- मार्तण्ड सिंह
एक
विराट
लक्ष्य
जब
जीवन
से
अभिन्न
रूप
से
जुड़
जाता
है
तो
विचार,
आचरण,
व्यवहार,
कर्म,
वाणी
और
दैनंदिन
के
सहज
कार्य
व्यवहार
में
उसका
प्रकटीकरण
होने
लगता
है।
तब
व्यक्ति
नहीं
व्यक्तित्व
प्रधान
हो
जाता
है
तब
व्यक्ति
निष्ठा
तत्वनिष्ठा
की
वाहक
हो
जाती
है,
तब
व्यक्ति
हाड़-मांस
का
स्थूल
पुतला
नहीं
जनमानस
का
प्रेरणापुंज
बन
जाता
है,
उसकी
स्मृति
का
एक-एक
अंश
लोक
मंगल
की
चेतना
बन
जाता
है।
नामवर
जी
सही
अर्थो
में
पूर्ण
काम
थे।
उन्होंने
समूचे
हिन्दी
समाज
को
अपना
परिवार
माना
था
और
अचेत
होने
से
ठीक
पहले
तक
उसी
विस्तृत
परिवार
के
कल्याण
हेतु
सक्रिय
और
प्रतिबद्ध
रहे,
इसीलिए
हिन्दी
आलोचना
में
नामवर
सिंह
का
अपना
एक
खास
स्थान
है।
उन्होंने
हिन्दी
आलोचना
में
प्रतिक्रियावादी
रुझानों
के
खिलाफ
निरन्तर
संघर्ष
किया
है,
मार्क्सवादी
आलोचना
के
सामने
जो
चुनौतियॉं
रही
है
उनका
साहस
से
सामना
करते
रहे
हैं।
‘दूसरी
परम्परा
की
खोज’
में
नामवर
सिंह
का
एक
वाक्य
है-‘‘मनुष्य
की
पहचान
संघर्ष
भूमि
में
होती
है,
पूजा
की
वेदी
पर
नहीं।
विरोधों
से
वह
ज्यादा
जाना
जाता
है।’’
सचमुच
यह
बात
उन
पर
भी
लागू
होती
है।
रचना
और
आलोचना
की
गति
वर्तमान
से
अतीत
और
वर्तमान
से
भविष्य
तक
की
दूरी
तथ्यों
कल्पनाओं
और
अनुमान
के
सहारे
तय
करती
रहती
है।
यह
सिलसिला
अपने
आप
ही
सही
परम्परा
की
पहचान
करता
हुआ
और
उसमें
नये
के
सहीपन
को
जोड़ता
चलता
है।
प्रो.
नामवर
सिंह
स्वीकार
करते
है
कि
‘‘मनुष्य
अपने
पूर्व
भ्रमों
से
क्रमशः
मुक्त
होता
हुआ
आगे
बढ़
रहा
है।
मनुष्य
का
इतिहास
भ्रमों
का
इतिहास
नहीं
बल्कि
भ्रमों
के
विरुद्ध
वास्तविकता
के
विजय
का
इतिहास
है।’’
परम्परा
अपने
प्रगतिशील
तत्वों
के
कारण
ही
प्रासंगिक
बनती
है।
परम्परा
और
प्रगतिशील
की
युगवत
पहचान
नामवर
सिंह
के
आलोचक
व्यक्तित्व
का
महत्वपूर्ण
गुण
है।
आज
उनका
नाम
हिन्दी
आलोचना
के
इतिहास
में
एक
नाम
नहीं,
अपितु
हिन्दी
आलोचना
का
निर्माण
और
समृद्ध
करने
वालों
में
से
एक
है।
उनकी
दृष्टि
केवल
ऐतिहासिक
तथ्यों
की
ओर
ही
नहीं,
ऐतिहासिक
सृजन
की
ओर
भी
रही
है।
यदि
प्रगतिशील
आलोचना
को
जातीय
और
हिन्दी
पाठकों
की
दृष्टि
में
विश्वसनीय
बनाने
का
कार्य
डॉ.
