डॉ.
नामवर
सिंह
हिन्दी
आलोचना
का
वह
नाम
है,
जो
इस
विधा
से
कभी
अलग
नहीं
होगा।
कहा
जाता
है
कि
यदि
प्रगतिशील
आन्दोलन
को
जातीय
और
हिन्दी
पाठकों
की
दृष्टि
में
विश्वसनीय
बनाने
का
कार्य
डा.
रामविलास
शर्मा
ने
किया
है,
तो
उसे
सक्रिय
आन्दोलन
के
रूप
में
जीवित
रखने
और
हिन्दी
भाषी
बुद्धिजीवी
युवको
में
रुचि
जागृत
करने
का
कार्य
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
किया।
अपनी
आलोचना
की
यात्रा
इन्होंने
‘‘हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’’
से
शुरू
की।
इन
ग्रंथों
में
इनकी
क्षमता
का
बखूबी
परिचय
मिलता
है।
उदाहरणार्थ-अपभ्रंश
के
महाकवि
स्वयंभू
की
सीता
अत्यंत
तेजस्विनी
हैं।
वे
अग्नि
परीक्षा
के
समय
राम
को
सुनाते
हुए
कहती
हैं- ‘गुणवान पुरुष भी हीन होते हैं, वे मरती हुई स्त्री पर भी विश्वास नहीं करते।’ लेकिन
अग्नि
परीक्षा
के
बाद
सीता
कर्म
फल
का
हवाला
देकर
राम
से
दोष
हटा
लेती
हैं।
इसकी
आलोचना
करते
हुए
डॉ.
नामवर
सिंह
कहते
हैं- ‘ऐसे महिमामयी नारी को कर्मफल विश्वासी जैन कवि नीचे उतारकर रख देता है। आग से तपकर असली सीता तो शायद खरे सोने की तरह और भी कांतिमयी होकर निकली होगी। लेकिन स्वयंभू की सीता कर्मफल की विभूति रमााए बाहर आईं। कवि को क्या पता कि उसकी सृष्टि अग्नि प्रवेश से पहले जितनी ही तेजोमयी थी, उससे निकलने के बाद उतनी ही म्लान भस्मावृत चिंगारी मात्र रह गई।’ डॉ. नामवर
सिंह
का
यह
तेवर
उनका
प्रारंभ
मात्र
था।
आगे
चलकर
इन्होंने
छायावाद,
इतिहास
और
आलोचना,
कविता
के
नए
प्रतिमान,
दूसरी
परम्परा
की
खेाज,
वाद
विवाद
संवाद,
कार्ल
मार्क्सः
कला
और
साहित्य
चिन्तन
जैसी
अमर
आलोचनाएं
लिखीं
जो
साहित्य
का
एक
बड़ा
हिस्सा
बनी।
भले
ही
मूर्धन्य
आलोचक
और
साहित्य
चिन्तक
नामवर
सिंह
ने
साहित्य
आलोचना
का
कोई
नितांत
नया
सिद्धान्त
न
दिया
हो,
पर
यह
बात
निर्विवाद
है
कि
वे
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी,
रामचन्द्र
शुक्ल
और
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
के
बाद
सर्वाधिक
महत्वपूर्ण
आलोचक
रहे
हैं।
अगर
रामविलास
शर्मा
ने
‘सूर्यकांत
त्रिपाठी
निराला
को
प्रतिष्ठित
करने
का
महत्वपूर्ण
कार्य
किया,
तो
नामवर
सिंह
ने
अपने
समय
के
अत्यंत
दुरूह
कवि
मुक्तिबोध
को
स्थापित
करने
का
कार्य
किया।
यह
एक
सच्चाई
है
कि
मुक्तिबोध
ने
रचना
प्रक्रिया
के
बारे
में
जैसा
मौलिक
चिन्तन
और
लेखन
किया
है,
उस
कोटि
का
मौलिक
चिन्तन
नामवर
सिंह
के
यहॉ
अनुपस्थित
है।
लेकिन
यह
बात
सर्व
स्वीकार्य
है
