नामवर सिंह की कहानी-आलोचना के कुछ और सूत्र-सन्दर्भ
- उदय शंकर
नामवर सिंह की कहानी-आलोचना के सूत्र-सन्दर्भ उनकी व्यावहारिक आलोचना से निःसृत सैद्धांतिक और व्यावहारिक कारवाईयों से संदर्भित हैं। नामवर सिंह की कहानी-आलोचना के चार-बिंदु उन्हें अलहदा पहचान देते हैं। ये बिंदु हैं: पाठकों का वर्गीकरण, पाठ-प्रक्रिया अर्थात पाठ को कैसे पढ़ाएं अर्थात टेक्स्ट की क्लोज रीडिंग, कथानक का ह्रास और पाठ की संगीतधर्मिता का अलग से रेखांकन। एक अलग तरह के पाठकों की खोज से ही जुड़ा मसला है ‘कथानक के ह्रास’ को वैध करती कहानियों का रेखांकन।
नामवर सिंह ‘कहानी: नयी कहानी’ की भूमिका में लिखते, “कहानी समीक्षा को मैंने “सहयोगी प्रयास” के रूप में शुरू किया…” (सिंह 1992; 09)। इसी किताब में दो लेखों के शीर्षक क्रमश: सच्चे निर्णय के सहयोगी प्रयास में (सिंह 1992; 155) और सहयोगी प्रयास में कुछ और (सिंह 1992; 167) हैं। एफ. आर. लीविस अपनी पुस्तक ‘कॉमन परस्यूट’ की भूमिका में लिखते हैं, "मैंने इस पुस्तक का शीर्षक श्री इलियट के निबंधों, जो कि मुझे काफी पसंद है, की पुस्तक ‘द फंक्शन ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ से लिया है… जहाँ तत्क्षण ही कुछ प्रासंगिक पंक्तियाँ नज़रों के सामने से गुजरती हैं: मान लीजिये कि एक ऐसी जगह थी जहाँ ‘श्रम की सहकारिता’ आधृत माहौल था। एक आलोचक यदि अपने अस्तित्व के औचित्य को सिद्ध करने निकलता है तो उसे अपने पूर्वाग्रहों… आदि को अनुशासित करना होता है। साथ ही साथ अपनी मतभिन्नताओं को अपने सजातियों के साथ जितना संभव हो सके ‘एक सच्चे निर्णय के सहयोगी प्रयास’ के रूप में उसे दर्ज करना चाहिए।" (Leavis 1964; iV)
श्रीमती क्यू.डी. लीविस, एफ.आर. लीविस की पत्नी, की शोधपूर्ण पुस्तक है, फिक्शन एंड द रीडिंग पब्लिक (1939)। यह पुस्तक एक तरह से उस समय के अंग्रेजी (ब्रिटिश) पब्लिक स्फीयर (लोकवृत्त) का अध्ययन है। अपने अध्ययन में वह इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि जन-समूह[1] की संस्कृति (मास कल्चर) ने कलात्मक/साहित्यिक रुचियों को अवरुद्ध किया है। जन-समूह की संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा उपन्यासों, पत्रिकाओं और अखबारों का ढेर बन चुका है और जहाँ से किसी सांस्कृतिक, साहित्यिक और कलात्मक उठान की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। इसी सन्दर्भ में वह संगीत की चर्चा करती हैं कि इस बाजारू (जिसमें कानफोड़ू गीत/संगीत भी शामिल है) और अखबारी जमात ने कैसे संगीत के सच्चे श्रद्धालुओं को, जो कभी अपने आप में जनसमुदाय ही होते थे, व्यापक जमीन से ही ओझल कर दिया है। ‘संगीत के सच्चे श्रद्धालु’ को अगर एक रूपक की तरह इस्तेमाल करें तो यही श्रद्धालु