शोध सार : हिंदी की लघु पत्रिकाओं के इतिहास में ‘लहर’ का विशेष स्थान है। यह केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि अपने समय की वैचारिक सक्रियता और साहित्यिक प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है । सीमित संसाधनों के बावजूद ‘लहर’ ने यह सिद्ध किया कि एक पत्रिका अपने दृष्टिकोण, ईमानदारी और वैचारिक स्पष्टता के बल पर साहित्यिक परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप कर सकती है। सन् 1957 में प्रारंभ हुई ‘लहर’ लगभग दो दशकों से अधिक समय तक, कभी नियमित तो कभी अनियमित रूप से प्रकाशित होती रही। इस दौरान उस पर अनेक आरोप भी लगे, किंतु अपनी निर्भीकता और वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण उसने पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी। प्रस्तुत शोधालेख में ‘लहर’ के योगदान का विश्लेषण उसके संपादकीय दृष्टिकोण, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों, आपातकालीन दौर में उसकी भूमिका के परिप्रेक्ष्य में किया गया है।
बीज शब्द : लघु पत्रिका, लहर, सम्पादक, दृष्टिकोण, आपातकाल, साहित्यिक, परिदृश्य, व्यावसायिकता, वैचारिकी, संदर्भ, प्रतिबद्धता |
मूल आलेख : लहर’ प्रारम्भ से ही अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट रही। पत्रिका में राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सभी प्रकार के प्रश्नों पर सक्रिय बहस देखने को मिलती है। हालांकि, संपादकीय दृष्टिकोण के स्तर पर ‘लहर’ का स्वर उसकी प्रकाशित सामग्री की अपेक्षा थोड़ा भिन्न दिखाई देता है। 1957 से लेकर लगभग 1988 तक के विस्तृत कालखंड में ऐसे अवसर अपेक्षाकृत कम मिलते हैं जब ‘लहर’ के संपादकीय किसी गंभीर मुद्दे पर प्रत्यक्ष और स्पष्ट हस्तक्षेप करते हों; किंतु इसे उसकी सीमा के रूप में देखने के बजाय उसकी संपादकीय नीति के एक विशिष्ट स्वभाव के रूप में समझा जाना चाहिए। यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि प्रत्येक अंक में संपादक समकालीन विषयों पर अनिवार्यतः टिप्पणी करे। अनेक बार पत्रिका का संपादकीय मौन भी उसकी दृष्टि का संकेत होता है, जहाँ वह विचार-विमर्श के लिए व्यापक साहित्यिक अवकाश निर्मित करता है।
जब पत्रिका स्वयं विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक प्रश्नों को प्रमुखता से उठाती है, तब यह स्वाभाविक है कि संपादकीय वक्तव्य की प्रतीक्षा की जाती है, फिर भी ‘लहर’ का महत्व इस बात में निहित है कि उसने प्रत्यक्ष टिप्पणी के स्थान पर अपने प्रकाशित लेखों, बहसों और रचनात्मक सामग्री के माध्यम से विचार-दिशा निर्मित की। इस प्रकार उसका संपादकीय स्वर प्रायः अंतर्निहित और संकेतात्मक रूप में सक्रिय दिखाई देता है।
‘लहर’ के अनेक अंकों में संपादकीय स्तम्भ या तो संक्षिप्त रूप में उपस्थित हैं अथवा वह सूचनात्मक स्वर ग्रहण करते हैं, जिसमें वर्तमान या आगामी अंकों की जानकारी दी जाती थी। इसे भी एक प्रकार की पारदर्शिता और पत्रकारीय ईमानदारी के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ संपादक स्वयं को केंद्र में न रखकर सामग्री को प्रमुखता देता है। विशेषांकों में किसी लेखक या भाषा के संदर्भ में उसकी संपादकीय दृष्टि अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट और केंद्रित रूप में सामने आती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आवश्यकता पड़ने पर पत्रिका अपनी वैचारिक स्थिति अभिव्यक्त करने में संकोच नहीं करती थी।
