साक्षात्कार : दलित कविता मूल्यों पर टिकी हुई है, नफरत पर नहीं / सुभाष चन्द्र से योगेश शर्मा की बातचीत

दलित कविता मूल्यों पर टिकी हुई है, नफरत पर नहीं
- सुभाष चन्द्र से योगेश शर्मा की बातचीत

 
योगेश: नमस्ते सर।
प्रो. सुभाष चन्द्र: नमस्ते भाई।

साक्षात्कार में आपका स्वागत है सर।
आपका भी थैंक्यू।

आप हिंदी के दलित साहित्य आंदोलन में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का क्या योगदान देखते हैं?
ओके। देखिए, जहां तक सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की बात है, उन्होंने एक मूवमेंट शुरू किया था। समाज के हाशिए पर जो लोग थे, उनके लिए उनकी शब्दावली 'शूद्र और अति शूद्र' थी, जिसे आप दलित कह रहे हैं। उन्होंने शूद्र और अति शूद्र शब्दों का प्रयोग किया था। जब उन्होंने अपने अनुभव से यह महसूस किया कि इन लोगों के पास मूलभूत जीवन जीने के लिए भी साधन, संसाधन या सम्मान नहीं है; जिन्हें मनुष्य से भी गया-गुजरा माना जाता है, उनके जीवन में कैसे सुधार आएगा, कैसे उसका आधार बनेगा? तब उन्हें समझ में आया कि यदि वे विद्या—यानी ज्ञान, नॉलेज, पढ़ाई या शिक्षा—ग्रहण करते हैं, तो उससे वे (शूद्र और अति शूद्र) अपनी परिस्थितियां समझ सकते हैं। अज्ञानता की जो काई इतने सालों से उनके दिमाग पर जमी हुई है, जिससे उन्हें वंचित रखा गया है और जिसे उन्होंने भी सिर्फ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए, एक पशु समान जीवन मानकर स्वीकार कर लिया है... यदि इसे दूर कर देते हैं, तो परिस्थितियां बदल सकती हैं। यह बात उन्हें समझ में आई।इसके लिए उन्होंने बहुत सारे उपाय किए। संरचनाएँ बनाईं, जैसे स्कूल खोले और बहुत सी चीजें कीं। उसी में एक बात यह भी थी कि उनके लिए कुछ साहित्य का निर्माण किया जाए। यदि कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी है, तो उसके साथ-साथ बौद्धिक या सॉफ्ट चीजों का निर्माण भी जरूरी है। यह जागरूकता की सबसे पहली सीढ़ी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध दिमाग के साथ है। यह जागरूकता पैदा करने के लिए युवा ज्योतिबा फुले ने सबसे पहले 'तृतीय रत्न' के नाम से एक नाटक लिखा, जो उनकी पहली रचना है। 'तृतीय रत्न' का मतलब ही 'थर्ड आई' है... और तीसरी आंख विवेक, विजडम और तार्किकता की होती है। यदि इसके आधार पर चीजें देखेंगे, तो परिवर्तन होगा। यह बहुत ही शानदार नाटक है जो दिखाता है कि कैसे एक साधारण मनुष्य के दिमाग में पराभौतिक शक्तियों के नाम पर सुरक्षा, असुरक्षा और उसकी आने वाली पीढ़ियों का डर पैदा किया जाता है... और फिर उसी के नाम पर उसके संसाधनों को किस तरह से लूटा जाता है।यहां से ज्योतिबा फुले की शुरुआत होती है। लगभग उसी समय युवा सावित्रीबाई फुले का भी 'काव्य फुले' के नाम से एक कविता संग्रह छपा। इसमें कई तरह की कविताएं हैं। कुछ प्रकृति से संबंधित हैं, तो कुछ हमारे इतिहास और इतिहास बोध की दृष्टि से संबंधित हैं। इसके अलावा जनजीवन, लोगों की समस्याएँ और वे जिन चीजों में फंसे हुए हैं, उनसे संबंधित कविताएं भी इसमें शामिल हैं।