कि
नामवर
सिंह
ने
नई
कविता
व
नयी
कहानी
को
समझाने
की
जो
दृष्टि
विकसित
की,
बल्कि
आलोचना
की
एक
ऐसी
भाषा
विकसित
की,
जो
रचना
के
मर्म
को
समझाने
का
कार्य
कर
सके।
उनके
लेखन
और
चिन्तन
से
प्रभावित
होकर
आलोचकों
की
एक
फौज
का
ही
उदय
संभव
हुआ,
जो
अपनी
अपनी
तरह
से
आलोचना
समीक्षा
को
मजबूत
बनाने
का
काम
कर
रही
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
हिन्दी
आलोचना
की
एक
शिखर
प्रतिभा
हैं,
जिनका
विकास
20वीं
शती
के
उत्तरार्द्ध
में
हुआ।
स्वतंत्रता
के
बाद
की
उत्तरशती
में
हिन्दी
भाषा
और
साहित्य
में
एक
अभिनव
उत्कर्ष
और
उभार
आया
जिसे
सामान्यतः
जो
कि
प्रतिबद्ध
यथार्थवाद
के
रूप
में
जाना
जा
सकता
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
की
आलोचना
में
इस
उत्कर्ष
और
उभार
को
साहित्य
में
लक्षित
किया
जा
सकता
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
की
आलोचना
में
गहरी
ऐतिहासिक
अन्तर्दृष्टि,
परम्परा
के
रचनात्मक
तन्तुओं
की
पहचान
एवं
सार
सहेज,
एवं
सूक्ष्म
समयबोध
ओर
लोकनिष्ठा
के
साथ-साथ
साहित्य
कृतियों
के
रूप
एवं
अन्तर्वस्तु
की
मार्मिक
समझ
दिखई
पड़ती
है।
साहित्यिक
कृतियॉ,
संरचनाएं
और
प्रवृत्तियॉ
गणित
के
फार्मूलों
की
तरह
सहज
व
सपाट
नहीं
होतीं।
उसमें
समाज,
व्यक्ति
व
इतिहास
के
तथ्य
लेखकीय
मानस
में
आभ्यांतरीकृत
होकर
बहुत
कुछ
बदल
जाते
है
तथा
एक
जटिल
और
संश्लिष्ट
रूप
धारण
कर
लेते
हैं।
स्वभावतः
आलोचक
में
सामान्य
प्रबुद्ध,
एक
विशेष
प्रकार
की
अभिज्ञता,
सहृदयता,
और
कल्पनाशील
बौद्धिक
निपुणता
वांछित
होती
है।
आलोचक
में
संग्रह,
त्याग
का
यह
नित्य
चेतन
विवेक,
सहृदय
सहानुभूति
का
नैसर्गिकगुण
होना
चाहिए।
कहना
न
होगा
कि
डॉ.
नामवर
सिंह
में
ये
विशेषताएं
अपने
निखरे
रूप
में
पाई
जाती
हैं।
हृदय
और
बुद्धि
का
आलोचनात्मक
तनाव
भरा
द्वन्दात्मक
सन्तुलन
उनके
आलोचनात्मक
दृष्टि
की
आधारभूत
विशेषता
है।
आलोचना
के
क्षेत्र
में
रवीन्द्र
नाथ
ठाकुर
और
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
विरासत
डॉ.
नामवर
सिंह
को
प्राप्त
हुई,
जिसे
वे
दूसरी
परम्परा
कहते
रहे
है।
डॉ.
नामवर
सिंह
की
हिन्दी
आलोचना
को
एक
लालित्यपूर्ण
सर्जनात्मक
भाषा
और
मुहावरा
देने
का
श्रेय
प्राप्त
हैं।
उनकी
पहचान
हिन्दी
के
आलोचकों
की
गौरवपूर्ण
परम्परा
की
एक
अपरिहार्य
कड़ी
के
रूप
में
की
गई
है।
वे
मार्क्सवादी
विचारधारा
से
प्रभावित
प्रगतिशील
आधुनिक
आलोचक
के
रूप
में
आज
भी
अपनी
जीवंत
उपस्थिति
बनाए
हुए
है।
समग्र
भारतीय
वांड्मय
में
कबीर
के
बाद
डॉ.