रामविलास
शर्मा
ने
किया
है,
तो
उसे
सक्रिय
आन्दोलन
के
रूप
में
जीवित
रखने
और
हिन्दी
के
भावी
बुद्धिजीवी
युवकों
में
तत्सम्बन्धी
रुचि
जाग्रत
करने
का
कार्य
नामवर
सिंह
ने
किया
है।
आलोचक
साहित्य
की
नयी
पाठ
विधि
का
आविष्कार
करता
है।
नामवर
जी
ने
छायावादी
कविता,
हिन्दी
कहानी
और
अंशतः
अपभ्रंश
कविता
का
नया
पाठ
प्रस्तुत
किया।
आचार्य
रामचन्द्र
शुक्ल
और
डॉ.
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
ने
मध्यकालीन
भक्तिकाव्य
का
नया
पाठ
प्रस्तुत
किया
था।
डॉ.
विश्वनाथ
त्रिपाठी
के
हवाले
से
कहे
तो-
‘‘डॉ.
रामविलास
शर्मा
ने
निराला,
भारतेन्दु
और
प्रेमचन्द
साहित्य
की
और
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
समकालीन
रचनाकारों-निर्मल
वर्मा,
धूमिल,
विनोद
कुमार
शुक्ल
के
साहित्य
की
पहचान
कराई।
डॉ.
नामवर
सिंह
अपने
समय
की
रचनाओं
की
पहचान
करने
में
विश्वसनीय
रहे।
कालान्तर
में
उन्होंने
मुक्तिबोध
की
प्रसिद्ध
कविता
‘‘अंधेरे
में’’
को
केन्द्र
में
रखकर
‘कविता
के
नये
प्रतिमान’
लिखी।
वे
वामपंथी
बने
रहे,
लेकिन
उन्होंने
वामपंथी
चिन्तन
पर
अस्तित्ववाद,
अस्मिताओं,
दलित,
लिंग....
जैसी
समस्याओं
और
वैचारिकता
के
दबाव
को
स्वीकार
किया।
वे
नये
और
आधुनिक
को
हमेशा
समझते
और
समझाते
रहे।
उनका
आलोचक
समावेशी
रहा,
अपवर्जी
या
व्यतिरेकी
नहीं।’’1
हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग,
छायावाद,
आधुनिक
साहित्य
की
प्रवृत्तियां,
कविता
के
नये
प्रतिमान,
दूसरी
परम्परा
की
खोज,
कहानीः
नयी
कहानी,
वाद
विवाद
संवाद,
नामवर
सिंह
की
महत्वपूर्ण
पुस्तके
हैं।
उन्होंने
जितना
लिखकर
हिन्दी
साहित्य
और
समाज
को
दिया,
उससे
कहीं
अधिक
बोलकर
दिया।
सभा,
संगोष्ठियों
की
जान
थे
और
ऐसा
धारा-प्रवाह
बोलते
थे
कि
साहित्यानुरागी
उन्हें
सुनने
के
लिए
उत्सुक
रहते
थे।
इसीलिए
हममें
से
अधिकांश
लोग
इस
बात
से
सहमत
हैं
कि
प्रो.