साहित्य का यह जो सारा काम है और हमें किस तरह का साहित्य चाहिए, इस पर उन्होंने अपने विचार भी दिए। जिसे आप दलित साहित्य में योगदान कह रहे हैं, इस रूप में देखें तो आप फुले को पहला दलित लेखक मान सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले नाटक लिखा। सावित्रीबाई फुले की कविताएं 1853-54 में ही छप चुकी थीं। इससे आप समझ सकते हैं कि वे बिल्कुल एक पुरानी, आद्य कवयित्री की तरह हैं।इससे पहले महिलाओं का जो भी लेखन मिलता है, वह काफी बाद का है। जैसे ताराबाई शिंदे का 'स्त्री-पुरुष तुलना' काफी लेट आया। रमाबाई और आनंदीबाई का लेखन भी काफी बाद का है। एक महिला के तौर पर सावित्रीबाई फुले का साहित्य सबसे पहले नजर आता है। यह सिर्फ पहला ही नहीं है, बल्कि उसमें जो मूल्य, सरोकार और दृष्टि है, उससे यह स्पष्ट होता है कि दलित दृष्टि से परंपरा का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा और उसे कैसे समझा जाएगा।दलित यानी शूद्रों और अति शूद्रों के जीवन की दृष्टि से इतिहास को कैसे देखा जाए, यह भी उनकी कविताओं में है। उनकी नजर से उस समय उनके जीवन का जो सबसे बड़ा द्वंद्व था, वह भी इन कविताओं में मौजूद है और इसके भीतर एक सौंदर्य दृष्टि भी है।

यदि हम थोड़ा आगे की बात करें, जब इनका यह मूवमेंट थोड़ी और मैच्योरिटी की तरफ बढ़ता है... तो महाराष्ट्र में 'सार्वजनिक सभा' नाम से लेखकों की एक सभा बनी थी। इसमें उस समय के बड़े-बड़े लेखक शामिल थे। वे दलित नहीं थे, लेकिन उन्हें प्रोग्रेसिव कहा जा सकता है। उस समय के समाज सुधारकों में मुख्य रूप से एम.जी. रानाडे यानी महादेव गोविंद रानाडे शामिल थे। वे आर्य समाजी थे और चीजों को उसी नजर से देखते थे। आप उन्हें थोड़ा लिबरल बोल सकते हैं हालांकि यदि उनका जीवन देखें, तो उन्हें बहुत बड़ा समाज सुधारक भी नहीं कहा जा सकता। चूंकि पूना एक तरह का बौद्धिक केंद्र था, इसलिए लेखकों की इस सभा के तीसरे वार्षिक सम्मेलन में उन्होंने ज्योतिबा फुले को आमंत्रित किया। ज्योतिबा फुले ने उन्हें एक पत्र लिखकर बताया कि वे इसमें क्यों नहीं आएंगे और इस सभा का हिस्सा क्यों नहीं बनना चाहते। इस पत्र में उन्होंने जो कुछ लिखा है, उसे आप एक तरह से दलित साहित्य का मेनिफेस्टो भी कह सकते हैं कि हमें किस तरह का साहित्य चाहिए और साहित्यकारों का चरित्र कैसा होना चाहिए।साहित्य के अंदर कौन सी चीजें शामिल होंगी, जिनमें मानवीय मूल्य और सरोकार हों, और जो इतिहास में हुई हमारी गलतियों पर उंगली रख सकें... इसमें ऐसी कई बातें हैं। यह एक छोटा सा पत्र है, लेकिन इसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु निकलकर आते हैं।

इसके बाद उनका लेखन लगातार जारी रहा। ज्योतिबा फुले ने शिवाजी पर एक 'पवाड़ा' (यानी गाथा) लिखी। शिवाजी महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नायक हैं और माना जाता है कि वे शूद्रों के नायक है। उनका शासन बहुत शानदार था और उन्होंने अपने समाज में बहुत सारे काम किए। पेशवा शासन में जो बुराइयां आ गई थीं, उन्हें दूर करने के लिए शिवाजी के शासन की जो स्मृतियां और असली विरासत थी, उसे उद्घाटित करने के लिए फुले ने सबसे पहले शिवाजी की समाधि खोजी। वहां बहुत झाड़-झंखाड़ थे, जिसे उन्होंने खुद साफ किया और फिर उस पर एक पवाड़ा लिखा। जैसे अपने यहां गोगा पीर आदि की लोक गाथाएं होती हैं, वैसे ही। यह पवाड़ा सिर्फ शिवाजी का इतिहास नहीं है, बल्कि इसमें दिखाया गया है कि वे किस तरह का नायक चाहते हैं; एक ऐसा नायक जो कल्याणकारी राज्य का निर्माण करे। इसमें बताया गया है कि राजा का यह दायित्व बनता है कि वह अपने समाज के अंदर भेदभाव ना करे और सारी जनता व प्रजा को एक ही नजर से देखे। दलित दृष्टि की समता, स्वतंत्रता, बंधुता, गरिमा, न्याय, सत्य... जो एक तरह से दलित वैचारिकी का आधार हैं, इनकी शुरुआत फुले से ही हो जाती है। यह सब उनके साहित्य में बिखरा हुआ है। उनकी कोई भी रचना उठा लें, चाहे 'गुलामगिरी' हो या 'किसान का कोड़ा'। बाद में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा फुले की जो जीवनी लिखी, उसमें भी ये सारी बातें मौजूद हैं।इस रूप में हम कह सकते हैं कि सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का जीवन, उनके कार्य, सरोकार और साहित्य में मौजूद मूल्य व्यवस्था के आधार पर हम उन्हें दलित साहित्य या दलित कविता के आदि-पुरुष के रूप में देख सकते हैं।