नामवर
सिंह
एक
ऐसे
व्यक्तित्व
नजर
आते
हैं
जो
हर
आने
वाले
काल
में
ही
नहीं,
एक
असंभावित
अपवाद
की
तरह
अपनी
हर
रचना
से
बड़ा
है।
‘‘गालिब
की
दिल्ली
में
आज
भी
बनाकर
फकीरों
का
देख
तमाशाए
अहले
करम
’’देखने
वाले
इस
गंवईं
व्यक्तित्व
के
बारे
में
कोई
यह
नहीं
जानना
चाहता
कि
आज
तक
वे
क्या
लिख
चुके
है,
लिख
रहे
है
और
आगे
क्या
लिखने
वाले
हैं।’’1
उनका
हर
कहा
अनकहा
शब्द
उनके
आलोचनात्मक
तेवर
और
साहित्य
की
प्रतिनिधि
रचना
के
रूप
में
स्वीकार्य
हो
जाता
है।
‘‘वाचक
साहित्य
की
जो
प्रवृत्ति
कबीर
में
थी,
वह
आज
इस
व्यक्तित्व
में
चीन्ही
जा
सकती
है,
जो
अपने
विचार
के
प्रति
दृढ़
है,
किन्तु
वह
स्वयं
विचार
के
पीछे
नहीं,
विचार
उनके
पीछे
छाया
की
तरह
चलता
है।
ठीक-ठीक
यह
अंदाजा
नहीं
लगाया
जा
सकता,
कि
दो
भिन्न
समयों
में,
एक
ही
भाव
को
व्यक्त
करते
हुए,
वे
अपने
पिछले
विचार
के
तत्वार्थ
की
जमीन
पर
ही
अटके
हैं
या
उसी
विचार
के
नए
रूपान्तरण
की
नयी
जमीन
को
अपना
चुकने
के
उपरांत
उसे
घुटने
टिकवाकर
अपने
सामने
नचवा
रहे
है।
नामवर
सिंह
के
व्यक्तित्व,
रचनाधर्मिता
और
आलोचना
के
लोक
का
मूल्यांकन
उनके
जीवनकाल
में
ही
चौंकाने
वाली
हदों
तक
हुआ
है।
साहित्य
की
वाचक
परम्परा
में
ऐसा
सार्थक
और
अविस्मरणीय
स्तंभ
शायद
ही
कोई
दूसरा
हो।’’2
डॉ.
नामवर
सिंह
का
मानना
है
कि
‘‘आलोचना
की
वह
पद्धति
जिसमें
बार
बार
सिद्धांतों
की
दुहाई
हो,
रचना
के
मूल्यांकन
विश्लेषण
से
असम्बद्ध
और
अलग
उनका
उल्लेख
हो-मुझे
गलत
लगता
है।
कुछ
मार्क्सवादी
आलोचक
किसी
कृति
का
मूल्यांकन
करते
समय
मार्क्स,
एगेल्स
लेनिन
या
माओ
के
प्रमाण
पर
सिद्धान्त
कथन
करते
हैं,
फिर
उस
कृति
की
जॉच
करते
हैं।
मार्क्स
या
लेनिन
का
प्रमाण
किसी
आलोचना
के
प्रमाणिक
होने
की
गारंटी
नहीं
है,
उसी
तरह
जैसे
किसी
कविता
में
समाजवादी
आस्था
की
घेाषणा
उस
कविता
के
अच्छे
होने
की
शर्त
नहीं
है।’’3
डॉ.
नामवर
सिंह
के
साहित्य
समबन्धी
सिद्धान्त
उनकी
व्यावहारिक
आलोचना
के
साथ
ही
विकसित
हुए
हैं।
डॉ.
