शोध आलेख : नामवर सिंह की सौंदर्य एवं कला-दृष्टि : विशेष संदर्भ भारतीय सौंदर्यशास्त्र / पुष्पराज यादव

नामवर सिंह की सौंदर्य एवं कला-दृष्टि : विशेष संदर्भ भारतीय सौंदर्यशास्त्र
- पुष्पराज यादव



शब्दानां विविनक्ति गुम्फनविधीनामोदते सूक्तिभिः
सान्द्रं लेहि रसामृतं, विचिनुते तात्पर्यमुद्रां यः।
पुण्यैः सङ्घटते विवेक्तृ-विरहादन्तर्मुखं ताम्यतां
केषामेव कदाचिदेव सुधियां काव्य-श्रमज्ञोजनः।।


(अर्थात् किसी कवि को बड़े पुण्य प्रभाव से काव्यरचना के परिश्रम को समझने वाला ऐसा विद्वान-आलोचक व्यक्ति प्राप्त होता है, जो शब्दों की रचना-विधि का भली-भाँति विवेचन करता है, सूक्तियों-अनोखी सूझों से आह्लादित होता है, काव्य के सघन रसामृत का पान करता है और रचना के गूढ़ तात्पर्य को ढूँढ निकालता है)

राजशेखर : काव्यमीमांसा

 

हिंदी आलोचना और उसके विस्तृत-वैविध्यमय आधुनिक इतिहास के संदर्भ में भारतेंदु-युगीन आलोचकों से लेकर अब तक की लंबी परम्परा रही है। जहाँ अन्यायन्य दृष्टियों और आग्रहों से आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि का काम जारी रहा। इस क्रम में तत्कालीन आरंभिक हिंदी साहित्येतिहास-लेखक, भारतेंदु-युगीन प्रमुख कवि और निबंधकार, सरस्वती पत्रिका और महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दर दास, छायावादी कवि और आलोचक, रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेई, लक्ष्मीकांत वर्मा, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, मैनेजर पांडेय और विजयदेवनारायण साही आदि प्रमुख आलोचक हैं। ध्यातव्य है कि हिंदी की परिपुष्ट और समग्र सौंदर्य-विचार-दृष्टि को विकसित करने वाले रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ही हैं। नामवर सिंह अपने आलोचना-कर्म से पूर्व कवि-कर्म में रमे हुए थे, यह आलोचना और सौंदर्य-विचार का बीड़ा उन्होंने बाद में उठाया। जैसा कि वे स्वयं कहते थे, ‘आए थे हरिभजन को, औंटन लगे कपास।

किसे ज्ञात था यह कपास का औंटना एक दिन रचना और आलोचना दोनों के सृजन अथवा मूल्यांकन का नया अध्याय या यूँ कहें कि मील का पत्थर साबित होगा। नामवर सिंह ने अपनी पुष्ट-बौद्धिक और वैचारिक-क्षमता का परिचय अपने आलोचना-सिद्धांत को विकसित कर के दिया। यदि राजशेखर की उक्त पंक्तियों को उनके संदर्भ में पढ़ा जाये तो अतिशयोक्ति होगी।

सौन्दर्यशास्त्र: उद्भव और चिंतन-

दर्शन एवं ललित कलाओं (Fine Arts) के अध्ययन एवं चिंतन के क्षेत्र में यह तथ्य सर्वमान्य है कि कला के समग्र मूल्यांकन और विवेचन के लिए सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) ही सर्वाधिक उपयुक्त निकाय है। विभिन्न पाश्चात्य और भारतीय कला-दर्शनशास्त्रियों ने इसेललित कलाओं या संवेदनाओं का दर्शन भी कहा है। सौन्दर्यशास्त्र के समग्र कलाओं, साहित्य तथा प्रकृति-सौंदर्य के अध्ययनरूप का प्रस्थान-बिंदु हमें प्रथमतः पाश्चात्य विचारकों, तत्पश्चात् भारतीय साहित्य तथा आलोचना में उसके कुछ सूत्र अनुस्यूत दिखाई पड़ते हैं। इसे सामान्यतः दर्शन की एक शाखा के रूप में देखा जाता है और उसका अनुशीलन क्षेत्र वस्तुतः ज्ञान या संवेदनात्मक-ज्ञान के विश्लेषण (Metaphysical Knowledge in Sense), कला और कलाकार के अंतःसंवेद्य संबंधों (Relation between Arts and Artist) को समझने से है। जैसा कि प्रसिद्ध सौंदर्यशास्त्रीय-विचारक और इतिहासकार बर्नार्ड बोसांके ने अपने ग्रंथहिस्ट्री ऑफ़ ऐस्थेटिक्सकी भूमिका में लिखा है, “AESTHETIC theory is a branch of philosophy, and exists for the sake of knowledge and not as a guide to practice. ___ The aesthetic theorist, in short, desires to understand the artist, not in order to interfere with the letter, but in order to satisfy an intellectual interest of his own.”[1]