इसके अतिरिक्त, कुछ अवसरों पर ‘लहर’ ने अपने संपादकीयों के माध्यम से लघु पत्रिकाओं के संघर्ष और दायित्वों को प्रभावी रूप से स्वर प्रदान किया है। मई 1968 के संपादकीय में लघु पत्रिकाओं के आर्थिक संकट की ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित किया गया, जो उस समय की साहित्यिक पत्रकारिता की एक महत्वपूर्ण समस्या थी। अगस्त 1968 में प्रकाश जैन ने लघु पत्रिकाओं के दायित्वों को रेखांकित करते हुए उनकी सांस्कृतिक भूमिका को स्पष्ट करते हुए लिखा कि—“हम हर कदम पर ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे हैं | पर यह भी सही है कि मृत्यु निश्चित है –चाहे आज हो या कल| अत: आवश्यक है कि हम आंतरिक शक्ति का सहारा लें और जागरूक लेखकों के साथ अपनी दृष्टि खुली रखकर चलें| कोई पत्रिका जीवित रहती है या असमय मर जाती है ये बात कतई महत्त्व नहीं रखती; महत्त्व रखती यह बात कि अगली आने वाली पत्रिका का मार्ग वह अपने जीवन-काल में प्रशस्त करती है या नहीं|”¹ स्पष्ट है कि लघु पत्रिकाओं का भविष्य प्रायः अनिश्चित रहा है। आर्थिक संसाधनों के अभाव में उनका बंद हो जाना कोई असामान्य घटना नहीं रही, अनेक पत्रिकाएँ समय-समय पर प्रकाशित हुईं और अल्पावधि में विलुप्त भी हो गईं, जिनका स्मरण तक शेष नहीं रहा। ऐसे परिदृश्य में ‘लहर’ द्वारा लघु पत्रिकाओं के प्रश्न को गंभीरता से उठाया जाना उसकी सजग साहित्यिक चेतना का द्योतक है। यहाँ प्रमुखता प्रसिद्धि या व्यापक पहचान को नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्धता को दी गई है—ऐसी प्रतिबद्धता, जो अपने जीवनकाल में अन्य पत्रिकाओं के लिए मार्गदर्शक उदाहरण प्रस्तुत कर सके।
यह भी स्वीकार करना होगा कि प्रत्येक पत्रिका इस भूमिका का निर्वाह समान रूप से नहीं कर पाती। इसके पीछे अनेक व्यावहारिक कारण रहे हैं, जिनमें प्रमुख है—अनियमित प्रकाशन। समय पर अंक प्रकाशित न होने की स्थिति में पत्रिका को लेखकों और सीमित पाठक-वर्ग दोनों की आलोचना का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त स्तरीय रचनाओं का अभाव, लेखकों के साथ असमान व्यवहार तथा सामग्री के चयन में शिथिलता जैसी चुनौतियाँ भी प्रकाशन-प्रक्रिया को प्रभावित करती रही हैं। ‘लहर’ का महत्त्व इस बात में निहित है कि उसने इन प्रश्नों को अनदेखा करने के स्थान पर उन्हें विमर्श का विषय बनाया।
इसी संदर्भ में प्रकाश जैन अपने संपादकीय में लिखते हैं— “लघु पत्रिकाओं की कुछ स्थिति ऐसी है कि बहुत बड़ी संख्या में निकलने के कारण इनके स्तर और नियमितता में सुधार इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि आज के रचनाकार का पाठक-वर्ग लेखक-वर्ग तक ही सीमित है | .....हिंदी जानने वालों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद अधिकतर पत्रिकाएँ उतनी ही प्रतियाँ छपवाती हैं, जितनी की उन्हें ज़रूरत होती है |”²