मैनेजर
पाण्डेय
ने
नामवर
सिंह
की
आलोचना
दृष्टि
पर
विचार
करते
हुए
लिखा
कि
‘‘उनकी
आलोचना
में
सिद्धान्त
और
व्यवहार
की
ऐसी
एकता
है
कि
एक
को
दूसरे
से
अलग
करना
संभव
नहीं
है।
उनके
निबंधों
या
पुस्तकों
के
शीर्षक
प्रायः
सैद्धांतिक
लगते
हैं,
लेकिन
उनके
भीतर
सिद्धान्त
निर्माण
से
अधिक
व्यावहारिक
विवेचन
का
प्रयत्न
दिखाई
देता
है।
उनके
निबंधों
में
सैद्धांतिक
चिन्तन
की
प्रक्रिया
यह
है
कि
प्रारंभ
में
वे
किसी
विचार
को
सूत्र
के
रूप
में
रखते
हैं,
फिर
व्याख्या
करते
हैं।
व्याख्या
के
समर्थन
में
उदाहरण
रखकर
उनका
विवेचन
करते
हैं,
और
अंत
में
निष्कर्ष
के
रूप
में
जो
विचार
प्रस्तुत
करते
हैं,
वे
प्रायः
उनके
अपने
सैद्धांतिक
निष्कर्ष
होते
हैं।
वैचारिक
स्थापना,
विश्लेषण,
उदाहरण,
व्याख्या,
निष्कर्ष
की
यह
विचार
प्रक्रिया
मूलतः
आचार्य
शुक्ल
की
है,
जिनका
उपयोग
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
किया
है।
कभी
कभी
अति
साधारण
व
परिचित
उदाहरणों
से
अपनी
बात
शुरू
करते
हुए
गहरे
चिन्तन
में
डूब
जाते
हैं
और
विवेचन
व
विश्लेषण
के
समय
अपनी
वैचारिक
यात्रा
में
पाठक
को
साथ
लेकर
चलते
हैं।
लोकप्रिय
लेखन
की
यह
विशेषताएं
‘‘इतिहास
व
आलोचना
में
मौजूद
है,
लेकिन
‘‘कविता
नए
प्रतिमान’’
में
सपाटबयानी
की
जगह
कुछ
जटिलता
आ
गयी
है।4
कविता
का
वैचारिक
आधार
व
रचनाशीलता
के
विश्लेषण
की
नामवर
सिंह
की
निराली
पद्धति
में
सपाटता
व
इकहरापन
नहीं
आता,
बल्कि
रचना
की
जटिलता
की
विभिन्न
परतों
को
वे
खेालते
हैं।
उनके
आलोचना
पद्धति
की
विशेष
बात
यह
है
कि
वे
रचना
के
रूप
की
व्याख्या,
विश्लेषण
तक
सीमित
करके
आलोचना
को
न
तो
रूपवाद
का
शिकार
होने
देते
हैं,
नही
समाजशास्त्रीय
व्याख्या
तक
सीमित
करके
उसके
रूप
की
उपेक्षा
करते
हैं।वे
रचना
के
रूप
से
आरंभ
करके,
उसका
सामाजिक
आधार
खोजते
हुए,
भाव
बोध
व
सामाजिक
तत्व
तक
पहुँचते
हैं
और
विषयवस्तु
से
शुरू
करके,
रचना
प्रक्रिया
से
गुजरते
हुए,
सचना
के
रूप
की
विशिष्टता
तक
जा
पहुँचते
हैं।
अपनी
पद्धति
के
बारे
में
डॉ.
नामवर
सिंह
का
कहना
है- ‘‘आप मेरे आलोचनात्मक लेखों को
ध्यान
से
देखें
तो
पाएंगे
कि
मैने
रचना
के
विश्लेषण
के
दौरान
रूप
के
स्तर
पर
जहॉ
उसमें
मौजूद
अन्तर्विरोधों
और
दुर्बलताओं
की
ओर
संकेत
किया
है,
वहीं
उस
रचना
के
समूचे
नैतिक
स्खलन
की
बात
भी
की
है,
जो
रचना
की
जीवन
दृष्टि
और
विचारधारा
से
भी
सम्बन्धित
है।
निर्गुण
और
उषा
प्रियंवदा
की
कहानियॉ
तथा
अज्ञेय
की
असाघ्य
वीणा
का
विश्लेषण
भी
इसी
पद्धति
पर
है।’’5
‘‘रचना
के
सामाजिक
आधार
की
पहचान
और
उसकी
सामाजिक
सार्थकता
के
सन्दर्भ
में
उसकी
महत्ता