(अर्थात् सौन्दर्यशास्त्र मूलतः दर्शन की एक शाखा है और उसका उद्देश्य ज्ञान अर्जन करना है की कला-स्रष्टा का निर्देशन। सौन्दर्यशास्त्र का अध्येता वस्तुतः कलाकार को समझने की चेष्टा करता है कि उसके कार्य में हस्तक्षेप।)

Aestheticsको हिंदी मेंसौन्दर्यशास्त्र, ‘लालित्य-शास्त्र’, ‘नंदन-शास्त्रआदि कहा जाता है, जो मूलतः ग्रीक भाषा केatoQnTikos’ से बना है। कला-विवेचन और चिंतन के क्रम में यही ग्रीक शब्द बाद मेंAesthesisऔर विद्वानों ने इसका अर्थऐन्द्रिय-सुख की चेतनामाना। इसAesthesisको सर्वप्रथम सन् 1750 ई० में अलेक्जेंडर बाउमगार्टन नेAestheticsके रूप में परिभाषित किया। नामवर सिंह ने इसऐस्थेटिक्सका अर्थ कांट और संतायना की मान्यता से मिलता-जुलता आस्वाद या सौंदर्य (Taste or Beauty) के रूप में ग्रहण किया। ध्यातव्य यह है कि नामवर सिंह ने जो अर्थ ग्रहण किए वे दोनों ही आत्मवादी या तत्त्वमीमांसीय-सौंदर्यशास्त्र के मूल दार्शनिक मतों में से एक माने जाते हैं; जबकि वैचारिक धरातल पर नामवर सिंह मार्क्सवादी विचारों के अनुरूप रूपवाद या संरचनावाद के अधिक समीप हैं। इस दृष्टि से नामवर सिंह का सौन्दर्यबोध स्वतः हीद्वंद्वात्मकताका अभिप्राय बन गया है। इसीऐन्द्रिय-सुख के चित्या आत्मवादी-सौंदर्यबोध को पाश्चात्य दार्शनिकों ने समय-समय पर साहित्य और ललित-कलाओं के परिप्रेक्ष्य में अधुनातन वैचारिक या बौद्धिक उत्थानों के बाद तरह-तरह से व्याख्यायित किया। इस क्रम में प्राचीन पाश्चात्य सौंदर्य-विचारकों में होरेस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और सिसेरो का नाम प्रमुख है। मध्ययुगीन यूरोपीय-पुनर्जागरण के पूर्व दर्शन तथा कला-साहित्य-चिंतन में विशेषतः रेने डेकार्ट, रूसो, थॉमस एक्विनस, लायबनित्ज़, एडम स्मिथ, बाउमगार्टेन आदि प्रमुख रहे। रेनेंसाँ के दौर मेंजर्मन-विचार-प्रणालीसे लोंजाइनस, इमैनुएल कांट, हीगेल, लेसिंग, शिलर, कार्ल मार्क्स, वेलिंस्की, सोरेन कीर्केगार्द, ऑर्थर शॉपेनहॉवर और फ्रेडरिक नीत्शे आदि का नाम प्रमुख है। ये सभी अपनी पूर्ववर्ती-विचार-पद्धति को लेकर आगे बढ़े। लोंजाइनस ने सौंदर्य को उदात्त (On the Sublime), कांट ने एपिस्टिमोलॉजी, मेटाफिज़िकल सेंसेस, अभिरुचियों, निर्णय और संवेदना के दर्शन (Critique of Judgement), हीगेल ने ललितकला के दर्शन (Philosophy of Fine Arts) आदि के रूप में परिभाषित किया।