संस्कृति, साहित्य और कला के असली (जेनुइन) पारखी थे और एक अल्पसंख्यक समुदाय का निर्माण करते थे। व्यावसायिकता की जद में आने के कारण जन-समूह की संस्कृति के नियामकों को नार्थक्लिफ (बिर्टिश की पहली अख़बार कंपनी और प्रकाशक) जैसी ताकतें तय करने लगी हैं और सचमुच के पारखी और सुरुचि-संपन्न लोगों को इस वृत्त से बाहर धकेल दिया गया है। पहले जहाँ पाठक-वर्ग आलोचकों पर भरोसा करता था वहीं अब आलोचक व्यावसायिकता का साझेदार हो गया है। (Leavis, 1939)
अंततः श्रीमती लीविस इस नुक्ते पर पहुँचती हैं कि उस अल्पसंख्यक जमात का पुनरुद्धार/ पुनर्विष्कार करना होगा। लेकिन इसकी पृष्ठभूमि एफ.आर. लीविस की तैयार की हुयी है। 1930 में एफ.आर. लीविस का एक पर्चा आता है जिसका शीर्षक ही है, 'जन-समूहगत सभ्यता और अल्पसंख्यक-संस्कृति' (मास सिविलाइज़ेशन एंड माइनॉरिटी कल्चर)। इस पर्चे में वे मैथ्यू अर्नाल्ड की संस्कृति-संदर्भित चिंता से अपनी बात शुरू करते हैं। मैथ्यू अर्नाल्ड अपनी पुस्तक 'कल्चर एंड अनार्की' में संस्कृति को ‘पूर्णता के विचार’ (आईडिया ऑफ़ परफेक्शन) से जोड़ते हैं। ‘पूर्णता की खोज’ दरअसल माधुर्य और प्रकाश की खोज है। माधुर्य-कार्य वाली संलग्नत़ा अंततः प्रकाश की खोज से संलग्न होती है। इसी तरह प्रकाश की खोज वाली माधुर्य-कार्य में संपन्न होती है। लेकिन जो माधुर्य और प्रकाश, दोनों, के लिए एक साथ काम करता है, वह एक उद्देश्य (reason) के लिए काम करता है और इसमें इश्वर की सम्मति भी है। लेकिन, मशीनरी (machinery) के लिए काम करने वाला, घृणा के लिए काम करता है और अंततः वह सिर्फ भ्रम के लिए काम करता है। संस्कृति इन सब से परे है, संस्कृति घृणा से घृणा करती है, संस्कृति सिर्फ माधुर्य और प्रकाश की खोज जैसे महत्तर उद्देश्य से खुद को संचालित करती है। और जब तक इसे वह प्राप्त नहीं कर लेती तब तक उसके जूनून में किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। जब तक हम सभी एक आदर्श मनुष्य, पूर्ण मनुष्य (परफेक्ट मैन) नहीं बन जायेंगे, तब तक संस्कृतिपरक-संतुष्टि नहीं होगी। कुछ लोगों के अन्दर व्याप्त माधुर्य और प्रकाश भी तब तक अपूर्ण है जब तक मानव-समुदाय का बड़ा हिस्सा, जो कि अपरिपक् और अन्धकार में है, माधुर्य और प्रकाश का स्पर्श नहीं पाते।’ (Arnold 2006; 52) अर्नाल्ड के अनुसार बहुत सारे लोग, संस्थाएं इस अपरिपक्व और अँधेरे में व्यतीत लोगों को अपने विचार, इरादे, दलगत रुचियों से प्रेरित करते हैं। सामान्य साहित्य (लोकप्रिय साहित्य) की लोकप्रियता का राज जनसमूह के ऊपर इसी तरह की प्रेरणाओं का शासन है।