का
उद्घाटन
नामवर
सिंह
की
आलोचना
का
केन्द्रीय
सूत्र
है।
उनकी
व्यावहारिक
आलोचना
में
साहित्य
सिद्धान्तों
के
निरूपण
की
आधारभूमि
यही
है।
साहित्य
का
कोई
रूप
हो,
विचार
हो,
या
साहित्य
में
प्रचलित
कोई
भ्रम
हो,
रूढ़ि
हो,
वास्तविकता
हो
या
कलात्मक
सौन्दर्य
हो
या
कोई
साहित्यिक
प्रवृत्ति
इनके
सामाजिक
आधार
की
तलाश
में
ही
नामवर
सिंह
ने
हिन्दी
आलोचना
और
विशेषकर
प्रगतिशील
आलोचना
के
समक्ष
चुनौती
बनी
हुई
समस्याओं
को
सुलझाया।’’6
छायावाद
की
गुत्थी
प्रगतिशील
आलोचना
के
सामने
चुनौती
बनी
हुई
थी।
नामवर
सिंह
की
विश्लेषक
बुद्धि
व
रचना
के
भीतर
से
उसकी
पहचान
करने
की
उसकी
पद्धति
ने
इसे
सुलझा
दिया।
ऐतिहासिक
परिप्रेक्ष्य
में
रचना
के
दार्शनिक
आधार
को
खेाजने
के
प्रयास
से
ही
छायावाद
पर
पड़े
रहस्यवाद
के
कोहरे
के
पार
की
सच्चाई
दिख
सकी।
विशुद्ध
साहित्य
से
बाहर
सामाजिक
सन्दर्भ
में
देखने
की
कोशिश
की
तो
नामवर
को
छायावाद
की
भावप्रवणता,
कल्पनाशीलता,
प्रकृतिचित्रण
को
छायावाद
की
अभिव्यक्ति
नजर
आया।
‘‘नामवर
सिंह
मूलतः
कविता
के
आलोचक
हैं
लेकिन
कहानी:
नयी
कहानी
में
कहानी
की
समीक्षा
के
संतुलित
प्रतिमान
तैयार
करने
में
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाई
और
कहानी
को
समाज
के
भावबोध
व
युगसत्य
को
अभिव्यक्ति
प्रदान
करने
महत्वपूर्ण
विधा
के
रूप
में
स्थापित
किया।
कहानी
को
चर्चा
के
केन्द्र
में
लाने
में
नामवर
सिंह
का
अहं
योगदान
है।’’7
नामवर
सिंह
वास्तव
में
हिन्दी
के
पहले
आलोचक
हैं, जिन्होंने कहानी
की
समीक्षा
को
गंभीरता
से
लिया।
और
कहानी
के
रूप
को
कहानीपन
से
जोड़ा
और
कहानी
के
रूप
की
विशिष्टता
के
महत्व
को
समझा।
नामवर
सिंह
के
कहानी
आलोचना
में
प्रवेश
से
पहले
कहानी
तात्विक
आलोचना
ही
मुख्य
तौर
पर
स्थापित
की।
कहानी
विवेचन
फार्मूलाबद्ध
था।
अभी
तक
हिन्दी
की
कहानी
सम्बन्धी
सामान्य
धारणा
ने
कहानी
की
जीवनी
शक्ति
का
अपहरण
कर
उसे
निर्जीव
शिल्प
ही
नहीं
बनाया
है,
बल्कि
उस
शिल्प
को
विभिन्न
अवयवों
में
कांटकर
बांट
दिया।
लिहाजा
हम
कहानी
को
कथानक,
चरित्रचित्रण,
वातावरण,
विषयवस्तु
आदि
के
अलग
अलग
अवयवों
के
रूप
में
देखने
को
अभ्यस्त
हो
गए।
इस
धारणा
का
असर
यह
पड़ा
कि
लोगों
ने
कहानी
में
जीवन
सत्य
और
भावबोध
को
देखना
छोड़कर
उसे
कहानी
की
पारिभाषिक
संज्ञाओं
के
रूप
में
देखना
शुरू
कर
दिया।
प्रभान्विति
व
एकान्विति
की
माला
जपते
हुए
भी
आलोचकों
ने
कहानी
को
अनुभूति
की
एक
इकाई
के
रूप
में
देखना
छोड़
दिया।
इस
तरह
उन्होने
कहानी
के
सत्य
के
साथ
ही,
कहानी
के
कहानीपन
की
समझ
को
खो
दिया।
नामवर
सिंह
ने
कहानी
के
कहानीपन
को