19वीं सदी के बाद यूरोप में वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति के बाद आई० ए० रिचर्ड्स, बेनेदेत्तो क्रोचे, हाइडेगर, बर्ट्रेंड रसेल, जॉन हॉस्पर्स, जॉर्ज संतायना तथा सूजन के लैंगर आदि प्रख्यात् सौन्दर्यशास्त्रीय-विचारक और चिंतक सामने आए। इन्होंने युगीन सन्दर्भों में कला और साहित्य के समग्र मूल्यांकन और विश्लेषण के लिएसौन्दर्यशास्त्रमें अनेक महत्त्व की अवधारणा या प्रत्यय-तत्त्वों को जोड़कर इसेस्वतंत्र शाखाके रूप में विकसित कर अपनी भूमिका का निर्वाह किया। भारतीय वाङ्मय एवं साहित्यशास्त्रीय-चिंतन में भी प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक कालों की भाषा एवं कला-शिल्पों में सौंदर्य और लालित्य-सिसृषा (Beautiful Creativeness) अनवरत प्रवाहमान रही है।

इसी तरह ललित-कलाओं और दर्शन की युगीन संपृक्ति ने आधुनिक युग के औद्योगिक और बौद्धिक समाज के निर्माण के साथ-साथ बदलते सौंदर्यबोध की भी नींव डाली और इसकी छाप लगभग विश्वभर के हर साहित्य और कला-चिंतन में देखी गई। आधुनिक युग के तेज़ी से करवट बदलते समाज और मानुषिक अवचेतन ने अजाने ही सौन्दर्यबोध की नवीन दिशा और अनेक नए वैचारिक आंदोलनों को जन्म दे दिया। उदाहरण के लिए हम जर्मन-विचार-प्रक्रिया में ही कई तरह की करवटें बदलते हुए पाते हैं। हीगेल कामेटाफिजिकल ऑर फ़िनोमिनल डायलेक्ट इन क्रिएटिव आर्ट्स’, कार्ल मार्क्स का भौतिक और ऐतिहासिक द्वंद्ववाद, मनोविज्ञान में नई तरह की मनोविश्लेषणवादी या प्रायोगिक सौंदर्यशास्त्र की  पद्धति का विकास, दो-दो विश्वयुद्धों की तपिश से उपजाअस्तित्त्ववादसब एक-साथ या कुछ आगे-पीछे अपनी संवेदनात्मक-दृष्टि का नया अध्याय पेश करते हुए प्रतीत होते हैं। इन सब युगीन प्रभावों और दृष्टियों का अंश लेते हुए साहित्यिक आंदोलनों में एक तरफ़, कला और साहित्य की शुद्ध-चिंताधारा, यानी कलावादी-सौंदर्यशास्त्र (कला, कला के लिए) की शुरुआत हुई। इनमें बेनेदेत्तो क्रोचे, टी० एस० इलियट, एज़रा पाउण्ड, जॉन क्रो रैनसम और आई० ए० रिचर्ड्स प्रमुख हैं। दूसरी तरफ़, कला जीवन के लिए, साहित्य-कला-सृजन और चिंतन की मार्क्सवादी और प्रगतिवादी धारा ने आंदोलन का रूप धर लिया। फल ये हुआ कि रूप और वस्तु (Form and Content) नया विवाद उभर आया। इस विवाद को समग्रता और संतुलित प्रयासों से सुलझाने का काम अमेरिका दार्शनिक सूजन के० लैंगर ने अपनी सौंदर्यशास्त्र की पुस्तकफीलिंग एंड फॉर्ममें किया। उन्होंने उक्त ग्रन्थ में संवेदना, विचार और अनुभूति, कल्पना, प्रत्यक्षीकरण (Perception) आदि वस्तु तथा संरचना, आकृति, अनुक्रम-सममिति, वैचित्र्य-वैविध्य, वर्ण-प्रतीति आदि को रूप की दृष्टि से समन्वित कर सौन्दर्यशास्त्र प्रस्तुत स्तुत्य कार्य किया।

