शोध आलेख : नामवर सिंह की स्त्री-दृष्टि : एक आलोचनात्मक पाठ / प्रोमिला

नामवर सिंह की स्त्री-दृष्टि : एक आलोचनात्मक पाठ
- प्रोमिला


बड़े आलोचकों में से कौन है, जिसका कोईअंधबिंदु हो! क्या वहअंधबिन्दुही उसकीअंतर्दृष्टिका कारण नहीं?’1 जैसी खरी बात कहनेवाले हिन्दी आलोचना मेंबहसके सशक्त हस्ताक्षर नामवर सिंह ने विचार, इतिहास और भाषा के समन्वय से आलोचना को नवीन आयाम दिए हैं। तथापि उनकी दृष्टि कुछ अविदित अंधबिंदुओं से रहित नहीं रही है, विशेषतः तब जब स्त्री-अनुभव की स्वायत्त संवेदना का मुद्दा उपस्थित है, यह जिज्ञासा पुनः उभरती है कि वर्ग, इतिहास और समाज के प्रश्नों पर उनकी विमर्श-गंभीरता स्त्री-लेखन के क्षेत्र में किस रूप, किन परिप्रक्ष्यों के साथ रूपायित होती है। अतएव यह आलेख नामवर सिंह की स्त्री-दृष्टि के अंतर्विरोधों की पड़ताल करते हुए स्त्री-विमर्श के प्रति उनकी संवेदना के समावेश और सीमाओं का सम्यक् मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।

यदि आलोचना को 'कोण निर्धारित दर्पण' बताने वाली जॉन होलोवे की मान्यता से मतैक्य रखा जाए तो दर्पण मात्र बाह्य जगत का प्रतिबिंब प्रस्तावक साधन होकर दृष्टि-चयन, संवेदन-नियमन और अर्थ-उत्पत्ति का गूढ़ उपकरण प्रतीत होता है। यह 'कोण' ही आलोचना के मूल्य आधारित संरचनात्मक तंत्र का निर्माणकर्ता बनता है, जिसके द्वारा साहित्य का अर्थ, सत्ता और संवेदना रूपायित होते हैं। इसी बिंदु से जिस कोण को मूलतः मूल्य स्वतंत्रता का द्योतक होना चाहिए था, वह स्वयं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर आलोचना की निष्पक्षता के प्रश्न से चिन्हित होता है। और यहीं से साहित्य के अनुभव-संसार की आधी वास्तविकता, स्त्री-जीवन, स्त्री-चेतना के इस अंकन परिधि से क्रमशः छूटते चले जाने या यदि चर्चा हुई भी है तो एकाकी पुरुष दृष्टि से ही होने की बात प्रत्यक्ष होती है। स्त्री-सृजन की उपेक्षा पर उठता सवाल और अधिक अर्थगर्भित हो जाता है कि 'पुरुष आलोचना को क्यों स्त्री की इस दुनिया में कुछ नया नहीं दिखता।'2 इस संबंध में कही गई टिप्पणियां, 'मर्दवादी आलोचना प्रायः इस (स्त्री) 'अर्जन' को नजरअंदाज करती है। अब तक की आलोचना मर्द लेखक के इरादे (हेतु) को सबके लिए समान हित वाला मानकर चलती रही है।'3 या 'हिंदी आलोचना कभी स्त्री-लेखन के प्रति मर्दवादी दुराग्रह छोड़कर पाठ पर बात करने की स्थिति में नहीं आई,'4 की आलोचनात्मक पृष्ठभूमि स्वतः उद्घाटित हो जाती है।

