- स्तुति राय
नामवर
सिंह
की
शख्सियत
किसी
भी
हिंदी
के
विद्यार्थी
के
लिए
हिंदी
आलोचना
में
प्रवेश
करने
का
प्रस्थान
बिंदु
है।
उनको
पढ़ने
का
पहला
मौक़ा
मुझे
बी.
ए.
करने
के
दौरान
मिला,
उनके
द्वारा
सम्पादित
होकर
निकलने
वाली
पत्रिका
‘आलोचना’
के
माध्यम
से।
पहली
बार
में
उनका
लेख
पढ़कर
उनके
बारे
में
जानने
की
जिज्ञासा
काफ़ी
बढ़
गयी।
उसी
समय
हिंदी
विभाग
में
‘प्रो.
सत्यप्रकाश
मिश्र
स्मृति
व्याख्यानमाला’
के
आयोजन
में
इलाहाबाद
विश्वविद्यालय
में
उनके
आने
की
ख़बरें
मिलने
लगी,
अब
- तक
उनके
विषय
में
मैं
काफ़ी
कुछ
हिंदी
की
कक्षाओं
में
सुन
चुकी
थी
और
हिंदी
साहित्य
का
इतिहास
पढ़ने
के
क्रम
में
‘आधुनिक
हिंदी
साहित्य
की
प्रवृत्तियाँ’
पुस्तक
पढ़
चुकी
थी।
बी.ए.
के
विद्यार्थी
के
लिए
उस
पुस्तक
की
सरल
भाषा
और
आधुनिक
कविता
के
विभिन्न
कालखण्डों
पर
सुचिंतित
आलोचना
ने
मुझे
बहुत
प्रभावित
किया
था।
उन्हें
अपने
सामने
प्रत्यक्ष
रूप
में
देखने
और
सुनने
की
तीव्र
इच्छा
और
लोभ
को
लिए
मैंने
अपने
विभाग
के
एक
शिक्षक
से
पूछ
ही
लिया
कि
जब
वह
विभाग
में
आयेंगे
तो
क्या
बी.ए.
के
विद्यार्थी
भी
उन्हें
सुन
पाएंगे।
लेकिन
हमें
बताया
गया
कि
जहाँ
पर
उनका
व्याख्यान
होगा
वहाँ
जगह
की
कमी
की
वजह
से
केवल
शिक्षक
और
रिसर्च
स्कॉलर
ही
उनके
व्याख्यान
में
शामिल
होंगे।
यह
सुनकर
मुझे
बड़ी
निराशा
हुई
और
मैंने
अपने
मन
में
आयोजकों
को
खूब
कोसा
और
सोचा
कि
यह
क्या
बात
हुई
कि
हम
लोग
उनके
व्याख्यान
को
सुन
भी
नहीं
पाएंगे।
व्याख्यान
के
दिन
मैंने
उन्हें
हिंदी
विभाग
से
बाहर
भारी
भीड़
के
साथ
निकलते
हुए
देखकर
संतोष
प्राप्त
किया
कि
चलो
कम
से
कम
देखा
तो,
यह
भी
सही।
परंतु
केवल
देखने
का
ही
नहीं
बल्कि
मुझे
उन्हें
सुनने
का
भी
खूब
अवसर
मिला
और
उनके
सान्निध्य
में
काम
करने
का
भी।
यह
अवसर
मुझे
जवाहरलाल
नेहरू
विश्वविद्यालय
में
एम.ए.
करने
के
दौरान
मिला।
वहाँ
के
विभागीय
व्याख्यानमालाओं
में
अक्सर
वह
मुख्य
अतिथि
के
तौर
पर
आमंत्रित
किए
जाते
थे।
ना
केवल
सी
आई
एल
के
बल्कि
दूसरे
विषय
एवं
अनुशासन
के
साहित्यप्रेमी
एवं
छात्र-छात्राएं
भी
उन्हें
सुनने
के
लिए
बहुत
उत्साहित
रहते
थे
और
उनके
आने
पर
मिलने
के
लिए
लालायित
रहते
थे।
एम.फिल.
