- रजनीश कुमार यादव
हिंदी
आलोचना
में
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
को
परस्पर
दो
ध्रुवांतों
के
रूप
में
देखने
का
प्रयास
किया
गया
है।
नामवर
सिंह
का
शुरुआती
झुकाव
भी
मुक्तिबोध
की
ओर
ही
था।
उनकी
आलोचनात्मक
पुस्तक
'कविता के नए
प्रतिमान'
मुक्तिबोध
को
समर्पित
है।
इसमें
नामवर
सिंह
ने
काव्य-प्रक्रिया
या
रचना-प्रक्रिया
पर
विचार
करते
हुए
कविता
के
नए
प्रतिमानों
को
रेखांकित
किया
है।
कविता
क्या
है,
रस
के
प्रतिमान
की
प्रसंगानुकूलता,
छायावादोत्तर
कविता
मूल्यांकन
की
समस्या,
काव्य-भाषा,
काव्य-बिंब,
अनुभूति
की
जटिलता
जैसे
प्रमुख
विषय
हैं।
इस
पुस्तक
में
मुक्तिबोध
की
रचना-प्रक्रिया
और
उनकी
कविता
'अंधेरे में' का
मूल्यांकन
नामवर
सिंह
ने
कविता
के
नए
प्रतिमान
के
आधार
पर
की
है।
'कविता
के
नए
प्रतिमान'
के
बाद
हिंदी
आलोचना
में
लगने
लगा
कि
नामवर
सिंह
का
मुक्तिबोध
के
प्रति
झुकाव
है
और
वे
कविता
के
प्रतिमान
को
मुक्तिबोध
की
रचना-प्रक्रिया
के
आधार
पर
निर्मित
करना
चाहते
हैं।
नामवर
सिंह
बाद
के
दिनों
में
इसे
सिरे
से
खारिज
करते
हैं।
प्रयोगवाद
और
नई
कविता
को
स्थापित
करने
वाले
अज्ञेय
के
प्रति
भी
उनका
उतना
ही
लगाव
है
जितना
मुक्तिबोध
से।
नेशनल
बुक
ट्रस्ट
से
'अज्ञेय: संकलित कविता'
का
प्रकाशन
करना
और
'हिंदी कविता की
परंपरा'
पुस्तक
में
अज्ञेय
को
केंद्र
में
रखते
हुए
उनके
कई
आलेख
हैं
जैसे
- नई
कविता
पर
क्षण
भर,
अज्ञेय
साधक
कवि
थे,
आज
के
प्रश्न
और
अज्ञेय,
नई
कविता
का
सामाजिक
धरातल
तथा
बिंब
विधान
और
नई
कविता
जैसे
आलोचनात्मक
लेखों
के
माध्यम
से
अज्ञेय
का
मूल्यांकन
किया।
हिंदी
आलोचना
में
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
का
मूल्यांकन
आलोचकों
ने
अपने-अपने
दृष्टिकोण
से
किया
है।
कहीं
इन्हें
परस्पर
विरोधी
तो
कहीं
परस्पर
पूरक
के
रूप
में
देखा
गया।
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
दोनों
का
साहित्य
वैविध्यपूर्ण
है।
कविता,
कहानी,
उपन्यास,
आलोचनात्मक
निबंध
तथा
अन्य
गद्य
विधाओं
में
इन
दोनों
रचनाकारों
ने
अपनी
कलम
चलाई।
तारसप्तक
के
प्रकाशन
के
साथ
इन
दोनों
रचनाकारों
ने
हिंदी
काव्य
को
एक
नया
मार्ग
प्रस्तुत
किया।
प्रयोगवाद
और
नई
कविता
में
इनकी
भूमिका
महत्वपूर्ण
रही।
यह
कहना
सही
होगा
कि
नई
कविता
को
इन
दोनों
रचनाकारों
ने
दो
धाराओं
में
बांटकर
विकसित
किया।
एक,
व्यक्तिवादी
और
अस्तित्ववादी
धारा
तो
दूसरी,
मार्क्सवादी
या
समाजवादी
धारा
थी।
सही
मायने
में
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
न
केवल
रचनाकार
थे
बल्कि
आलोचना
के
प्रतिमान
को
भी
गढ़ने
वाले
थे।
परिणामस्वरूप
हिंदी
आलोचना
में