एफ. आर. लीविस अर्नाल्ड की चिंताओं के बाद आई.ए. रिचर्ड्स के शरण में जाते हैं। रिचर्ड्स का मानना था कि ‘जनसँख्या’ (पापुलेशन) में बढ़ोत्तरी ने एक खाई को जन्म दिया है, जो बहुसंख्यक की रुचियों बनाम प्रवीण-कुशल लोगों की रुचियों के रूप में समाज में मौजूद है और निकट भविष्य में यह खतरनाक साबित होने वाला है। यह खाई व्यवसायीकरण के कारण संभव हुआ है। सिनेमा और लाउडस्पीकर की भयावह-क्षमता की थाह से अनजान और साहित्य-संसार में ‘बेस्ट-सेलर्स’ के ठप्पे से भ्रमित जनसमूह सच्चे साहित्य से दूर है। आलोचक का काम इस खाई को पाटना है। “यह कहना कि आलोचना एक लक्ज़री व्यापार है, यह सच नहीं है। समाज का रियर गार्ड (जो पीछे से कारवां को सचेत करता है) खुद को तब तक कार्य-मुक्त नहीं कर सकता जब तक हिरावल दस्ता (वैनगार्ड) आगे न निकल जाए। सद्भावना और बुद्धिमत्ता की उपलब्धता अभी भी सीमित है। आलोचक का संबंध, जैसा कि मैंने कहा, बुद्धि की खैरियत से है, जैसे चिकित्सक का शरीर की। खुद को आलोचक के रूप में स्थापित करना, खुद को मूल्यों के जज के रूप में स्थापित करना है… कविता जीवन की आलोचना है’, मैथ्यू अर्नाल्ड का यह कहना ही स्पष्ट कर देता है कि इस इलाके की कितनी अनदेखी हुयी है। कलाकार अनुभवों के दस्तावेजीकरण और उसकी निरंतरता से खुद को सम्बद्ध करता है और यही सम्बद्धता उसकी मूल्यवान पूंजी है… साथ ही वह दस्तावेजीकरण के अहमियत को अपने अनुभव का साझा मानता है। वह एक ऐसा बिंदु है जहाँ बुद्धि अपने वृद्धि को स्वयं दर्शाती है।” (Richards 2004; 54-55)
अर्नाल्ड के यहाँ ‘माइनॉरिटी’ की जगह ‘एलियंस’ है जो समाज के किसी भी तबके में सायास ही पाया जाता है और वह अपने वर्गहीत (विवेक) से ऊपर उठकर मानव-विवेक के पक्ष में कार्य करता है। (Arnold 2006; 81) अर्नाल्ड के लिए, मशीन एलियंस की मौजूदगी के लिए खतरनाक है। रिचर्डस के यहाँ मशीन की जगह व्यवसायीकरण है, जनसमूह और कुशल-प्रवीण की रुचियों में खाई है। एफ. आर. लीविस के यहाँ इसी क्रम-पद्धति के अध्ययन-उपरान्त अल्पसंख्यक-संस्कृति का विचार आता है। किसी भी युग में अल्पसंख्यक की एक छोटी जमात रही है जिसके विवेकपूर्ण आदर-सत्कार, गुण-दोष विवेचन (appreciation) पर साहित्य निर्भर रहता आया है। यही कुछ लोग हुए हैं जो किसी अप्रकाशित, अप्रचारित साहित्य के बारे में मूल्य-निर्णय का अधिकार रखते हैं। वे अभी भी अल्पसंख्यक हैं लेकिन उन्हीं में यह माद्दा है कि किसी कृति के बारे में वाजिब , व्यक्तिगत और प्रथमद्रष्टया विचार रख सकते हैं। अभी तक मूल्यांकन की जो स्वीकृत पद्धति है वह उस कागजी रूपये की तरह है जो सोने के एक छोटे टुकड़े की कीमत पर आधृत है। राज्य के लिए यह स्थिति और कुछ नहीं बल्कि इन तबकों को अपने साथ ज्यादा समय तक बनाए रखना है। यह अल्पसंख्यक तबका न सिर्फ क्लासिक्स को आत्मसात किया है बल्कि आने वाले किसी भी समय में साहित्यिक धारा को मोड़ने की काबलियत रखता है। (Leavis 1930; 12-13)