भारतीय काव्यशास्त्र और ललित-कला का सौंदर्य-

इसी प्रकार जब हम भारतीय सौंदर्य-शास्त्र की अवधारणा और उसके साहित्य-कला-चिंतन के पक्ष पर चिंतन करते हैं तो हमें अपने इतिहास और संस्कृतियों के अगणित द्वारों से होते हुए गुज़रना पड़ता है। प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर हम यह निसंदेह कह सकते हैं कि प्राचीन भारत के लोग, चाहे वे आर्य रहे हों या आर्येत्तर जातियों से, ललित-कलाओं की सिसृषा और सर्जना से भली-भाँति परिचित थे। प्राचीन भारत के कला-विवरण को ही ले लें तो हमारे सामने हड़प्पा सभ्यता की अनेक सौन्दर्यात्मक प्रतिकृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें देवताओं, मातृदेवी, नटराज, पशुपति, नर्तकी एवं एक सींग वाले सांड की चित्रित मूर्तियाँ, मुहरें, गहने, बर्तन और रहन-सहन का स्तर बतौर प्रमाण मौजूद हैं। जो यह बताती हैं कि भारत के इतिहास में दब गई पूर्व मानवी सभ्यता भी सौंदर्य-तत्त्वों से परिचित और उनका सर्जन करने वाली थी।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद अस्तित्त्व में आई आर्य-वैदिक सभ्यता और आर्येत्तर भारतीय या मूल-जातियों की लोक-कलाओं के मिश्रण से सौंदर्य के अनेक नवीन पहलू सामने आते हैं। भीमबेटका, अजंता-एलोरा की गुफ़ाएँ, साँची, भरहुत, बौद्ध एवं जैन धर्म-दर्शन से संबंधित कला और शिल्प यह दर्शाता है कि हमारी सौंदर्य-चेतना अपने ललित-तत्त्वों के समाहार हेतु सदैव अग्रसर रही है। इस क्रम में जहाँ हमारे पास संस्कृत-काव्यग्रंथों और उसमें समाहित अनगिनत दर्शनों या शास्त्रों जैसे- संहिताओं, सूक्तों, ब्राह्मण-ग्रंथों, उपनिषदों अथवा पौराणिक-कथाओं आदि की झड़ी सी लगी हुई प्रतीत होती है, तो उसके विस्तृत अनुशीलन और गुण-धर्म-दोष आदि के विवेचन की वृहद् काव्यशास्त्रीय परंपरा और व्याकरण आदि के ग्रंथ मिलते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ जैसे भरत का नाट्यशास्त्र, वैदिक मीमांसा-ग्रंथ, वात्स्यायन का कामशास्त्र, यास्काचार्य और सायण के निरुक्त या भाष्य, पतंजलि का महाभाष्य, पाणिनि की अष्टाध्यायी, भर्तृहरि के व्याकरण-ग्रंथ वाक्यपदीयम् में स्फोटवाद, हेमचंद्र के सिद्ध हेम शब्दानुशासन आदि इनमें उल्लेख्य हैं।

