शोध आलेख : मैत्रेयी पुष्पा एवं सानिया की कहानियों में चित्रित स्त्री अस्मिता / वृषालीमांद्रेकर एवं साईली मोरजकर

मैत्रेयी पुष्पा एवं सानिया की कहानियों में चित्रित स्त्री अस्मिता
- वृषालीमांद्रेकर एवं साईली मोरजकर

 

शोध सार : स्त्री अस्मिता समकालीन हिंदी साहित्य का एक संवेदनशील विषय है जो स्त्री के अधिकार, अस्तित्व, स्वायत्तता के प्रश्नों को नए रूप में प्रस्तुत करता है। इस शोध आलेख में हिंदी की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के दस प्रतिनिधि कहानियां तथा मराठी की लेखिका सानिया के कहानी संग्रह खिडक्या में संकलित कहानियों में चित्रित स्त्री अस्मिता को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। इस शोध आलेख का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि दोनों लेखिकाओं की कहानियों मेंस्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति किन-किन रूपों में की गयी है। एक ओर जहां मैत्रेयी की कहानियों में ग्रामीण और सामंती परिवेश में स्त्री के संघर्ष, सामाजिक बंधनों से मुक्ति की आकांक्षा को रेखांकित किया है तो दूसरी ओर सानिया की कहानियां शहरी जीवन में स्त्री के व्यक्तिगत पहचान की खोज को अभिव्यक्त करती हैं। अतः प्रस्तुत आलेख में स्त्री अस्मिता के विकसित और बहुआयामी स्वरूप को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। 

बीज शब्द : स्त्री अस्मिता, पितृसत्ता, आर्थिक निर्भरता, विद्रोह, आत्मबोध, स्वाभिमान, संघर्ष, यथार्थ, आत्मचेतना, प्रतिरोध, आत्मसम्मान।

मूल आलेख : समकालीन साहित्य में स्त्री लेखन ने प्रभावशाली और सशक्त स्थान अर्जित किया है। इस संदर्भ में हिंदी साहित्य में मैत्रेयी पुष्पा और मराठी साहित्य में सानिया का स्थान विशिष्ट है।अस्मिता शब्द संस्कृत भाषा के अस्मि शब्द से निकला है। जिसका अर्थ है- मैं हूं की भावना। यह स्वयं की विशिष्ट पहचान को दर्शाता है।समाज में पुरुष की तरह स्त्री भी एक स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाली इकाई है जिसकी अपनी इच्छाएं, आकांक्षाएं तथा स्वप्न हैं। यह निजत्व और आत्मबोध ही उसकी पहचान का मूल आधार है। इस संबंध में महादेवी वर्मा का वक्तव्य है, हमें जय चाहिए, पराजय; किसी की प्रभुता चाहिए, किसी का प्रभुत्व। हमें केवल अपना वह स्थान स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेंगी। हमारी जागृत और साधन संपन्न बहिनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी, इसमें कोई संदेह नहीं।1 यह उद्धरण स्त्री की स्वतंत्र पहचान और अधिकार चेतना को व्यक्त करता है। उन्हें विश्वास है कि जो स्त्रियां जागरूक हैं वह इस दिशा में जरूर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आज स्त्रियां अपनी अस्मिता को सुरक्षित रखने हेतु निरंतर प्रयास से समाज की परंपरागत रूढ़ियों और तमाम बंधनों को तोड़ते हुए संघर्ष करती हैं। यद्यपि वह पारिवारिक दायित्व निभाते हुए परिवार को प्राथमिकता देती हैं, फिर भी अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान के प्रति दृढ़ रहती हैं।

समकालीन साहित्य में स्त्री अस्मिता का अध्ययन सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों को समझने का माध्यम है। इसमें स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मचेतना, अधिकारों के प्रति जागरूकता और रूढ़ियों के विरोध को दर्शाया गया है। साथ ही उसके मानसिक, मनोवैज्ञानिक आयामों और अंतर्द्वंद्वों का भी सूक्ष्म चित्रण मिलता है।

