शोध आलेख : राजकुमारी द्वारा रचित ‘ग्राफिक’ उपन्यास ‘बिक्सू’ का विश्लेषण / दीपाली सुतार

राजकुमारी द्वारा रचितग्राफिकउपन्यास बिक्सू का विश्लेषण
दीपाली सुतार


शोध सार : भारत में कहानी कहने की समृद्ध परंपरा रही है। यह कला मनुष्य की संवेदनाओं, विचारों एवं जीवनानुभवों का जीवंत प्रतिबिंब है। ग्राफिक उपन्यास चित्रों और शब्दों के माध्यम से कहानी कहने की एक आधुनिक विधा है। अभिव्यक्ति के तमाम आधुनिक माध्यमों मेंग्राफिकउपन्यास का जन्म एक नई संभावना के रूप में हुआ है।ग्राफिकउपन्यास एक लोकप्रिय साहित्यिक विधा है। विश्वभर में हर उम्र के पाठकों द्वारा इसे पसंद किया जा रहा है। इस शोध आलेख का मुख्य उद्देश्य हिंदी के प्रथमग्राफिकउपन्यास के रूप में बिक्सू उपन्यास की समीक्षा करना है। साथ हीग्राफिकउपन्यास की परंपरा और विकास का अध्ययन कर उसके माध्यम से उठाए गए संवेदनशील मुद्दों का विश्लेषण करना है। इस शोध के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध मूल पुस्तक बिक्सू, अंग्रेज़ी शोध पत्रों, अन्य आलोचनात्मक सामग्री तथा यूट्यूब पर उपलब्ध साक्षात्कार का आधार लिया गया है।

बीज शब्द : ग्राफिकउपन्यास, साहित्य, परंपरा, संवेदना, जीवनानुभव, अभिव्यक्ति, समकालीन, लोकप्रिय साहित्य, प्रतिबिंब।

मूल आलेख : ग्राफिकउपन्यास, कलाकृति (विजुअल आर्ट) और पाठ के संयोजन से एक विस्तृत कथा कहने के लिए जाना जाता है।ग्राफिकउपन्यासों की चित्रात्मक भाषा अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली माध्यम बनती जा रही है। यह अपनी जटिल कहानियों, चारित्रिक विकास तथा चित्रात्मक शैली के कारण पारंपरिक कॉमिक्स से भिन्न है। पूरी दुनिया में ग्राफिक उपन्यास अब महज़ क़ॉमिक्स नहीं रहे; समाज के गंभीर मुद्दों के कारण इन्हें अब साहित्य जगत में एक नई पहचान मिल रही है। आमतौर पर इनमें पैनल होते हैं, जो चित्रों और रेखाओं की श्रृंखला के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाते हैं। पैनलों के मध्य संवाद अथवा वर्णन के लिए टेक्स्ट बॉक्स का प्रयोग किया जाता है।

ग्राफिक उपन्यासों को उनकी विषय-वस्तु और प्रस्तुति के आधार पर मूलत: तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- 1) मुख्यधारा केग्राफिकउपन्यास; 2)मांगा और 3) कलात्मकग्राफिकउपन्यास। जहाँ कॉमिक्स को अक्सर हल्के-फुल्के मनोरंजन से जोड़कर देखा जाता है, वहींग्राफिकउपन्यास में आम जीवन के गंभीर विषयों का चित्रण किया जाता है। मांगा, जापानी कॉमिक्स की एक विशिष्ट विधा है। Artsper Magazine के अनुसार, मांगा शब्द जापानी भाषा के दो शब्दों ‘Man’ (अतरंगी) और ‘Ga’ (चित्र) से मिलकर बना है। इसमें शोनेन(Shonen) शैली विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जो 8 से 18 वर्ष के किशोरों को केंद्र में रखकर रची जाती है। इन कहानियों के मुख्य पात्र अधिकतर किशोर होते हैं, और कथानक साइंस फिक्शन, एडवेंचुरस कहानियाँ, जैसे मार्शल आर्ट से संबंधित होता है।