सौंदर्यबोध की दृष्टि से यदि हम आधुनिक युग और भारतीय भाषाओं के साहित्य पर विचार करें तो तमिल, मराठी, बांग्ला एवं हिंदी में सौंदर्य-विचार और निदर्शन की लंबी परंपरा पाते हैं। आनंद कुमारस्वामी, के० कृष्णमूर्ति, एस०टी० नरसिंहाचारी, वी० राघवन तमिल, तो एस० के० डे, गणेश त्र्यंबक देशपांडे, के० सी० पांडे, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रवासजीवन चौधरी, बी एस० मर्ढ़ेकर आदि  बांग्ला तथा मराठी के प्रमुख भारतीय सौंदर्यशास्त्री हुए। संस्कृत और हिंदी में काव्य-तत्त्व-विचार की एक विस्तीर्ण परंपरा भी हमारे सामने है जिनमें प्राचीन भारतीय संस्कृत-काव्याचार्य, मध्यकालीन या रीतिकालीन ब्रजभाषा कवि और आचार्य, आधुनिक हिंदी काव्य एवं गद्य आलोचना-दृष्टि और रूप या वस्तु आदि के विचार का सौन्दर्य-दर्शन प्रमुखतः से दिखायी पड़ता है। कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर, हजारीप्रसाद द्विवेदी सहित आलोचक नामवर सिंह का भी मत रहा है कि संस्कृत-साहित्य ने जहाँ आर्य-अभिजात वर्गीय शास्त्रीय परंपरा और चिंतन को प्रश्रय दिया। तो वहीं ललित-कलाओं ने आर्येत्तर एवं आर्य-पूर्व भारतीय लोक-सौन्दर्य की रक्षा नृत्य, संगीत, चित्र, मूर्ति, नाटक अथवा काव्य के माध्यम से की। इस तथ्य के प्रमाण के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति-विषयक निबंध, हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध-संग्रहसाहित्य-सहचर’, ‘अशोक के फूलऔरलालित्य-तत्त्वके लेखों को विशेष महत्त्व का माना जा सकता है। साथ ही नामवर सिंह की पुस्तकों मेंइतिहास और आलोचना’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धान्तएवंदूसरी परम्परा की खोजसेसंस्कृति और सौंदर्यनिबंध और सन् 1992 ई० में जेएनयू में संभवतः अपनी अंतिम संस्कृत-काव्यशास्त्रीय कक्षाओं में दिए उनके व्याख्याननामवर के नोट्सको भी देखा जा सकता है। इन लेखों में उक्त विद्वानों ने अपनी गहरी और सूक्ष्म इतिहास और सांस्कृतिक-दृष्टि और भारतीय सौंदर्यबोध के मूल में अपनी आस्था दिखायी है।

नामवर सिंह की स्पष्ट मान्यता है किसुकुमार कलाएँ आर्येत्तर जातियों के माध्यम से आईं पंचमवेद यानी नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि स्वयंशूद्रसमाज से आते थे। रस भी आर्येत्तर जातियों की देन है।[2] तथ्य है कि वेद मात्र द्विज जातियों के लिए ही थे जो अपौरुषेय माने जाते थे। जिस आधार पर शूद्रों द्वारा उनका पाठ, श्रवण और अभिनय आदि वर्जित था, इसके समानांतर आचार्य भरत ने एक अन्य पंचमवेद की रचना कर डाली जो कि सर्व-साधारण के लिए उपलब्ध था। नामवर सिंह के अनुसार, भरतमुनि ने आर्येत्तर कलाओं, अभिनय अथवा अनुकीर्तन (भरत ने इस शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि उनका मत था कि किसी भी कला का पूर्णतः अनुकरण नहीं हो सकता, जिसे अरस्तू नेअनुकरण का सिद्धांतकहा।), शिल्प और सौंदर्य को लेकर एक वैकल्पिक अनार्य-कलाशास्त्र  ‘नाट्यशास्त्रकी रचना की। वे आगे कहते हैं कि प्रथमतः भरतमुनि ने ही भारतीय सौंदर्यशास्त्र के मूलाधार की स्थापना तथा अर्वाचीन भारतीय ललित-कलाओं के संवर्धन का मार्ग प्रशस्त किया। अपने निबंधसंस्कृति और सौंदर्यमें वे लिखते हैं, “आर्येत्तर अवदान की इस सूची में यदिभक्ति द्राविड़ ऊपजीऔर आभीरों के आराध्यदेव बालकृष्ण तथा देवी राधा को जोड़ लें तो हमारी परंपरा में सुंदर माना जाने वाला ऐसा कुछ भी नहीं बचता जो आर्येत्तर हो!”[3] इस प्रकार हम देखते हैं नामवर सिंहवेदों से आदि और वेदों में अंतवाले रेले में बहकर ज़मीनी धरातल और सांस्कृतिक-वर्चस्व या बंधनों को तोड़ते हुएसौंदर्य के सांस्कृतिक-सामग्र्यपर बल देते हैं, देखा जाए तो एक प्रखर मार्क्सवादी आलोचक होते हुए वे भारतीय सौंदर्य और सामग्र्य की संस्कृति को भारतीयता-बोध और खुली आँखों से देखने का प्रयास कर, अपनी वैचारिक-सत्यनिष्ठा (मार्क्सवाद) का भी परिचय देते हैं।