यह भी सच है कि लीविस के लिए संस्कृति के इस अल्पसंख्यक को परिभाषित करना आसान नहीं था[2], और शायद संभव भी नहीं। बावजूद इसके उन्होंने कहा कि संस्कृति में अल्पसंख्यक वह है जो अर्नाल्ड की पुस्तक ‘संस्कृति और अराजकता’ (Culture and Anarchy) पढता है। उपर्युक्त भाषा के लहजे में (यहाँ के दूसरा उदहारण भी है[3]) बात करना ही वह विशेष संस्कृति है।
नामवर सिंह अल्पसंख्यक की संस्कृति के इस सिद्धांत से गहरे प्रभावित रहे हैं, यह अलग बात कि वे कहीं भी सन्दर्भ-चिन्ह छोड़ते या बताते नहीं हैं। लेकिन जहाँ-जहाँ वे पाठक की ग्राह्य-क्षमता को प्रश्नांकित करते हैं वहाँ यह विशेष लीविसवादी सिद्धांत स्पष्तः झलक जाता है। साधारण पाठक, कॉमन रीडर, पब्लिक, कॉमन सेंस, सहज बोध, सहज दृष्टि, वर्तमान शिक्षा (आधुनिक), डॉ. जॉनसन (शमूएल), वर्जिनिया वूल्फ आदि का नामवर सिंह जहाँ-जहाँ (कहानी: नयी कहानी में) जिक्र करते हैं, वे और कुछ नहीं बल्कि श्री लीविस और श्रीमती लीविस की कृतियों (जिनका ऊपर जिक्र किया गया है) से संदर्भित हैं। (सिंह 1992; 69-75)
एफ.आर. लीविस के ‘कॉमन परस्यूट’ से ही संदर्भित एक प्रसंग का नामवर जी अपने ही अंदाज में, मजेदार भी, धारण करते हैं। श्री लीविस अपने गुरु-कवि टी.एस. एलियट की महानता साबित करने के लिए डब्लू.एच. ऑडेन की आलोचना करते हैं कि ऑडेन अपनी कविता में स्व का अन्वेषण करते हैं, अपने राजनीतिक आग्रहों के कारण कविता की भाषा को समेटते नहीं बल्कि उसकी ऐन्द्रियता को ऋजु करते हैं, आदि आदि। (Leavis 1964; 293-298) नामवर जी इसी को अपने हिसाब से इस्तेमाल कर जाते हैं, “अन्वेषण से विरोध नहीं, लेकिन ‘अन्वेषण’ आप करते कहाँ हैं? और फिर किसका अन्वेषण करते हैं? इतनी विशाल और समृद्ध जिन्दगी का जंगले सामने लहरा रहा है और आप हैं कि जाने किन सूक्षम मान्यताओं और रूढ़ प्रतीकों के ‘एब्सट्रैकशन्स’ में झक मार रहे हैं। इन बातों के लिए दर्शन या एक हद तक कवितायें (जोर मेरा) कुछ कम हैं?... कहाँ तो ऑडेन जैसे कवि हैं कि मांसलता का ज्यों-का-त्यों कविता में समेटने के लिए कविता के ढाँचे को दूर तक ऋजु करने की कोशिश करते हैं और कहाँ हमारा कहानीकार है कि कहानी को कविता के तंग दायरे की ओर घसीट डालना चाहता है!” (सिंह 1992; 38)
नामवर सिंह जिस संगीतधर्मिता की तलाश निर्मल वर्मा में करते हैं उसके भी सन्दर्भ-सूत्र श्री और श्रीमती लीविस ही हैं और यह संस्कृति के उसी अल्पसंख्यक तबके से संदर्भित है जिसका जिक्र ऊपर कर आये हैं। श्री लीविस ने तो अलग से टीएस एलियट के यहाँ संगीत की उपस्थिति को दर्ज किया है, इसके अलावा कॉमन परस्यूट में ही 60-70 बार संगीत की चर्चा है। श्रीमती लेविस के यहाँ भी 30-40 बार है तो नामवर जी के यहाँ भी 30 से कम क्या होंगे!