ग्राफिकउपन्यास शब्द का प्रथम प्रयोग 1964 में रिचर्ड काइल द्वारा उनके लेख कापा अल्फा में किया गया था। हालाँकि शुरुआती दौर में इसे व्यापक पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा, लेकिन 1970 के दशक के मध्य तक पुस्तक व्यवसाय के क्षेत्र में इसकी स्वीकार्यता बढ़ने लगी। विशेष रूप से 1978 में विल आइजनर के कॉन्ट्रेक्ट विद गॉड और मार्वल द्वारा शुरू की गईग्राफिकउपन्यास श्रृंखला से प्रसिद्धि मिली। इसके अलावा आर्ट स्पीगेलमैन के पुलित्जर पुरस्कार विजेता, उपन्यास माउज़ (1992) ने इसे वैश्विक लोकप्रियता दिलाई।’[1] इस मोड़ पर एलन मूर के वॉचमैन (1987) ने भी पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा और लोकप्रियता हासिल की। संपूर्ण विश्व में शुरुआती दौर के कॉमिक्स औरग्राफिकउपन्यास का सृजन केवल मनोरंजन के उद्देश्य से होता था। विशेष रूप से, बच्चों में जीवन मूल्य और नीतियों के निर्माण के लिए इनका प्रकाशन होता था। समय के साथ इनके माध्यम से जीवन के यथार्थ को दर्शाया जाने लगा। चित्रों और शब्दों के सहारे मानवीय संवेदनाओं को इतने प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया जाने लगा, कि केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि बड़े भी इनकी ओर आकर्षित होने लगे।      

भारत में एक स्वतंत्र विधा के रूप मेंग्राफिकउपन्यास की शुरुआत 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में हुई। भारतीयग्राफिकउपन्यास का इतिहास भारत की पहली कॉमिक्स अमर चित्रकथा से प्रारंभ होता है। 1967 में अनंत पई ने इसकी शुरुआत कॉमिक श्रृंखला के रूप में की थी। यह श्रृंखला टिंकल में भी प्रकाशित होती थी। इसकी अब तक 100 करोड़ से भी अधिक प्रतियाँ, 400 से अधिक शीर्षक, 26 से अधिक भाषाओं में बिक चुके हैं।’[2]

भारत में चित्रकला के माध्यम से कहानी कहने की लंबी परंपरा रही है। प्रारंभिक दौर के चित्र गुफाओं में पाए जाते हैं। अजंता और एलोरा की गुफाएँ इसका प्रमाण हैं। जैसे-जैसे मानव समाज सभ्यता की ओर बढ़ता गया, अभिव्यक्ति के लिए दीवारों पर चित्र और रेखाएँ बनाईं जाने लगी। दीवारों के साथ-साथ पेड़ों, पत्तों, पत्थरों, कपड़ों, काग़ज़ों पर भी इस कला के माध्यम से जीवन की अनेक कथाओं को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जाने लगाजो आज भी अनवरत जारी है। पटचित्र, वरली, कलमकारी, मधुबनी जैसी भारतीय लोक-चित्रकलाएँ इसके जीवंत उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से देवी-देवताओं, पौराणिक आख्यानों, दैनिक जीवन कथाओं को दर्शाया जाता है।

उत्तर-आधुनिक युग में, कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में, ‘ग्राफिकउपन्यास लेखकों को नए प्रयोगों तथा पाठकों के लिए नए अनुभवों का सशक्त माध्यम बन गए हैं। इनमें रोज़मर्रा के जीवन, राजनीति, संस्कृति, समाज, पौराणिक एवं मिथकीय आख्यानों के साथ-साथ फैंटसी और बाल मनोविज्ञान जैसे विषयों का कलात्मक चित्रण देखने को मिलता है। रिवर ऑफ स्टोरीज़ अंग्रेज़ी में लिखे गए प्रथम भारतीय ग्राफिक उपन्यासों में से एक है­जिसका सृजन 1990 के दशक की शुरुआत में हुआ और प्रकाशन 1994 में। ओरिजीत सेन द्वारा लिखित और चित्रित यह पुस्तक, नर्मदा नदी घाटी में विशाल बाँधों के निर्माण के विरुद्ध दशकों तक चले स्वदेशी विरोध प्रदर्शनों औरनर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ उनकी गहरी सक्रिय भागीदारी का परिणाम है।’[3] इसके पश्चात, सारनाथ बनर्जी के कॉरिडोर (2004), बार्न आउल्स वांड्रस केपर्स (2007) तथा हरप्पा फाइल्ज़ (2011), नासिर अहमद के कश्मीर पेंडिंग (2007), सरस्वती नागपाल के सीता: डॉटर ऑफ अर्थ (2011) और अमृता पाटिल के कारी (2008), आदिपर्व (2012), सौप्तिक (2016) तथा अरण्यक (2019) के प्रकाशन से भारत में इस विधा को लोकप्रियता प्राप्त हुई।  