रामविलास शर्मा को पुराने क्लासिकल वाम के प्रमुख वक्ता के रूप में देखते हुए अर्चना वर्मा द्वारा लिखा गया कथन, 'पुराने क्लासिकल वाम से उसका (स्त्री का) रिश्ता अगर विरोध का नहीं तो प्रगाढ़ असहमति का अवश्य है,'5 मार्क्सवादी आलोचना के भीतर विद्यमान सीमाओं का द्योतक बनता है। वहीं मैनेजर पाण्डेय के चार निबंधों के आधार पर रोहिणी अग्रवाल का विवेचन, 'वे स्त्री को सहानुभूति देते हैं, उसकी मुक्ति की कामना भी करते हैं लेकिन पितृसत्तात्मक व्यवस्था की अमानुषिकता की समीक्षा नहीं करते जो मौजूदा सामाजिक ढांचे को यथावत बनाए हुए है।... डॉ. मैनेजर पाण्डेय की आलोचना में विश्लेषण की अपेक्षा उद्बोधन अधिक है,'6 वामपंथी आलोचना के अंतर्विरोधों का खुलासा करता है। और गौरतलब है कि रामविलास शर्मा तथा मैनेजर पाण्डेय के मध्य में नामवर सिंह के होने का विशेष अभिप्राय है, जिसे मात्र कालक्रम के संकेत रूप में ना पढ़ा जाकर हिन्दी आलोचना की वैचारिक यात्रा के विशेष पड़ाव रूप में विचारा जाना चाहिए। वे केवल हिन्दी के शिखर-पुरुष रूप में ख्यात रहे हैं बल्कि उनसे जो विपुल आलोचना भंडार तथा 'बड़ा साहित्य विचारधारा के बावजूद भी बड़ा होता है', का बोध हिन्दी को मिला है, वह अमूल्य है। उन्होंने 'आलोचना कर्म का नया व्याकरण' लिखा है।

किंतु विचारणीय है कि अंधभक्ति के समस्त गुबारों से परे आरोपों, वाद-विवादों और समस्त सहमतियों, असहमतियों के साथ नामवर सिंह पर एक आरोप दलित लेखन के स्वीकार, अस्वीकार का रहा है तो दूसरा स्त्री-विमर्श संबंधी लेखन पर टिप्पणियों से बचाव का। प्रभा खेतान ने सीधे पूछा है कि 'आलोचना के इतिहास में क्या रामविलास शर्मा, नामवर सिंह ने इन लेखिकाओं को कभी ध्यान से पढ़ा भी है? स्वयं नामवर जी महिला लेखन के प्रति अपनी अभिज्ञता स्वीकारते हैं। मगर क्या यह आत्मस्वीकृति ही काफी है? उनके जैसा व्यापक फलकवाला व्यक्ति स्त्री जीवन तथा उससे संबंधित समस्याओं और लेखन के प्रति भला इतना उदासीन कैसे रहा?'7 जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा है, 'साहित्य में स्त्री साहित्य की भयानक उपेक्षा हुई है। स्त्री के पुंसवादी चित्रण जैसे पति-पत्नी की मर्यादा के पुंसवादी चित्रण को नामवर सिंह आदर्श चित्रण मानते हैं। स्त्री के प्रति पुंसवादी नजरिए और स्त्री नजरिए में वे अंतर नहीं करते।'8 और यहीं से नामवर सिंह की आलोचना में क्या स्त्री-विमर्श के लिए अपेक्षित स्पेस नहीं रहा है, के प्रश्न की खंगाल-पीठिका तैयार हो जाती है। अन्वेषण किया जा सकता है कि आलोचक की दृष्टि में स्त्री एक स्वतंत्र विश्लेषणात्मक श्रेणी के रूप में कितना स्थान पाती रही है? उन्होंने स्त्री-लेखन को कितनी गंभीरता से लिया है? क्या उनकी चिंतनधारा में अस्मिता का सवाल महत्वपूर्ण है? स्त्री-पराधीनता की परंपरा तथा उसके समकालीन रूप से उनका संवाद किस स्तर पर घटित होता है? स्त्री-विमर्श की कौन-सी विचार-सरणियां उनके आलोचनात्मक विवेक में प्रस्तावित होती हैं, कौन-सी अनुलक्षित रह जाती हैं?

यद्यपि स्त्री-विमर्श पर नामवर सिंह के पूर्ण कुल जमा दो, 'मुक्त स्त्री की छद्म छवि' तथा 'स्त्री-विमर्श की भूमिका'  लेख ही प्राप्त होते हैं परंतु इन सीमित लेखों में गूढ़ आलोचना का वह आग्रह झलकता है, जिसमें स्त्री-अनुभव को समाज-संरचना से जोड़कर देखने का सामर्थ्य पाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त साक्षात्कारों में पूछे गए प्रश्नों के उत्तरस्वरूप कहे गए विचार, ‘किताबनामामें संकलित कृष्णा सोबती से लेकर रीता सिन्हा की पुस्तकों संबंधी टिप्पणियां विवेचन का आधार बनती हैं। अतएव कर्मेंदु शिशिर के कथन, 'नामवर सिंह ने जहां भी हस्तक्षेप किया है, वह चाहे जितना संक्षिप्त हो, कोई ना कोई नई बात, नई दृष्टि अथवा उसे देखने समझने का नया नजरिया जरूर मिल जाएगा,'9 से इनके स्त्री-चिंतन की अंत:संरचना, बौद्धिक अनुक्रम, सांस्कृतिक व्यूह के निहितार्थों की पड़ताल की जा सकती है।

