- रीना सिंह
‘टेंशन मत ले यार’ पुस्तक का शुरुआती कन्फेशन पढ़ते ही आमिर ख़ान की फ़िल्म थ्री इडियट्स का प्रसिद्ध संवाद ‘ऑल इज वेल’ सहज ही स्मरण हो आता है। साथ ही मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस. की वह भावुक पंक्ति—“जादू की झप्पी”—भी मन में गूंजने लगती है। जिस प्रकार इन फ़िल्मों के नायक संवादों के माध्यम से लोगों की परेशानियों, डर और तनाव को कम करने का प्रयास करते हैं, उसी तरह दिव्य प्रकाश दुबे अपनी पुस्तक में एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करते नज़र आते हैं, जो बस इतना कह दे—
“टेंशन मत ले यार, सब ठीक हो जाएगा।”
लेखक ने इस पुस्तक में स्पष्ट किया है कि उन्होंने इसे किसी को उपदेश देने या मोटिवेशनल किताब लिखने के उद्देश्य से नहीं रचा है। फिर भी यह पुस्तक जीवन की दिशा से भटके उन युवाओं को अवश्य प्रेरित करती है, जो अपने करियर को लेकर भ्रम में हैं। यह उन्हें किसी एक ठोस निर्णय तक पहुँचाने का प्रयास करती है और यह भरोसा दिलाती है कि भ्रम की स्थिति असामान्य नहीं है।
‘टेंशन मत ले यार’ हर उस युवा की कहानी है जो अपने जीवन को लेकर उलझन में है। वह युवा जो यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे आगे क्या करना है, कौन-सा करियर चुनना है। वह कुछ और बनना चाहता है, किसी और रास्ते पर चलना चाहता है, लेकिन अक्सर उसे अपने सपनों को छोड़कर माता-पिता और समाज के सपनों को पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है—इंजीनियर बनने के लिए, डॉक्टर बनने के लिए, जबकि उसका मन वहाँ होता ही नहीं।
हमारे समाज में यह समस्या बहुत गहरी और गंभीर है। कई बार यही दबाव, यही असमंजस युवाओं को इस कदर तोड़ देता है कि वे आत्महत्या जैसा कठोर कदम तक उठा लेते हैं। हर वह युवा जो यह सोचने पर मजबूर है कि वह इस दुनिया में क्यों आया है, ईश्वर ने उसे क्यों भेजा है और उसके जीवन का उद्देश्य क्या है—यह पुस्तक उसके मन के उन सभी प्रश्नों को छूती है।
दिव्य प्रकाश दुबे अपने व्यक्तिगत संघर्षों और अनुभवों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास करते हैं कि जीवन में अपने मन की आवाज़ सुनना भी उतना ही ज़रूरी है। वे यह नहीं कहते कि आप अपनी नौकरी छोड़ दें या गैर-ज़िम्मेदार फैसले लें, बल्कि उनका संदेश यह है कि जब जीवन में ऐसा समय आए, जब आपको भीतर से लगे कि यही सही है, तब बिना भय और संकोच के उस निर्णय को अपनाने का साहस रखें। यह पुस्तक युवाओं को न केवल आश्वस्त करती है, बल्कि उन्हें अपने जीवन के प्रति ईमानदार होने की प्रेरणा भी देती है।
लेखक का मानना है कि प्रायः हम वही रास्ता सही मान लेते हैं, जिस पर अधिकांश लोग चल रहे होते हैं। समाज की भीड़, दिखावे और सफलता के चमकदार उदाहरण हमें आकर्षित कर लेते हैं। लेकिन किसी भी लक्ष्य या पेशे को अपनाने से पहले उसके बाहरी रंग-रोगन को देखने के बजाय उसके भीतर छिपे दबाव, संघर्ष और वास्तविकताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है। चाहे बात यूपीएससी की तैयारी की हो या किसी अन्य क्षेत्र में जाने की—लेखक का सुझाव