लोकप्रिय साहित्य की आलोचना का परिदृश्य सैद्धांतिक रूप से स्पष्ट हो चुका था, साहित्य के असली भावक के रूप में संस्कृति के एक अल्पसंख्यक जमात की ‘वायवीय’ स्थापना हो चुकी थी और वह संगीतधर्मी भी है, यह भी स्पष्ट है। लब्बोलुआब यह कि एक आभिजात्य-संस्कृति का पताका लहराने की कवायद थी।[4] डब्लू. एच.ऑडेन कविता की पेरीफेरी को ऋजु करने के कारण लीविस द्वारा आलोचित हो चुके थे। श्रीमती लीविस अपने शोध-अभ्यास से यह सिद्ध ही कर चुकी थीं कि उपन्यास जन-समूह की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है और साहित्यिक ‘रस-रंजन’ से बाहर भी जा चुका है। एक तरह से एक नयी समस्या का प्रादुर्भाव हो चुका था। इस समस्या का निराकरण कविता और गद्य के अंतर को मिटाए बिना संभव नहीं था। श्रीमती लीविस इसके लिए वर्जिनिया वूल्फ का सहारा लेती हैं। इसी समस्या से आलोचकविद् को समझ में आया कि ‘प्लॉट’ (कथानक) ही वह जड़ है जो फ़ॉर्मूलाबद्ध बाजारू साहित्य के उत्पादन की जड़ है। लेकिन आलोचक इस जड़ को अगर ‘ऑडेन द्वारा ऋजु करने’ के सामानांतर हल करना चाहता तो तत्काल सफलता की संभावना नहीं थी। ‘परिंदे’ की समीक्षा कर नामवर जी यही हल करना चाहते थे, लेकिन नहीं हुआ। लेकिन सिद्धांत जब स्पष्ट हो तो उदहारण का अन्वेषण कभी खत्म नहीं होता है। उनका अन्वेषण पूरा हुआ, हेमिंग्वे की कहानी ‘हत्यारे’ की खोज से। नहीं, हेमिंग्वे की कहानी की व्याख्या की खोज से। यह अलग बात है कि नामवर जी इसका भी सन्दर्भ-स्रोत स्पष्ट नहीं करते हैं।
लीविसवाद/नयी समीक्षा के अमेरिकी सन्दर्भ क्लिंथ ब्रुक्स और रॉबर्ट पेन वारेन की पुस्तक, अंडरस्टैंडिंग फिक्शन 1943 में आती है। एक तरह से (क्योंकि यह समीक्षा पहली बार American Prefaces-7, spring 1942 में प्रकाशित हुयी थी) पहली बार उसी में हेमिंग्वे की ‘हत्यारे’ की विशेष, नामवर जी जैसी समीक्षा करते हैं वैसी ही, समीक्षा आती है।
लेखक (क्लिंथ ब्रुक्स और रॉबर्ट वारेन) एक पाठक के हवाले से एक संभावित प्रश्न करते हैं, हालाँकि नामवर जी भी ऐसा ही सवाल करते हैं, इसमें कहानी क्या है? यह कहानी किसके बारे में हैं? (Brooks and Warren 1959; 304) ऐसा लगता है कि जैसे नामवर जी इसी का उत्तर दे रहे हैं, “क्यों, साफ़ है कि पेशेवर हत्यारों की कहानी है और उनकी जिन्दगी की एक झलक दिखाई गयी है अब उसमें किसी की दिलचस्पी नहीं हो तो दूसरी बात है।” (सिंह 1992; 119)
ब्रुक्स और वारेन लिखते हैं, कहानी का पहला दृश्य, जहाँ पेशेवर हत्यारे आपसी चुहलबाजी में मस्त है, इस चतुराई से बुना गया गया है कि लम्बे समय तक सस्पेंस की गुंजाइश की संभावना है। तत्क्षण ही दूसरा दृश्य नमूदार हो जाता है। (Brooks and Warren 1959; 304) इसको नामवर सिंह ऐसे पूरा करते हैं, मतलब मूल लेखक द्वय को दुहराते हैं (बिना सन्दर्भ के), “वाह, हत्या के सनसनीखेज कारनामे के बिना हत्यारों की यह कहानी कैसी? जहाँ से कहानी शुरू होनी चाहिए वहीं तो ख़त्म हो जाती है। यह भी कोई बात हुयी?” (सिंह 1992; 119) मूल लेखक इसी बात को ऐसे कहता है, “हत्यारे’ हत्यारों के एक गैंग की कहानी है, ऐसी कहानी जिसमें घटना-प्रतिघटना का संयोग है, लेकिन वह नहीं हुआ।” (Brooks and Warren 1959; 304)
कहने का तात्पर्य यह है कि नामवर सिंह ‘कथानक के ह्रास’ रूपी सिद्धांत गढ़ने के उपरान्त नायब उदहारण के बतौर हेमिंग्वे की कहानी ‘हत्यारे’ को प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी की व्याख्या के सारे सूत्र उन्होंने ‘अंडरस्टैंडिंग ऑफ़ फिक्शन’ से उड़ाए हैं।
नामवर सिंह ‘कहानी: नयी कहानी’ की भूमिका में लिखते हैं, “…जनवरी’ 1962 के ‘एसेज़ इन क्रिटिसिज्म’ में स्वयं उस पत्रिका के संपादक और अंग्रेजी के जागरूक समालोचक एफ़. डब्लू. बेटसन एवं बी. शाहेबिच द्वारा प्रस्तुत कैथरीन मैन्सफील्ड की कहानी ‘मक्खी’ का विश्लेषण देखकर संतोष हुआ। इस कहानी में आलोचना की वही विश्लेष्णात्मक पद्धति (जोर मेरा) अपनाई गयी है जो पिछले दशकों से छोटी कविताओं के विश्लेषण में सफल पायी गयी थीं।” (सिंह 1992; 10)