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
को
दो
ध्रुवंत
के
रूप
में
देखा
जाने
लगा।
नामवर
सिंह
का
भी
शुरुआती
झुकाव
मुक्तिबोध
की
ओर
ही
था।
उनकी
आलोचनात्मक
पुस्तक
'कविता के नए
प्रतिमान'
मुक्तिबोध
को
समर्पित
है।
इसमें
नामवर
सिंह
ने
काव्य-प्रक्रिया
या
रचना-प्रक्रिया
पर
विचार
करते
हुए
कविता
के
नए
प्रतिमानों
को
रेखांकित
किया
है।
कविता
क्या
है,
कविता
के
नए
प्रतिमान,
रस
के
प्रतिमान
की
प्रसंगानुकूलता,
मूल्यांकन
की
समस्या
: छायावादोत्तर
कविता,
मूल्यों
का
टकराव
: उर्वशी-विवाद,
पुनर्मूल्यांकन
का
एक
उदहारण
: कामायनी,
तारसप्तक
: इतिहास
की
आवृत्ति,
काव्य-भाषा
और
सृजनशीलता,
काव्य-बिंब
और
सपाटबयानी,
काव्य-संरचना
: प्रगीतात्मक
और
नाटकीय,
विसंगति
और
विडंबना,
अनुभूति
की
जटिलता
और
तनाव,
ईमानदारी
और
प्रामाणिक
अनुभूति
तथा
परिवेश
और
मूल्य
जैसे
आलोचनात्मक
लेख
हैं।
इस
पुस्तक
में
मुक्तिबोध
की
रचना-प्रक्रिया
और
उनकी
कविता
'अंधेरे में' का
मूल्यांकन
नामवर
सिंह
ने
कविता
के
नए
प्रतिमान
के
आधार
पर
की
है।
अपने
समकालीन
आलोचकों
से
हटकर
'अंधेरे में' का
मूल्यांकन
किया।
उनके
दो
लेख
महत्त्वपूर्ण
हैं
- अंधेरे
में
: परम
अभिव्यक्ति
की
खोज
और
अंधेरे
में:
पुनश्च।
कविता
के
नए
प्रतिमान
की
भूमिका
में
नामवर
सिंह
लिखते
हैं-
“यह
तथ्य
अनदेखा
नहीं
किया
जा
सकता
कि
'कविता के नए
प्रतिमान'
के
केंद्र
में
मुक्तिबोध
हैं।
मूल्यों
के
अन्वेषण
की
प्रक्रिया
में
कभी-कभी
प्रायः
सबके
सामने
आदिकाव्य
का
यह
प्रश्न
उपस्थित
होता
है।
कोन्वस्मिन्
सांप्रतं
लोके...?
उत्तर
में
मुझे
मुक्तिबोध
ही
क्यों
दीखे,
इसका
उत्तर
यदि
स्वयं
यह
पुस्तक
नहीं
देती
तो
अलग
से
कोई
उत्तर
देना
अनावश्यक
है।”1
'कविता
के
नए
प्रतिमान'
में
मुक्तिबोध
को
केंद्र
में
रखने
का
कारण
स्पष्ट
करते
हुए
नामवर
सिंह
लिखते
हैं
- “इस
पुस्तक
का
आधार
यह
धारणा
है
कि
नई
कविता
में
मुक्तिबोध
की
स्थिति
वही
है
जो
छायावाद
में
निराला
की
थी।
निराला
के
समान
ही
मुक्तिबोध
ने
भी
अपने
युग
के
सामान्य
काव्यों
को
प्रतिफलित
करने
के
साथ
ही
उनकी
सीमा
को
चुनौती
देकर
उस
सर्जनात्मक
विशिष्टता
को
चरितार्थ
किया,
जिससे
समकालीन
काव्य
का
सही
मूल्यांकन
संभव
हो
सका।”2
नामवर
सिंह
मुक्तिबोध
की
विशेषता स्पष्ट करते
हुए
लिखते
हैं
- “उन्होंने
रचना
के
साथ
ही
आलोचना
के
भी
मान
रखे।
रचना-प्रक्रिया
के
विश्लेषण
के
साथ
ही
उन्होंने
आलोचना-प्रक्रिया
का
भी
प्रमाण
प्रस्तुत
किया।
एक
साहित्यिक
की
डायरी,
नई
कविता
का
आत्म-संघर्ष
तथा
अन्य
निबंध,
कामायनी
एक
पुनर्विचार
आदि
इस
आलोचना-प्रक्रिया
के
ऐतिहासिक
दस्तावेज
हैं।”3
कविता
के
नए
प्रतिमान
के
बाद
हिंदी
आलोचना
में