सर, हम देखते हैं कि सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का समय जो 19वीं सदी का लगभग उत्तरार्ध है, उसमें हम उन्हें काम करता हुआ पाते हैं। आपकी नजर में ऐसा क्या है, जो मध्यकालीन संत साहित्य (जिसमें दलित साहित्य की जड़ें मौजूद हैं) और आधुनिक दलित साहित्य (यानी वर्तमान दलित कविता, कहानियां आदि) के बीच एक सेतु का काम कर रहा है?
देखिए, यदि हम सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का लेखन देखें, तो उसमें संत आते हैं। उस समाज के अंदर उनकी सूक्तियां या पंक्तियां लोक-जीवन का हिस्सा बनी हुई थीं। हर जगह उनका प्रभाव एक नैतिक मानदंड और नैतिक बोध के तौर पर काम कर रहा था कि क्या सही है और क्या गलत। यह उनकी कविताओं में भी मौजूद है। जैसे उनकी पोएट्री में संत तुकाराम या तुकडो जी महाराज का जिक्र आता है। चोखा मेला का भी जिक्र आता है... क्योंकि महाराष्ट्र में भी संत साहित्य का बहुत बड़ा प्रभाव था और वारकरी संप्रदाय की यात्राएं चलती थीं। (हालांकि बाद में ज्योतिबा फुले ने खुद भी 'सार्वजनिक सत्य धर्म' चलाया था, इसलिए उनका इसमें कोई विश्वास नहीं था) लेकिन जो यात्राएं निकलती थीं और उनमें जो लोग शामिल होते थे, वे किसान ही थे। लोगों को जानने-समझने के लिए ज्योतिबा फुले जगह-जगह पर उनके साथ यात्राएं करते थे। ऐसी चीजें भी मौजूद हैं।और जहां तक कबीरपंथियों की बात है... वे एक जगह लिखते भी हैं कि एक कबीरपंथी संत उनके पास आए। चूंकि ज्योतिबा फुले बहुत ही रैशनल समाज सुधारक थे और इन संत परंपराओं में भी धीरे-धीरे कई रूढ़ियां आ गई थीं, इसलिए जब ज्योतिबा फुले ने संत के किसी प्रश्न का उत्तर दिया, तो वह उन्हें मंजूर नहीं था। यानी फुले उस परंपरा को भी रैशनल दृष्टि से क्रिटिकली देख रहे थे।लेकिन यह भी सच है कि अपनी जड़ों के साथ उनका एक गहरा संबंध है, क्योंकि उनकी पोएट्री में सीधे संतों के नाम लेकर चीजें आती हैं। संत साहित्य के जो मूल्य हैं—जैसे सच्चाई पर खड़े रहना—वह सबसे बड़ी चीज है। क्योंकि जैसे ही आप सच्चाई पर खड़े रहते हैं, बहुत सारे पाखंड, भ्रम जाल और अन्य चीजें अपने आप दूर होने लगती हैं।

यदि आपके पास सच्चाई जांचने का एक ही टेस्ट पॉइंट है—कि जो अनुभव हो रहा है, चीजों को उसी नजर से देखना है—तो बहुत सी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं। परंपरा का बोझ या रूढ़ियों का जीवन में बेवजह निर्वहन करते चले जाना कि 'किसी बड़े आदमी ने कहा है' या 'सत्ता ऐसा चाह रही है'... आप अपने अनुभव से ही समझ सकते हैं कि क्या सही है, क्या करने योग्य है और क्या नहीं इसलिए उनका मध्यकालीन विवेक बोध के साथ एक निरंतर संबंध है। संतों की जो वाणियां लोक में स्थापित हो गई हैं, उनके माध्यम से वे लोक विवेक का प्रयोग करते हैं। इसके साथ जो पाखंड, माइथोलॉजी और चमत्कार जुड़े हैं, उनकी वे आलोचना करते हैं। उनकी पूरी 'गुलामगिरी' किताब में यही सब है।इतना ही नहीं, मध्यकालीन संतों ने हमारे पुराने धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों की जिस तरह से व्याख्याएं की हैं, उसकी भी उन्होंने बहुत आलोचना की है। उनकी पूरी किताब में अध्याय बनाकर बकायदा यह दिखाया गया है इसलिए, उन्होंने अपनी परंपरा के साथ गहराई से जुड़ाव रखा, लेकिन उस ट्रेडिशन के साथ नहीं जो रूढ़ियों से भरा था; बल्कि उस वैल्यू सिस्टम के साथ, जो मानवता के पक्ष में है। उसे उन्होंने मजबूती से पकड़ कर रखा।

