापकता
का
तिरस्कार
करके
जो
लेखक
गहराई
लाने
का
दम
भरता
है,
वह
दरअसल
संकीर्णता
के
अन्धकूप
में
पड़ता
है।"(वही,
पृ.14)
अनुभूति
की
सर्जनात्कता
पर
विचार
करते
हुए
नामवर
जी
'अनुभूति और वास्तविकता'
निबन्ध
में
अनुभूति
की
यथार्थपरकता
और
जीवन
की
वास्तविकता
से
उसके
अन्तर
सम्बन्ध
की
विवेचना
करते
हैं।
युगीन
परिवेश
और
परिस्थिति
के
अनुकूल
जो
रचनाकार
अपने
अनुभूति
में
परिवर्तन
नहीं
करता
वह
युग
के
यथार्थ
को
व्यक्त
कर
पाने
में
सक्षम
नहीं
हो
पाता।
इस
सन्दर्भ
में
नामवर
जी
का
यह
कहना
सही
है
कि
अनुभूति
की
ईमानदारी
से
अधिक
मायने
रखती
है
वास्तविकता
की
कसौटी
पर
निर्मित
अनुभूति।
जीवन
और
परिवेश
के
क्रम
में
बदली
हुई
अनुभूतियाँ
ही
प्रामाणिक
होती
हैं।
नामवर
जी
ने
लिखा
है,
"अनुभूति
एक
रचनात्मक
क्रिया
है।
अपने
जीवन
और
परिस्थितियों
को
बदलने
के
क्रम
में
हमारी
अनुभूतियाँ
भी
बदलती
चलती
हैं-उनमें
नवीनता
आती
है।
वैज्ञानिक
आविष्कारों
के
द्वारा
प्रकृति
पर
विजय
प्राप्त
करने
के
कारण
मनुष्य
के
राग
बोध
के
अनेक
पहलू
प्रगट
हुए।
अपने
देश
की
स्वाधीनता
के
लिए
लड़ते
हुए
जिस
राष्ट्रीय
भावना
की
अनुभूति
प्रेमचन्द,
प्रसाद,
निराला
आदि
आधुनिक
साहित्यकारों
में
हुई
वह
हिन्दी
साहित्य
में
सर्वथा
नयी
थी।(वही,
पृ.53)
इसी
निबन्ध
में
नामवर
जी
अनुभूति
के
सामाजिक
आधार
का
विवेचन
करते
हुए
लिखते
हैं,
"जो
लेखक
अपने
युग
की
ज्वलन्त
समस्याओं
से
तटस्थ
रहकर
केवल
'अनुभूति' की रट
लगाया
करते
हैं
वे
अनुभूति
के
सामाजिक
आधार
का
निषेध
करते
हैं।
इसलिए
उनकी
सारी
सदिच्छा
सपना
बनकर
ही
रह
जाती
है।
अनुभूति
वास्तविकता
नहीं
बल्कि
वास्तविकता
सम्बन्धी
भावना
है।
इसीलिए
वह
वास्तविकता
का
एक
अंश
अथवा
पहलू
है।
अनुभूति
वास्तविकता
की
जगह
नहीं
ले
सकती;
उसकी
सार्थकता
इसी
बात
में
है
कि
वह
वास्तविकता
को
रचनात्मक
रूप
दे
सके।"(वही,
पृ.53-54)
नामवर
जी
मार्क्सवादी
आलोचना
और
चिन्तन
पद्धति
को
भारतीय
नज़रिए
से
देखते-परखते
हैं।
भारतीय
काव्यशास्त्र
की
ज़मीन
पर
वह
आधुनिक
मार्क्सवादी
चिन्तन
के
सहारे
अपने
आलोचकीय
प्रतिमान
बनाते
हैं।
समय
और
सामाजिक
परिस्थितियों
को
महत्व
देने
वाली
उनकी
आलोचकीय
दृष्टि
से
वह
'समाज, साहित्य और
लेखक
का
व्यक्तित्व'
तीनों
के
अन्तःसम्बन्ध
की
बात
करते
हैं।
इस
विवेचना
में
वह
लेखक
की
'प्रतिभा' जिसको भारतीय
काव्यशास्त्र
में
'शक्ति' की संज्ञा
दी
गयी
है,
उसकी
समाजशास्त्रीय
व्याख्या
करते
हैं।
उनके
अनुसार
किसी
भी
लेखक
की
'प्रतिभा' परिस्थिति और
परम्परा
से
संवाद
करते
हुए
निखरती
है
और
सृजन
के
नये
आयाम
रचती
है।
लेखक
का
व्यक्तित्व,
समाज