है कि पहले उस क्षेत्र में कार्यरत लोगों के जीवन को नज़दीक से देखा जाए। यदि संभव हो तो उनकी एक-दो दिन की दिनचर्या को समझा जाए—वे सुबह से शाम तक क्या करते हैं, किन मानसिक और शारीरिक दबावों से गुजरते हैं, और उनके जीवन की वास्तविक चुनौतियाँ क्या हैं। जब हम यह सच देख लेते हैं, तब हमारे सामने वे तमाम सपने बिखरने लगते हैं जो हमें समाज या विज्ञापनों द्वारा बेचे गए होते हैं। और यही बिखरना ज़रूरी भी है, क्योंकि उसी क्षण हम यह तय कर पाते हैं कि वह रास्ता हमारे लिए है या नहीं। तब हम न तो भीड़ के पीछे अंधाधुंध भागते हैं और न ही किसी गलत दिशा में कदम रखते हैं।
लेखक के अनुसार, इसी आत्मनिरीक्षण के बाद शायद पहली बार हम सचमुच यह समझ पाते हैं कि हमारे लिए सही क्या है और हमें अपने जीवन में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। लेखक यह भी बताते हैं कि आज वे जिस मुकाम पर हैं, वहाँ तक पहुँचने का उनका सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। आई.आई.टी. की तैयारी के लिए उन्होंने दो वर्ष समर्पित किए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने पुणे के सिम्बायोसिस महाविद्यालय से चार वर्षों की इंजीनियरिंग की। आगे चलकर उन्होंने दो वर्ष एम.बी.ए. की तैयारी में लगाए। एम.बी.ए. के बाद कई इंटरव्यू दिए, परंतु कहीं चयन नहीं हुआ। इस पूरे संघर्ष के दौरान लेखक के मन में एक गहरी बेचैनी बनी रही। उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि जिस नौकरी में उनका मन ही नहीं लगता, उसी नौकरी के लिए वे लगातार क्यों भटक रहे हैं। यही प्रश्न, यही असमंजस और यही आत्मसंघर्ष इस पुस्तक की आत्मा बन जाता है, जिससे हर वह युवा जुड़ाव महसूस करता है जो जीवन के किसी मोड़ पर ठहर गया है। अपने भीतर उठते प्रश्नों के उत्तर तलाशते हुए लेखक एक बार रुड़की में एक पुस्तक-दुकान पर पहुँचते हैं। वहीं उन्हें रजनीश ओशो की कुछ पुस्तकें मिलती हैं। इन पुस्तकों को पढ़ते हुए उन्हें एक अलग तरह का सुकून और आनंद मिलता है—इसलिए नहीं कि उन्हें तुरंत सभी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मिल जाते हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें यह एहसास होता है कि जिन सवालों से वे जूझ रहे हैं, उनमें वे अकेले नहीं हैं। दुनिया में उनके जैसे और भी लोग हैं, जो इन्हीं उलझनों में अटके हुए हैं।
लेखक के मन में उठने वाले प्रश्न अत्यंत मूलभूत और अस्तित्ववादी हैं—मैं इस धरती पर क्यों आया हूँ? क्या ईश्वर का अस्तित्व वास्तव में है? जीवन का अर्थ क्या है? क्या जीने का कोई उच्च उद्देश्य (हायर परपज़) होता है? ओशो की पुस्तकों को पढ़ते हुए उन्हें इन प्रश्नों के सीधे-सीधे उत्तर नहीं, बल्कि प्रश्नों के साथ जीने की समझ मिलती है। यही समझ उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।
इसी मानसिक अवस्था के दौरान लेखक में पुस्तकों को पढ़ने की गहरी आदत विकसित हो जाती है। वे पढ़ाई के दौरान भी किताबों से जुड़े रहते थे—कई बार तो क्लास चल रही होती और वे टेबल के नीचे छुपाकर कोई दूसरी किताब पढ़ रहे होते। साहित्य अब उनके लिए केवल पढ़ाई का विषय नहीं, बल्कि आत्मखोज का माध्यम बन जाता है।