नामवर
सिंह
के
यश,
कीर्ति
और
वैभव
में
बहुत
बड़ा
हाथ
उनकी
वक्तृत्व
कला
का
है।
उनके
बोलने
का
अपना
ढंग
है।
वे
भाषण
कर्ता
नहीं
हैं।
वे
वकील
की
तरह
किसी
विषय
पर
तर्क
प्रस्तुत
करते
हैं।
वे
श्रोता
को
तर्क
से
विश्वस्त
करते
हैं।
आचार्य
विश्वनाथ
त्रिपाठी
के
शब्दों
में
कहें
तो-
‘‘वे
प्रधानतः
वाद-विवाद-संवाद
के
वक्ता
हैं।
बच्चन
रचनावली
लोकार्पण
के
अवसर
पर
भरी
सभा
में
श्रोताओं
ने
देखा
कि
श्रीमती
इन्दिरा
गांधी
उनके
भाषण
से
प्रभावित
हैं।
किसी
सभा
या
गोष्ठी
में
उनकों
हूट
होते
हुए
किसी
ने
कभी
नहीं
देखा।’’
हिन्दी
के
नव्यतम
रचनाओं
के
आलोचक
नामवर
सिंह
ने
अपना
आलोचक
जीवन
‘हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
से
प्रारंभ
किया
था।
इसके
अलावा
उन्होंने
अपने
गुरु
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
जी
के
साथ
संक्षिप्त
पृथ्वीराज
रासों
का
सम्पादन
किया
है।
तेस्तोतेरी
के
प्रसिद्ध
भाषा
शास्त्रीय
ग्रंथ
‘प्राचीन
राजस्थानी
का
हिन्दी
में
अनुवाद
किया
है।
ब्रेख्त
और
लीविस
के
प्रशंसक-नामवर
सिंह
ने
अपना
शोध-प्रबन्ध’
पृथ्वीराजरासों
की
भाषा
पर
लिखा
है।
प्रथम
आलोचना
ग्रंथ
‘हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
में
नामवर
सिंह
ने
द्वितीय
खण्ड
अपभ्रंश
साहित्य
नामक
अध्याय
में
अपभ्रंश
की
कतिपय
महत्वपूर्ण
रचनाओं
का
परिचय
देते
हुए
उनके
सौन्दर्य-पक्षों
का
उद्घाटन
किया
है।
अपभ्रंश
के
महाकवि
स्वयंभू
की
सीता
अत्यन्त
तेजस्विनी
है।
वे
अग्नि
परीक्षा
के
समय
राम
से
कहती
हैं-
‘‘गुणवान
पुरुष
भी
हीन
होते
है,
मरती
हुई
स्त्री
पर
भी
विश्वास
नहीं
करते।’’2 इस प्रसंग पर
टिप्पणी
करते
हुए
प्रो.
नामवर
सिहं
कहते
है-
‘‘ऐसी
महिमामयी
नारी
को
कर्मफल
विश्वासी
जैन
कवि
नीचे
उतारकर
रख
देता
है...कवि
को
क्या
पता
कि
उसकी
दृष्टि
अग्नि
प्रवेश
से
पहले
जितनी
ही
तेजोमयी
थी,
उससे
निकलने
के
बाद
उतनी
ही
म्लान
भस्मावृत
चिन्गारी
मात्र
रह
गई।’’2
‘पृथ्वीराजरासो’
पुस्तक
में
गोरी
के
कैद
में
पड़े
पृथ्वीराज
की
मनोदशा
का
विश्लेषण
करते
हुए
नामवर
सिंह
ने
करुण
स्थिति
की
जो
व्याख्या
की
है
वह
उनकी
संवदेनशीलता
और
मर्मग्राहिता
का
प्रमाण
है।
इन
दो
पुस्तकों
पर
टिप्पणी
करते
हुए
आलोचक
डॉ.
विश्वनाथ
त्रिपाठी
कहते
हैं-
‘‘ये
पुस्तकें
आलोचनात्मक
नहीं
हैं।
फिर
भी
हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
की
एक
नवीन
दृष्टि,
मार्क्सवादी
दृष्टि
देखने
समझने
की
शुरुआत
यहां
से
हो
जाती
है।’’3
सर्वविदित
तथ्य
यह
है
कि
साहित्य
का
हर
युग
नये
आलोचक
पैदा
करता
है
और
हर
आलोचक
किसी
खासयुग
से
जुड़ा
रहता
है
नामवर
सिंह
मुख्यतः
छायावादोत्तर
हिन्दी
कविता
के
प्रगतिवादी
आलोचक
हैं।
इसी
दौर
में
उन्होंने
ऐतिहासिक,
सामाजिक
संदर्भ
में
छायावाद
की
व्याख्या
को
आवश्यक
समझा
तो
दूसरी
ओर
कविता
को
नया
रूप
देते
हुए
नई
कविता
के
प्रतिमान
गढ़ने
का
दावा
करने
वाली
कृतियों
और
दावों
का
भी
मूल्यांकन
किया।
हिन्दी
आलोचना
में
जब
छायावाद
के
खिलाफ
घृणा
का
प्रचार
करके
अपनी
प्रगतिशील