लगने
लगा
कि
नामवर
सिंह
का
मुक्तिबोध
के
प्रति
झुकाव
है
और
वे
कविता
के
प्रतिमान
को
मुक्तिबोध
की
रचना
प्रक्रिया
के
आधार
पर
निर्मित
करना
चाहते
हैं।
नामवर
सिंह
बाद
के
दिनों
में
इसे
सिरे
से
खारिज
करते
हैं।
प्रयोगवाद
और
नई
कविता
को
स्थापित
करने
वाले
अज्ञेय
के
प्रति
भी
उनका
उतना
ही
लगाव
है
जितना
मुक्तिबोध
से।
नेशनल
बुक
ट्रस्ट
से
'अज्ञेय : संकलित कविता'
का
प्रकाशन
करना
और
'हिंदी कविता की
परंपरा'
में
हिंदी
कविता
की
परम्परा,
नई
कविता
पर
क्षण
भर,
अज्ञेय
साधक
कवि
थे,
आज
के
प्रश्न
और
अज्ञेय,
आधुनिक
हिंदी
साहित्य
में
मनुष्य
की
छवि
: एक
दृष्टिकोण,
नई
कविता
का
सामाजिक
धरातल
तथा
बिम्बविधान
और
नई
कविता
जैसे
आलोचनात्मक
लेखों
के
माध्यम
से
अज्ञेय
का
मूल्यांकन
किया।
नामवर
सिंह
अज्ञेय
के
संदर्भ
में
अपने
पुराने
परिचय
का
हवाला
देकर
हिंदी
आलोचकों
के
भ्रम
को
दूर
करते
हैं,
वे
लिखते
हैं
- “एक
आम
धारणा
है,
ख़ासतौर
से
अज्ञेय
भक्तों
की,
कि
मैं
उनके
विरोधियों
में
हूँ।
उसके
लिए
स्पष्टीकरण
देना
कोई
बहुत
जरूरी
नहीं
है।
सफ़ाई
में
वक़्त
बर्बाद
नहीं
करना
चाहता,
न
आपका,
न
अपना।
लेकिन
यह
कम
लोग
जानते
हैं
और
यहाँ
जितने
लोग
उपस्थित
हैं,
कम-से-कम
इस
समय
जो
लोग
हैं...
हिन्दी
के
अनेक
लोगों
में
से
जो
सन्
चालीस
के
आस-पास
दिल्ली
में
रहे
होंगे
और
वे
यहाँ
दिखायी
भी
पड़
रहे
हैं।
अज्ञेय
से
मिलने
वालों
में,
परिचय
करने
में,
मुलाक़ात
में,
सम्भवतः
यहाँ
उपस्थित
लोगों
में
मेरी
पहचान
पुरानी
है।”4
नई
कविता
अपनी
पूर्वर्ती
काव्यधारा
छायावाद,
प्रगतिवाद
और
प्रयोगवाद
से
कैसे
अलग
है
इसको
लेकर
हिंदी
आलोचकों
में
मतभेद
और
बहस
रही
हैl
नामवर
सिंह
लिखते
हैं
- 'नयी कविता' प्रयोगवाद
से
कुछ
बातों
में
भिन्न
होते
हुए
भी
वस्तुतः
प्रयोगवाद
के
विकास
का
ही
दूसरा
चरण
है।
इसके
मूल
में
भी
चरम
व्यक्तिवाद
ही
है;
बल्कि
नयी
कविता
में
व्यक्तिवादिता
कुछ
बढ़ी
ही
है।
'तार सप्तक' काल
के
समान
ही
'दूसरा सप्तक' में
भी
'अन्वेषण' की बात
दुहराई
गयी
किन्तु
एक
अन्तर
के
साथ।
पहले
'राहों के अन्वेषण'
की
बात
की
गयी
थी,
अब
'आत्म-अन्वेषण' का
प्रश्न
उठाया
गया।
आत्मनिष्ठता
का
यह
स्पष्ट
संकेत
है।
इस
दौर
में
कवियों
ने
कविता
में
'ईमानदारी' का आग्रह
किया
और
'अनुभूति की प्रामाणिकता'
पर
विशेष
बल
दिया।"5
नई
कविता
की
प्रमुख
विशेषताओं
में
आत्मसंघर्ष
और
आत्मान्वेषण
दोनों
काव्य
प्रवृत्तियां
उभरती
हैं
अब
सवाल
उठता
है
ईमानदारी
और
प्रामाणिक
अनुभूति
के
आधार
पर
किसका
आत्मसंघर्ष
व्यापक
और
गहरा
थाl
नामवर
सिंह
लिखते
हैं
-"'तार सप्तक'
के
कवियों
में
केवल
मुक्तिबोध
ही
हैं
जिनमें
आज
भी
'आत्म-संघर्ष' का
बोध
जीवन्त
है।
क्यों?