अमृता पाटिल ने भारतीयग्राफिकउपन्यास की विधा को एक नया और संवेदनात्मक मोड़ दिया है। उनकी कृतियों ने पौराणिक एवं मिथकीय आख्यानों को पाठकों के समक्ष नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है। अमृता पाटिल का कारी और तेजस मोडक का प्राइवेट आई एनोनिमस प्रारंभिक भारतीयग्राफिकउपन्यास की विषय-वस्तु से हटकर, एक व्यक्तिगत और दिलचस्प परिदृश्य में प्रवेश करते हैं। कारी भारतीयग्राफिकउपन्यासों का समलैंगिकता के मुद्दों से परिचय कराता है।’[4] इस विधा ने हाशिए के समाज को भी सशक्त आवाज़ प्रदान की है। वर्ष 2011 में प्रकाशित श्रीविद्या नटराजन एवं एस. आनंद द्वारा रचित एवं दुर्गाबाई सुभाष व्याम द्वारा चित्रित भिमायना: एक्सपिरियंसेस ऑफ अनटचेबिलिटी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। यह आधुनिक भारत के महान विचारक, डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर (1891-1956) के प्रारंभिक जीवन पर आधारित एक कालजयीग्राफिक उपन्यास है। इसकी एक विशिष्टता इसकी दृश्य भाषा है, जिसमें डॉ. अंबेडकर और दलित अनुभवों को चित्रित करने के लिए एक आदिवासी कला रूप, गोंड शैली का प्रयोग किया गया है।’[5]  

हिंदी में इस प्रकार केग्राफिकउपन्यास अब तक उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि कई सारे लोकप्रिय अंग्रेज़ी कॉमिक्स तथाग्राफिकउपन्यासों का अनुवाद हिंदी में प्राप्त होता है। परंतु, 2018 में प्रकाशित बिक्सू को हिंदी का प्रथम मौलिकग्राफिकउपन्यास कहने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इसकी रचना और परिकल्पना मूल रूप से हिंदी और उसकी क्षेत्रीय बोली छोटा नागपुरी में की गई है। जहाँ पूर्ववर्ती ग्राफिक उपन्यास जैसेरिवर ऑफ स्टोरीज मूलत: अंग्रेज़ी में लिखे गए और बाद में अनूदित हुए, वहीं बिक्सू किसी अनुवाद की छाया नहीं बल्कि एक स्वतंत्र भाषाई सृजन है। इसकी मूल कथा विकास कुमार विद्यार्थी की चिट्ठियों से ली गई है। शुरुआत में इसे धारावाहिक के रूप मेंचकमकमें प्रकाशित किया गया था। इसकी पटकथा एवं संवाद वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं तथा आकल्पन एवं चित्र राजकुमारी द्वारा बनाए गए हैं।