आलोचना का संबंध रचना के साथ-साथ व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक, वैचारिक प्रक्रिया से भी जुड़ा होता है। अतः वही आलोचक स्वीकृत तथा सार्थक है जो शुद्ध साहित्यवाद का अनुयाई ना होकर उस जीवंत चौराहे से प्रेरित होता है, जहां साहित्य समाज और संस्कृति परस्पर मुठभेड़ करते, नई संवेदनात्मक संभावनाएं रचते हैं। ऐसी आलोचना ही वास्तविक अर्थों में जीवन सापेक्ष कर्म-प्रेरक बनती है। आलोचना का मूल्य निष्कर्ष में नहीं, उस वैचारिक-मानसिक यात्रा में निहित होता है, जिसके द्वारा आलोचक निष्कर्ष तक पहुंचता है। इस यात्रा में विचारधारा के अनुशासन की भी भूमिका होती है। वह विचारधारात्मक साधन बनकर व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष का हथियार बनती है और मार्क्सवादी आलोचक तो इसे इसी रूप में इस्तेमाल करता है। नामवर सिंह ऐसे ही आलोचक हैं, जिनका आलोचनात्मक संघर्ष साहित्य मात्र के लिए नहीं, सभ्यता का पाठ बनकर समाज-बदलाव के लिए लक्षित रहा है। उन्होंने अस्मिताओं के बौद्धिक विकास को इतिहास-प्रक्रिया से संयोजित किया है कि प्रारंभिक युगों में समस्त जीवन तत्वों को एक रस-दृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति प्रबल थी, जिसेहोमोजेनाइजेनसकहा गया है तथा जिसका चरम रूप फासीवाद रूप में इतिहास गति को रोकता आया है। अतः अस्मिताओं का जो वर्तमान उद्दीपन और आत्मविकास रूपायित हो रहा है, वह इतिहास के अंतःसंचालन में निहित विविधता की दिशा का पुनर्संस्कार है। मार्क्स का विचार था कि साम्यवादी या आदर्श समाज में व्यक्ति विशिष्टताएं समाप्त नहीं होंगी प्रत्युत उसके सर्वतोमुखी विकास के सर्वाधिक अवसर उद्घाटित होंगे। यानी विकास का वास्तविक अर्थ किसी सत्ता का विनाश नहीं, उसकी संभावनाओं का प्रस्तुतिकरण है। कली के विकसन में उसकी पंखुड़ियां जिस प्रकार पृथक होकर अपनी-अपनी रंग-सुगंध में दीप्त होती हैं, उसी प्रकार बंद समाज आवरणों को त्यागता है तो समस्त अंग अपने स्वतंत्र अस्तित्व में प्रत्यक्ष होते हैं। अंधकार की एकरूपता समस्त वस्तुओं के रंगों को ओझल कर देती है पर प्रभात किरण में प्रत्येक सत्ता अपनी स्वाभाविक भिन्नता के साथ प्रकाशित होती है। यही ज्ञान, विज्ञान तथा आधुनिक के आलोक के साथ समाज में घटित हुआ। विभिन्न वर्गों समुदायों और लैंगिक समूहों ने अपनी विशिष्ट पहचान का अनुभव किया। आरंभिक अवस्था में यह भिन्नता मात्र रूपात्मक थी पर शीघ्र ही इसमें आत्मबोध और स्वत्व-संवेदना का उदय हुआ। ऐतिहासिक प्रक्रिया का यह द्वितीय निर्णायक चरण था, जिसमेंमैं अलग हूंके बोध के कारण समकालीन भारतीय विचार-जगत में स्त्री-विमर्श जैसी अस्मितामूलक प्रवृत्तियां ऐतिहासिक आत्म-चेतना की अनिवार्य परिणति बनकर प्रतिष्ठित हुई।10 अर्थात नामवर सिंह ने अपना दृष्टिकोण ऐतिहासिक प्रक्रिया की ठोस पड़ताल से विकसित किया।