उपर्युक्त पंक्तियाँ उस समय की साहित्यिक संरचना में अंतर्निहित विडंबनाओं का उद्घाटन मात्र नहीं करतीं, बल्कि ‘लहर’ की परिपक्व, आत्मसमीक्षात्मक तथा उत्तरदायी संपादकीय दृष्टि को भी उजागर करती हैं। इनके माध्यम से पत्रिका लघु पत्रिका आंदोलन की वास्तविकताओं का संयत विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए उस पर गंभीर एवं चिंतनशील हस्तक्षेप करती प्रतीत होती है।
वास्तव में लघु पत्रिकाओं का पाठक-वर्ग प्रायः सीमित रहा है, जो मुख्यतः लेखकों, शोधार्थियों और संलग्न साहित्यिक समुदाय तक सिमट जाता है। सामान्य साहित्य-रुचि रखने वाले पाठकों में इनके प्रति अपेक्षित सक्रियता कम दिखाई देती रही है। यह स्थिति केवल किसी एक कालखंड की नहीं, बल्कि अतीत से वर्तमान तक एक निरंतर चुनौती के रूप में विद्यमान रही है। परिणामतः लघु पत्रिकाएँ समय-समय पर अस्तित्वगत संकट का सामना करती रही हैं।
‘लहर’ ने इस संकट की ओर संकेत करते हुए केवल परामर्शात्मक भूमिका ही नहीं निभाई, बल्कि उन बुनियादी प्रश्नों को भी उठाया जो इस स्थिति के मूल में निहित थे। जनवरी 1969 के सम्पादकीय ‘लघु या छोटी पत्रिकायें’ में प्रकाश जैन ने नामकरण पर प्रश्न उठाते हुए लिखा—“यह नामकरण ही गलत नहीं है क्या ? छोटी पत्रिका माने ? क्या वैसा ही कुछ, जैसे भारत में छोटा आदमी, छोटी जात ? या फिर पत्रिका का छोटा आकार ? हँसी की बात नहीं है यह ? हम सहस्त्स्राब्दियों से चले आ रहे ऊँच-नीच, छोटे-बड़े के भेद को मिटाने का प्रपंच रचकर इस भेदभाव की शाखाएँ–उपशाखाएँ बढ़ाते जा रहे हैं|”³
यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि प्रकाश जैन पत्रिकाओं को ‘छोटी’ या ‘बड़ी’ श्रेणियों में विभाजित करने की मानसिकता से असहमत थे। उनके अनुसार ऐसा नामकरण अनायास ही हीनता-बोध को जन्म देता है और साहित्यिक प्रयासों के मूल्यांकन को आकार या संसाधनों के आधार पर निर्धारित करता है। विशेषतः जब इन पत्रिकाओं का वैचारिक क्षितिज व्यापक हो और उनका उद्देश्य गंभीर साहित्यिक तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हो, तब उन्हें ‘लघु’ कहना उनकी भूमिका को सीमित करना प्रतीत होता है।
प्रकाश जैन ने इस प्रश्न को केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि तार्किक आधार पर उठाते हुए यह सुझाव भी प्रस्तुत किया कि इन्हें ‘अव्यावसायिक पत्रिकाएँ’ कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि उनका उद्देश्य लाभार्जन नहीं, बल्कि साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का संवर्धन है। इस प्रकार ‘लहर’ का यह हस्तक्षेप उसकी संपादकीय सजगता का द्योतक है, जिसके माध्यम से उसने लघु पत्रिका आंदोलन की पहचान को अधिक स्पष्ट और सम्मानजनक रूप देने का प्रयास किया।
लहर’ पत्रिका अव्यावसायिक पत्रिकाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण और प्रेरक उदाहरण के रूप में उभरी, किंतु इसके साथ ही वह समय-समय पर बड़ी पत्रिकाओं की आलोचना और प्रश्नों के घेरे में भी रही। दिनमान’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने ‘लहर’ पर अर्थोपार्जन का आरोप लगाया, जिसके प्रत्युत्तर में संपादक मनमोहिनी ने स्पष्ट किया—“मैंने कहा था कि ‘लहर’ ने स्वयं को कभी छोटी पत्रिका नहीं कहा और ‘लहर’ छोटी पत्रिका है भी नहीं।….....छोटी पत्रिका किसी की जीविका का साधन नहीं हो सकती | वह वैसे भी अल्पायु होती है प्राय : | किन्तु ‘लहर’ हमारी जीविका का साधन है | इस बात को अब इस रूप में प्रचारित किया जा रहा है, कुछ गलत लोगों द्वारा कि मनमोहिनी जी ने कहा है, ‘लहर’ अर्थोपार्जन कर रही है | मुझे दया आती है, शब्दों का इतना गलत अर्थ समझने वालों पर या फिर गलत न भी समझ कर गलत अर्थ लगाने वालों पर |”⁴