जी। लेकिन सर, हम देखते हैं कि संत कवियों का जाति-पाँति का विरोध करने का जो तरीका है, वह एक किस्म से आध्यात्मिकतावादी और नैतिकतावादी है। वे अपने पूरे साहित्य या वैचारिकी में उसी रास्ते को अपनाते हैं, जैसे ‘हरि का भजे सो हरि का होए’। लेकिन इसके विपरीत, आधुनिक दलित साहित्य सीधे तौर पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की बात करती है। इस वैचारिक यात्रा को आप कैसे देखते हैं?
देखिए, मनुष्य सिर्फ एक ही तरह से तरक्की नहीं करता, बल्कि चीजों को देखने और पलटने में भी तरक्की करता है। मध्यकाल तक दुनिया कैसे बनी है, किसने बनाई है, इसमें मनुष्य का क्या रोल है, प्रकृति कैसे बदलती है, विज्ञान ने कितनी तरक्की की है कि मनुष्य कार्य-कारण संबंधों और उसके परिणामों को देखने में सक्षम हुआ है। यह सब होने के बावजूद, अंततः उसके पास पराभौतिक चीजों—जैसे बारिश कैसे होती है, आंधी-भूचाल क्यों आते हैं, इन सबके पीछे कौन है—इन सवालों के कोई विश्वसनीय उत्तर नहीं थे इसलिए मध्यकालीन संत मानवीय अधिकारों और बराबरी को उसी आध्यात्मिक विचार में मांगते हैं। बराबरी रियल लाइफ का सवाल है, लेकिन उसकी फॉर्म आध्यात्म के साथ आ रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि वे इसे सिर्फ चिंतन में मांग रहे हैं। उनके दिमाग में बराबरी की यह बात जनजीवन से ही आई है और उनके तर्क भी वैसे ही हैं। कबीर कहते हैं कि 'जे तू बामन बामनी जाया, आन बाट से क्यों नहीं आया'। यह एक सच्चाई है कि मनुष्य के पैदा होने का एक ही रास्ता है। यदि कोई ब्राह्मण श्रेष्ठ है, तो उसके आने का कोई और रास्ता होना चाहिए था; जब सबका रास्ता एक ही है, तो यह भेदभाव क्यों है? इसी तरह गुरु रविदास या कबीर कहते हैं कि... सबमें एक जैसा ही खून है। हम कत सूद तुम कत बामन, हम कत लोहू तुम कत दूध'। कि हमारी नाड़ियों में भी खून बह रहा है, तो तुम्हारी नाड़ियों में दूध क्यों नहीं है? यह सब रियल लाइफ के ही उदाहरण हैं।वे ये सारी चीजें यहीं इसी दुनिया में मांग रहे हैं। अध्यात्म का जो घटाटोप रचा गया है, वह भी रियल लाइफ पर ही आधारित है। रियल लाइफ के ऊपर ही अध्यात्म टिका हुआ है। जैसे-जैसे रियल लाइफ बदलती है, अध्यात्म भी अपने आप को बदलता रहता है, क्योंकि वह रियल लाइफ से ही सारे उदाहरण लेता है। सामाजिक जीवन की सच्चाई बदलने के साथ वैचारिक प्रक्रिया भी बदलने लगती है।