मैत्रेयी पुष्पा और सानिया दोनों ही दो भारतीय भाषाओँ की महत्वपूर्ण समकालीन लेखिकाएं हैं। मैत्रेयी ने हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से ग्रामीण जीवन से जुड़ी स्त्रियों के संघर्ष का चित्रण किया है। पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध स्त्री की आवाज़ उनके लेखन का केंद्रबिंदु है। उनके कहानी साहित्य में स्त्री का आत्मसम्मान से युक्त तथा विद्रोही रूप उभरकर सामने आता है। कुछ बातें जिन्हें स्त्री बताना नहीं चाहती बल्कि छिपाना चाहती है, ऐसी बातों को मैत्रेयी जी ने समाज रीति रिवाजों की धज्जियां उड़ाते हुए बड़ी ही निडरता के साथ स्वीकारा है, जिन्हें पढ़, एक बारगी पाठक स्तब्ध रह जाता है लेकिन साथ ही समाज में फैली कुरीतियों, सच्चाइयों तथा नारी के हो रहे अत्याचारों से रूबरू भी होता है, जो उसे पुनः विचार मंथन की ओर ले जाता है- कि जो सदियों से नारियों के प्रति होता रहा है वह सही है या जो मैत्रेयी जी के नायिकायें चीख-चीख कर कह रही हैं, वह सही हैं।2 यह उनके साहित्य को पढ़कर समझा जा सकता है।

मराठी साहित्य की चर्चित लेखिका सानिया (सुनंदा कुलकर्णी) की कहानियों के विषय मुख्यतः महाराष्ट्र के शहरी मध्यवर्गीय परिवेश से जुड़े हैं। उन्होंने विशेषतः स्त्री के मानसिक तथा भावनात्मक संसार को अपनी कहानियों में व्यक्त किया है। उनकी कहानियों में स्त्री पात्रों के अकेलेपन, अंतर्द्वंद्व, संबंधों की जटिलता और अस्तित्व की खोज भी मुख्य रूप से उभरकर सामने आती है। उनकी स्त्री पात्र शिक्षित हैं।सानिया के स्त्री पात्रों के बारे में रेखा इनामदार लिखती हैं, बाई आहेम्हणूनकोणीकाहीही सेवा, सवलतीवा लाभ देऊ करने आणितेस्वीकारणे या स्त्रियांनानकोसेवाटते. स्वतःच्याबळावरघट्टपाऊलरोवूनत्याउभ्याराहतात, आत्मप्रतिष्ठाजपतात. किंबहुनाकोणतीहीतडजोडनाकारणे हे त्यांच्याव्यक्तिमत्वाचे एक व्यवच्छेदकलक्षणचअसते”.3 (भावार्थस्त्री होने के कारण कोई भी सेवा, सुविधा या लाभ देना और उसे स्वीकार करना इन स्त्रियों को पसंद नहीं।वे अपने बल पर दृढ़ता से खड़ी होती हैं और आत्मसम्मान को बनाए रखती हैं। किसी भी प्रकार का समझौता करना उनके व्यक्तित्व की एक प्रमुख विशेषता है।)