अधिकांशतः कला और संस्कृति की ऐसी उद्भावक व्याख्या करते हुए वे कविगुरु रवीन्द्रनाथ और अपने गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी की स्थापनाओं को अवश्य दोहराते जान पड़ते हैं, लेकिन उनके तर्क तमाम अंतर-अनुशासनिक अध्ययनों और सांस्कृतिक इतिहास के विशद-विवेचन का सटीक परिणाम सिद्ध होते हैं। आचार्य द्विवेदी ने अपने ललित-निबंधोंसाहित्य-सहचर’, ‘कालिदास की लालित्य-योजनातथालालित्य-तत्त्वनामक पुस्तकों में अपनी भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के अलावा भारतीय ढंग की सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यताओं को विवेकपूर्ण प्रतिपादन किया है। यह निसंदेह कहा जा सकता है कविगुरु की चिंतन-परंपरा को आचार्य द्विवेदी ने हिंदी भाषा में लालित्य-तत्त्व (सौन्दर्यशास्त्र) के मौलिक विवेचन की ओर ज़रूर अग्रसर या प्रस्तावित किया है। आचार्य के इस अनूठे सौंदर्य-दर्शन और सांस्कृतिक-प्रेम को आगे बढ़ाने की आवश्यकता आवश्यंभावी तौर पर थी; जबकि आधुनिक-आलोचना के क्षेत्र के शिखर-पुरुष कहलाने वाले नामवर सिंह नेसौन्दर्यशास्त्रपर कोई स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना नहीं की। उनके सौंदर्य संबंधी विचार फुटकल-निबंधों, आलोचनात्मक लेखों या उनकेक्लास-नोट्ससे ही प्राप्त होते हैं।

नामवर सिंह के अनुसार संस्कृत-काव्यशास्त्र सौन्दर्यशास्त्र का अंग अवश्य हो सकता हो किंतु इसे हम सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) का पर्याय नहीं मान सकते। काव्यशास्त्र को सौन्दर्यशास्त्र मानने के पीछे उनके जो तर्क हैं, उनमें सबसे पहला यह है कि संस्कृत आचार्यों द्वारा काव्य तथा अन्य ललित-कलाओं के अंतर्संबंधों के विश्लेषण, विवेचन, गुण-दोष-प्रकृति, तात्त्विक-समय और वैषम्य आदि पर विचार कर केवल काव्य को ही अपने शास्त्र में विवेचन का विषय बनाया। दूसरा यह कि काव्यशास्त्र में पूर्णतः इंद्रियानुभूति अथवा संवेदना दार्शनिक अध्ययन को विवेचन का आधार नहीं बनाया गया। जबकि कला-विवेचन के समग्र-मूल्यांकन के लिए ऐसा होना एक आवश्यक शर्त मानी जाती है। अंतिम बात जो उनके अध्यापन और वक्तव्यादि (1992 में ली काव्यशास्त्र की कक्षाओं) से लक्षित होती है; वह  यह है कि हमारे यहाँ शास्त्र की परंपरा के विकासक्रम की उपेक्षा कर उसेसंप्रदायवादमें बाँट दिया गया और इस अतार्किक विभाग को स्वतंत्र अध्ययन का विषय बनाया गया। इससे तो काव्यशास्त्र के ही समग्र-अध्ययन और उसके विस्तृत होने मार्ग खुला, ही भारतीय भाषाओं के साहित्य का। फलतः दोनों ही खंड-खंड रूप में अध्ययन के अरुचिकर और बनकर उभरे। जबकि हम पहले ही देख चुके हैं कि भरत ने अपने नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय मेंनाट्य’, ‘अभिनय’, ‘अनुकीर्तनतथारसआदि की लोक-संपृक्त परंपरा, उपेक्ष्य अथवा क्षीण ही सही, के अनवरत विद्यमान होने के प्रामाणिक संकेत दिए हैं। हमारे यहाँ ज्ञान एवं शास्त्र-परंपरा मेंइंडिविजुअलयानिषेधके बजायपरंपरा-अध्ययन का सामग्र्य-विकासनिरूपित किया गया है। हमने यहसांप्रदायिक-विभागपश्चिमी-ज्ञान और विचार-परंपरा केस्कूलकी तर्ज पर स्थापित कर अपने ही सिद्धांतों कोहायरारिकीका शिकार बना डाला। इस संबंध में नामवर सिंह ने जिन भारतीय काव्य-विमर्श के मनीषियों का उल्लेख करते हैं, उनमें डॉ. वी. राघवन की पुस्तकहाइवेज एंड बाइवेज ऑफ़ लिटरेरी क्रिटिसिज्ममें रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, औचित्य एवं ध्वनि पारस्परिक अन्तःसाम्य या अंतःपूरक स्थिति; जी० टी० देशपांडे केसंस्कृत काव्यशास्त्र का विकास क्रमिक विकास था- ‘होरिजेंटलथा- जिसका समापन रस एवं ध्वनि की पूर्णता में हुआ।[4]