बिक्सू एक मार्मिकग्राफिकउपन्यास है, जो झारखंड के अंचल के विकास कुमार विद्यार्थी अर्थात बिक्सू की बोर्डिंग स्कूल की यात्रा को दर्शाता है। यह कहानी है बालमन के विकास की, मित्रता की और नए परिवेश में चुनौतियों की। यह एक बच्चे के परिपक्व होने की जीवन यात्रा है। विशेष बात यह है कि कहानी डायरी शैली में प्रस्तुत की गई है। बिक्सू के अनुभवों से परिचित होकर पाठक उसके दृष्टिकोण से उसकी दुनिया को देखते हैं। उत्साह, भय, भ्रम जैसे विभिन्न भावों को महसूस करते हैं। उपन्यास में झारखंड की संस्कृति और जीवन शैली का चित्रण हुआ है। बिक्सू को अपने गाँव से संत इग्नासियस बोर्डिंग स्कूलभेजा जाता है, जो उसके लिए एक बहुत बड़ा परिवर्तन और चुनौतीपूर्ण बन जाता है। स्कूल में उसका नए लोगों, नई संस्कृति और नई भाषा से सामना होता है। वहाँ उसे नए दोस्त मिल जाते हैं, जिनके साथ वह हर दिन नए अनुभव की यात्रा पर गुज़रता है। स्कूल में दी जा रही शिक्षा तथा शिक्षकों के विचारों से प्रभावित होकर जीवन के विभिन्न प्रश्नों के उत्तर भी वह प्राप्त करता है। जीवन के बारे में नए विचारों से परिचित हो जाता है। उपन्यास के हर पड़ाव पर नए मूल्यों से परिचय होता है। परिवार, दोस्ती, प्रेम, सत्य, सहिष्णुता, साहस, परिपक्वता, शिक्षा का महत्त्व जैसी महत्त्वपूर्ण बातें इस उपन्यास में दर्शायी गई हैं। बिक्सू का बोर्डिंग स्कूल के पहले दिन रोना, उसे अपने रोने का बेवजह लगना और दोस्ती का हाथ बढ़ाना, स्कूल में फादर चोन्हास द्वारा बच्चों से पेड़ लगवाना, उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए प्रेरित करना, सेमिनार में प्रेम क्या है प्रश्न के अनेक उत्तर पाना, आदि घटनाएँ इसके उदाहरण हैं।   

आकर्षक चित्र, संवाद और भाषा इस उपन्यास की प्रमुख विशेषताएँ हैं। उपन्यास के बारे में हकु शाह का कहना है किपरंपरा के साथ नई बात को जोड़ने की कोशिश करने वाली किताब। बहुत बातें शब्दों में रखकर उन्हें दृश्यरूप देने से रोचक बन गई हैं। जैसे पानी कितने अलग-अलग फॉर्म्स में कहानी से जुड़ा हुआ है। बादलों में, दिनचर्या में, कुएँ में, खेल में, आँसुओं में। साइकिल, लैम्प, नाव, घड़ी जैसी आधुनिक वस्तुओं के साथ फसल, पंख, और चाँद जैसी विविध चीज़ों को बहुत सरलता से जोड़ा है। पन्ने को सीधी लाइन में देखने की बजाय ऐसे ही खेल-खेल में सजाया है और इससे किताब का स्वरूप बहुत नया हुआ है। और हाँ! बिक्सू की बदाम जैसी आँखें बहुत सुन्दर लगती हैं।[6] इस कहानी का मर्म इतना भावुक और प्रभावशाली है कि पाठक सहजता से इससे जुड़ पाता है।