और
साहित्य
की
पारस्परिकता
ही
उत्कृष्ट
साहित्य
का
आधार
है।
नामवर
जी
के
शब्दों
में,
"साहित्य
के
रूप
मे
समाज
की
जो
छाया
प्रगट
होती
है
वह
लेखक
के
व्यक्तित्व
के
ही
माध्यम
से
आती
है।
साहित्य
के
निर्माण
में
इस
बीच
की
कड़ी-लेखक
के
व्यक्तित्व
का
बहुत
महत्व
है
और
यह
महत्व
इस
बात
में
है
कि
एक
ओर
इसका
सम्बन्ध
समाज
से
है
तो
दूसरी
ओर
साहित्य
से।
साहित्य
की
रचना
प्रक्रिया
में
समाज,
लेखक
और
साहित्य
परस्पर
एक-दूसरे
को
इस
तरह
प्रभावित
करते
हैं
कि
इनमें
से
प्रत्येक
क्रमशः
परिवर्तित
और
विकसित
होता
रहता
है-समाज
से
लेखक,
लेखक
से
साहित्य
और
साहित्य
से
पुनः
समाज।"
(पृ.37-
38) इसी
क्रम
में
वह
'प्रतिभा' की प्रगतिशील
और
समाज
सापेक्ष
व्याख्या
करते
हुए
लिखते
हैं,
"हर
लेखक
की
प्रतिभा
एक
निश्चित
परिस्थिति
और
परम्परा
की
उपज
होती
है।"(पृ.
40)
नामवर
जी
'इतिहास और आलोचना'
पुस्तक
के
आरम्भ
से
अन्त
तक
लेखक
और
समाज
के
अंतरसंबंध
की
गहन
पड़ताल
करते
हैं।
समाज
के
प्रति
लेखक
की
प्रतिबद्धता
पर
सवाल
करते
हैं।
किसी
भी
लेखक
में
बौद्धिकता
के
साथ
कर्मशीलता
का
होना
उतना
ही
आवश्यक
है।
व्यापक
जन
समुदाय
के
प्रति
आस्था
और
कर्म
में
प्रवृत्त
होकर
ही
एक
लेखक
मानवीय
स्वाधीनता
और
इतिहास
का
निर्माण
कर
सकता
है।
खुद
एक
आवयविक
बुद्धिजीवी
और
आलोचक
की
तरह
वह
जीवन
भर
समाज
से
जुड़े
रहे
सो
उनके
चिन्तन
में
सामाजिक
बदलाव
की
चिन्ता
सर्वोपरि
है।
'आस्था का प्रश्न'
शीर्षक
लेख
में
नामवर
जी
की
इस
चिन्ता
को
बखूबी
महसूस
किया
जा
सकता
है।
नामवर
जी
के
शब्दों
में,
"जीवन
में
अस्थिरता
और
विचारों
में
अनास्था
दोनों
समानान्तर
स्थितियाँ
हैं
और
इनमें
कार्य-कारण
सम्बन्ध
है।
बुद्धिजीवी
की
अनास्था
उसकी
ढुलमुल
सामाजिक
स्थिति
का
परिणाम
है।.......जब
तक
बुद्धिजीवी
की
सामाजिक
स्थिति
नहीं
बदलती
अथवा
कम
से
कम
सामाजिक
स्थिति
बदलने
की
भावना
उसमें
नहीं
पैदा
होती
तब
तक
कोरे
अलचिन्त
से
अनास्था
को
मिटाना
असम्भव
है।
जिन
सामाजिक
स्थितियों
ने
उसमें
अनास्था
पैदा
की
है
उन्हीं
में
से
आस्था
खोजनी
है।"(पृ.72)
लोक
जीवन
प्रगतिशील
कविता
का
प्राण
है।
प्रगतिशील
कवि
निराला,
भवानी
प्रसाद
मिश्र,
केदारनाथ
अग्रवाल,
नागार्जुन
और
त्रिलोचन
के
तले
नामवर
जी
प्रगतिशील
कविता
में
लोकजीवन
की
पड़ताल
करते
हैं।
नामवर
जी
का
मत
है
कि
लोकजीवन
की
चेतना
लोक
में
रमने
के
बाद
ही
आती
है।
लोक
की
कविता
भर
लिख
देने
से
उसमें
लोक
का
स्पन्दन
नहीं
आता।
लोक
के
प्रति
आस्था
और
लोक
में
रमने
के
कारण
प्रगतिशील
कवियों
के
काव्य
में
लोक
चेतना
का
जीवन्त
रूप
मौजूद
है
जबकि
लोक
के
प्रति
काव्य-सृजन