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में स्त्री अस्मिता

मैत्रेयी कीफैसलाकहानी स्त्री सशक्तिकरण के राजनीतिक पक्ष को दर्शाती है। वसुमती के माध्यम से स्त्री की स्वतंत्र निर्णय क्षमता के विकास को दिखाया गया है। शुरुआत में वह पति रनवीर के नियंत्रण में पारंपरिक भूमिका निभाती है, लेकिन धीरे-धीरे उसमें आत्मचेतना जागती है और वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है। वह यह सिद्ध करती है कि स्त्री केवल किसी पद की प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि निर्णयक्षम भी हो सकती है। प्रधान के चुनाव में वह रनवीर को वोट नहीं देती। बाद में मास्साब को चिट्ठी में लिखती है, “ मेरे अग्नि देवता! सात फेरे दिलाने वाले महापंडित! मेरे जननी-जनक! और मास्साब आप, मेरे गुरुवर...आपने मुझे सुख-दुख की सहभागिनी, अर्धांगिनी, सहचरी बनाकर रनवीर की पत्नी के रूप में विदा किया था। लेकिन मैं क्या करती? अपने भीतर की ईसुरिया को नहीं मार सकी। 4कहानी में ईसुरिया का पात्र भी स्त्री अधिकारों के प्रति सजगता दिखाता है। वह गांव की स्त्रियों को जागरूक करते हुए कहती है, SS सब जनी सुनो, सुन लो कान खोलकें! बराबरी का जमाना गया। अब ठठरी बंधे मरदमाराकूटी करें, गारी-गरौज दें, मायके भेजें, पीहर से रुपया पइसा मंगवावे, क्या कहते हैं कि दायजे के पीछे सतावें, तो बैन सुधी चली जाना बसुमती के ढिंग। 5हरदेई की आत्महत्या के बाद वह वसुमती को पंचायत के अन्याय का अहसास दिलाते हुए कहती है, अच्छा होता बसुमती, हम अपना बोट काठ के लठिया को दे आते, निरजीव लड़की को। उठाउ उठती तो। बैरी पर वार तो करती। अतीचालों के विरोध में पड़ती। पर रणबीर की दुल्हन, तुम तो बड़े घर की बहू ही रहीं। पिरमुख जी की पत्नी। घूंघट में लिपटी पुतरिया-सी चलती रहीं, आंखें मूंद के। 6यहां स्त्री अधिकारों और समानता की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

उज्रदारीकहानी की नायिका शांति स्त्री अस्मिता और प्रतिरोध का सशक्त उदाहरण है। विधवा होने के बाद वह पारिवारिक शोषण का सामना करती है, जो पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर करता है। परंतु वह चुप रहकर जेठ के विरुद्ध प्रतिरोध करती है, जो सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ भी एक विद्रोह है। उदा- वह सोचती है- आज मुझे डर नहीं। जेठ का लिहाज नहीं। ताज्जुब है, आज क्या हो गया ऐसा? शर्मिली बहू कहाँ गयी? पति के रहते उंगली देखने वाले जेठ को अंगूठा दिखाने की सोच रही है?” 5उपरान्त उसका अपने जीवन को पुनः नये तरीके से शुरु करना भी स्त्री की स्वायत्तता और आत्मनिर्णय की क्षमता को दर्शाता है।

            पगला गई है भागवतीकहानी में स्त्री अस्मिता के दमन और विद्रोह दोनों स्वर दिखाई देते हैं। भागवती के माध्यम से विधवा स्त्री पर समाज के प्रतिबंध और उसके अस्तित्व के दमन को दर्शाया गया है। माधोसिंह ने अपनी बेटी अनुसुइया को इसलिए ज़हर देकर मार दिया क्योंकि उसने दूसरे बिरादरी के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया, जबकि बेटे के ऐसे ही निर्णय पर उन्होंने विरोध नहीं किया। भागवती उसे ललकारते हुए कहती है कि,  “तैनें जो सराबी-जुआरी ढूंढो हतो सो बा ने पसंद नहीं करौ। मास्टर जी से प्रीत हती.. हमें बताई हमाई बिटिया ने! भगवान् के अगाई मंदिर में ब्याह करौहतो और फिर गरभ.. 8 इससे स्पष्ट होता है कि अनुसुइया ने अपने निर्णय से विवाह किया था, जिसके लिए उसे दंड दिया गया। उसका यह कदम व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह और स्वतंत्रता की इच्छा को दर्शाता है।

छुटकाराकहानी में छन्नो और उसकी बेटी रज्जो सामाजिक आर्थिक अस्मिता के सशक्त प्रतीक हैं। दलित निम्न वर्गीय होते हुए भी छन्नो अपने श्रम से सामाजिक सीमाओं को तोड़ती है। सवर्ण समाज के बीच घर खरीदना उसकी आर्थिक उपलब्धि के साथ सामाजिक संरचना को चुनौती देना भी है।रज्जो मां के काम का विरोध करती है और सम्मानजनक जीवन चाहती है। जब वह छन्नो से काम छोड़ने को कहती है, तब छन्नो कहती हैहाय बेहा, खाएगी क्या, सिलाई-कढ़ाई हमारा किसब नहीं, कोई काम दे कि नहीं?” 9तब रज्जो कहती है, “नौकरी करूंगी। सिलाई सीखी होगी तो काम भी मिलेगा। 10इससे स्पष्ट होता है कि रज्जो चाहती थी कि वह और उसकी मां समाज में सम्मान से जीवन जीए। यह कहानी सामाजिक और आर्थिक अस्मिता के संघर्ष तथा जागरूकता को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करती है। छन्नो और रज्जो के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि आत्मसम्मान और परिवर्तन की इच्छा से स्त्री पारंपरिक बंधनों को तोड़ सकती है। यह कहानी समानता, सम्मानजनक जीवन और सामाजिक बदलाव की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