के
दौरान
शोध
विषय
चुनने
के
लिए
अपने
शोध-निर्देशक
रामबक्ष
सर
के
सुझाव
पर
मैं
नामवर
जी
से
मिलने
उनके
आवास
पर
गई
थी।
हिंदी
जगत
की
प्रख्यात
शख्सियत
से
सामने
से
मिलने
की
मेरी
इच्छा
अब पूरी होने
वाली
थी।
उस
समय
वह
सेवा
निवृत्त
होकर
जेएनयू
के
बाहर
रहते
थे।
आवास
पर
पहुँच
कर
उन्हें
सामने
से
देखकर
भीतर
से
एक
अनजान
भय
ने
मुझे
जकड़
लिया
था।
उनके
घर
के
वातावरण
ने
उस
समय
मुझे
बहुत
प्रभावित
किया
था।
हम
जहाँ
बैठे
थे
वहाँ
हर
तरफ़
पुस्तकें
बड़े
क़रीने
से
लगी
हुई
थीं।
वहाँ
डर
और
सकुचाहट
के
बीच
मुझे
ऐसे
लग
रहा
था
जैसे
मैं
पुस्तकों
के
मंदिर
में
प्रवेश
कर
चुकी
हूँ
और
उनका
पुजारी
मुझसे
रूबरू
हो
रहा
हो।
मेरी
सकुचाहट
को
भाँपकर
उन्होंने
तुरंत
मुझसे
सामान्य
बातचीत
की
शुरुआत
कर
मेरे
डर
को
दूर
कर
दिया।
उनसे
मिलकर
उन्होंने
मेरी
रुचियाँ
पूछ
कर
उस
के
अनुरूप
ही
शोध
करने
के
लिए
मुझे
प्रेरित
किया।
उसके
बाद
मैं
लगातार
शोध
के
सिलसिले
में
कभी-न-कभी
उनसे
मिलती
रही।
इस
बीच
मैंने
उनकी
आलोचनात्मक
पुस्तकों
को
भी
ध्यान
से
पढ़ा।
रीतिकाल
पर
शोध
के
दौरान
मुझे
लगातार
यह
महसूस
होता
रहा
कि
जेएनयू
में
रीतिकाल
जैसे
सामंती
परिवेश
में
लिखे
गए
साहित्य
को
लेकर
एक
उपेक्षा
का
भाव
मौजूद
है
और
उस
युग
पर
शोध
कार्य
करना
सामंती
मूल्यों
और
विचारों
का
पिष्ट-पेषण
है।
व्याख्यानों
के
दौरान
कभी
- कभार
मैंने
उसके
ऐतिहासिक
अवदानों
पर
विद्वानों
के
बीच
थोड़ी
बहुत
चर्चा
अवश्य
सुनी
थी
मगर
केवल
टीका-टिप्पणी
के
तौर
पर।
परंतु
सर
से
इस
विषय
में
बातचीत
के
बाद
मैंने
अपना
मन
बना
लिया
था
कि
इस
युग
पर
काम
की
संभावनाएं
मौजूद
हैं।
नामवर
सिंह
ने
भी
कई
जगहों
पर
नए
सिरे
से
बात
करने
की
आवश्यकता
पर
विचार
किया
है।
खैर,
20वीं
सदी
की
शुरुआत
से
ही
साहित्येतिहास
पर
बहुत
सारी
बहसें
चल
रहीं
हैं
और
वर्तमान
में
भी
चल
रही
हैं।
पुराने
इतिहासलेखन
की
प्रासंगिकता
ने
नई
बहस
को
जन्म
दिया
है
क्योंकि
इतिहास
में
लगातार
हो
रहे
नवीन
शोधों
ने
पुराने
इतिहासों
पर
प्रश्नचिह्न
लगा
दिया
है।
तमाम
आवश्यकताओं
के
बाद
भी
इतिहासलेखन
अपने
आप
में
एक
गंभीर
चिंतन
प्रक्रिया
के
उपरांत
ही
संभव
है
अन्यथा
इसके
परिणाम
अनुकूल
नहीं
प्राप्त
होंगे।
इसके
लेखन
से
जुड़ी
समस्याओं
के
संदर्भ
में
नामवर
सिंह
की
जो
अपनी
चिंताएँ
थी
उसको
लेकर
वह
काफ़ी
सतर्क
रहते
थे
और
बातचीत
में
नए
इतिहासलेखन
के
प्रति
अपनी
आशंकाएँ
समय-समय
पर
जाहिर
करते