मध्यकालीन पोएट्री, चिंतकों या दार्शनिकों के सोचने के सवाल दुनियावी हैं, ईश्वर प्राप्ति के लिए नहीं। 'हरि का भजे सो हरि का होई', यह समाज में मौजूद असमानता को दूर करने के लिए ईश्वर या आध्यात्मिक दुनिया का एक तर्क के तौर पर प्रयोग करना है। वे मानवता की मूलभूत समस्याओं पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। बाद में जब इनकी व्याख्याएं हुईं और सच्चाई बदलने के बावजूद पुराने विचार बने रहे, तब जाकर इन पर रहस्यवाद जैसी चीजें चिपका दी गईं।आधुनिक काल का बोध और देखने का तरीका मध्यकाल से आगे बढ़ चुका है। अब हम ईश्वर रचित दुनिया या धर्म के दायरे में नहीं हैं। इसलिए राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की जो बात दलित पोएट्री में आती है, वह बराबरी, समानता और सम्मान का अधिकार है कि हम भी उतने ही मनुष्य हैं जितने दूसरे, और हमें भी संसाधनों का प्रयोग करने का हक होना चाहिए। ये दोनों एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं, बल्कि उसी दिशा में विकसित हुआ एक अगला कदम है; क्योंकि मूल्य व्यवस्था की जड़ें वहीं टिकी हुई हैं। मेरे ख्याल से इसे इस रूप में देखना चाहिए।

सर, मध्यकाल में संत रविदास हुए, जिन्होंने 'बेगमपुरा' की कल्पना की थी, जिसके बारे में आप निरंतर बातचीत करते हैं। वर्तमान दलित साहित्य का समतामूलक समाज का जो स्वप्न है, आप उस परिकल्पना को इसके कितना नजदीक पाते हैं?
देखिए, गुरु रविदास या मध्यकाल के जितने भी संत हैं, उनके पदों में एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना है जहाँ कोई ऊँच-नीच या अमीर-गरीब न हो। कोई हायरार्की न हो, और कम से कम सबको जीने का अधिकार हो। मनुष्य के लिए एक ऐसा आदर्श समाज, जहां दुख विहीन जीवन जिया जा सके। व्यवस्थाएं दुख को कम भी कर सकती हैं और बढ़ा भी सकती हैं। संत रविदास में यह सोच मौजूद है। आपने और क्या पूछा था?

सवाल यह था सर कि 'बेगमपुरा' की परिकल्पना और वर्तमान दलित साहित्य के समतामूलक समाज के स्वप्न में कितनी समानता है?
हां, यह इसी रूप में प्रासंगिक है कि बेगमपुरा में एक ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है जिसमें सब मनुष्यों को न्याय मिले, सबके पास जीने के लिए संसाधन हों, सत्ता की ताकत से किसी को दबाया न जाए, और सबको अपनी प्रतिभा के अभ्यास का अवसर मिले। यही सच्ची दलित कविता या साहित्य का सार है। यदि दलित पोएट्री में सामाजिक, लैंगिक, नस्लीय या धार्मिक स्तर पर बराबरी का मूल्य नहीं है, तो वह दलित वैचारिकी की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। परंपरा हमारे सामने मूल्यों की शक्ल में ही आती है। गुरु रविदास ने जो सोचा था, उसे ज्यों का त्यों धारण करने की बात नहीं है, क्योंकि समाज में बहुत सी चीजें बदल चुकी हैं। यदि कोई दलित कविता मध्यकाल के इन संतों के साथ अपना रिश्ता नहीं बनाती, तो उसके लिए अपनी परंपरा ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। आज दलित कविता में जो सपना समाया है, हजारों साल पहले उसकी परिकल्पना करने वाले यही संत थे। इसलिए दलित कविता को इन मूल्यों के साथ गहराई से जुड़े रहने की जरूरत है।

सर, आपने पारंपरिक मूल्यों से जुड़े रहने की बात की। एक सवाल उभरता है कि क्या वर्तमान समय में कोई सवर्ण या गैर-दलित व्यक्ति जातिवाद के विरुद्ध कविता रच सकता है? यदि वह रचता है, तो उसकी कविता और एक दलित व्यक्ति की कविता में आप क्या फर्क देखते हैं?
देखिए, संवेदनशीलता कहीं भी हो सकती है। इसके लिए किसी विशेष जाति में पैदा होना मायने नहीं रखता। फर्क इस बात का पड़ता है कि क्या आपने उस जीवन को झेला और जिया है। यदि केवल अपमान झेलने से महान कवि बनते, तो पूरा दलित समाज कवि बन जाता, लेकिन डॉक्टर अंबेडकर, ज्योतिबा फुले या सावित्रीबाई फुले जैसे लोग गिने-चुने ही हुए। टकराहट मूल्यों और संवेदनशीलता की होती है। यदि कोई सवर्ण व्यक्ति दलित मोहल्ले में पले-बढ़े, तो क्या वह नहीं लिख पाएगा? बिल्कुल लिख पाएगा। मनुष्य के पास 'परानुभूति' (एम्पैथी) का वरदान होता है, जिससे वह दूसरे की तकलीफ महसूस कर सकता है। जैसे यदि कोई खुद मां नहीं है, तो क्या उसमें वात्सल्य नहीं होगा?