यहाँ ‘जीविका का साधन’ का तात्पर्य प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ से नहीं, बल्कि उस वैचारिक और संपादकीय प्रयोजन से था, जिसकी पूर्ति ‘लहर’ के माध्यम से की जा रही थी। किंतु ‘दिनमान’ ने इस कथन को भिन्न अर्थ में ग्रहण कर विवाद को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप पत्रिका-जगत में विस्तृत बहस प्रारंभ हो गई।
इसी संदर्भ में ‘विजयबहादुर सिंह’ ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा—“मुझे व्यावसायिकता और अव्यावसायिकता का यह नारा उतना ही बेमानी और शरारती नज़र आता है जितना कुछ दिनों पहले का – साहित्यिक कहानी बनाम लोकप्रिय कहानी| ....अपनी बात कहने के लिए जब आप दूसरों पर आक्षेप करते हैं तो इस बात के लिए आपको तैयार रहना चाहिए कि दूसरे भी आपका विरोध कर सकते हैं| .....दिनमान ने छोटी पत्रिकाओं पर छींटाकशी की है| मैं समझता हूँ उसने तो केवल जवाब दिया है| क्या छोटी पत्रिकाओं ने ‘व्यावसायिक पत्रों’ पर कम छींटाकशी की है ?......अपना आय-व्यय विवरण प्रकाशित कर, दे मारिए दिनमान के मुंह पर और साबित कर दीजिये कि आपने अर्थोपार्जन नहीं किया है|”⁵
विजयबहादुर सिंह ने एक ओर ‘दिनमान’ के आरोपों को एकतरफा मानने से इंकार किया, तो दूसरी ओर ‘लहर’ से पारदर्शिता की अपेक्षा भी व्यक्त की। इसी क्रम में यह भी कहा गया—“मैं नहीं जानता कि ‘लहर’ ने कितना अर्थोपार्जन किया है ....लेकिन ‘लहर’ का अन्य श्रमजीवी पत्रिकाओं और उनके समर्थकों के प्रति रुख हमेशा तर्कसंगत नहीं रहा है| बिना तथ्यों की पड़ताल किए आप भी इस तरह के आक्षेप छापते रहते हैं| आप ज़रा-ज़रा सी बातों पर भड़क कर, अपने गंभीर उत्तरदायित्वों को धता बता देते हैं, इस दृष्टि से ‘लहर’ और ‘दिनमान’ में क्या फर्क रह जाता है|”⁶
इन प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट होता है कि ‘लहर’ को सर्वसम्मत समर्थन प्राप्त नहीं था। वह वैचारिक मतभेदों और बहसों के केंद्र में थी। उस पर विज्ञापन तथा आर्थिक सहयोग मिलने के बावजूद पारिश्रमिक न देने जैसे आरोप भी लगाए गए। तथापि यह स्वीकार करना होगा कि लघु अथवा अव्यावसायिक पत्रिकाओं का आर्थिक संघर्ष स्वभावतः जटिल और दीर्घकालिक होता है, जिसे सीमित संसाधनों के आधार पर सरलता से सुलझाया नहीं जा सकता।
इन समस्त विवादों और आरोप-प्रत्यारोपों के बीच भी ‘लहर’ ने अपनी संपादकीय नीतियों से समझौता नहीं किया। उसने बहसों का सामना किया, प्रत्युत्तर दिए और अपने पक्ष को सार्वजनिक रूप से रखा। उसके संपादकीयों में लघु पत्रिकाओं के आर्थिक संकट, उनके संघर्ष और वैचारिक दृष्टि को गंभीरता से उठाया गया तथा उन्हें व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने का प्रयास किया गया। इसी संपादकीय साहस और संवादधर्मिता ने ‘लहर’ को समकालीन पत्रिका-जगत में एक विशिष्ट पहचान प्रदान की।