रहते
थे।
इतिहास
लेखन
को
कभी
भी
वह
अतितोन्मुखी
नहीं
मानते
थे।
उनका
कहना
था
कि
इतिहास
हमेशा
भविष्योन्मुखी
होना
चाहिए
और
भविष्य
की
चिंता
हमेशा
वर्तमान
से
जुड़ी
होनी
चाहिए।
उनके
आलोचनात्मक
लेखन
को
ध्यान
से
देखा
जाए
तो
वह
उनके
सम-सामयिक
युग
से
जुड़ा
हुआ
है।
चाहे
वह
‘आधुनिक
साहित्य
की
प्रवृत्तियाँ’
हों
या
‘छायावाद’
या
‘कविता
के
नए
प्रतिमान’
हों,
अपनी
हर
आलोचनात्मक
पुस्तक
में
वह
अपने
युग
के
साहित्यिक
लेखन
के
साथ
टकराते
हैं
और
इस
टकराहट
में
अपनी
मान्यताओं
या
विचारधारा
के
साथ
कभी
भी
समझौता
नहीं
करते।
उन
पर उनकी प्रसिद्ध
आलोचनात्मक
पुस्तक
‘कविता
के
नए
प्रतिमान’
में
रूपवादी
होने
के
कई
बार
आरोप
लगाए
गए
किंतु
उन्होंने
उसका
निराकरण
करते
हुए
उस
आरोप
को
बेबुनियाद
बताया
और
अपनी
मार्क्सवादी
समीक्षा
दृष्टि
को
पूर्णतः
तर्कसंगत
ठहराया।
इस
पुस्तक
के
द्वितीय
संस्करण
की
‘भूमिका’ में वह
लिखते
हैं
कि
‘‘मार्क्सवादी
साहित्य
दृष्टि
बराबर
ही
कविता
की
सापेक्ष
स्वतंत्रता
पर
बल
देती
रही
है।
हिंदी
से
और
उदाहरण
लें
तो
मुक्तिबोध
के
अलावा,
जिनका
मत
कविता
के
नए
प्रतिमान
में
उद्धृत
है,
डॉ.
रामविलास
शर्मा
के
‘आस्था
और
सौंदर्य’
में
भी
यही
मान्यता
व्यक्त
की
गई
है।
वस्तुतः
यही
वह
आधार
है
जिस
से
मार्क्सवादी
आलोचक
एक
ओर
शुद्ध
कविता
के
समर्थक
रूपवादी
आलोचकों
से
लोहा
लेते
रहे
हैं
और
दूसरी
ओर
कविता
को
समाज
का
पर्याय
मानने
वाली
स्थूल
समाजशास्त्रीय
आलोचना
से
संघर्ष
कर
रहे
हैं।’’1
उनके
इस
वक्तव्य
से
यह
स्पष्ट
हो
जाता
है
कि
अपनी
मान्यताओं
को
लेकर
वह
बराबर
सजग
और
संवेदनशील
थे।
अपने
ऊपर
हुए
हमलों
से
वह
आतंकित
होकर
ना
तो
सुरक्षात्मक
उपायों
का
उपयोग
करते
थे
और
ना
ही
आक्रामक
होते
थे।
व्याख्यानों
में
उनकी
आक्रामकता
के
कई
किस्से
हमने
जेएनयू में सुन
रखे
थे
किंतु
जब
भी
मैंने
उन्हें
सुना
उनकी
भाव-भंगिमा
में
कभी
उत्तेजना
का
कोई
अंश
नहीं
देखा
और
हमेशा
तार्किक
रूप
से
तथ्यों
को
सामने
रख
कर
उत्तर
देते
हुए
ही
पाया।
यह
उनकी
व्याख्यान
शैली
की
अपनी
विशिष्टता
थी।
मुख्य
अतिथि
रहते
हुए
वह
सभी
वक्ताओं
को
बड़े
ध्यान
से
सुनते
थे
और
अंत
में
जब
अपना
व्याख्यान
देने
आते
थे
तब
वह
इस
बात
की
शिकायत
अक्सर
करते
थे
कि
उन्हें
मुख्य
अतिथि
बनाया
ही
इसीलिए
जाता
है
कि
वह
सभा
का
समापन
करने
आयें
और
अपनी
बात
संक्षेप
में
रखें।
उसके
बावजूद
उन्हें
और
मैनेजर
पांडे
को
सुनने
के
लिए
सी.आई.एल.