एक विद्वान हुए हैं- कार्ल मार्क्स उनका 'डीक्लास' का कांसेप्ट है, जिसके अनुसार एक उच्च वर्ग में पैदा हुआ व्यक्ति निम्न वर्ग की तकलीफों को समझ सकता है और उन्हें दूर करने में हिस्सेदारी भी ले सकता है। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण हैं। यदि पीड़ितों के बीच से ही कोई साहित्य लिखता है, तो उसके अनुभव की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।ज्योतिबा फुले अछूत माने जाने वाले बच्चों की नाक साफ करते थे, उन्हें नहलाते थे, जबकि उनका अपना कोई बच्चा नहीं था। संवेदनशीलता जन्म से नहीं, सामाजिकता से आती है। जो लेखक डाकुओं, जेबकतरों या वेश्याओं पर लिखता है, उसका खुद वैसा होना जरूरी नहीं है।यदि दलित समाज में पैदा होने के बावजूद किसी में समता की नजर नहीं है, तो वह भी दलित पोएट्री नहीं लिख पाएगा। केवल अनुभव होना काफी नहीं है; अनुभव एक कच्ची सामग्री है जिसे साहित्य में ढालने के लिए रचनात्मक टूल और संवेदनशीलता की जरूरत होती है।

सर, कई बार हम देखते हैं कि दलित आंदोलन किसी विशेष समुदाय के विरुद्ध चला जाता है। क्या दलित कविता किसी जाति विशेष के विरुद्ध लिखी जा रही है या जाति के विचार के विरुद्ध? और क्या यह नफरत के हथियार में तब्दील हो सकती है? जाति व्यवस्था और जाति विशेष के विरुद्ध लड़ाई में आप क्या बुनियादी फर्क देखते हैं?
यदि आप किसी जाति विशेष के खिलाफ लिख रहे हैं, तो आपके अंदर संकीर्णता है। जाति एक व्यवस्था है और सब इसके शिकार हैं। जो इस व्यवस्था में ऊंचे पद पर बैठा है, उसने इसे नहीं बनाया, उसे तो बस स्वतः ही कुछ विशेषाधिकार मिल गए हैं। किसी जाति विशेष के खिलाफ लिखना दलित कविता की श्रेणी में नहीं आता। दलित कविता मूल्यों पर टिकी हुई है, नफरत पर नहीं। नफरत से साहित्य में कोई ताकत नहीं आती। साहित्य हमेशा सहयोग और मानवीय लक्ष्यों के साथ ही टिकता है। जाति व्यवस्था के कारण जो लोग बिना कारण सजा भुगत रहे हैं, उनका एहसास करवाना और समाज को संवेदनशील करना पोएट्री का काम है। ऊंची जाति वालों को गालियां देना दलित पोएट्री का काम नहीं है। जाति व्यवस्था की वजह से जो मानवीयता खत्म हो रही है, उसका एहसास कराना ही असली मकसद है।

डॉक्टर अंबेडकर या ज्योतिबा फुले के साहित्य में कहीं नफरत नहीं है। फुले का ब्राह्मणों से विरोध था, लेकिन उनका गोद लिया हुआ बेटा एक ब्राह्मणी का ही था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता अंबेडकर ब्राह्मण थीं और उनकी शादी सफल रही, जिसका आधार प्रेम था। अंबेडकर पूछते हैं कि "भारतीय ब्राह्मणों में से कोई वाल्टेयर क्यों नहीं पैदा हुआ?" उनका मतलब यह था कि यह विशेषाधिकार वाली व्यवस्था आपको कभी बुद्धिजीवी नहीं बनने देगी, क्योंकि इसमें स्वार्थ वृत्ति शामिल है। जब तक आप इसे त्यागेंगे नहीं, अपनी मानवीयता को प्राप्त नहीं कर सकते।कोई भी दलित साहित्यकार किसी जाति विशेष के खिलाफ जहर उगलकर कुछ हासिल नहीं कर पाएगा। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि नफरत से नफरत ही बढ़ती है, इसे खत्म करने के लिए प्रेम की जरूरत है। आग को आग से नहीं, पानी से बुझाया जा सकता है। दलित पोएट्री का मकसद नफरत फैलाना नहीं, बल्कि प्रेम बढ़ाना और इस प्रदूषित व्यवस्था को पहचानकर दूर करना है।

सर, पूरे दलित आंदोलन और साहित्य में आप 'साहित्यिक वर्चस्ववाद' को कैसे देखते हैं?
मैं समझा नहीं, कैसे?