रिजककहानी में लल्लन के माध्यम से श्रमशील स्त्री की नैतिकता का चित्रण है। पति के कहने पर वह काम छोड़ देती है, लेकिन उसकी गिरफ्तारी के बाद घर चलाने के लिए फिर से दाई का काम करती है। इससे उसे अहसास होता है कि पति के निर्णय का समर्थन करना उसकी गलती थी।उदा- इस बार लल्लन की देह में बिजली सी कौंधी। पांवों में आंधी तूफान भर गया। वह बद हवास-सी भाग छूटी। नंगे पांव भागती गयी। भागती ही गयी मोदी के द्वार तक।11 स्पष्ट होता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद भी वह अपने पेशे के प्रति ईमानदार रहती है और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर काम करती है। उसका यह व्यवहार स्पष्ट करता है कि स्त्री अस्मिता सिर्फ बाहरी विरोध में ही नहीं, अपितु खुद के कर्म, कर्तव्य और अपने नैतिक मूल्यों के प्रति डटे रहने में भी होती है। इसी तरह गोमा हंसती है कहानी की गोमा, ताला खुला है पापाकी बिन्दो, तुम किसकी हो की बिन्नी, बिछुड़े हुए की चंदा, राय प्रवीण की सावित्री, यह सभी अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करती हुई प्रतीत होती हैं।

सानिया की कहानियों में स्त्री अस्मिता

एकदा जाग आली कहानी में मुख्य नायिका कालिंदी के जरिए स्त्री की रचनात्मक अस्मिता के ह्रास का चित्रण किया है। एक कलाकार के रुप में उसकी पहचान समाप्त हो चुकी है। बाहरी रूप से व्यवस्थित वैवाहिक जीवन जीने के बाद भी वह भीतर से शून्यता अनुभव करती है। अपने सपनों के बारे में सोचती है, केवळ एक अनुभूती जी हवीशीवाटते, स्वतःतआहेसा आत्मविश्वास एकेकाळीअसतो, पण जेनंतरसगळंनाहीसंहोतं. आणिते परत मिळवायचाअट्टाहासमग जागृत होतो, तीजागाच आता संपूनगेलीआहे. वसूनं जागी केलीतीकेवळ स्वप्न होती, स्वतःची, स्वतःबद्दलचीआणि आता ती जाग आल्याप्रमाणंसंपूनगेली, त्याबद्दलचं हे बालिश दुख...12 (भावार्थ- केवल एक ऐसी अनुभूति, जो कभी बहुत प्रिय लगती है; अपने भीतर का वह आत्मविश्वास, जो एक समय मौजूद होता है, लेकिन बाद में सब कुछ जैसे खत्म हो जाता है। और फिर उसे वापस पाने की जिद जाग उठती है, जबकि वह जगह अब समाप्त हो चुकी होती है। वसु ने जो जगाया था, वह केवल एक सपना थाअपने बारे में, अपने अस्तित्व के बारे मेंऔर अब वह ऐसे खत्म हो गया है जैसे नींद खुलने पर सपना समाप्त हो जाता है; उसी का यह बचकाना-सा दुख है।”) यह कहानी इस तथ्य को उजागर करती है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में एक स्त्री को भले ही भौतिक सुरक्षा प्रदान की जाती है परंतु उसकी सृजनात्मकता और आत्मसंतुष्टी को नष्ट कर देती है।