विरासत
से
वंचित
करने
का
प्रयास
किया
जा
रहा
था,
तब
नामवर
सिंह
ने
‘छायावाद’
(1955) नामक पुस्तक लिखकर
छायावाद
को
देखने
की
सर्वथा
नयी
दृष्टि
देकर
छायावादी
प्रवृत्तियों
को
पहली
बार
नये
ढंग
से
परिभाषित
करते
हुए
उसके
मुक्ति
परक
चरित्र
का
खुलासा
करते
हैं,
जो
ब्रिटिश
औपनिवेशिक
शासन
के
विरुद्ध
स्वतंत्रता
आन्दोलन
के
अनुरूप
था।
नामवर
सिंह
ने
इस
पुस्तक
के
बारे
में
स्वयं
लिखा
है-‘‘यह
निबन्ध
छायावाद
की
काव्यगत
विशेषताओं
को
स्पष्ट
करते
हुए
छायाचित्रों
में
निहित
सामाजिक
सत्य
का
उद्घाटन
करने
के
लिए
लिखा
गया
है।4 इस पुस्तक में
कुल
12 अध्याय
है।
विभिन्न
अध्यायों
के
विवेच्य
विषयों
को
सूचित
करने
के
लिए
जो
शीर्षक
दिये
गये
हैं
उनमें
से
अधिकांश
छायावादी
कवियों
के
पंक्तियों
के
टुकड़े
हैं।
शीर्षकों
से
ही
स्पष्ट
है
कि
सिद्धान्तों
को
यान्त्रिक
ढंग
से
छायावाद
पर
थोपा
नहीं
गया
है।
‘प्रथत
रश्मि’-में
ही
छायावाद
की
परिभाषा
देने
का
प्रयास
न
करके
एक
विशिष्ट
काव्यधारा
के
लिए
प्रयुक्त
नाम
के
इतिहास
की
खोज
की
गयी
है।
नामवर
सिंह
के
शब्दों
में
‘‘छायावाद
उस
राष्ट्रीय
जागरण
की
काव्यात्मक
अभिव्यक्ति
है
जो
एक
ओर
पुरानी
रुढ़ियों
से
मुक्ति
चाहता
था
और
दूसरी
ओर
विदेशी
पराधानता
से।’’5
केवल
मैं
केवल
मैं-छायावादी
कविता
का
मूलस्वर
आत्मीय
है।
कवि
यहां
अपने
व्यक्तित्व
को
प्रकट
करना
चाहता
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
कहते
है
कि
‘‘कवि
ने
समाज
से
यह
छूट
पहली
बार
ली...कविता
में
जहां
देवताओं
का
प्रेम
वर्णन
होता
था,
वह
स्थान
साधारण
मनुष्य
ने
लेली-यह
जनतांत्रिक
भाव
की
विजय
है-मध्य
वर्ग
की
पहली
सामाजिक
स्वाधीनता
है।
नामवर
सिहं
की
छायावाद
सम्बन्धी
दृष्टि
पर
विचार
करते
हुए
मुझे
ऐसा
लगता
है
कि
छायावाद
का
स्थायित्व-आत्मीयता,
प्रकृति-प्रेम,
सौन्दर्य-भावना,
उच्चतर
जीवन
की
आकांक्षा
और
इन
सबके
लिए
अनवरत
संघर्ष
करने
की
प्रेरणा
में
है।
‘नई
कविता’
और
‘नई
कहानी’
की
तर्ज
पर
यदि
आलोचना
के
साथ
भी
यह
विशेषण
जोड़ा
जाय
तो
नामवर
सिंह
बुनियादी
रूप
से
‘नयी
आलोचना’
के
आलोचक
हैं।
नई
कविता
जिस
तरह
विकसित
भावबोध
की
प्रतिज्ञा
से
जुड़ी
है,
उसी
तरह
नई
आलोचना
भी।
छायावाद
के
बाद
हिन्दी
कविता
में
यथार्थवाद
का
विकास
आरंभ
होता
है।
अब
कविता
भाव
परक
होने
की
जगह
रूप
परक
अर्थात्
आत्मपरक
होने
की
जगह
वस्तुपरक
होने
लगती
है।
छायावादी
कविता
और
नई
कविता
में
मूल
अंतर
इसी
बात
को
लेकर
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
कविता
के
नये
प्रतिमान
में
लिखते
है-
‘‘छायावादी
काव्य-रचना
प्रक्रिया
जहां
भीतर
से
बाहर
की
ओर
है
वहां
नई
कविता
की
रचना
प्रक्रिया
बाहर
से
भीतर
की
ओर
है।
एक
में
रूप
में
भाव
का
आरोपण
है
तो
दूसरी
में
रूप
का
भाव
में
रूपान्तरण
है।’’6
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
हिन्दी
में
यथार्थवादी
कविता
में
विकास
को
गौर
से
देखा
है
और
एक
उत्तरदायी
मार्क्सवादी
आलोचक
की
तरह
उसमें
उभरने
वालों
नये
प्रतिमानों
को
चिन्हित
किया
है।
प्रो.