का
कमेटी
रूम
नंबर
212 खचाखच
भरा
रहता
था।
अपने
इतिहास
चिंतन
के
निबंधों
में
अक्सर
उनकी
चिंता
इस
बात
की
तरफ़
होती
थी
कि
कभी
भी
केवल
‘नवीनतम
खोजों’
और
‘नवीन
व्याख्याओं’
को
ही
इतिहास
नहीं
मान
लिया
जाना
चाहिए
यह
केवल
जानकारी
या
‘इतिहास
के
नवीन
स्रोत’
हो
सकते
हैं
इतिहास
नहीं।
दरअसल
सूचना
क्रांति
के
दौर
में
नए
-नए
तथ्यों
और
सूचनाओं
की
भरमार
ने
इतिहास
को
तथ्यात्मकता
की
ओर
धकेल
दिया
है
जिससे
इतिहास
लेखन
तथ्यपरक
एवं
सूचनात्मक
अधिक
होता
जा
रहा
है
और
समुचित
इतिहासदृष्टि,
इतिहास
पद्धति,
और
वस्तुनिष्ठता
के
अभाव
में
अपना
मूल
स्वरूप
खोता
जा
रहा
है।
इस
समस्या
को
लक्षित
करते
हुए
अपने
एक
निबंध
में
नामवर
जी
कहते
हैं-
‘‘नवीन
व्याख्याओं
का
उपयोग
इतिहास
नहीं
है,
इतिहास
स्वयं
एक
नई
व्याख्या
है।
ये
स्वयं
इतिहास
को
बनाने
या
बदलने
में
असमर्थ
हैं,
इनका
उपयोग
करके
चाहे
तो
कोई
इतिहास
भले
ही
बना
दे।’’2
दरअसल वह
इस
बात
से
सर्वथा
परिचित
थे
कि
कोई
भी
आलोचक
या
इतिहासकार
नवीन
शोधों
की
जानकारियों
के
बल
पर
इतिहास
को
अपने
‘नैरेटिव’
के
हिसाब
से
बदल
सकता
है,
ऐसे
में
इतिहास
की
वस्तुनिष्ठता
और
उसकी
शुचिता
पर
सवाल
खड़े
होते
रहेंगे
जैसे
कि
पूर्ववर्ती
इतिहासलेखन
के
साथ
हो
चुका
है
और
इस
तरह
का
खतरा
वर्तमान
में
अधिक
दिखाई
दे
रहा
है।
इतिहास
का
नैरेटिव
सत्तायें
भी
अपने-अपने
हितों
के
अनुरूप
बदलकर
उसका
इस्तेमाल
करती
आई
हैं
जिसका
खामियाजा
भविष्य
की
पीढ़ियाँ
चुकाती
हैं।
19 वीं
सदी
में
भारतीय
पुनर्जागरण
के
नाम
पर
तत्कालीन
राजनीतिज्ञों
और
शासकों
ने
जिस
तरीके
से
धर्म
का
इस्तेमाल
अपने-अपने
राजनीतिक
हितों
के
लिए
किया
वह
उदाहरण
के
लिए
हमारे
सामने
हमेशा
मौजूद
रहेगा।
हिंदू
पुनरुत्थानवाद,
राष्ट्रवाद,
भाषायी
विवाद
और
सांप्रदायिकता
ने
जिस
प्रकार
आगे
चलकर
अपना
नकारात्मक
शक्ल
अख्तियार
किया
उसके
परिणामस्वरूप
देश
का
विभाजन
हम
सभी
के
सामने
विद्यमान
है।
हिंदुत्व
या
राष्ट्रवाद
को
अगर
संकुचित
नजरिये
से
स्वीकार
कर
लिया
जाए
तो
भारतीय
समाज
का
एक
बहुत
बड़ा
तबका
उस
से
प्रभावित
होगा,
और
इस
संकुचित
नजरिये
से
प्रभावित
होकर
इतिहास
लेखन
किया
जाए
तो
निश्चित
रूप
से
उसके
दुष्परिणाम
आगे
चलकर
सामने
आयेंगे।
नामवर
जी