बरक्स
रखा।
यदि
नामवर
सिंह
कहानीपन
व
उसकी
प्रक्रिया
पर
इतना
जोर
न
देते
तो
शायद
कहानी
आलोचना
अभी
तक
उसके
अवयवों
की
दोषपूर्ण
समीक्षा
तक
ही
सीमित
रहती।
कहानी
समीक्षा
में
उसके
कहानीपन
को
स्थापित
करना
हिन्दी
कहानी
के
अध्ययन
में
गुणात्मक
परिवर्तन
था।
नामवर
सिंह
ने
कहानीपन
को
मुख्य
मानते
हुए
कहा
कि
‘असल
बात
है
कहानी
का
कहानीपन।
यह
आकस्मिक
नहीं
है
कि
कहानीपन
की
उपेक्षा
करके
केवल
शिल्प
के
लिए
लिखी
हुई
एक
भी
श्रेष्ठ
कहानी
नहीं
बन
सकी।
कहानी
का
कहानीपन
समझने
में
कठिन
होते
हुए
भी
कोई
रहस्य
नहीं
है।
कविता
में
जो
स्थान
लय
का
है,
कहानी
वही
स्थान
कहानीपन
का
है।
निःसन्देह
इस
कला
का
चरम
विकास
आधुनिक
युग
में
हुआ,
जब
उद्देश्य
और
कहानीपन
दोनों
घुल-मिलकर
इस
तरह
एक
हो
गए
कि
उद्देश्य
से
अलग
कहानी
के
रूप
की
कल्पना
कठिन
हो
गई।’
कहानी
को
मात्र
शिल्प
की
दृष्टि
से
अच्छी
या
सफल
कहने
के
बजाय
जीवन-मूल्यों
को
कसौटी
पर
कसने
तथा
मनोरंजन
के
बजाय
उसकी
सामाजिक
सार्थकता
पर
जोर
दिया
जिससे
कहानी
साहित्य
की
केन्द्रीय
विधा
के
रूप
में
स्थापित
हुई।
नामवर
सिंह
के
कहानी
को
जीवन
का
खंडित
सत्य
या
एक
टुकड़ा
सत्य
व्यक्त
करने
का
मात्
धारणा
का
खण्डन
करते
हुए
कहा
कि
लोगों
की
यह
धारणा
गलत
है
कि
कहानी
जीवन
के
एक
टुकडे
को
लेकर
चलती
है।
कहानी
जीवन
के
टुकड़े
में
निहित
अन्तर्विरोध,
द्वन्द,
संक्रान्ति
अथवा
क्राइसिस
को
पकड़ने
की
कोशिश
करती
है
और
ठीक
ढ़ंग
से
पकड़
में
आ
जाने
पर
यह
खंडगत
अन्तर्विरोध
भी
वृहद
अन्तर्विरोधों
के
किसी
न
किसी
पहलू
का
आभास
दे
जाता
है।
नामवर
सिंह
ने
कहानी
की
आलोचना
में
उसकी
रचना
प्रक्रिया
पर
जोर
देते
हुए
तत्कालीन
कहानियों
की
इस
ढ़ंग
से
व्याख्या
की
कि
कहानी
के
अध्ययन
में
एक
नई
स्फूर्ति
का
संचार
हुआ।
यद्यपि
यह
भी
सही
है
कि
उनकी
इस
रचनात्मक
पहल
से
उस
समय
के
बहुप्रतिष्ठित
कहानीकारों
के
अहं
को
चोट
पहुँची
जिसकी
अभिव्यक्ति
जब
तब
लेखों,
गोष्ठियों,
भाषणों,
सेमिनारों,
पत्रिकाओं
के
संपादकीयों
में
होती
रही
है।
अनुभव
को
ही
प्रमाणिक
मानकर
रचित
कहानियॉ
जिस
तरह
मध्यवर्गीय
कुंठा,
निराशा,
घुटन
व
पराजय
बोध
की
विकृतियों
की
शिकार
हुई,
वह
आज
तक
पूरी
तरह
से
समाप्त
नहीं
हुई
है।
नामवर
सिंह
का
हिन्दी
कहानी
पर
कलम
चलाना
शुभ
संकेत
था,
जिसने
हिन्दी
कहानी
को
एक
नई
दिशा
दी
थी।
हिन्दी
में
शायद
ही
ऐसा
कोई
आलोचक
हो
जो
रचना
को
इस
तरह
प्रभावित
कर
सका
हो।
नामवर
सिंह
को
हिन्दी
आलोचना
में
जो
ख्याति
प्राप्त
हुई
है,
उसका
श्रेय
उनकी
आलोचना
की
रचनात्मक
भाषा
को
जाता
है।
आलोचना
की
भाषा
अकसर
या
तो
पांडित्य
से
बोझिल
व
नीरस
हो