कार्ल मार्क्स नारीवादी नहीं थे परंतु अर्थ संबंधों की पड़ताल करते हुए स्त्री के विषय में विकसित उनकी सोच मार्क्सवादी नारीवाद की महत्वपूर्ण आधारशिला बनी। हेइडी हार्टमैन और एमी ब्रिजेस का कथन है कि मार्क्सवाद और नारीवाद एक हैं और वह एक मार्क्सवाद है।11 (Marxism and feminism are one and that one is Marxism.) नामवर ने भी लिखा है,स्त्री-विमर्श एक तरह से मार्क्सवाद के अंदर से ही आया है। समाजवाद की सीमाएं प्रकट होने लगीं तो आमतौर से कम्युनिस्ट महिलाएं मार्क्सवाद को मानने वाली और सोशलिस्ट महिलाओं ने ही कहा कि मार्क्सवाद में वर्गभेद का वर्ग-संघर्ष तो है लेकिन स्वयं वर्ग के भीतर के स्त्री-पुरुष भेद पर मार्क्स को इसका ध्यान था। वहीं से फेमिनिस्ट हवा चली तो उसमें कोई गलती नहीं थी, सही काम था।12 

नामवर सिंह का मानना रहा कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का विमर्श तीन त्रिज्याओं, कानून, समाज और परिवार के भीतर सम्पन्न होता है किंतु कानून जिन कठोर रेखाओं में इन सम्बन्धों का आकलन करता है, समाज प्रायः उनसे कहीं अधिक उदार और लचीला सिद्ध होता है। भले ही कानून दो विवाह को वैधता प्रदान ना करे किंतु सामाजिक जीवन की अनेक परिस्थितियां मनुष्य को ऐसे विकल्पों की ओर धकेल देती हैं, जिनमें एकाधिक विवाह विचित्र नहीं प्रतीत होते। संतान-कामना की पूर्ति हेतु द्विविवाह की प्रवृत्ति, यदि सर्वसामान्य भी हो, जीवनगत विडंबनाओं में अस्वाभाविक भी नहीं ठहरती।13 इसी प्रकार पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री अधीनता का कोई जैविक आधार है या स्त्री पुरुष भेद को सामाजिक प्रक्रियाओं ऐतिहासिक सत्ता संरचनाओं ने मूल्यगत असमानता का रूप दे दिया है, के संदर्भ में भी नामवर सिंह की स्पष्ट राय रही है,जो काम पुरुष कर सकता है, वह काम स्त्री भी कर सकती है। हमारा समाज पुरुष प्रधान है लेकिन हमारे यहां ऐसे भी दौर रहे हैं जब स्त्री प्रधान रही है। हमारे यहां कारू कामा या कोस्त्री-देश ही कहा जाता है। देश की ऐसी जनजातियां भी हैं जहां स्त्री की प्रधानता है। इसलिए हमारे यहां शक्ति की पूजा होती है और कहा जाता है कि बिना शक्ति के शिवशवहै। शिव मेंशक्ति है, उसे हटा दे तो शिवशवहो जाएगा।14 नामवर सिंह ने स्त्री-अधिकार आन्दोलन की उग्र रूपरेखाओं पर लगातार प्रश्नचिह्न  अंकित किए हैं। उनकी दृष्टि में इन आन्दोलनों का उद्देश्य, अपनी मूल संवेदना में, अक्सर अस्पष्ट हो जाता है। वे इंगित करते हैं कि स्त्रियों के कामकाजीहोने की आड़ में अधिकार-चेतना की तीव्रता को समझना ऐतिहासिक भूल है क्योंकि भारतीय सामाजिक-यथार्थ में स्त्रियां कभी अकर्मण्य नहीं रही, उनका श्रम सदा अदृश्य रहते हुए भी पारिवारिक एवं सामाजिक संरचना की रीढ़ रहा है।