यहीं
पर
ऐसे
इतिहास
लेखन
के
प्रति
आगाह
करते
हैं।
राष्ट्रीय
आंदोलन
के
दौरान
गांधी
और
टैगोर
की
वैचारिक
टकराहट
इसी
मुद्दे
पर
थी।
रवीन्द्रनाथ
टैगोर
ने
गांधी
और
उनके
राष्ट्रवादी
विचारों
से
अपने-आप
को
अलग
कर
लिया
था,
इसकी
वजह
से
उन्हें
भारी
विरोध
भी
झेलना
पड़ा
था।
यहाँ
तक
कि
उनपर
अंग्रेजपरस्त
होने
के
आरोप
भी
लगाए
गए।
रवींद्रनाथ
टैगोर
द्वारा
लिखित
‘भारतवर्षे
इतिहासेर
धारा’
में
उनकी
इतिहासदृष्टि
की
समीक्षा
करते
हुए
एक
निबंध
में
उन्होंने
इतिहास
के
ग़लत
नैरेटिव
के
ख़तरे
का
ज़िक्र
किया
है
जिसमें
उन्होंने
माना
है
कि
‘‘इतिहास
अन्ततः
एक
नैरेटिव
या
आख्यान
है
और
रवींद्रनाथ
की
ऐतिहासिक
कल्पना
में
भी
भारत
विषयक
आख्यान
का
अपना
एक
निश्चित
ढाँचा
था
जहाँ
कवि
ने
भारतीय
इतिहास
के
अंतर्गत
परिवर्तन
और
विकास
का
एक
नियम
खोजा
है।
यह
नियम
संक्षेप
में
आत्मरक्षण
और
आत्म-प्रसारण
का
अनवरत
चक्र
है।’’3 हालाँकि
टैगोर
की
इतिहासदृष्टि
या
उनके
नैरेटिव
में
वह
चक्र
‘छुद्र
हिंदुत्व’
या
‘विच्छिन्न’
हो
चुकी
कोई
धारा
ना
होकर
एक
विशाल
प्रवाहित
धारा
का
ही
अंग
है।
टैगोर
के
माध्यम
से
उनकी
शंका
वाजिब
है
कि
यह
नैरेटिव
या
आख्यान
अगर
सही
तथ्यों
या
सुचिंतित
धारणाओं
पर
आधारित
ना
हुआ
या
सजग
होकर
इतिहास
ना
लिखा
जाए
तो
वह
एक
किसी
समूह
या
समुदाय
का
‘नया
प्रोपेगेंडा’
या
‘वाद’
की
शक्ल
ले
लेगा।
उन्हीं
के
शब्दों
में,
‘‘इन
बातों
को
पढ़कर
एक
बार
हठात्
वाल्टर
बेन्यामिन
का
यह
कथन
याद
आता
है
कि
दुश्मन
के
हाथों
मृतक
भी
सुरक्षित
ना
रह
पाएंगे।
यहाँ
तो
भगवान
राम
ही
सुरक्षित
नहीं,
फिर
सामान्य
मृतकों
की
कौन
कहे।मौत
के
सौदागर
मृतकों
से
भी
डरते
हैं।
फिर
भी
वे
अपने
आपको
इतिहास
का
रक्षक
कहते
हैं।
ऐसे
रक्षकों
से
इतिहास
की
रक्षा
का
दायित्व,
रवीन्द्र
नाथ
के
अनुसार,
सच्चे
इतिहासकार
पर
है।’’4
टैगोर
की
इतिहासदृष्टि
की
समीक्षा
के
हवाले
से
नामवर
जी
‘भारतीय
राष्ट्रवाद
और
‘हिंदू
पुनरुत्थानवाद’ के तत्कालीन
मूल्यों
पर
भी
सवाल
उठाते
हैं
जो
आज
के
दौर
में
समीचीन
हैं।
वर्तमान
में
राष्ट्रवादियों
की
नजर
में
राष्ट्र
की
कमजोरियों
को
बतलाना
‘देशद्रोह’ माना जा
सकता
है,
या
यों
कहें
की
राष्ट्रवाद
की
आलोचना
का
साहस
अपने
आप
में
एक