नामवर
सिंह
ने
‘कविता
के
नये
प्रतिमान
में
लिखा
है-
‘‘नये
प्रतिमान
उन्होंन
गढ्ढे
नहीं
है,
बल्कि
नई
कविता
के
माध्यम
से
जो
जाने
जाते
हुए
थे
उन्हें
केवल
पहचानने
का
प्रयास
किया
है।
ऐसा
भी
नहीं
है
कि
ये
सभी
प्रतिमान
नितान्त
नवीन
है
और
नई
कविता
में
पहली
बार
प्रयुक्त
हुए
है।
इस
सम्बन्ध
में
इतना
ही
ज्ञातव्य
है
कि
ये
प्रतिमान
हिन्दी
कविता
में
पहली
बार
प्रकट
हुए
है।7
हिन्दी
में
जब
‘नई
कहानी’
का
दौर
आया
तो
उसके
सबसे
विश्वसनीय
आलोचक
नामवर
सिंह
ही
हुए।
उन्होंने
निर्मल
वर्मा
की
कहानी
‘परिन्दे’
को
नई
कहानी
की
पहली
कहानी
मानते
हुए,
उसकी
जो
व्याख्या
की,
इतने
वर्ष
बाद
भी
उसकी
तार्किकता
और
तरलता
नये
से
नये
अध्येता
को
न
सिर्फ
आकर्षित
करती
है
बल्कि
बहुत
कुछ
सिखाती
भी
है।
उन्होंने
‘कहानी
नयी
कहानी’
में
संकलित
विष्णु
प्रभाकर
की
कहानी
पर
केन्द्रित
अपने
आलेख
को
अतिवादी
दृष्टि
कोण
का
परिणाम
बताया
था।
इसी
प्रकार
अज्ञेय
के
प्रति
भी
उनका
दृष्टिकोण
बदला
था।
बाद
के
दिनों
में
उन्होंने
अज्ञेय
को
निराला
के
बाद
हिन्दी
का
सबसे
बड़ा
कवि
माना
था।
प्रो.
नामवर
सिंह
का
हिन्दी
आलोचना
को
सबसे
बड़ा
अवदान
उनकी
आलोचना
की
भाषा
है।
उन्होंने
हिन्दी
आलोचना
को
एक
सार्थक
और
समर्थ
भाषा
दी
है।
डॉ.
अरविन्द
त्रिपाठी
ने
नामवर
सिंह
की
भाषा
के
बारे
में
लिखा
है-
‘‘नामवर
सिंह
इस
लिहाज
से
हिन्दी
के
पहले
ऐसे
मार्क्सवादी
आलोचक
है
जिन्होंने
अपनी
आलोचना
की
भाषा
में
भारतीय
लोक
जीवन
के
लोकानुभव
की
भाषा
का
अद्भुत
इस्तेमाल
किया
है।8
कविता, कहानी
और
आलोचना
आधुनिक
हिन्दी
साहित्य
की
तीनों
महत्वपूर्ण
विधाओं
को
नामवर
सिंह
ने
अपनी
समीक्षा
का
आधार
बनाया
है।
यह
बात
दावे
के
साथ
कही
जा
सकती
है
कि
उनकी
आलोचना
के
आतंक
को
उभारने
में
उनकी
पारदर्शी
तथा
दो
टूक
भाषा
का
सबसे
बड़ा
श्रेय
रहा
है।
सन्दर्भ
:
5. छायावाद-पृ. सं. 17
8. दस्तावेज, जुलाई-सितम्बर 1991, अंक-52 पृ. 3

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