नामवर सिंह के सौंदर्य-विवेचन में सर्वाधिक प्रमुख भारतीय सौंदर्यशास्त्रियों में कुन्तक, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त एवं आचार्य भरत हैं। उन्होंने कुंतक के कवि प्रतिभा, कवि व्यापार औरक्रिएटिव इमेजिनेशन’, काव्य-कला अथवा अन्य ललित-कलाओं के बीच पूर्वापर संबंध और क्रमागत विकास, कालिदास के काव्य की व्यावहारिक समीक्षा, तथा वक्रोक्तिवाद का समर्थन किया। अपने अत्यंत प्रिय आचार्य आनंदवर्धन द्वारा वैदिक-मीमांसकों के शब्द एवं अर्थ के मध्यतात्पर्य’, भामह से ग्रहीतप्रतीयमानर्थ[1], ‘आह्लादक चारुत्व-प्रतीति’; वैयाकरणों (भर्तृहरि) केस्फोटवाद’, नैयायिकों केअनुमितिवादआदि काध्वन्यालोकमें समाहार और विस्तार को ललित-कला और सौंदर्य-विवेचन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना है। अंत में नामवर सिंह ने जिसे काव्यशास्त्र कासुमेरुकहा वे हैं अभिनवगुप्त। अभिनवगुप्त की दार्शनिक-दृष्टि, कला-विवेचन, रूप और भाव का अनुकीर्तन या अनुकरण (Narration और Re-narration) काअनुव्यवसायतथा भावों के साधारणीकरण का दार्शनिक विवेचन उनका प्रिय रहा है। उनका मत है कि भारतीय काव्य और ललित कलाओं के विवेचन के लिए वक्रोक्ति, ध्वनि (भामह का प्रतीयमान), अभिनवगुप्त का न्याय-दर्शन, भरत का नाट्य, रस अथवा भाव आदि प्रमुख हो सकते हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय आचार्यों में वे भामह, वामन, मम्मट, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ तथा नागेश भट्ट की स्थापनाओं की समालोचना करते हैं।

आचार्य द्विवेदी एवं पश्चिम के विद्वानों हेगेल या कांट के सौंदर्य-विषयक-विवेचनसंवेदना या अनुभूतियों के दर्शनको नामवर सिंह ने अपने लेखव्यापकता और गहराईमें भाव और चिंतन की कसौटी पर कसते हुए लिखा है कि, “ऐन्द्रिय-बोध अनुभूति की केवल पहली अवस्था है; इसके बाद उनकी मानसिक प्रतिक्रिया भावानुभूति की सृष्टि करती है जो अंत में चिंतन के आलोक से आलोकित हो उठती है। परंतु ऐन्द्रिय-बोध को भाव और चिंतन की अवस्थाओं तक ले जाने के लिए क्षणों के प्रवाह से गुज़रना पड़ता है।[5] इस आधार पर देखें तो नामवर सिंह की सौंदर्य-दृष्टि मात्र काव्य अथवापोएटिक एलिमेंट्सतक ही नहीं ठहरती वह अन्य ललित-कलाओं, यथा- संगीत, चित्र, स्थापत्य, शिल्प, रीति, नाट्य या अभिनय, भाषा  के साथप्रोज़ एलिमेंट्सयानी गद्य-विधाओं के लिए भी एक मानक सौंदर्यशास्त्र के माँग की पूर्ति करते दिखाई देते हैं। वह संवेदना और विचार-प्रवाह के बीच शैल्पिक-सुंदरता और पके हुए अनुभूत्यतात्मक सत्य की स्थापना पर बल देते हैं।