असाधारण
बात
होगी
क्योंकि
‘सोशल
मीडिया’
के
जमाने
में
आप
‘ट्रोल’
हो
सकते
हैं
या
आपकी
सामाजिक
छवि
धूमिल
की
सकती
है,
लेकिन
भविष्य
में
एक
सच्चे
लेखक
या
इतिहासकार
की
निष्ठा
इसी
कसौटी
पर
कसी
जाएगी
कि
वह
सत्य
के
पक्ष
में
है
या
सत्ता
के।
टैगोर
ने
अपने
समय
में
यह
खतरा
उठाया
था।
गौरवशाली
इतिहास
का
आख्यान
कर
अपने
देशप्रेम
को
सिद्ध
करने
से
तात्कालिक
भावनाओं
को
तो
तुष्ट
किया
जा
सकता
है
किंतु
भविष्य
की
चिंताओं
को
दरकिनार
नहीं
किया
जा
सकता।
अतीत
और
वर्तमान
का
अंतर
हमेशा
बना
रहता
है
और
पुरानी
चीजों
या
मूल्यों
को
बिल्कुल
उसी
रूप
में
लौटा
पाना
संभव
नहीं
हो
पाता।किसी
भी
युग
में
पुनरुत्थानवादियों
की
यही
विडंबना
होती
है
कि
वह
चाहते
हैं
कि
स्थितियां
बिल्कुल
पहले
जैसी
हो
जायें
और
विरोध
में
उठने
वाले
स्वरों
को
या
तो
ख़त्म
कर
दिया
जाए
या
उन्हें
हाशिए
पर
रखा
जाए।
दीर्घकालिक
परिस्थितियों
में
इसका
परिणाम
हमेशा
प्रश्नों
के
घेरे
में
ही
रहता
है।
इतिहास
की
वास्तविक
मुठभेड़
उसकी
समकालीन
परिस्थितियों
में
ही
संभव
है
क्योंकि
वही
से
भविष्य
की
दिशायें
निकलती
हैं।
ऐतिहासिक
परिदृश्य
से
टकराते
हुए
नामवर
सिंह
‘समसामयिकता’
पर
विशेष
बल
देते
हैं।
उनका
मानना
था
कि
‘समसामयिक
समस्याएं
इतिहास
की
ही
समस्याएं
हैं’
इसलिए
‘वस्तुतः
इतिहास
लेखन
वही
कर
सकता
है
जो
स्वयं
इतिहास
बनाने
में
योग
देता
है
अथवा
दिलचस्पी
रखता
है
- इतिहास
अर्थात
समसामयिक
इतिहास,
क्योंकि
जो
बीत
चुका
अब
उसका
क्या
बनाया
जा
सकता
है।’
सही
इतिहास
बोध
( अतीत
का
बोध
) और
समकालीनता
( हम
इसे
‘काल
बोध’
की
भी
संज्ञा
दे
सकते
हैं)
का
आपस
में
कोई
विरोध
नहीं
होता
बल्कि
दोनों
का
तादात्म्य
बोध
यदि
सही
अनुपात
में
हो
तो
वह
कालजयी
रचनात्मक
लेखन
हो
सकता
है।
प्रसाद
की
‘कामायनी’
इसका
श्रेष्ठ
प्रमाण
है।
प्रसाद
का
सम्पूर्ण
लेखन
एक
विशिष्ट
तरह
के
इतिहासबोध
और
समकालीनता
की
उपज
है,
जहाँ
वह
अपने
ऐतिहासिक
पात्रों
के
साथ
अपनी
युगीन
समस्याओं
से
रूबरू
होते
हैं।
साहित्येतिहास
लेखन
के
लिए
नामवर
जी
इतिहासकार
को
पहले
‘जागरूक
समीक्षक’
होने
पर
ज़ोर
देते
हैं।
साहित्यिक
समीक्षक
अगर
केवल
सतही
आलोचना
करे
तो
वह
अपने
युग
की
वास्तविक
घटनाओं
की
सही
व्याख्या
नहीं