वय कहानी में नयी पीढ़ी की स्त्री अस्मिता का चित्रण दर्शाया गया है जहां दिप्ती अपना जीवनसाथी स्वयं चुनना चाहती है। उसका विवाह कुमार से तय हुआ था। उसके परिवार को कुमार बहुत पसंद था। कुमार के कनाडा जाने का बाद वह उससे दूरी महसूस करने लगी। उपरान्त उसे मकरंद से प्रेम हुआ। वह बिना डरे यह बात चिट्ठी के माध्यम से कुमार तक पहुंचाती है। यह बात पता चलने पर कुमार उसकी मां से कहता है, प्रत्येकाच्यामतालाकिंमत दिली पाहिजे. तिचातिनं निर्णय घेतलाअसेल तर त्यातवाईटकायआहे?... तिनंनंतर मला पत्रातूनकळवायलासुरुवातकेलीहोतीच. 13 (भावार्थ- हर किसी की राय को महत्व दिया जाना चाहिए। यदि उसने अपना निर्णय खुद लिया है, तो उसमें बुरा क्या है?… बाद में उसने मुझे पत्र के माध्यम से बताना शुरू भी कर दिया था।”)  इससे स्पष्ट होता है कि भले ही दिप्तीके परिवार को कुमार पसंद था किंतु उसे मकरंद से प्रेम था। यह कहानी इस बात तो स्पष्ट करती है कि समकालीन स्त्री स्वयं की इच्छाओं को महत्व एवं प्राथमिकता देती है तथा विवाह को सहमति के आधार पर परिभाषित करती है। यहां कुमार के विचारों की भी सराहना करना आवश्यक है।

वाटा कहानी की नायिका मिनू अपने वैवाहिक जीवन में पति से भावनात्मक उपेक्षा महसूस करती है। पति के पास उसके लिए समय नहीं है। परिणामस्वरूप मिनू के भीतर असंतोष की भावना उत्पन्न होती है। इसी मानसिक अवस्था में वह प्रतिशोधात्मक मनोवृत्ति से प्रेरित होकर अपने दफ्तर में नौकरी करने वाले दोस्त के साथ हमबिस्तर होती है और गर्भवती हो जाती है। पति को इस बात का पता चलने पर वह उसे समझाते हुए कहती है, मीसगळंतेत्याभारातकेलं. तुला माझ्याबद्दलकाहीवाटतनाही, माझ्यासाठीवेळ देता येतनाहीम्हणून. प्लीज, कसंसांगू तुला? फक्ततुझासूडघेतल्यासारखं....14 (भावार्थ: “मैंने यह सब उसी भावावेश में कियातुम्हें मेरे बारे में कुछ महसूस ही नहीं होता, तुम मेरे लिए समय भी नहीं निकाल पाते। प्लीज़, मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ? बसऐसा लगा जैसे मैं तुमसे बदला ले रही हूं…”)इस उदाहरण में मिनू का कदम पारंपरिक नैतिक मान्यताओं के विरुद्ध होते हुए भी उसके भावनात्मक आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति और स्व-अस्तित्व के रूप में देखा जा सकता है। वह अपनी इच्छाओं और असंतोष को व्यक्त करती है। हालांकि उसका विरोध नकारात्मक दिशा में जाता है फिर भी यह इस तथ्य को उजागर करता है कि जब स्त्री की भावनात्मक आवश्यकताओं की उपेक्षा होती है तो वह अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए परंपरागत सीमाओं को लांघने का प्रयास करती है।

खिडक्याकहानी में जयंती संबंधों में अपने स्वतंत्रता को महत्व देती है और पति से अलग रहती है। वहीं उसकी बेटी सुमा पिता के उपेक्षापूर्ण व्यवहार का विरोध करती है और उनसे भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं करती। पिता की मृत्यु के बाद उनकी पुस्तक के प्रकाशन का भी वह विरोध करती है जिसमें उनके जीवन से संबंधित कई बातें लिखी हुई थी।सुमाके अनुसार जीवन में दूरी रखने वाले व्यक्ति को मृत्यु के बाद जानने का कोई अर्थ नहीं है। इसके पूर्व उसके अस्तित्व को पिता ने महत्व नहीं दिया, एक-दूसरे को जानने तक का मौका नहीं दिया। अब उन पन्नों को वह जलाना चाहती है। वह अपने मां से कहती है, त्यांचीमुलगीम्हणूनत्यांनीलिहिलेल्या प्रत्येक शब्दावरमाझाहक्कआहेआणितेसगळे शब्द परत घेऊनमी नष्ट करुनटाकणारआहे. जाळूनटाकणारआहेतेकागद. 15 (भावार्थ-उनकी बेटी होने के नाते उन्होंने लिखे हुए प्रत्येक शब्द पर मेरा अधिकार है। और मैं उन सभी शब्दों को वापस लेकर नष्ट करने जा रही हूं। उन कागज़ों को जला दूंगी।”)