नामवर सिंह एक महत्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत करते हैं कि स्त्री-विमर्श का केंद्र केवल देह और यौनिकता पर सिमटकर उसके गहरे आत्मिक, भावनात्मक और वैचारिक शोषण को ओझल कर देता है। वे कहते हैं,  ‘अधिकांश स्त्री लेखन में मैं दो ही बातें देखता हूं। एक तो ज्यादातर चर्चा सेक्स की होती है, जैसे स्त्री का यौन-शोषण ही सबसे बड़ा शोषण है। शरीर को इतना महत्त्व देना और उसकी आत्मा, उसका हृदय, उसकी भावनाएं, उसके विचार इन सबका जो शोषण होता है, उस पर चर्चा नहीं होती।’…स्त्री-विमर्श में यह समझा जा रहा है कि दुस्साहस सबसे बड़ा मूल्य हो गया है। कुछ वर्जित शब्द हैं, उनका प्रयोग अगर कोई स्त्री कर देती है, तो समझते हैं, बड़ी साहसी है।15

मार्क्सवादी नारीवाद का तर्क रहा कि महिलाओं के उत्पीड़न का मूल कारण पूंजीवाद है, जिसमें किसी भी चीज की मूल्यवत्ता उसके उपयोग मूल्य से ज्यादा विनिमय मूल्य द्वारा परिभाषित होती है। स्त्री-देह का सास्कृतिक और दृश्य रूप किन्हीं प्रोडक्ट या सपनों के साथ बेचा जाता है।  नामवर की कड़ी दृष्टि इस बात पर भी रही है कि  बाजारवाद का सबसे बड़ा असर आज के परिवार पर, पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है और साथ स्त्री के शरीर को माल बनाकर फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है। बाजारूमाल हो गई है औरत और औरत का शरीर स्त्रीवादी विमर्श इस मामले में बहुत ज्यादा सावधान और सतर्क है।हम लोगों ने स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों पर इतना ध्यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था।16

वैचारिक स्थापना, विश्लेषण, व्याख्या और निष्कर्ष की आचार्य शुक्ल-प्रणीत पद्धति का अवलंबन करने वाले नामवर सिंह भविष्य-दृष्टा की भांति कहते हैं, ‘यहां तो पुरुष बनाम स्त्री के द्वंद्व और संघर्ष का माहौल है। बात पुरुष-सत्ता के बरक्स स्त्री-सत्ता की हो रही है, जबकि स्वयंसत्ता पर्दे के पीछे या ऊपर आसमान में हँस रही है। वस्तुतः स्त्री-विमर्श प्रकारांतर से सत्ता-विमर्श में परिवर्तित हो चला है, जिसकी परिणति चिंताजनक है!मुक्ति अकेले की नहीं होती।’’ 17 क्योंकि मुक्तिबोध की तर्ज़ पर उनका व्यक्ति भी समाज-निरपेक्ष नहीं है।

नामवर सिंह वास्तविक साहित्य को स्त्री-शोषण का स्वाभाविक प्रतिरोध माना है। उनका मत है कि पुरुष रचनाकारों ने भी अपनी कृतियों में स्त्री-पीड़ा के पक्ष में स्वर उठाए हैं। इसके विपरीत, कुछ स्त्री-लेखिकाओं और कवयित्रियों का उग्र स्वर उन्हें ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सम्पूर्ण पुरुष-समाज के विरुद्ध एक समर-घोष कर रही हों, जो उनके अनुसार तो साहित्यिक रूप से सार्थक है और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यौनिकता की अतिरंजना को भी आलोचक नामवर ने गम्भीर आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है। साहित्य में अल्प मात्रा की अतिरंजना को स्वाभाविक माना है पर यथार्थ से पलायन को अनुचित कहा है। कृष्णा सोबती के यारों के यारतथा मृदुला गर्ग के चित्तकोबरामें दिखाई देने वाली अश्लीलता के बिन्दुओं को वे इस पैनी दृष्टि से आलोचित करते हैं कि साहित्य में सामाजिक-यथार्थ का चित्रण आवश्यक है किन्तु सेक्स-विकृतियों को विचलनकी तरह ही दर्ज किया जाना चाहिए, उन्हें मानकबनाकर लोकप्रियता अर्जित करना साहित्य की मर्यादा का हनन है।