अपनेमार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के विकास की दिशाऔरकलात्मक सौंदर्य का आधारनामक लेख में उन्होंने सौंदर्य और कला केग्रेडेड डिवीज़न’, उसके सूक्ष्म तथा स्थूल प्रकारों, वर्ग तथा वर्णभेद आदि का ऐतिहासिक एवं भौतिक आधारों पर गुण-दोष-विवेचन कर मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं को इंगित किया है। उनका मत है कि मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र तब तक नहीं रचा या सम्पूर्ण माना जा सकता है जब तक हम उक्त विभेदों को स्वीकार और उनका निराकरण करने की दिशा में नहीं बढ़ेंगे। वे लूकाच के जर्मन-ग्रंथसौन्दर्यशास्त्रकी कमियों को भी पूरी ईमानदारी और मार्क्सवादी दृष्टि से उद्घाटित करते हैं, उनका मानना है कि लूकाच स्वयं कोक्लासिकल ऐस्थेटिक ट्रेडिशनऔरकलानामक संस्था के हावी होने से नहीं बचा सके हैं। उन्होंने आगे बढ़ते हुए मानवता के सकारात्मक क्रियावाद एवं थोथे आदर्शवाद, कलावाद को कला और जीवन दोनों में समन्वयात्मक संबंध, रूपवाद या वर्ण्य-विषय (मूर्त और ठोस रूप, कि अमूर्त और सामान्य सा कोरा आदर्श-विधान), विचारधारा के स्तर पर जनवादी साहित्य और कलाओं को प्रधान तथा मध्यवर्गीय-बुर्ज़ुआजी यथार्थवाद की कड़ी आलोचना की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य नामवर सिंह एक मार्क्सवादी और आधुनिक आलोचक होते हुए हिंदी में शास्त्र और लोक, समाज और संस्कृति के पारस्परिक प्रभाव-ग्रहण, आम और खास, रूप और वस्तु, विचारधारा और संवेदना के धरातल पर भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों छोरों परसामग्र्यवादी आलोचक और सौंदर्य-द्रष्टाकी तरह अपने अडिग कदम जमाए हुए बढ़ते गए। अफ़सोस है कि सौंदर्य-विचार में वे आचार्य द्विवेदी के अगले स्वतंत्र शास्त्र-कार के रूप में किसी ग्रंथ की रचना करने को प्रेरित नहीं हुए, संभव है कि उन्हें मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के अधूरेपन और वैचारिक-प्रतिबद्धता नेस्वतंत्र ग्रंथ-रचनासे रोका हो। लेकिन जितना हमारे समक्ष है वह उनके दृष्टिकोण और आगामी सौंदर्यशास्त्र के लिए ज़रूर प्रेरणादायी होगा।


संदर्भ :
[i] बर्नार्ड बोसांके, ए हिस्ट्री ऑफ़ एस्थेटिक्स, जॉर्ज एलेन एंड अनविन, लंदन, भूमिका पृष्ठ 11, 1949
[ii] शैलेश कुमार एवं अन्य (सं.), नामवर के नोट्स, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 22, प्रथम संस्करण 2016
[iii] नामवर सिंह, दूसरी परम्परा की खोज, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 110, सातवाँ संस्करण 2023
[iv] शैलेश कुमार एवं अन्य (सं.), नामवर के नोट्स, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 36, प्रथम संस्करण 2016
[v] नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 14, दसवाँ संस्करण 2018

पुष्पराज यादव
शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव 

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