शिल्लककहानी में शहरी स्त्री की आर्थिक निर्भरता और उससे जुड़ी अस्मिता का चित्रण है, जहां वह स्वतंत्र जीवन को महत्व देती है और विवाह को अनिवार्य नहीं मानती।स्त्रोतमें किशोरी आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक है, जो सामाजिक अस्वीकृति के बावजूद संतुलन बनाए रखती है। अन्य कहानियां जैसे दुहेरी, चाफा, पावसाळ्यातलीगोष्ट, प्रारंभीखेळाच्या आदि में भी स्त्रियां आत्मनिर्णय को प्राथमिकता देते हुए अस्मिता के विविध आयाम प्रस्तुत करती हैं।

मैत्रेयी तथा सानिया की कहानियों में स्त्री अस्मिता की तुलना

मैत्रैयी की दस प्रतिनिधि कहानियां एवं सानिया केखिडक्याकहानी संग्रह में संकलित कहानियों चित्रित स्त्री अस्मिता का तुलनात्मक अध्ययन स्पष्ट करता है कि दोनों लेखिकाओं की दृष्टि, प्रस्तुति में उल्लेखनीय समानताएं और असमानताएं दिखाई देती हैं। दोनों लेखिकाओं की कहानियों में स्त्री अस्मिता का विषय केंद्र में है। यहां उनके पात्र पीड़ित रुप में नहीं अपितु निर्णयक्षम, सजग व्यक्ति के रूप में उभरकर आती है। दोनों के पात्र पितृसत्ता का विरोध एवं विद्रोह करते हुए दिखाई देती हैं। वे अपना निर्णय स्वयं लेती हैं। इसके अतिरिक्त उनकी स्त्री पात्र समाज में व्याप्त रूढ़ियों और परंपराओं कीचुनौती देती हैं। दोनों कहानीकारों ने स्त्री जीवन का यथार्थपरक चित्रण किया है जिससे उनकी रचनाओं में जीवन सापेक्षता और प्रामाणिकता दिखाई देती है। प्रमुख अंतर अभिव्यक्ति और स्वर में है। जहां मैत्रेयी की नायिकाएं विद्रोही, प्रतिरोधात्मक हैं वही सानिया की नायिकाएं अपेक्षाकृत शांत और आत्मविश्लेषी प्रतीत होती हैं। मैत्रेयी की नायिकाएं सामाजिक अन्याय, पारिवारिक दमन आदि का खुलकर विरोध करती हैं। तो सानिया की नायिकाओं में आंतरिक संघर्ष दिखाई देता है जहां वे असंतोष, पहचान के संकट से जूझती हैं। अगला महत्वपूर्ण अंतर संघर्ष के स्तर पर दिखाई देता है। मैत्रेयी की कहानियों में संघर्ष मुख्यतः सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संरचना के विरुद्ध दिखाया गया है। उनकी नायिकाएं शोषण को चुनौती देती हैं और परिवर्तन का माध्यम बनती हैं। वहीं सानिया की नायिकाओं का संघर्ष व्यक्तिगत और भावनात्मक है जहां वे अपने भीतर के खालीपन और आत्म संतोष की खोज में लगी रहती हैं। मैत्रेयी की कहानियों में स्त्री अस्मिता आर्थिक, सामाजिक विद्रोह, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक भागीदारी जैसे ठोस आयामों में अभिव्यक्त हुई है। इसके विपरीत सानिया के यहां स्त्री की अस्मिता का स्वरूप मनोवैज्ञानिक है। उनमें आत्म चेतना, करियर की आकांक्षा आदि प्रमुख है। वे खुला विद्रोह करने के बजाय दूरी और आत्मचिंतन के माध्यम से अपनी अस्मिता बनाए रखती हैं। अतः कहा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा की स्त्रियां सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय वाहक हैं। वे व्यवस्था से लड़कर अपनी अस्मिता स्थापित करती हैं जबकि सानिया की स्त्रियां आत्मबोध के जरिए अपनी अस्मिता को गढ़ती हैं। एक ओर स्त्री अस्मिता का बाहरी, क्रांतिकारी रूप मैत्रेयी के यहां मिलता है वहीं सानिया के यहां उसका आंतरिक रुप उभरकर पाठक के समक्ष आता है।