उन्होंने
भी
रामविलास
शर्मा
की
तरह
सुविधानुसार
किसी
'आस्था' का वरण
करके
आत्म-संघर्ष
समाप्त
क्यों
नहीं
कर
दिया?
अज्ञेय
की
तरह
उन्होंने
भी
आत्म-संघर्ष
से
ऊबकर
किसी
दर्द
पर
आधारित
'आस्था' के सामने
घुटने
क्यों
नहीं
टेक
दिये?
और
नहीं
तो
नेमिचन्द्र
जैन
की
तरह
उन्होंने
भी
मौन
क्यों
नहीं
साध
लिया?
क्या
इसका
कारण
यह
नहीं
है
कि
मुक्तिबोध
का
आत्म-संघर्ष
इन
कवियों
की
अपेक्षा
अधिक
व्यापक
तथा
गहरा
था?"6
नई
कविता
का
मूल्याङ्कन
करते
समय
आलोचकों
का
ध्यान
अनुभूति
की
जटिलता
और
तनाव
पर
भी
थाl
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
की
तुलना
करते
हुए
नामवर
सिंह
लिखते
हैं
- " निस्संदेह
मुक्तिबोध
के
'तनाव' और अज्ञेय
के
'तनाव' की प्रकृति
में
अंतर
है।
अज्ञेय
की
दृष्टि
में
'मानसिक तनाव' प्रमुख
है,
जिसे
जीवन
की
विविधता
का
बोध
'विशृंखल' करता है।
इसके
विपरीत
मुक्तिबोध
का
तनाव
दुहरा
है
: एक
ओर
अपने
परिवेश
के
साथ,
दूसरी
ओर
स्वयं
अपने
अंदर।
किंतु
अंततः
ये
दोनों
तनाव
परस्पर
संबद्ध
हैं।
तनाव-संबंधी
इन
दोनों
दृष्टियों
की
परिणति
दो
रूपों
में
हुई
है।"7
'अँधेरे
में'
कविता
का
मूल्याङ्कन
करते
हुए
नामवर
सिंह,
रामविलास
शर्मा
(स्वप्न-कथा)
जैसे
आलोचकों
से
बहस
करते
हैं
और
इस
कविता
को
नये
सन्दर्भों
में
देखते
हैंl
वे
लिखते
हैं
- "निस्संदेह
इस
कविता
का
मूल
कथ्य
है
अस्मिता
की
खोज;
किंतु
कुछ
अन्य
व्यक्तिवादी
कवियों
की
तरह
इस
खोज
में
किसी
प्रकार
की
आध्यात्मिकता
या
रहस्यवाद
नहीं,
बल्कि
गली-सड़क
की
गतिविधि,
राजनीतिक
परिस्थिति
और
अनेक
मानव-चरित्रों
की
आत्मा
के
इतिहास
का
वास्तविक
परिवेश
है।
आज
के
व्यापक
सामाजिक
संबंधों
के
संदर्भ
में
जीनेवाले
व्यक्ति
के
माध्यम
से
ही
मुक्तिबोध
ने
'अँधेरे में' कविता
में
अस्मिता
की
खोज
को
नाटकीय
रूप
दिया
है।"8 काव्य भाषा और
सृजनशीलता
के
आधार
पर
नामवर
सिंह
अँधेरे
में
का
मूल्याङ्कन
करते
हुए
लिखते
हैं
- "कवि
मुक्तिबोध
के
लिए
अस्मिता
की
खोज
व्यक्ति
की
खोज
नहीं
बल्कि
अभिव्यक्ति
की
खोज
है।
एक
कवि
के
नाते
उनके
लिए
परम
अभिव्यक्ति
ही
अस्मिता
है।
भाषा
स्वभावतः
इस
अभिव्यक्ति
का