‘लहर’ पत्रिका अपने समय की महत्त्वपूर्ण लघु पत्रिकाओं में से एक रही है, जिसने सामान्यतः राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक मुद्दों पर निर्भीक उपस्थिति दर्ज कराई। आपातकाल
(1975–77) का कालखंड भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक जटिल और दमनकारी दौर था, जिसमें अभिव्यक्ति पर नियंत्रण, सेंसरशिप और व्यापक भय का वातावरण विद्यमान था। ऐसी परिस्थितियों का प्रभाव स्वाभाविक रूप से साहित्यिक पत्रिकाओं पर भी पड़ा। इस संदर्भ में ‘लहर’ की भूमिका को उस समय की वस्तुगत सीमाओं और परिस्थितियों के भीतर समझना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
फ़रवरी 1978 के अंक में ‘पत्र-प्रतिक्रिया’ स्तम्भ के अंतर्गत कुंतल कुमार जैन की एक विस्तृत टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने आपातकाल के दौरान ‘लहर’ की भूमिका पर प्रश्न उठाया। वे लिखते हैं—“इमरजेंसी का विरोध करने वाले और उसके खूंख्वार रूप को पहचानने और उसका प्रतिकार करने वाले समूचे साहित्य में या समूचे भारतीय साहित्य में इने गिने लोग ही थे लेकिन आज जब इमरजेंसी नहीं है तो उसका विरोध करने वाली भेड़ों के झुंड के झुंड हर जगह दिखाई दे रहे हैं | अजीब विडम्बना है कि ‘लहर’ में भी यह लहर इमरजेंसी के बाद आई है| समझ नहीं आता कि अब इमरजेंसी है ही नहीं तो इसके खिलाफ इस शोर गुल क्या मतलब है ?”⁷
यह टिप्पणी वस्तुतः उस व्यापक साहित्यिक परिदृश्य पर भी लागू होती है, जहाँ भय और सेंसरशिप ने प्रत्यक्ष प्रतिरोध की संभावनाओं को सीमित कर दिया था। इसके प्रत्युत्तर में प्रकाश जैन ने अपने सम्पादकीय में आपातकालीन अनुभवों को सरल निषेध की दृष्टि से देखने का विरोध किया। वे लिखते हैं—“कुंतल भाई ने कहा है ‘जो हो चुका, उसका आज क्या रोना है ?’ अर्थ यह हुआ कि आदमी बीते क्षण को एक दम भूल जाय, या नकार दे, वीतरागी हो जाए ? पर यह क्या संभव है? और क्या ऐसा होना चाहिए?.......कुंतल भाई को विश्वास का करना चाहिए कि ऐसे भी लोग थे जिन्होंने उन दिनों जमकर मंच से ऐसी आक्रोशी कविताओं का जी भर पाठ किया और उस समय ऐसे अफसर भी थे जो कवि सम्मलेन के बीच से उठकर चले जाते थे, ताकि वे कवि उन कविताओं को सुना सकें |....और आपातकाल मात्र आपातकाल ही था, उस समय जनहित की दृष्टि से कुछ नहीं हुआ, यह कहना भी अपने साथ छल करना है |”⁸
प्रकाश जैन के इस उत्तर से स्पष्ट है कि वे आपातकाल को एकांगी दृष्टि से नहीं, बल्कि अनुभव की जटिलता के साथ देखना चाहते थे। इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए कुंतल कुमार जैन का वह मार्मिक वक्तव्य भी उल्लेखनीय है, जिसमें वे लिखते हैं—“आपातकाल आते ही मेरे तो हाथ-पाँव फूल गए थे| तब एक भले आदमी ने मुझ से कहा था कि छोड़ो आप इन पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना, और पढ़ो गांधी के लेखों को, जो बिना ज़रूरत के कुछ भी नहीं लिखते थे| इसके बाद मैं ज्यों-ज्यों गांधी को पढ़ता गया, मुझे मेरा खोया बल वापस मिलने लगा| कहने का मतलब यह है कि हम शब्दों को बिना ज़रूरत अनाप-शनाप प्रयोग न करें तो अच्छा है| तब थोड़े दिन बाद जाकर मैंने लिखा –पहले होठों से कहा गया, तुम जीभ के कहने में मत आओ| बाद में दांतों ने जीभ से कहा, ‘तुम अपनी मर्यादा में रहो| अब हम ही तुम्हारे पहरेदार हैं| रक्षा भार हम पर है और देखो, देखो! सेना हमारा शरीर है| अब हर चीज पहले हम चख लेंगे| फिर मौसम अनुकूल होने पर तुम्हें देंगे| बात नयी भी है और पुरानी भी है| सिंहासनों से जुड़ी इसकी कहानी भी है कि जीभ जब सच के साथ हो जाती है तो कड़वी नीम हो जाती है| फिर मुंडी पकड़कर, गला दबाकर, बाहर निकालकर सरे आम रास्ते पर काट दी जाती है| या दांतों के पीछे डाल दी जाती है| .........