कर
सकता
और
ऐसी
आलोचना
एक
मुकम्मल
इतिहास
तो
क्या
सही
तथ्यों
का
दस्तावेज
भी
नहीं
ही
बन
पाएगी
इसलिए
उसका
कोई
मूल्य
भी
नहीं
होगा।
इस
बात
को
समझाते
हुए
नामवर
जी
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
को
एक
अच्छा
इतिहासकार
इसीलिए
बतलाते
हैं
क्योंकि
शुक्ल
जी
अपने
युग
के
श्रेष्ठ
समीक्षकों
में
से
एक
थे।
इतिहास
के
साथ
आलोचना
को
जोड़कर
उन्होंने
व्यवस्थित
साहित्यिक
इतिहास
की
नींव
रखी
थी
जो
उनसे
पहले
के
पूर्ववर्ती
इतिहासलेखन
में
नहीं
पायी
जाती।तमाम
कमियों
के
बावजूद
उनका
इतिहासलेखन
दूसरों
के
मुक़ाबले
कहीं
अधिक
प्रभावशाली
है।
इतिहासकार
द्वारा
की
गई
तथ्यों
की
गलतियों
को
नामवर
सिंह
‘युग
की
सीमाएँ’
मानते
हैं
और
यह
‘युग
सापेक्ष’
होती
है।
ऐसे
में
युग
सापेक्षता
इतिहासकार
के
लिए
सबसे
अनिवार्य
तत्व
है
जिस
से
वह
इतिहास
में
टकराता
है।
यहाँ
ध्यान
देने
योग्य
तथ्य
है
कि
इतिहास
में
जुड़
चुकी
व्याख्यायें
भी
कालांतर
में
इतिहास
का
नया
तथ्य
बन
जाती
हैं
और
अगले
इतिहासलेखन
में
उसका
उपयोग
तथ्य
के
रूप
में
ही
किया
जाना
चाहिए।
आधुनिक
समय
में
आलोचना
में
कई
नए
मानदंड
स्थापित
हो
चुके
हैं,
जिनकी
वजह
से
साहित्येतिहास
में
‘परंपरा’
के
पुनर्मूल्यांकन
की
भी
आवश्यकता
पर
बल
दिया
जा
रहा
है।
परंपरा
के
गहरे
‘जीवित
बोध’
और
उस
से
जुड़े
‘प्रासंगिकता’
के
प्रश्नों
पर
बहुत
सावधानी
से
विचार
करने
की
आवश्यकता
होती
है
अन्यथा
इतिहासलेखन
में
परंपरा
के
नाम
पर
अंधविश्वासी
या
अतीतोपजीवी
होने
का
भी
ख़तरा
बढ़
सकता
है।इतिहासलेखन
की
पद्धति
में
परंपरा
शब्द
बहुधा
‘प्रगति’
के
विरोध
में
दिखाया
जाता
है
किंतु
साहित्येतिहास
में
इसका
मूल्यांकन
एक
अनिवार्य
विषय
है
और
दोनों
का
सामंजस्य
ही
ऐतिहासिक
मूल्यांकन
को
ठोस
आधार
प्रदान
कर
सकता
है।
इसीलिए
किसी
भी
रचनाकार
ने
अपने
आप
को
परंपरा
से
विच्छिन्न
करके
प्रगतिवादी
नहीं
घोषित
किया
है।
अलबत्ता,
ऐतिहासिक
बोध
का
अंतर
परंपरा
के
मूल्यांकन
में
भिन्नता
पैदा
करता
है।
कबीर
संबंधी
मूल्यांकन
में
शुक्ल
जी
एवं
द्विवेदी
जी
के
मूल्यांकन
के
मानदंडों
में
अंतर
से
इसे
बखूबी
समझा
जा
सकता
है।
यही
अंतर
शुक्ल
जी
एवं
द्विवेदी
जी
की
आलोचनात्मक
दृष्टि
की
भिन्नता
को
स्पष्ट
करने