करते
हुए
भी
कई
कवियों
के
काव्य
में
आत्मीयता
नहीं
पैदा
होती।
कर्म
और
सृजन
के
ऐक्य
का
अभाव
होने
से
लोकजीवन
और
लोकभाषा
का
रूपायन
सम्भव
नहीं
हो
पाता।
यह
तभी
सम्भव
है
जब
कवि
लोक
जीवन
में
रचा-बसा
हो,
रमा
हो।
'नयी कविता में
लोकभाषा'
लेख
में
नामवर
जी
इसी
संवेदना
का
विवेचन
करते
हुए
लिखते
हैं,
"सामाजिक
कारणों
से
हममें
से
अनेक
रचनाकार
चाहते
हुए
भी
लोक-जीवन
के
साथ
तादात्म्य
की
गहरी
अनुभूति
नहीं
कर
पाते।
इसीलिए
हमारी
कविताओं
में
लोकभाषा
के
शब्दों
को
अपनाने
की
महत्वाकांक्षा
तो
व्यक्त
होती
है
परन्तु
उन्हें
खपाने
की
सफलता
बहुत
कम
पाई
जाती
है।
कारण
स्पष्ट
है
अनुभूति
आकांक्षा
से
नहीं
आती,
आकांक्षा
के
कार्यान्विति
होने
की
ठोस
प्रगति
से
आती
है।
जो
ऐक्य
जीवन
में
नहीं
आ
सका
है,
वह
अनुभूति
में
नहीं
आ
सकता
है
और
जो
अनुभूति
में
नहीं
आ
सकता
वह
अभिव्यक्ति
में
भी
नहीं
आ
सकता।
आकांक्षा
की
विवक्षा
प्रायः
वायवीय
होती
है।"(पृ.88)
नामवर
जी
की
पुस्तक
'इतिहास और आलोचना'
में
दर्ज
लेखों/निबन्धों
में
से
जिन
लेखों
कोबार-बार
पढ़ा
गया,
परखा
गया
और
आज
भी
इतिहास
पुनर्लेखन
और
आलोचना-विमर्श
पर
बात
करते
हुए
प्रायः
इनका
उल्लेख
किया
जाता
है;
ये
लेख
हैं
-' इतिहास का नया
दृष्टिकोण',
'हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
पर
पुनर्विचार'
और
'इतिहास और आलोचना'।
इन
लेखों
में
नामवर
जी
इतिहास
और
आलोचना
के
अंतरसंबंध
के
आलोक
में
साहित्येतिहास
पुनर्लेखन
और
इतिहास
के
नये
दृष्टिकोण
की
विवेचना
करते
हैं।
आलोचना
और
इतिहास
एक
दूसरे
के
पूरक
हैं।
बिना
ऐतिहासिक
अन्तर्दृष्टि
के
आलोचना
का
विवेक
पैदा
नहीं
होता
और
आलोचकीय
चेतना
से
हीन
इतिहास-लेखन
सिर्फ
इतिवृत्त
संग्रह
मात्र
ही
होगा।
इतिहास
और
आलोचना
का
सन्तुलन
न
होने
से
हिन्दी
आलोचना
और
इतिहास
लेखन
में
दृष्टि
विहीन
लेखन
के
कई
उदाहरण
देखे
जा
सकते
हैं।
नामवर
जी
के
मत
से
इतिहास
और
आलोचना
का
यह
सन्तुलन
सहज
नही
है
इसके
लिए
अध्ययन
की
निरन्तरता,
समसामयिकता
का
बोध
और
साहित्य
की
गहरी
समझ
की
आवश्यकता
है।
इसी
प्रक्रिया
से
गुजरकर
एक
इतिहासकार
आलोचक
और
आलोचक
इतिहासकार
की
भूमिका
तय
होती
है।
रही
बात
साहित्येतिहास
लेखन
की
तो
उसके
लिए
इतिहासकार
का
समर्थ
समीक्षक
होना
अति
आवश्यक
है।
इसी
कसौटी
पर
आचार्य
शुक्ल
का
इतिहास-ग्रन्थ
कालजयी
है।
नामवर
सिंह,
'हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
पर
पुनर्विचार'
निबन्ध
में
'इतिहास और आलोचना'
के
सम्बन्ध
की
जरूरत
को
ध्यान
में
रखते
हुए
लिखते
हैं,
"हिन्दी
साहित्य
का
पहला
व्यवस्थित
इतिहास
लिखने
वाले
पं.