आधार
है।"9
अज्ञेय
की
कविता
असाध्य-वीणा
को
भी
काव्य-भाषा
और
सृजनशीलता
के
आधार
पर
नामवर
सिंह
मूल्यांकित
करते
हैं
साथ
ही
कामायनी
के
भावबोध
से
भी
तुलना
की
है
- "असाध्य
वीणा'
के
विन्यास
पर
दृष्टिपात
करें
तो
वह
दो
स्थिर
बिदुओं
के
बीच
फैलाई
हुई
रचना
प्रतीत
होती
है।
आदि
में
मौन
और
अंत
में
मौन
और
दोनों
ही
स्थिर
एवं
पूर्ण
निर्धारित।
किंतु
मौन
उभयनिष्ठ
है।
इस
प्रकार
आदि
अंत
का
द्वैत
आभास-मात्र
है।
आधार-बिदु
वस्तुतः
एक
ही
है।
वह
अद्वैत
है।
जिस
प्रकार
कामायनी
का
आरंभ
और
अंत
दोनों
ही
हिमालय
में
होता
है।
उसी
प्रकार
असाध्य
वीणा
का
भी
आदि-अंत
दोनों
मौन
में
होता
है।
प्रसाद
का
हिमालय
भी
'मधुरिमा में अपनी
ही
मौन
एक
सोया
संदेश
महान्'
है।
आकस्मिक
नहीं
कि
असाध्य-वीणा
का
मौन
भी
हिमालय
के
समान
ही
स्थिर,
विराट्
और
हिम-शीतल
है।
वस्तुतः
'असाध्य वीणा' जिस
वज्र
किरीटी
तरु
के
दारु
से
बनी
है
उसकी
जन्मभूमि
हिमालय
की
ही
उपत्यका
है।…असाध्य
वीणा
की
भाषा
में
आश्चर्यजनक
रूप
से
छायावाद
और
रीतिवाद-जैसे
दो
विरोधी
छोर
एक
बिंदु
पर
मिलते
दिखाई
पड़ते
हैं।
एक
ही
निष्प्राण
चेतना
भाषा
से
लेकर
भाव
के
स्तर
तक-कथन
रो
कथ्य
तक
आद्योपांत
व्याप्त
है।
भाषा
की
यह
अशक्यता
नैतिक
अशक्यता
का
पर्याय
है।
इस
प्रकार
असाध्य
वीणा
का
मौन
अपनी
सारी
वर्णन-चातुरी,
नाटकीयता
और
शब्द
प्रयोग-संबंधी
सतर्कता
के
बावजूद
आधुनिक
परिवेश
के
साथ
एक
समझौते
का
सूचक
है।"10
आज
के
प्रश्न
और
अज्ञेय
आलेख
में
नामवर
सिंह
अज्ञेय
और
मुक्तिबोध
के
कलात्मक
रचना
विन्यास
के
आधार
पर
(दोनों
की
प्रसिद्ध
कवितायें
असाध्य
वीणा
और
अँधेरे
में)
मूल्याङ्कन
किया
है,
वे
लिखते
हैं
- "अब
ये
आकस्मिक
नहीं
है...
संयोगवश
मैं
कह
दूँ
कि
अज्ञेय
ने
'प्रतीक' नामक पत्रिका
निकाली
थी।
लोग
'प्रतीक' का अर्थ
आमतौर
से
जो
समझते
हैं...
बिम्ब,
प्रतीक
जो
लिखा
करते
हैं...पर
प्रतीक
जब
वो
कहते
हैं
तो
उसका
एक
अलग
दर्शन
है।
हमारे
यहाँ
प्रतीकवाद
का
कोई
वाद
नहीं
चला
हिन्दी
में।
फ्रांस
में
ही
'सिम्बालिज्म' नाम की
चीज़
चली
थी।...
लोग
भूल
जाते
हैं
अज्ञेय
के
सन्दर्भ
में
कि
प्रतीकवाद
अज्ञेय
में...