जिस किताब से हेमिंग्वे की ‘हत्यारे’ की व्याख्या के सूत्र उड़ाए गए हैं, उसी किताब में ‘हत्यारे’ की व्याख्या के अगले ही अध्याय में ‘मक्खी’ का विवेचन है।
पाद टिप्पणी :
[1] ‘मास’ का हिंदी अनुवाद अभी तक हिंदी में स्थिर हुआ हो ऐसा देखने में नहीं आता है। ‘मास’ के आस-पास के दो अन्य शब्द क्रमशः लोक और जन हैं, लेकिन ये दोनों शब्द किन्हीं और अर्थों में रूढ़ हो चुके हैं।
[2] इसीलिए जॉर्ज एव्री ने बहुत ही मीठा व्यंग्य करते हुए लिखा, और इस कारण श्री लीविस थोड़े उखड़ भी गए, ‘स्क्रूटिनी के लेखकों की गलती थी कि वे बौद्धिक जमात की तलाश में उन्हीं पुरानी जगहों पर पहुँचे जहाँ ‘येलो बुक’ और राइम्स क्लब के दिनों में रसिकों की भर्ती हुयी थी। इन्हीं रसिक जमात में पुराने रंग-ढंग के विश्विद्यालयों के बौद्धिक और जानकार युवा/युवतियाँ भी शामिल थीं। और ये सब साहित्य को पेशे की तरह अपनाने के लिए तैयार थे। ऐसे लोग बड़े ही आसानी से ‘पोथी-पढुये पंडित’ में तब्दील हो जाते हैं, यह पंडिताऊपन समकालीन साहित्य के साथ-साथ पूरी तरह से सुरक्षित क्लासिक्स को भी अपना आहार बना सकता है। इसीलिए अल्पसंख्यक, हमेशा, साहित्य में नवोन्मेष के लिए वास्तव में उत्तरदायी हैं। कला-संसार में हमेशा ऐसे लोगों के लिए जगह बनानी चाहिए जो सीधे रूप में साहित्य-कर्म से नहीं जुड़े हैं, वे कला की क़द्र करते हैं क्योंकि यह उन्हें जीवन का मर्म प्रदान करता है।’ (Quoted in, Leavis 1964; 250)
[3] “The expert in matters of taste is in an awkward position when he differs from the majority। He is forced to say in effect, ‘I am better than you। My taste is more refined, my nature more cultured, you will do well to become more like me the than you are।’ It is not his fault that he has to be so arrogant। He may, and usually does, disguise the fact as far as possible, but his claim to be heard as an expert depends upon the truth of these assumptions।” (Richards 2004; 32)
[4] “Scrutiny became a defensive elite which, like the Romantics, viewed itself as 'central' while being in fact peripheral, believed itself to be the 'real' Cambridge while the real Cambridge was busy denying it academic posts, and perceived itself as the vanguard of civilization while nostalgically lauding the organic wholeness of exploited seventeenth-century farm labourers।” (Eagleton 2008; 31)
संदर्भ:
- सिंह, नामवर, 1992 (1966), कहानी: नयी कहानी. इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाशन.
- Arnold, Matthew. 2006 (1869). Culture and Anarchy. Oxford: Oxford University press.
- Brooks, Cleanth and Warren, Robert Penn. 1959 (1943). Understanding Fiction. New York: Appleton-Century-Crofts, Inc.
- Eagleton, Terry. 2008 (1983). Literary Theory: An Introduction. Minneapolis: University of Minnesota Press.
- Leavis, F.R. 1964 (1952). The Common Pursuit. New York: New York University press.
- Leavis, F.R. (1930). Mass Civilization and Minority Culture. Cambridge: Minotity Press.
- Leavis, Q.D. 1939. Fiction and The Rading Public. London: Chatto & Windus.
- Richards, I. A. 2004 (1924). Principles of Literary Criticism. London: Routledge.
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव


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