जाती
है
या
फिर
आलोचक
का
एकतरफा
वक्तव्य
बनकर
रह
जाती
है।
नामवर
सिंह
की
सृजनात्मक
भाषा
पाठकों
के
साथ
संवाद
करती
है।
नामवर
सिंह
की
भाषा
पाठक
पर
हथैाड़े
नहीं
चलाती,
बल्कि
धीरे
से
उसकी
चेतना
में
उतर
जाती
है।
कथा
साहित्य
में
जो
भाषा
प्रेमचन्द
ने
अपनाई
वह
सीधे
लोगों
से
संवाद
करती
हुई
उनके
दिलों-दिमाग
में
जगह
बना
ली,
वही
काम
नामवर
सिंह
की
भाषा
आलोचना
में
करती
है।
यह
अपने
पाठक
के
साथ
जीवंत
सम्बंध
बनाए
रखती
है
और
उसे
अपने
साथ
लेकर
चलने
की
क्षमता
रखती
है।
व्यंग्य
नामवर
की
भाषा
का
सहज
गुण
है।
वह
शब्दों
के
बीच
अपनी
उपस्थिति
बनाए
रखता
है।
कभी
इस
बात
का
आभाव
या
एहसास
नहीं
होता
किसी
विशेष
शब्द
को
किसी
विशेष
पर
कटाक्ष
करने
के
लिए
विशेष
रूप
से
चुना
गया
है।
इसी
से
उनकी
भाषा
में
एक
रवानी
आती
है
और
पाठक
के
साथ
एक
रिश्ता
कायम
करने
में
यह
व्यंग्य
मदद
करता
है।
नामवर
सिंह
की
भाषा
का
रूप
निखर
कर
सामने
आया
जहाँ
उनके
सामने
कोई
विरोधी
विचार
हो
और
उन्हें
उनके
भीतर
की
विडम्बना
या
कमजोरी
या
बेईमानी
को
उद्घटित
करना
हो।
ऐसे
मौके
पर
भाषा
के
व्यंग्य
की
मारक
क्षमता
और
बढ़
जाती
है।
व्यापकता
और
प्रश्न
के
गहराई
की
आड़
में
व्यक्तिवादी
रचनाकार
जब
प्रेमचन्द
पर
हमले
कर
रहे
थे
तो
नामवर
सिंह
के
उत्तर
की
भाषा
देखने
लायक
है।
आजकल
बहुत
से
लेखक
हैं
जो
वास्तविकता
पर
परदा
डालने
को
ही
गहराई
समझते
हैं।
ये
आज
के
शोषण
व
सामाजिक
प्रगति
पर
रहस्य
और
दर्द
के
कुहासे
का
परदा
डालते
हैं।
जो
सत्य
का
उद्घाटन
करने
की
ओर
कदम
नहीं
बढाता,
उसकी
गहराई
कैसी?
सच्चाई
के
हिमायती
अधिकांशतः
अन्तर्मुखी
हैं
और
अपने
अन्दर
सिमटते
जाने
को
ही
वे
गहराई
कहते
हैं।
इसी
को
ही
गुलेरी
जी
ने
कछुआ
धर्म
कहा
हैं।
इसतरह
ये
लेखक
जैसे
जैसे
अपने
भीतर
सिमटते
हैं,
उसी
क्रम
से
समाज
से
दूर
होते
जाते
हैं।
रत्नाकरजी
की
गोपियों
की
तरह
उन्हें
भी
कहना
चाहिए- ‘ज्यों ज्यों बसे जात दूरि दूरि प्रिय प्रान मूरि, त्यों त्यों घसे जात मन मुकुर हमारे में|’
नामवर
सिंह
की
भाषा
में
संस्कृत,
उर्दू,
फारसी,
अंग्रेजी
के
शब्द
उसी
सहज
भाव
से
आते
हैं,
जैसे
कि
लोक
जीवन
में
प्रचलित
मुहाबरे
व
लोकोक्ति।
वे
मुहाबरे
व
लोकोक्ति
तथा
लोकजीवन
में
प्रचलित
कहावत
व
मान्यता
को
गूढ़
चिन्तन
से
इस
तरह
जोड़ते
हैं,
मानों
कि
आलोचना
नहीं,
बतकही
कर
रहे
हों।
मुहाबरे
व
लोकोक्तियों
का
येसा
प्रयोग
वही
समर्थ
लेखक
कर
सकता
हैं
जिसकी
लोकजीवन
पर
गहरी
पकड़
हो।
मीर,
गालिब,
टैगोर
और
अंग्रेजी
के
किसी
कवि
की
कविता
की
पंक्तियां
आलोचना
में
सहज
रूप
से
आ
जाती
हैं,
जो
नामवर
सिंह
के
विशद्
अध्ययन
को