बिक्सू में मधुबनी चित्रकला का प्रयोग कर, रचनाकार राजकुमारी ने इलस्ट्रेशन के माध्यम से उपन्यास की कथा को समृद्ध किया है, तथा उसे कलात्मक आकार भी प्रदान किया है। मधुबनी शैली के चमकीले रंगों और जटिल रेखाओं ने इस कहानी को जीवंत बनाया है। मधुबनी पेंटिंग बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र से उत्पन्न एक लोक-चित्रकला है, जिसके माध्यम से भारत की पौराणिक-मिथकीय कथाओं, स्थानीय किंवदंतियों और लोगों में प्रचलित कथाओं को चित्रित किया जाता है। यह कला अपनी जटिल रेखाओं और चमकीले रंगों की विशेषता के लिए जानी जाती है। मूल रूप से इसे स्त्रियाँ, दीवारों, कपड़ों और काग़ज़ पर जटिल चित्र बनाकर कहानियों का वर्णन करने के लिए उपयोग करती हैं। बिक्सू में इसी मधुबनी शैली का प्रयोग हुआ है। उपन्यास के हर दृश्य को इस शैली के चित्रों के माध्यम से जिया जा सकता है, और बिक्सू तथा अन्य पात्रों की भावनाओं को महसूस किया जा सकता है। यूट्यूब चैनल लल्लनटॉप को दिए गए साक्षात्कार में राजकुमारी कहती हैं- “पुस्तक में बिक्सू की मनोदशा के हिसाब से ही हर पन्ने का फॉर्म है।[7] किसी भी रचना को पाठकों की दुनिया में लाने से पहले रचनाकार को उसकी रचना-प्रक्रिया से होकर गुज़रना पड़ता है। राजकुमारी बिक्सू को बनाने की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहती हैं- “मधुबनी चित्रों को जब मैं बनाती गई तो मुझे समझ आया कि इसके लिए बहुत सारी अनलर्निंग की ज़रूरत है।[8] लोककला सरलतम की बात करता है।[9] जटिलता को छोड़ने के लिए और सरलता को बनाए रखने के लिए हमें कई बार हमने जो सीखा है उसे छोड़ना पड़ता है।”[10] किसी भी कला में भावना संप्रेषित होती है। अगर वह आकर आपको कुछ कह नहीं पा रही है, वह कला नहीं है। पर उसके कहने के लिए उसे सहजता से आना पड़ेगा। तब कला में जान आती है। और उस सहजता को लाने के लिए बहुत सारी चीज़ें छोड़नी पड़ जाती हैं।”[11]      

जैसे-जैसे कथानक का विकास होता है, यह एहसास होता है कि यहग्राफिकउपन्यास केवल मनोरंजन के उद्देश्य से नहीं बनाया गया है। इसमें हर घटना के माध्यम से मानवीय मूल्यों को बचाए रखने की बात कही गई है, जैसेपाप क्या होता है?” “चोरी करना...झूठ बोलना...किसी को मारना...गाली देना...”[12] उपन्यास में गांधीवादी विचार, जीवन दर्शन तथा योग के महत्त्व को भी संप्रेषित किया है।

इसकी भाषा झारखंड के छोटे से इलाके छोटानागपुर की भाषा है। आंचलिकता के रसात्मक अनुभव के लिए इसमें आंचलिक भाषा का प्रयोग किया गया है। विकास कुमार विद्यार्थी की चिट्ठियों की जो भाषा रही है, उसी भाषा को मुख्य पात्र बिक्सू और अन्य पात्रों के संवादों की भाषा के रूप में चुना गया है। आम हिंदी पाठक भाषा से अनजान होने के बावजूद इससे प्रभावी रूप से जुड़ जाता है। पाठक के लिए यह एक नया अनुभव बन जाता है। मानव कौल ने इस उपन्यास के संबंध में कहा है- बिक्सू का बचपन इतनी खूबसूरती से भरा हुआ है कि उसमें अपने धुंधले पड़े गाँव, खेत, स्कूल, मास्साल, खेल, दोस्त, माँ, भाई...सब दिखने लगते हैं। मीठी भाषा और अपनेपन से संजोई हुई किताब”[13]

संक्षेप में, बिक्सू केवल एक मनोरंजक कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और समाज की कलाकृति है। इसमें प्राचीन मधुबनी चित्रकला को आधुनिक जीवन शैली और विचारों के साथ सहजता से जोड़ा गया है। चित्रों और शब्दों के माध्यम से बालमन से जुड़े अनेक मुद्दों को नया दृष्टिकोण प्रदान करने का प्रयास किया गया है। उपन्यास का कथानक इतना सरल है कि पाठक को बिक्सू की कहानी अपनी कहानी लगने लगती है। आज समाज में मनुष्य के लिए चुनौतियाँ बढ़ गई हैं। इस चुनौतीपूर्ण समाज में वह मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं को भूलता जा रहा है। ऐसे में इस प्रकार के साहित्य का महत्त्व बढ़ जाता है। उपन्यास में कई सारे विचार जीवन मूल्यों से जुड़े हुए हैं। ख़ासतौर पर इसमें आए गांधीवादी विचारों को बिक्सू के दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। बिक्सू केवल एक ग्राफिक उपन्यास नहीं, बल्कि एक विचार भी है।