लोग
उनको
तो
प्रयोगवादी
कहते
हैं।
मुझे
भ्रामक
लगता
है।
प्रयोगवादी
नहीं
हैं
वो।
हमारी
पूरी
परम्परा
के
प्रतीकों
का
अज्ञेय
कैसे
इस्तेमाल
करते
हैं।….लोगों
का
खयाल
है
कि
मैंने
'अंधेरे में' को
महान
कविता
कहा
था।
तुलना
करने
की
बात
नहीं
है
लेकिन
यह
जो
कलात्मक
रचाव
कविता
का
विन्यास
जैसा
अज्ञेय
में
है,
मुक्तिबोध
में
नहीं
था।
ये
तथ्य
है।
स्वीकार
करना
चाहिए।
विचार
बड़े
ज्वलन्त
हैं,
इसमें
कोई
शक
नहीं
लेकिन
जो
रचाव
है
कविता
का,
जो
कला
है
और
यह
कविता
प्रतीकवादियों
की
नहीं
थी,
ये
शब्दों
की
कला
है।
जैसा
साध
लिया
था
अज्ञेय
ने,
कम
लोगों
में
पाया
जाता
है।
उनके
अनुयायियों
तक
में
नहीं,
फिर
बाकी
विरोधियों
को
तो
छोड़
दीजिए।"11
अपने
जीवन
के
आखिरी
दिनों
में
नामवर
सिंह
अज्ञेय
की
कविता
'नाच' से काफी
प्रभावित
थे।
कविता
के
दर्शन
को
वे
अपने
या
किसी
भी
मनुष्य
के
जीवन
दर्शन
से
जोड़कर
देखते
हैं।
वे
लिखते
हैं
- "अज्ञेय
की
कविताओं
में
एक
छवि
है,
एक
चित्र
है
और
उनमें
जो
संवेदना
है,
वह
कथित
या
वाच्य
नहीं
होती,
ध्वनित
होती
है।
उनकी
एक
बड़ी
प्यारी
कविता
है
'नाच'। "मैं
नाच
रहा
हूँ
दो
खम्भों
के
बीच
बँधी
रस्सी
पर।
लोग
देख
रहे
हैं
मेरा
नाच..
।”
इसमें
नाच
उनका
सम्पूर्ण
संरचनात्मक
कार्य
है।
कविता,
कहानी,
उपन्यास
लिखना
उनका
नाच
है।
लोग
जिसे
नाच
या
कला
समझ
रहे
हैं
उसके
विपरीत
वे
दो
खम्भों
के
बीच
बँधी
रस्सी
को
खोलकर
तनावमुक्त
होना
चाह
रहे
हैं।
इसी
मुक्ति
की
तलाश
में
वे
आजीवन
रहे।
यह
अकेली
कविता
उनके
जीवन
की
आत्मकथा
भी
है।
उनकी
सोच
वैज्ञानिक
थी।
जिस
तरह
विज्ञान
में
अन्तिम
सत्य
कुछ
नहीं
होता
सिर्फ़
प्रयोग
होता
है,
उसी
तरह
वे
कविता
में
भी
जब
प्रयोग
की
बात
करते
तब
कहते
यह
अन्तिम
सत्य
नहीं
है।"12
अज्ञेय और मुक्तिबोध पर नामवर सिंह द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तकों, आलेखों, भाषणों, पत्र-व्यवहारों से स्पष्ट होता हैं कि ये दोनों साहित्यकार उनके आलोचना प्रतिमान निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। चूंकि अज्ञेय और मुक्तिबोध रचनाकार आलोचक थे। वे अपनी रचना-प्रक्रिया को अपनी आलोचना प्रक्रिया पर कसते थे। नामवर सिंह का प्रारंभ में मुक्तिबोध के प्रति झुकाव था कारण उनका आत्मसंघर्ष या वैचारिक प्रतिबद्धता हो सकती है। समय बीतने के साथ ही उनका झुकाव अज्ञेय के प्रति होने लगा। कारण का उल्लेख 'नाच' कविता के माध्यम से स्पष्ट हो सकता है। जिस तरह हिंदी कविता परंपरा के विकास में अज्ञेय और मुक्तिबोध की अहम भूमिका रही उसी तरह नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि के विकास में इन दोनों के महत्त्व को भुलाया नहीं जा सकता। हिंदी आलोचना की परंपरा में 'विरुद्धों के सामंजस्य' की एक प्रवृत्ति रही है। शायद नामवर सिंह भी इससे प्रभावित रहे हों।
संदर्भ
:
2. वही, भूमिका से.
3. वही, भूमिका से.
4. हिंदी कविता की परम्परा – संकलन-संपादन – विजय प्रकाश सिंह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2024, पृष्ठ-55
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा
7974306753

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