लेखक अपनी पढ़ी हुई कुछ पुस्तकों का विशेष उल्लेख भी करते हैं, जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा—‘मुझे चाँद चाहिए’ (सुरेंद्र वर्मा), ‘शेखर : एक जीवनी’ (अज्ञेय) और ‘ययाति’ (विष्णु सखाराम खांडेकर)। इन रचनाओं ने न केवल उनकी साहित्यिक समझ को समृद्ध किया, बल्कि जीवन, मनुष्य और उसके अंतर्द्वंद्वों को देखने की दृष्टि भी दी।
इस प्रकार पुस्तकें लेखक के जीवन में केवल ज्ञान का स्रोत नहीं रहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्मसंवाद का माध्यम बन गईं।
लेखक ने हमारे समाज की शिक्षा-व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में उन्हें इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग से जुड़े विषयों में बैक लग जाती है। यह बात उन्हें भीतर तक विचलित करती है, क्योंकि जब वे आगे चलकर सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग करना चाहते थे, तो फिर इलेक्ट्रिकल/इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे विषय पढ़ने की बाध्यता क्यों थी—ऐसे विषय जिनमें वे रुचि नहीं रखते थे और जिनमें वे असफल भी हुए। यह अनुभव हमारे शिक्षा-तंत्र की उस कमी को उजागर करता है, जहाँ छात्र की रुचि और क्षमता से अधिक पाठ्यक्रम की मजबूरी हावी रहती है। वास्तव में लेखक का मन भीतर से बी.ए. करने का था, लेकिन वे इसे न तो स्वयं स्पष्ट रूप से समझ पाए और न ही अपने परिवार के सामने व्यक्त कर सके। यह चुप्पी भी हमारे समाज की ही देन है, जहाँ कला और मानविकी जैसे विषयों को अक्सर कमतर आँका जाता है।
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद लेखक के जीवन में लेखन से जुड़ा पहला ठोस अनुभव तब आता है, जब उन्हें एक स्कूल का एंथम लिखने के लिए एक हजार रुपए प्राप्त होते हैं। यह राशि भले ही छोटी हो, लेकिन लिखकर मिली यह उनकी पहली कमाई थी—और यही क्षण उनके भीतर यह विश्वास जगाता है कि शब्द भी रोज़गार और पहचान का माध्यम बन सकते हैं। यह अनुभव उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ की तरह आता है, जो उन्हें अपनी रचनात्मक क्षमता का आभास कराता है।
लेखक के जीवन में कॉलेज के दौरान मंच पर किया गया नाटक (प्ले) एक छोटा-सा लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आता है। मंच पर खड़े होकर अभिनय करना उनके भीतर छिपे आत्मविश्वास को थोड़ी देर के लिए जागृत करता है। तालियों की गूंज उन्हें यह एहसास दिलाती है कि वे भी कुछ कर सकते हैं, कि उनके भीतर भी कोई क्षमता है। लेकिन यह आत्मविश्वास स्थायी नहीं बन पाता। नाटक खत्म होते ही जीवन की वही बेचैनी, वही असमंजस फिर से उन्हें घेर लेता है। उनके भीतर एक खालीपन बना रहता है—जीवन के उद्देश्य को लेकर। वे पढ़ रहे हैं, आगे बढ़ भी रहे हैं, लेकिन यह तय नहीं कर पा रहे कि वे सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं। उन्हें हर समय ऐसा लगता है जैसे उनकी ज़िंदगी की कोई महत्वपूर्ण “ट्रेन” उनसे छूट रही हो। यह बेचैनी केवल करियर को