रामचन्द्र
शुक्ल
अपने
युग
के
सबसे
जागरूक
आलोचक
भी
थे
बल्कि
वह
मूलतः
आलोचक
ही
थे
उनके
'इतिहास' का स्थायित्व
उनके
आलोचनात्मक
मूल्यांकन
के
कारण
है।"(पृ.155)
समसामायिक
बोध
को
इतिहास
की
मुख्य
चिन्ता
मानते
हैं
नामवर
जी।
समसामयिकता
का
बोध
किसी
भी
इतिहासकार
और
आलोचक
की
कसौटी
है।
समसामयिकता
में
शामिल
होने
के
क्रम
में
इतिहासकार
स्वयं
भी
इतिहास
बनाने
में
योगदान
देता
है।
अपने
युगीन
विचार
और
समस्याओं
से
दो-चार
होना
सिर्फ
साहित्य
की
समझ
नहीं
पैदा
करता
अपितु
इतिहास
को
समकालीन
सन्दर्भों
में
समझना
भी
होता
है।
इतिहास
और
परम्परा
को
विवेचित
करने
की
कसौटी
भी
समकालीनता
में
ही
विन्यस्त
होती
है।
नामवर
जी
लिखते
हैं,
"इतिहास
लिखने
का
कार्य
वही
कर
सकता
है
जो
स्वयं
इतिहास
बनाने
में
योग
देता
है
अथवा
दिलचस्पी
रखता
है।....
साहित्य
के
इतिहास
की
मुख्य
समस्या
है
समसामयिक
साहित्य
की
समस्या।
अन्य
युगों
की
सारी
समस्याएँ
सहायक
हैं,
अथवा
गौण।
इस
प्रकार
जो
समसामयिक
समस्याओं
से
जूझ
रहे
हैं
वे
इतिहास
न
लिखते
हुए
भी
वस्तुतः
इतिहास
बनाने
में
योग
दे
रहे
हैं।
समसामयिक
साहित्य
के
सन्दर्भ
में
उठी
हुई
सारी
समस्यायें
इतिहास
की
समस्याएँ
हैं।"(पृ.155)
नामवर
जी
साहित्येतिहास
पुनर्लेखन
की
बात
करते
हुए
'इतिहास का नया
दृष्टिकोण'
निबन्ध
में
जो
बातें
लिख
रहे
थे
वह
आज
भी
इतिहास
लेखन
के
लिए
प्रासंगिक
है।
नामवर
जी
हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
लेखन
और
अध्ययन
के
लिए
द्वन्द्वात्मक
प्रणाली
के
प्रयोग
को
उपर्युक्त
मानते
हैं
तो
यह
तार्किक
भी
है।
द्वन्द्वात्मक
प्रणाली
की
चार
विशेषताएँ
बतायी
हैं
नामवर
जी
ने।
पहली
है
"किसी
वस्तु,
व्यक्ति,
घटना
या
विचार
को
अन्य
वस्तुओं,
व्यक्तियों,
घटनाओं
और
विचारों
के
अविभाज्य
प्रसंग
में
देखना।"(पृष्ठ
140) दूसरी विशेषता है,
"वस्तुओं,
व्यक्तियों,
घटनाओं
और
विचारों
को
गतिशील,
परिवर्तनशील
और
क्रमबद्ध
रूप
से
देखना।"(पृ.141)
द्वन्द्वात्मक
प्रणाली
की
तीसरी
विशेषता,
"विकास
क्रम
को
ऊध्र्वोन्मुख
और
अग्रसर
रूप
में
देखना।"(पृ.141)
और
चौथी
विशेषता
का
उल्लेख
करते
हुए
नामवर
जी
ने
लिखा
है,
"वस्तुओं,
व्यक्तियों,
घटनाओं
और
विचारों
में
असंगति
अथवा
अन्तर्विरोध
को
पहचानना।"(पृ.142)....