क्या हिंदी साहित्य में किसी किस्म का वर्चस्ववाद काम करता है?
देखिए, यदि वर्चस्ववाद से आपका मतलब ऐसे मूल्यों से है जो समाज में एक वर्ग का वर्चस्व बनाए रखने के लिए निर्मित किए जाते हैं...

 जी, जी।
साहित्य कोई अलग दुनिया की चीज नहीं है, यह सामाजिक संरचना में ही लिखा जाता है। साहित्य का असली काम तो वर्चस्व की श्रेणियों को तोड़ना और उन पर प्रश्नचिह्न लगाना है। यदि किसी साहित्य का उपयोग वर्चस्व स्थापित करने के लिए हो रहा है, तो वह प्रचार की श्रेणी में आएगा, उसे दलित साहित्य नहीं कहा जा सकता। दलित साहित्य ने हमेशा वर्चस्ववाद को चुनौती दी है। क्या आप सवाल को दोबारा थोड़ा समझाएंगे?

असल में सवाल यह था कि साहित्य (कविता, कहानी आदि) के कुछ मानदंड स्थापित कर दिए जाते हैं। एक विशेष क्षेत्र या भाषा के लोग उसे रचने और पढ़ने के आदी होते हैं। वहीं, एक अलग वर्ग या क्षेत्र से आने वाले लोग जो अपने जनजीवन से विषय लेते हैं, उन्हें साहित्य की दुनिया में दरकिनार कर दिया जाता है। इस संदर्भ में आपका क्या विचार है?
मुझे ऐसा नहीं लगता, यदि हम हिंदी साहित्य को ही देखें। प्रेमचंद के आने से पहले का साहित्य कुछ और ही था।

जी, जाहिर है।
प्रेमचंद की जगह बनी। उनके बाद जो आए, उनकी भी जगह बनी। हिंदी में दलित साहित्य और महिला साहित्य आया, और वे पूरी तरह से स्थापित हुए। जो साहित्य संरचनाओं और संकीर्णताओं को तोड़कर नई दुनिया को सामने लाता है, वही सर्वाइव करता है। जो पहले से बने फॉर्मेट या टेम्पलेट में लिखा जाएगा, वह बासी हो जाएगा और समाज में अपनी जगह नहीं बना पाएगा। महान कृतियां हमेशा पुराने खांचों को तोड़कर ही सम्मान पाती हैं।लेखक का काम ही सीमाओं को पार कर जाना है। जो नया करते हैं, वे ही असली सृजनकर्ता हैं। यदि सब एक ही भाषा और मुहावरे में लिखेंगे, तो नयापन कहां से आएगा? जब कोई नया अनुभव साहित्य में आता है, तो शुरू में बेचैनी हो सकती है।उर्दू शायरी में पहले साकी, मयखाने और जुल्फों की बातें होती थीं। लेकिन जब प्रगतिशील मूवमेंट शुरू हुआ, तो बात कहने के तरीके बदल गए और वे स्वीकार भी हुए। अब यदि कोई सिर्फ मयखाने की बात करे, तो गजल उससे बहुत आगे बढ़ चुकी है।इसी तरह जब 'मैला आंचल' लिखा गया, तो वह नई भाषा और कैरेक्टर्स के साथ पुराने ढांचों को तोड़ते हुए आया था। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'पंचलाइट' जाति के प्रश्न को उठाती है कि पंचलाइट को जलाएगा कौन? जलाना उसी को आता है जिसे किसी लायक नहीं माना जाता। यह कहानी समाज को संवेदनशील बनाती है। साहित्य इसी तरह अपनी जगह बनाता है।

सर, विमर्श मूलक कविता के आंदोलन में 'आइडेंटिटी' का सवाल हमेशा आता है। एक स्त्री, एक आदिवासी और एक दलित की आइडेंटिटी के सवाल में आप क्या बुनियादी फर्क देखते हैं?
देखिए, मनुष्य की केवल एक ही आइडेंटिटी नहीं होती। भौगोलिक, धार्मिक, नस्लीय और व्यावसायिक रूप से अनेक आइडेंटिटीज होती हैं।