के
लिए
नामवर
जी
ने
‘दूसरी
परम्परा
की
खोज’
जैसी
पुस्तक
लिखकर
ना
सिर्फ़
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
को
नई
परम्परा
का
इतिहास
लेखक
सिद्ध
किया
है
बल्कि
परम्परा
को
भी
नए
मानदंडों
के
अनुरूप
ढालकर
द्विवेदी
जी
के
व्यक्तित्व
एवं
कृतित्व
का
समग्र
मूल्यांकन
कर
आलोचना
में
आने
वाली
पीढ़ी
के
आलोचकों
को
चौंकाया
भी
है।
इस
पुस्तक
का
परम्परा
बोध
बिल्कुल
नए
कलेवर
में
सामने
आया
है।
व्यक्तित्व
विश्लेषण
की
मनोवैज्ञानिक
दृष्टि,
परिस्थितियों
एवं
घटनाओं
का
बेहतरीन
संतुलन
और
साफ़-सुथरी
प्रवाहमय
भाषा
इस
पूरी
पुस्तक
को
परंपरा
की
एक
‘नई
खोज’
की
तरह
सामने
लाती
है।
द्विवेदी
जी
जैसे
साहित्यकार
एवं
इतिहासकार
की
जीवन
यात्रा
नामवर
जी
की
अपनी
गहन
अध्येता
की
दृष्टि
की
यात्रा
है
जो
ना
केवल
गुरु
को
ही
विशिष्ट
बनाती
अपितु
शिष्य
को
भी
विशिष्ट
बना
देती
है।
परम्परा
की
तरह
ही
‘काव्यभाषा’
पर
भी
नामवर
जी
ने
गंभीरता
से
विचार
किया
है।
उनके
दृष्टिकोण
में
आने
वाले
समय
में
लगातार
बदलती
हुई
काव्यभाषा
आलोचकों
के
लिए
चुनौती
का
सबब
बन
रही
है।
इसका
संबंध
वह
मध्यकाल
में
लोकभाषाओं
के
उदय
से
जोड़कर
देखते
हैं
जिसने
भारत
की
पूरी
सांस्कृतिक
धारा
को
एक
नया
मोड़
दे
दिया
था,
जो
अपने
आप
में
काफ़ी
दिलचस्प
है।
ऐसे
में
उनका
मानना
है
कि
‘भाषा
की
सजीवता’
और
‘भाषायी
जटिलताओं’
का
अध्ययन
कर
के
ही
हम
अपने
साहित्य
के
इतिहास
के
पुनर्लेखन
को
सही
आधारभूमि
दे
सकते
हैं।
संदर्भ
:
2. इतिहास की रणभूमि और साहित्य: अजय तिवारी, वाणी प्रकाशन
3. कविता के नए प्रतिमान: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन
4. कविता के सम्मुख: (नामवर सिंह) संपादक आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन
5. दूसरी परंपरा की खोज: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन
6. पाश्चात्य आलोचक और आलोचना: (नामवर सिंह) संपादक डॉ. राजकुमार उदयभान दूबे, वाणी प्रकाशन
7. वाद विवाद संवाद: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन
8. इंटरनेट सामग्री: हिंदी समय से साभार
सहायक आचार्य हिंदी, सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय, प्रयागराज

एक टिप्पणी भेजें