निष्कर्ष : 20वीं सदी के अंतिम दशक में प्रारंभ हुए भारतीयग्राफिकउपन्यासों में समाज के मौजूदा संवेदनशील मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। चित्रों और संवादों के प्रयोग के माध्यम से जीवन की गंभीर घटनाओं को इसमें दर्शाया जा रहा है। कला और सृजनात्मकता के संयोजन से पौराणिक कथा, जातिवाद, नारी सशक्तिकरण, प्रकृति, राजनीति तथा समाज से जुड़ी संवेदनाओं को इन उपन्यासों में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस संदर्भ में हिंदी के प्रथम मौलिकग्राफिकउपन्यास के रूप में बिक्सू का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह एक ऐसी कहानी है, जो मनोरंजन तो करती ही है साथ ही जीवन के जटिल विषयों को भी सामने लाती है। राजकुमारी द्वारा मधुबनी लोककला में चित्रित यह कृति भारतीय परिवेश, लोकसंवेदना और मौलिक अभिव्यक्ति के धरातल पर हिंदी का अद्वितीयचित्रात्मक उपन्यास सिद्ध करती है। उपन्यास में प्रयुक्त मधुबनी शैली में बनाए जटिल चित्र एवं रेखाएँ, रंग, फॉण्ट, आंचलिक भाषा, पात्र, घटनाएँ, दृश्य, आदि का प्रभाव सहज रूप से देखा जा सकता है। इसमें मानव जीवन की अनेक घटनाओं का अद्भुत शैली में चित्रण हुआ है। निश्चित ही बिक्सू ने हिंदी साहित्य में ग्राफिक विधा के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया है।

संदर्भ:

  1. www.ebsco.com/research-starters/literature-and-writing/history-and-uses-term-graphic-novel
  2. www.researchgate.net/publication/337705164_Indian_Graphic_Novels-_An_Introduction
  3. https://orijitsen.com/river-of-stories/
  4. Abhijit R, Dr. Anne Angeline Abraham: ‘The Development of Graphic Novel in India: Why is it Growing a Class Apart?’ International Journal of Creative Research Thoughts, Vol. 11, November 2023, p. 379
  5. Pramod K. Nayar: ‘Towards a postcolonial critical literacy: Bhimayana and the Indian graphic novel’, Studies in South Asian Film and Media Vol. 3 (1), 2012, pp. 4 &18

www.researchgate.net/publication/270458231_Towards_a_postcolonial_critical_literacy_Bhimayana_and_the_Indian_graphic_novel

  1. राजकुमारी: बिक्सू, जुगनू प्रकाशन (एकतारा ट्रस्ट), भोपाल, 2018, पृ. पिछला आवरण
  2. Rajkumari और Varun Grover से उनके Graphic Novel पर बातचीत. YouTube, uploaded by The Lallantop, 13 April 2019, www.youtube.com/watch?v=OvnHPnReHGc
  3. वहीं
  4. वहीं
  5. वहीं
  6. वहीं
  7. राजकुमारी: बिक्सू, जुगनू प्रकाशन (एकतारा ट्रस्ट), भोपाल, 2018, पृ. 102
  8. राजकुमारी: बिक्सू, जुगनू प्रकाशन (एकतारा ट्रस्ट), भोपाल 2018, पृ. पिछला आवरण
  9. Srividya Natarajan, S. Anand, Subhash Vyam and Durgabai Vyam: Bhimayana: Experiences of Untouchability, Navayana Pub., New Delhi, 2011
  10. Amruta Patil, Devdutt Pattanaik: Aranyaka: Book of the Forest, Mumbai: Westland, 2019
  11. https://blog.artsper.com/en/a-closer-look/japanese-manga-comics-history
  12. https://www.thehindu.com/entertainment/art/how-a-35-page-letter-turned-into-a-graphic-novel-told-in-madhubani/article26471099.ece
  13. https://indianexpress.com/article/lifestyle/art-and-culture/raj-kumari-graphic-novel-about-school-boy-5681129/

 

दीपाली सुतार
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, कार्मेल कला, विज्ञान एवं वाणिज्य महिला महाविद्यालय, नुवें-गोवा
sutardeepali20@gmail.com, 7020374672

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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