कोई भी हिंदी पत्रिका इसे छाप न सकी| कोई ‘वेट एंड सी’ की बात कहने लगा, किसी ने उत्तर ही नहीं दिया| किसी ने चुपचाप कविता लौटा दी ......हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की यथास्थिति को बदलने का शोर मचाने वाले अव्यावसायिक संपादक भी बदल गए थे|”⁹
उपर्युक्त कथन उस भयाक्रांत और नियंत्रणपूर्ण वातावरण का सजीव चित्र उपस्थित करता है, जिसमें अभिव्यक्ति मात्र लेखन की क्रिया न रहकर साहस और जोखिम का प्रश्न बन गई थी। प्रकाशन भी एक प्रकार की, उत्तरदायित्वपूर्ण और संभावित रूप से संकटपूर्ण प्रक्रिया में रूपांतरित हो चुका था। ऐसे समय में अनेक पत्रिकाओं ने प्रत्यक्ष टकराव के स्थान पर संयमित और सावधान संपादकीय दृष्टि का चयन किया। ‘लहर’ को भी इसी व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना अधिक संगत प्रतीत होता है। विशेष उल्लेखनीय यह है कि आपातकाल के उपरांत उसने उस कालखंड के अनुभवों की आलोचनात्मक पुनर्समीक्षा में सक्रिय भागीदारी की और उन्हें विमर्श का विषय बनाया।
मई 1978 के अंक में प्रकाशित कविता ‘डर’ इसी मनःस्थिति का उत्तम उदाहरण है—
“इतने ज्यादा डरे हुए हैं वे लोग
कि खतरे को खतरा कहते हुए
खुद लड़खड़ाने लगते हैं
चेहरे की संतुष्ट सुर्खी
पीली पड़ने लगती है
आँखें गोल –गोल घूमती हुई
सूंघने लगती हैं कुछ इस तरह
कि आस-पास ही
कहीं कोई डर तो नहीं |”¹⁰
यह कविता उस सामूहिक मानसिकता का कलात्मक उद्घाटन करती है, जिसमें भय केवल बाह्य परिस्थिति न रहकर आंतरिक संस्कार का रूप ग्रहण कर लेता है। सामाजिक व्यवहार, भाषा और प्रतिक्रिया—सब कुछ एक अदृश्य आशंका से संचालित प्रतीत होता है। इस प्रकार, ‘लहर’ का आपातकाल-संबंधी दृष्टिकोण एक जटिल ऐतिहासिक परिस्थिति में संपादकीय संतुलन, आत्मसंयम और उत्तरदायित्व के समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है। आपातकालोत्तर काल में उसकी आलोचनात्मक सक्रियता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि वह उस अनुभव को विस्मृति के गर्त में नहीं डालना चाहती थी, बल्कि गंभीर पुनर्विचार के माध्यम से साहित्यिक दायित्व का निर्वाह करने के पक्ष में थी।
निष्कर्ष : निष्कर्षत: यह बात स्पष्ट है कि ‘लहर’ अपने समय की एक प्रभावशाली साहित्यिक पत्रिका रही, जिसने सीमित साधनों और जटिल ऐतिहासिक परिस्थितियों के बीच भी वैचारिक संवाद की निरंतरता को बनाए रखा। यद्यपि उसका संपादकीय स्वर प्रायः संयत और संकेत प्रधान रहा, फिर भी उसी के माध्यम से साहित्यिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रश्नों के प्रति उसकी गहरी सजगता और प्रतिबद्ध दृष्टि स्पष्ट रूप में प्रकट होती है।
संदर्भ :
सहायक प्राध्यापक (हिंदी), डॉ. बी.आर.अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली, दिल्ली -110006.
nkjn989@gmail.com, 9953058803

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