जी बिलकुल, सोशल लोकेशन भी होती हैं जहाँ से वो चीजों को देखता समझता है।
जी, कोई भी साहित्य केवल एक आइडेंटिटी पर नहीं टिक सकता, क्योंकि अंततः सबसे बड़ी आइडेंटिटी 'मनुष्यता' की ही है।छोटी आइडेंटिटी भी जरूरी है, क्योंकि उसी की वजह से उनका शोषण और उत्पीड़न हो रहा है। यह आइडेंटिटी व्यवस्था के कुरूप चेहरे को उद्घाटित करने का काम करती है। लेकिन यदि आप सिर्फ आइडेंटिटी के लिए ही काम कर रहे हैं और उत्पीड़न का सवाल पीछे छूट गया...तो उसका रूप कुछ और ही बन जाएगा। आइडेंटिटी का सेलिब्रेशन ठीक है, लेकिन मनुष्यता के बड़े रास्ते भी खुले रहने चाहिए। पहले साहित्य में व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंध पर बहस होती थी कि क्या व्यक्ति को समाज में पूरी तरह समाहित हो जाना चाहिए या अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखनी चाहिए।लेखक एक इंडिविजुअल भी है और किसी आइडेंटिटी से जुड़ा हुआ भी। यदि वह अपनी आइडेंटिटी के कारण हो रहे उत्पीड़न को पहचानता है और मनुष्यता की कसौटी पर रखकर लेखन करता है, तो वह बहुत पावरफुल होगा। इन सभी बाधाओं को पहचानकर मनुष्यता की नजर से लिखने पर ही बड़ा साहित्य आता है। ताराबाई शिंदे का 'स्त्री पुरुष तुलना' इसका बेहतरीन उदाहरण है। सिर्फ छोटी आइडेंटिटी पर रुकने के बजाय बेगमपुरा जैसे बड़े और समतामूलक समाज का सपना होना चाहिए।

अंत में सर, इधर हरियाणा के दलित कविता मूवमेंट को आप कैसे देखते हैं? इसके महत्वपूर्ण लोग कौन हैं और आपके क्या सुझाव हैं?
पहली बात तो यह है कि हरियाणा में कविता की कोई बहुत मजबूत परंपरा नहीं है। यहां गजलें ज्यादा लिखी जाती हैं। दलित चेतना से जो मिडिल क्लास बना है, उसमें कुछ साहित्यकार जरूर आए हैं और उन्होंने अपनी आकांक्षाओं को व्यक्त भी किया है। लेकिन कोई ऐसा बड़ा साहित्यकार, जिसने कोई नया रास्ता दिखाया हो या पूरे साहित्य जगत पर छा गया हो, कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं है।अब दलित जीवन साहित्य का विषय जरूर बनने लगा है, लेकिन इसके मुख्य मानदंड अभी स्थापित नहीं हुए हैं। पुराने लोक कवियों (जिन्होंने रागनियाँ आदि लिखीं) में कुछ बातें जरूर थीं, लेकिन वह पूरा दलित मूवमेंट नहीं था।असल में यहां दलित पोएट्री की मूल प्रेरणा सामाजिक आंदोलन कम और राजनीतिक मूवमेंट ज्यादा है। जब राजनीतिक प्रेरणा हावी होती है, तो कविता का मुख्य स्वर यही होता है कि "हमें लूट लिया गया" या "सत्ता ही हर समस्या का समाधान है।" इसमें यह बहुत कम दिखता है कि हमारे अपने समाज या घरों में महिलाओं की हालत कितनी खराब है।यदि कविता अपने ही समाज की कमियों को संबोधित नहीं करती, तो वह अधूरी है। ज्योतिबा फुले का लेखन सिर्फ ब्राह्मणों के लिए नहीं था, वह अपने समाज को बता रहे थे कि उनके साथ क्या हो रहा है। राजनीतिक प्रेरणा के कारण सामाजिक स्तर की कमियां छूट जाती हैं। हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है जो अपने समाज की कमियों पर भी उंगली रखें। अपने ही समाज से लड़ना बहुत जोखिम भरा और टेढ़ा काम है, लेकिन एक सच्चे लेखक की शुरुआत यहीं से होती है।

इस साक्षात्कार के लिए शुक्रिया सर।
थैंक्यू भाई। थैंक्यू।

सुभाष चन्द्र
पूर्व प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
सम्पादक – देसहरियाणा पत्रिका
संस्थापक सदस्य – सत्यशोधक फाउंडेशन
9416482156

योगेश शर्मा
सीनियर रिसर्च फेलो, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
9896957994

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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