प्राचीन साहित्यिक परम्परा का मूल्यांकन करते हुए नामवर सिंह ने अपभ्रंश के महाकवि स्वयंभू के पउमचरिउकी सीता की छवि का विश्लेषण किया है, जिसका उल्लेख यहां अप्रासंगिक नहीं। स्वयंभू की अत्यन्त तेजस्विनी सीता अग्नि-परीक्षा के क्षणों में राम के समक्ष यह कहने का साहस रखती है कि गुणवान पुरुष भी स्त्री के प्रति अविश्वासी हो सकते हैं।परंतु अग्नि-परीक्षा के उपरान्त वही सीता कर्म-फल के तर्क से राम के दोषों को निरस्त कर देती है। नामवर सिंह के विचार में, यह परिवर्तन कवि की दृष्टि का अवनमन है। महिमामयी स्त्री को स्वयंभू कर्म-फल-विश्वासी नैतिकता के बोझ  तले उतार देते हैं। अग्नि-प्रवेश से उदीप्त होकर निकलने वाली सीता तेजोमयी होनी चाहिए थी पर कवि की संरचना उसे म्लान, धूसर चिंगारी में रूपान्तरित कर देती है, यही कवि-कल्पना की सबसे बड़ी विफलता है। यानि नामवर सिंह एक निरपेक्ष, निष्पक्ष आलोचना दृष्टि को लेकर चलते दिखते हैं।

किंतु इतना सब होने पर भी हिन्दी में स्त्री-चिंतन की आधार मीरा और महादेवी वर्मा के विषय में नामवर सिंह  के विचार एक भिन्न आयाम में प्रस्तुत होते हैं। दूसरी परंपरा की खोजमें मीरा बहस से बाहर है और यह भक्तिकाल के महत्वपूर्ण कवि की उपेक्षा मात्र नहीं है, वरन् भक्ति आंदोलन के भीतर भारतीय स्त्री की पराधीनता के बोध और स्वाधीनता की आकांक्षा को व्यक्त करने वाली रचनाशीलता की उपेक्षा है।18 इसी प्रकार हिन्दी में स्त्री-लेखन पर नामवर सिंह ने स्पष्ट टिप्पणी की है किमराठी में स्त्रियों ने भी आत्मकथा लिखी। स्त्री-विमर्श आजकल बहुत हो रहा है। जिस प्रदेश में, जिस भाषा में स्त्रियों ने सबसे पहले आत्मकथा लिखना शुरू किया है, समझना चाहिए कि तब से उसे प्रदेश एवं देश में स्त्री की मुक्ति का प्रारंभ होता है। और हिन्दी में? आज भी कृष्णा सोबती ने नाम बदलकरहशमतनाम से अपने बारे में लिखा। महादेवी जी ने संस्मरणों के माध्यम से भक्तिन के बारे में लिखा लेकिन अपनी आत्मकथा उन्होंने भी नहीं लिखी। सुभद्रा जी ने भी नहीं लिखी।इससे पता चलता है कि स्त्री की अलग पहचान हिन्दी में अभी तक नहीं बन सकी है।19 किंतु साथ ही ‘छायावाद पुस्तक में केवल दो स्थानों पर महादेवी की कविताओं में अभिव्यक्त सामाजिक संतोष और प्रकृति को प्रिया बनाने का उल्लेख भर करकेश्रृंखला की कड़ियांको लगभग भूला ही देते हैं। उषा प्रियंवदा की वापसी कहानी को भाववादी आत्मपरायेपन से जोड़कर एलियनेशन से जोड़ते हैं। चंद्रकांता से लेकर मैत्रयी पुष्पा तक के लेखन पर सवाल उठाते हैं। बेशक सवाल उठाना यहां गलत नहीं है पर सिरे से नकारना नामवर सिंह की पुरुषत्व मानसिकता के परिणाम का भ्रम पैदा कर देता है।