साहित्य
का
इतिहास
इकहरा
या
एकरेखीय
नहीं
होता
इसलिए
इतिहास
लेखन
की
द्वन्द्वात्मक
प्रणाली
अथवा
ऐतिहासिक
भौतिकवादी
दृष्टिकोण
से
इतिहास
को
देखने
और
परखने
की
नामवर
जी
की
इतिहास-दृष्टि
उपयोगी
है।
हिन्दी
साहित्य
का
इतिहास
हिन्दी
जनता
के
आशा-आकांक्षा
और
संघर्ष
का
इतिहास
है।
इतिहासकार
का
यह
दायित्व
है
कि
वह
इस
संघर्ष
चेतना
की
पहचान
को
और
इतिहास
की
निरन्तरता
में
उसका
मूल्यांकन
करे,
"जिस
प्रकार
सामाजिक
इतिहास
में
विविध
सत्ताधारी
वर्गों
का
उत्थान-पतन
होता
गया
लेकिन
आधारभूत
जनता
कभी
खुले
रूप
में
और
कुछ
चुपचाप
अपने
अधिकारों
के
लिए
लड़ती
चली
आ
रही
है
उसी
तरह
हिन्दी
साहित्य
की
मूलधारा
हिन्दी
जनता
के
सतत
संघर्ष
की
कहानी
है।
भावी
इतिहास
के
निर्माता
को
साहित्यिक
इतिहास
के
इस
जीवन
नैरन्तर्य
पर
काफी
जोर
देने
की
जरूरत
है;
साथ
ही
यह
भी
बताने
की
जरूरत
है
कि
यह
अनन्त
और
निरुद्देश्य
नहीं
है।"(पृ.149)
कहना
न
होगा
कि
नामवर
जी
हिन्दी
जनता
के
इस
संघर्ष
की
कहानी
को
अपनी
तेजस्वी
वाणी
और
धारदार
प्रतिबद्ध
लेखन
से
उजागार
करते
हैं।
'इतिहास और आलोचना'
में
नामवर
जी
जिन
चुनौतियों
की
बात
करते
हैं
वह
आज
भी
कमोबेश
हमारे
सामने
मौजूद
हैं।
पूँजीवाद,
नव-उपनिवेशवाद
और
सांस्कृतिक
साम्राज्यवाद
के
इस
दौर
में
सबसे
अधिक
खतरा
हमारे
इतिहास-लेखन
ओर
आलोचकीय
विवेक
पर
ही
है।
नामवर
जी
का
यह
कहना
कि
'आइडियोलॉजी का
जवाब
आइडियोलॉजी
ही
हो
सकती
है।'
एकदम
सही
है।
इतिहास
और
आलोचना
का
कर्म
सिर्फ
साहित्यिक
नहीं
बल्कि
व्यापक
सामाजिक-सांस्कृतिक
अभियान
का
हिस्सा
है।
नामवर
जी
के
वैचारिक
संघर्ष
और
लेखन
से
यह
सीख
मिलती
हैं
कि
प्रगतिशीलता
और
ईमानदारी
से
भरे
परिवर्तनकामी
विचारों
के
लिए
बिना
वाद-विवाद
किये
संवाद
का
रास्ता
नहीं
बनेगा।

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