लेकर नहीं है, बल्कि जीवन को अर्थ देने की तलाश से जुड़ी हुई है। यह भावना हमें फ़िल्म ‘जब वी मेट’ के उस दृश्य की याद दिलाती है, जिसमें करीना कपूर भागती हुई स्टेशन पर पहुँचती है, लेकिन उसकी ट्रेन छूट जाती है। ठीक उसी तरह लेखक भी जीवन के मंच पर दौड़ते दिखाई देते हैं—पूरी कोशिश करते हुए, फिर भी भीतर से आशंकित कि कहीं वे सही समय पर सही जगह नहीं पहुँच पा रहे। यह “ट्रेन छूटने” का एहसास आधुनिक युवा मन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बन जाता है, जहाँ अवसर, पहचान और उद्देश्य—सब कुछ जैसे हाथ से फिसलता हुआ प्रतीत होता है।
इस प्रकार कॉलेज का नाटक लेखक के जीवन में एक झलक भर देता है—संभावनाओं की, आत्मविश्वास की—लेकिन जीवन का वास्तविक प्रश्न अब भी अनुत्तरित ही रहता है। इसके बाद लेखक पुणे स्थित एस.आई.बी.एम. से एमबीए करने के लिए चले जाते हैं। वर्ष 2009 वह समय था जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में थी और वैश्विक बाज़ार बुरी तरह गिर चुका था। यही वह वर्ष था जब उनका प्लेसमेंट होना था, लेकिन परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं। कंपनियाँ पीछे हट रही थीं और अवसर सीमित होते जा रहे थे।
एमबीए के दौरान लेखक जिस इंटरव्यू के माहौल का चित्रण करते हैं, वह अत्यंत तनावपूर्ण और असहज प्रतीत होता है। यह स्थिति हमें ‘ट्वेल्थ फ़ेल’ उपन्यास में आईएएस इंटरव्यू के समय मनोज कुमार शर्मा की मानसिक अवस्था की याद दिलाती है। वहाँ केंद्र में उसका “हिंदी मीडियम” होना था—जो उसे बार-बार हीनभावना से भर देता है—और यहाँ केंद्र में लेखक के वे चार वर्ष थे, जो उन्हें लगने लगे थे कि इंजीनियरिंग और एमबीए की तैयारी में व्यर्थ चले गए हैं।
दोनों ही परिस्थितियों में पात्रों का संघर्ष बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है—स्वयं को साबित करने का, अपने अतीत को बोझ नहीं बनने देने का संघर्ष। इस तुलना के माध्यम से लेखक का अनुभव केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि उस पूरे युवा वर्ग का प्रतिनिधि बन जाता है जो डिग्रियों, वर्षों और मेहनत के बावजूद अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करता है।
नौकरी करते हुए लेखक पाँच दिन पूरी निष्ठा के साथ अपने कार्य में लगे रहते थे, लेकिन सप्ताहांत के दो दिन वे पूरी तन्मयता और समर्पण के साथ लेखन को देते थे। लिखते समय उनके मन में यह विचार कभी नहीं आया कि उनका लिखा प्रसिद्ध होगा या नहीं। वे जानते थे कि जिस नौकरी में वे हैं, उसे अचानक छोड़कर केवल लेखन के भरोसे जीवन चलाने का निर्णय अत्यंत जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी, बल्कि जीवन में संतुलन बनाए रखने का रास्ता चुना।
हालाँकि, वे नौकरी में ‘बेस्ट परफॉर्मर’ बनने की होड़ में भी शामिल नहीं हुए। उन्होंने जानबूझकर ‘मिड एक्सपेक्टेशन’ या ‘थर्ड रैंकिंग’ में रहना स्वीकार किया, ताकि उनकी रचनात्मक ऊर्जा पूरी तरह खत्म न हो और लेखन के लिए भीतर की आग बची रहे। यह एक सचेत निर्णय था—सुरक्षा और सपनों के बीच संतुलन साधने का।