निष्कर्ष : निष्कर्षतः नामवर सिंह की संपूर्ण स्त्री-दृष्टि समर्थन और संकोच, दोनों के बीच संतुलित एक द्वंद्वात्मक संरचना के रूप में अंकित होती है और इसी द्वंद्व में उसकी आलोचनात्मक प्रामाणिकता तथा ऐतिहासिक महत्ता निहित है। नामवर सिंह जहां एक ओर पर्याप्त संवाद बिना ही स्त्री-अनुभव की अपेक्षाकृत उपेक्षा करते हैं और स्त्री-विमर्श की जटिलताओं को उग्रताया एकांगीपनके आरोपों में सीमित कर देते है, वहीं दूसरी ओर स्त्री-जीवन को इतिहास, समाज और संस्कृतिसभ्यता की व्यापक संरचनाओं में समझते हैं। मार्क्सवादी आलोचना के पुनर्पाठ के माध्यम से वर्ग-चेतना में निहित लैंगिक असमानताओं तथा उपभोक्तावादी संस्कृति द्वारा स्त्री-देह के वस्तुकरण को रेखांकित करते हैं। स्पष्ट आग्रह रखते हैं कि स्त्री-लेखन अत्युत्साही यौनिकता या भावोच्छ्वास से मुक्त होकर संतुलित कलात्मकता में अपनी स्वतंत्र संवेदना और सामूहिक स्वतंत्रता का लक्ष्य तलाशे, जिससे सहमतिअसहमति रखी जा सकती है पर जिसे कतई अनदेखा नहीं किया जा सकता।

संदर्भ :

1.    नामवर सिंह, वाद विवाद संवाद, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, तीसरी आवृति2007, पृ.143
2.    रोहिणी अग्रवाल, समालोचन ऑनलाइन पत्रिका, लेख-आलोचना का श्वेत पत्र, 20 जून, 2022
3.    सुधीश पचौरी, आलोचना से आगे उत्तर आधुनिकतावादी और उत्तरसंरचनावादी विमर्श, राधाकृष्ण प्रकाशन, पहली आवृति 2006, पृ.198
4.    सुजाता, आलोचना का स्त्री-पक्ष, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं. 2022, पृ.42
5.    प्रदीप सक्सेना (संपा.), उद्भावना पत्रिका, रामविलास शर्मा का ऐतिहासिक योगदान विशेषांक, (लेख-अर्चना वर्मा, स्त्री दृष्टि और रामविलास शर्मा) पृ.692
6.    रविरंजन (संपा.), आलोचना का आत्म संघर्ष, (लेख-रोहिणी अग्रवाल डॉक्टर मैनेजर पांडे की स्त्री-दृष्टि) वाणी प्रकाशन, 2011, पृ.76
7.    प्रभा खेतान, उपनिवेश में स्त्री, राजकमल प्रकाशन, दूसरी आवृत्ति 2022, पृ.48
8.    जगदीश्वर चतुर्वेदी, समालोचन ऑनलाइन पत्रिका, लेख-उत्तर आधुनिकतावादी आक्षेप और नामवर सिंह, 7 मई 2012
9.    एम.वेंकटेश्वर (अतिथि संपा.), साहित्य-सेतु पत्रिका, विशेषांक-हिंदी आलोचना के शिखर:नामवर, जुलाई-सितंबर2019, पृ.240)
10. नामवर सिंह, बात-बात में बात, समीक्षा ठाकुर (संकलन, संपा.), वाणी प्रकाशन, द्वि.सं.2013, पृ.289-291
11. हेइडी हार्टमैन और एमी ब्रिजेस (संपा), अनहैप्पी मैरिज का मार्क्सिज्म एंड फेमिनिज्म, लुडिया  सारजेट, ब्लैक रोज बुक्स लिमिटेड, 1981, पृ.45
12. नामवर सिंह, बात बात में बात, वही, पृ.259  
13. नामवर सिंह, जमाने से दो-दो हाथ, आशीष त्रिपाठी (संपादक), राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 2019, पृ.123
14. नामवर सिंह, आमने-सामने, विजय प्रकाश सिंह (संपादन, संकलन), राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 2019, पृ.204
15. नामवर सिंह, जमाने से दो-दो हाथ, वही, पृ.124
16. नामवर सिंह, बात-बात में बात, वही, पृ.276
17. वही, पृ.347
18. मैनेजर पाण्डेय, आलोचना की सामाजिकता, वाणी प्रकाशन दिल्ली, द्वि.सं.2008 पृ.70
19. नामवर सिंह, बात-बात में बात, वही, पृ.
287

                                                  

प्रोमिला
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजस युनिवर्सिटी, हैदराबाद, तेलंगाना
promila.du@gmail.com, 8977961191

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
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Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
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