दर्शाती
हैं
और
कमाल
की
बात
यह
है
कि
ये
किसी
भारी
भरकम
उद्धरण
या
पांडित्य
के
रूप
में
नहीं
आती
बल्कि
अपने
सृतनशील
मिठास
के
साथ
आलोचना
का
सरस
करने
के
लिए
आती
है।
‘‘आज
जब
हम
नामवर
सिंह
के
आलोचना
पर
विचार
करने
बैठते
हैं
तो
हमें
उनकी
आलोचना
शक्ति
का
बीजतत्व
उनकी
भाषा
में
दिखाई
दे
जाता
है।
उनकी
आलोचना
दृष्टि
में
अगर
तीक्ष्णता,
बेलागपन
और
हाजिरजबाबी
के
साथ
हमेशा
एक
ताप
दिखाई
देता
है,
तो
उसके
पीछे
उनकी
आलोचना
की
भाषा
का
बहुत
बड़ा
हाथ
है।
उनकी
भाषा
को
पढ़ते
हुए
कभी
आचार्य
शुक्ल
की
स्पष्टवादिता,
तत्वचिन्तन
ओर
हाजिर
जवाबी
झलकती
है,
तो
कभी
महावीर
द्विवेदी
जैसा
शब्दानुशासन,
तो
कभी
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
जैसा
मस्तमौलापन,
फक्कड़पन
और
जैसी
बेहिसाब
ठाठफकीरी
झलकता
हैं।
महाकवि
निराला
ने
गद्य
की
भाषा
को
जीवन
संग्राम
की
भाषा
जिन
अर्थो
में
कहा,
वह
नामवर
सिंह
की
आलोचनात्मक
भाषा
में
देखा
जा
सकता
है।
नामवर
सिंह
की
आलोचना
की
भाषा
में
तरकश
के
ऐसे
असंख्य
तीर
भरे
पड़े
हैं,
चाहे
वह
मुक्तिबोध
को
लेकर
नई
कविता
के
क्षेत्र
में
उतरने
का
दौर
हो,
या
फिर
नई
कहानी
के
मूल्यांकन
क्रम
में
निर्मलवर्मा
के
वकालत
का
सवाल
हो
या
फिर
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
को
लेकर
दूसरी
परम्परा
के
खेाज
की
बात
हो।’’8
हरिशंकर
पारसाई
के
अनुसार
‘‘नामवर
सिंह
की
समीक्षा
तथा
सैद्धांतिक
व्याख्या
में
रचनात्मक
साहित्य
जैसा
लालित्य
है।
आमतौर
पर
समीक्षा
की
भाषा
शुष्क
और
उबाउ
होती
है।
पर
नामवर
सिह
की
भाषा
और
शैली
बहुत
प्रभावी
है।
सहज
ढलान
हैं
उनके
लेखन
में।
सीढ़ियॉ
चढ़ना
या
उतरना
नहीं
पड़ता।
वे
मुहावरों
का
अच्छा
प्रयोग
करते
है।
संबोधन
पद्धति
से
तर्क
को
जीवंत
बनाते
है।
उनकी
भाषा
में
विलक्षण
‘लुसीडिटी
’हैं।
कटाक्ष
है,
व्यंग्योक्ति
है,
वक्रोक्ति
है,
व्याजस्तुति
और
व्याज
निंदा
है
और
‘विट्’
है।’
अंत
में,
डॉ.
नामवर
सिह
के
योगदान
ने
हिन्दी
आलोचना
को
नया
आयाम
दिया।
उन्होंने
समीक्षा
को
केवल
रचनाओं
की
व्याख्या
और
मूल्यांकन
तक
सीमित
नहीं
रखा,
बल्कि
उसे
साहित्य,
समाज
व
संस्कृति
के
बीच
संबन्धों
को
समझने
का
एक
महत्वपूर्ण
साधन
बनाया।
वे
हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
में
एक
युगांतकारी
व्यक्तित्व
है।
उनकी
समीक्षा
दृष्टि
ने
हिन्दी
साहित्य
की
समझा
को
बदल
दिया
और
आलोचनात्मक
विमर्श
को
एक
नई
दिशा
दी।
वे
हिन्दी
साहित्य
के
अध्येता
और
प्रेमी
के
लिए
सदैव
प्रेरणास्रोत
रहेंगे।
सन्दर्भ
:
अध्यक्ष - हिन्दी विभाग, के. एन. आई. पी. एस. एस., सुलतानपुर

एक टिप्पणी भेजें