अच्छी किताब क्या होती है, इसका बोध उन्हें अपने शिक्षक प्रतोष बनर्जी से मिला। उन्होंने लेखक को यह मूल मंत्र दिया—“इन लाइफ, डोंट अटर ए वर्ड यू डोंट मीन।” अर्थात् जीवन में ऐसा एक भी शब्द न कहो, जिसका अर्थ तुम वास्तव में न समझते हो या जिसे तुम सच में महसूस नहीं करते। यही सीख लेखक के लेखन की आत्मा बन गई, जिसने उनके शब्दों को बनावटी नहीं, बल्कि सच्चा और संवेदनशील बनाया।
लेखक का मानना है कि जीवन की सबसे सच्ची और सहज सीख हमें अक्सर बच्चों से ही मिलती है। बच्चे बिना किसी बनावट के, अपने मन की बात सरल और स्वाभाविक शब्दों में कह देते हैं। लेखक इसका एक सुंदर उदाहरण देते हैं—जब वे अपनी एक पुस्तक के शीर्षक को लेकर असमंजस में थे, तब उन्होंने एक छोटी-सी बच्ची को अपने पिता से यह कहते हुए सुना, “क्या यार पापा!” इस एक वाक्य में छिपी आत्मीयता, अपनापन और सहज भाव उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने उसी को अपनी पुस्तक का शीर्षक बना लिया—‘यार, पापा’।
इसी तरह ऐसा प्रतीत होता है कि ‘टेंशन मत ले यार’ शीर्षक भी जीवन के किसी सहज, आत्मीय क्षण से जन्मा होगा। संभव है कि लेखक स्वयं इस पुस्तक को लेकर तनाव में रहे हों—कि क्या यह पुस्तक उनकी पहली पुस्तक जितनी लोकप्रिय हो पाएगी या नहीं। उस असमंजस और चिंता के क्षण में किसी अपने, किसी मित्र ने उनसे सहजता से कहा हो—“टेंशन मत ले यार, सब ठीक होगा।” यही साधारण-सा वाक्य लेखक के मन को छू गया हो और वही इस पुस्तक का शीर्षक बन गया हो।
इस प्रकार पुस्तक का शीर्षक केवल शब्दों का संयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह जीवन के अनुभव, रिश्तों की गर्माहट और आश्वासन की भावना का प्रतीक बन जाता है। यही सरलता और अपनापन इस पुस्तक की आत्मा है, जो पाठक को यह भरोसा दिलाती है कि जीवन की उलझनों के बीच भी किसी न किसी कोने में यह आवाज़ हमेशा मौजूद है—टेंशन मत ले यार।
इस पुस्तक में लेखक समाज की मानसिकता पर भी सवाल उठाते हैं। हमारे यहाँ शारीरिक बीमारी होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाया जाता है, लेकिन मानसिक परेशानी, अवसाद या तनाव के लिए मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) के पास जाने में लोग हिचकिचाते हैं, जबकि यह उतना ही आवश्यक है। लेखक मानते हैं कि यदि जीवन में कोई नया काम या रुचि आकर्षित करे, तो उसे आज़माना चाहिए—संभव है कि वही हमारा वास्तविक उद्देश्य या सही रास्ता हो।
इसी सोच के साथ लेखक ने 38 वर्ष की आयु में एक बड़ा और साहसिक निर्णय लिया—स्थिर नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक लेखन को अपनाने का। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि जीवन की कोई भी ‘अच्छी सलाह’ हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी हो, यह ज़रूरी नहीं। जो मार्ग एक व्यक्ति के लिए सही है, वह दूसरे के लिए अनुपयुक्त भी हो सकता है। इसलिए स्वयं दी गई सलाह भी सार्वभौमिक सत्य नहीं होती।