निष्कर्ष : निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समकालीन साहित्य में स्त्री अस्मिता का प्रश्न केवल एक साहित्यिक प्रवृत्ति होकर एक व्यापक वैचारिक रूप में उभरकर सामने आता है। आज आधुनिक युग में स्त्री अपने अधिकारों, आत्मसम्मान और इच्छाओंप्रति सजग होती दिखाई देती है। इस परिवर्तनशील परिप्रेक्ष्य में दोनों लेखिकाएं स्त्री के इसी विकसित होते स्वरूप को अपने तरीके से अभिव्यक्त करती हैं। यहां स्त्री वस्तु नहीं अपितु एक महत्वपूर्ण विषय बनकर हमारे समक्ष आती है। दोनों कहानीकारों ने अपने नारी पात्रों को आदर्शवादी या काल्पनिक रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उनकी स्त्रियां परिस्थिति के अनुसार संघर्ष, रणनीति और आत्मचिंतन करती है। यह यथार्थपरकता लेखन को विश्वसनीय बनाती है। स्त्री अस्मिता के संदर्भ में दोनों की कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि मैत्रेयी की स्त्रियां सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय वाहक हैं, तो सानिया की स्त्रियां आत्मबोध और चेतना की वाहक हैं। मैत्रेयी स्त्री को प्रतिरोध, संघर्ष से सशक्त बनाती है तो सानिया उसे आत्मविश्लेषण और आंतरिक जागरूकता के माध्यमसे सशक्त बनती है। अतः दोनों लेखिकाओं की दृष्टि पूरक है जो मिलकर स्त्री अस्मिता को समग्र स्वरूप को प्रस्तुत करती है।

संदर्भ :

  1. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियां, इलाहाबाद बुक हाउस, इलाहाबाद, 1977, पृ. 23
  2. प्रीती यादव, मैत्रैयी पुष्पा नारी संवेदना के स्वर, विनय प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृ. 343
  3. सं. रेखा इनामदार-साने, वंदना बोकिल-कुलकर्णी, संपादित सानिया (सानिया यांच्यानिवडक कथा), राजहंस प्रकाशन, पुणे, 2014, पृ. 13
  4. मैत्रेयी पुष्पा, दस प्रतिनिधि कहानियां, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2020, पृ. 26
  5. वही, पृ. 14
  6. वही, पृ. 23
  7. वही, पृ. 49
  8. वही, पृ. 142
  9. वही, पृ. 77
  10. वही, पृ. 77
  11. वही, पृ. 170
  12. सानिया, खिडक्या, नाविन्य, प्रकाशन, पुणे, 2015, पृ. 22
  13. वही, पृ. 36
  14. वही, पृ. 71
  15. वही, पृ.190

 

वृषालीमांद्रेकर,
प्रोफेसरएवं शोध निर्देशक, हिंदी अध्ययन शाखा, शणैगोंयबाब भाषा और साहित्य संकाय, गोवा विश्वविद्यालय, तालेगांव-गोवा
vrushali.mandrekar@unigoa.ac.in, 9420208444
 
साईलीमोरजकर
शोधार्थी, हिंदी अध्ययन शाखा, शणैगोंयबाब भाषा और साहित्य संकाय, गोवा विश्वविद्यालय, तालेगांव-गोवा
saileemorajkar185@gmail.com, 8698335846

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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