लेखक ने अपने अनुभवों से यह भी देखा है कि जो व्यक्ति किसी एक कार्य को निरंतर कई वर्षों तक करता रहता है, वही आगे चलकर वास्तविक सफलता प्राप्त करता है। इसके साथ ही वे समय-प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट) को जीवन की एक अनिवार्य कला मानते हैं, क्योंकि सही समय-संतुलन ही हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करता है।
इस पुस्तक की सकारात्मक विशेषताओं के साथ-साथ एक कमी भी दृष्टिगोचर होती है। कुछ स्थानों पर लेखक का आत्मसंवाद अपेक्षाकृत लंबा हो जाता है, जिससे पाठक का प्रवाह टूटता है और विषय बोझिल लगने लगता है। ऐसे अंशों में कथात्मक गति धीमी पड़ जाती है और रुचि बनाए रखना कठिन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, लेखक ने कुछ विचारों और भावनाओं को बार-बार दोहराया है। यद्यपि यह दोहराव भाव की गहराई को रेखांकित करने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है, फिर भी कई बार यह अनावश्यक विस्तार का रूप ले लेता है। कुछ प्रसंगों में यह भी महसूस होता है कि लेखक अनुभव साझा करने के बजाय उपदेशात्मक शैली की ओर बढ़ जाते हैं, जिससे पाठक और लेखक के बीच का स्वाभाविक संवाद कमजोर पड़ता है।
यदि इन अंशों में संक्षेप और कसावट होती, तो पुस्तक और अधिक प्रभावशाली तथा संतुलित बन सकती थी।
जब लेखक को यह लगने लगता है कि उनका लेखन पर्याप्त अच्छा नहीं है, कि शायद उनके शब्द किसी तक पहुँच नहीं पा रहे हैं, तभी उनके जीवन में एक अत्यंत मार्मिक अनुभव घटित होता है। एक युवती उनसे मिलती है और बताती है कि वह आत्महत्या करने का विचार कर चुकी थी, लेकिन लेखक की पुस्तक पढ़ने के बाद उसने अपना निर्णय बदल लिया। यह सुनकर लेखक को पहली बार गहराई से यह एहसास होता है कि यदि उनका लिखा हुआ किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है, तो उनका लेखन पूर्णतः सार्थक है।
लेखक का मानना है कि यदि आपको अपनी कहानी पर विश्वास है, यदि आप अपने अनुभव और अपने शब्दों की सच्चाई पर भरोसा रखते हैं, तो यह मायने नहीं रखता कि कोई उसे सुन रहा है या नहीं। विश्वास ही लेखन की सबसे बड़ी ताकत है।
वे यह भी कहते हैं कि जीवन में हर व्यक्ति को किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत होती है, जो कठिन समय में उसे कंधे से लगाकर कह सके— “टेंशन मत ले यार, सब ठीक हो जाएगा।”
यदि आपके आसपास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, तो वही व्यक्ति आपको स्वयं बनना पड़ेगा—अपने लिए भी और शायद दूसरों के लिए भी।
लेखक स्वीकार करते हैं कि जीवन की राह में लगभग हर इंसान कभी न कभी भटकता है। ऐसे समय में ज़िंदगी किसी अंधेरे कमरे की तरह लगने लगती है, जहाँ दिशा भी दिखाई नहीं देती और उम्मीद भी धुँधली पड़ जाती है। लेकिन तभी यदि कोई हाथ आगे बढ़कर हमें थाम ले, तो यह एहसास जन्म लेता है कि हम अकेले नहीं हैं। यही हाथ बनने की कोशिश इस पुस्तक के पीछे की मूल भावना है। लेखक चाहते हैं कि उनकी किताब वह सहारा बने, वह स्पर्श बने, जो पीठ थपथपाकर यह कह सके— “टेंशन मत ले यार, सब ठीक हो जाएगा।”
पुस्तक: टेंशन मत ले यार
लेखक: दिव्य प्रकाश दुबे
प्रकाशक: हिंदी युग्म, नोएडा, उत्तर प्रदेश
मूल्य: 249 रुपए

एक टिप्पणी भेजें