डायरी : रेखा कँवर

आसमां में एक खिड़की
- रेखा कँवर

25 जनवरी, 2026

कभी-कभी तो तुम भी सोचते ही होंगे ना आसमान कि आखिरकार इतना ज्यादा क्यों निहारती है यह लड़की मेरी ओर? क्या मैं इतना सुंदर हूँ? तो तुम्हें बता दूँ बिलकुल नहीं! ना ही तो मुझे तुम्हारी कोई गरज है इतनी कि मैं निहारूँ तुम्हें बार-बार और ना ही तुम इतने सुंदर हो कि तुम्हें बार-बार निहारा जाए। वो तो बात कुछ यूँ है कि तुम्हारे ठीक ऊपर वाली जो दुनिया है ना, वहाँ मेरे मम्मी-पापा रहते हैं। बस उन्हीं को देखने के लिए निहारती हूँ मैं तुम्हारी ओर। और तुम्हें लगता होगा कि... मगर वे दिखते ही तो नहीं है मुझे?

उन्हें तो समय ही नहीं मिलता इस ओर देखने का। मगर मैं... मैं तो बेटी हूँ ना उनकी, मुझे तो आती है उनकी याद। उन्हें चाहें ना भी आती हो। मैं तो निहारती रहती हूँ उस ओर। इस उम्मीद में कि आखिरकार कभी तो खुलेगी ही वो आसमान वाली खिड़की ! कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मम्मी-पापा भी निहारने की कोशिश तो करते होंगे, मेरी ओर लेकिन आसमान में कोई खिड़की है ही नहीं, तो वो निहारे भी कैसे भला? तो इसलिए मैं सोच रही थी कि आजकल तो आसमान सरीखे लोगों से मिलने सचमुच आसमान वाली दुनिया में चले जाने वाले हमारे विनोद कुमार शुक्ल जी भी तो वही रहते हैं। तो मैं सोच रही थी, क्यों ना उन्हें ही कह दूँ आसमान में खिड़की बनवाने की? क्योंकि तुम्हें पता है, वो बहुत पढ़े-लिखे हैं और उन्होंने कई सारी किताबें भी लिखी हैं। तो इतना तो वो समझ ही जाएँगे। और वैसे भी, दीवार में खिड़की बना देने वाले हमारे विनोद कुमार शुक्ल जी के लिए कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं होगा आसमान में खिड़की बनाना। मुझे यकीन है कि वह जरूर बना देंगे... आसमान में एक खिड़की; जिससे मैं देख सकूँ अपने मम्मी-पापा को। बस उनसे एक बार मेरी बात हो जाए, तो अच्छा है। मगर ये विनोद कुमार शुक्ल भी इधर देखें, तब तो मैं उनसे कहूँ। मगर वह है कि इधर देखते ही नहीं। आखिरकार क्या बात है? उस आसमान वाली दुनिया में जो भी उधर जाता है, इतना ज्यादा व्यस्त हो जाता है कि उसे इस वाली दुनिया की तरफ देखने का समय ही नहीं मिलता। और जो इस वाली दुनिया के हम जैसे लोगों को देखो, तो मुँहफाड़ कर ऊपर वाली दुनिया की ओर ही देख रहे होते हैं। अरे भाई, इस वाली दुनिया के लोगों के पास भी है बहुत सारे काम करने को मेरे प्यारे आसमान? अगर तुम्हें विनोद कुमार शुक्ल दिखे, तो उनसे मेरी आसमान में खिड़की बना बनाने वाली यह इच्छा जरूर बताना उन्हें। ओ प्यारे आसमान ! बता तो दोगे क्या मेरी इस इच्छा के बारे में उन्हें?

16 फरवरी, 2026

भूलना एक मुखौटा है, याद रखना ही है परम सत्य। प्रेम स्थगित किया जा सकता है, मगर उसे भूलना असंभव। ठहर कर चलना सही है, ठहर जाना गलत, छोड़ दिए जाने से बेहतर है छूट जाना। वह जो आँखों के रास्ते से होते हुए प्रेमिका के माथे पर लगी बिंदिया तक पहुँचे, वह सभी प्रेमी थे और जो होठों पर ही ठहर गए, वह बस एक प्रश्नचिह्न की तरह छूटे रह गए। प्रेम छत है और प्रतीक्षा उसकी सीढ़ियाँ, वह सभी जो 'प' से प्रतीक्षा में है, वह सभी 'प' से प्रेम में है. प्रतीक्षा प्रेम की ही ओर जाने वाली एक दिशा है जिसे जाने बगैर पहुँचा नहीं जा सकता प्रेम तक। 'प' प्रेम है कहने से पहले जरूरी है 'प' से पेड़ हो जाना। 'प' से प्रेम है कहने से पहले जिन्होंने चुना 'प' से पेड़ होना, वह दुनिया के सबसे सुंदरतम प्रेमियों में से एक हैं। जिस तरह मृत्यु के इतवार के ठीक बाद आता है जीवन का सोमवार, ठीक उसी तरह प्रतीक्षा के इतवार के बाद आता है प्रेम का सोमवार। प्रेम में ना देखने का अभिनय करते हुए भी देख लिया जाना सबसे सुंदर है। कहकर जाना सुंदर है, पर "जा रही हूँ" कहकर ना जाना उससे भी अधिक सुंदर।

अलविदा कहने आए प्रेमियों का सिर्फ विदा कहकर चले जाना, उनकी भूल नहीं बल्कि एक प्यार भरी चालाकी है। प्रेम में एक दूजे को बहुत देर तक सोते हुए देखना, प्रेमियों की सबसे बड़ी कला है। खिड़कियों का खुलना, देर से इंतजार में खड़ी उन दो आँखों को अपने आने की खबर देना होता है। जाते हुए बार-बार पीछे मुड़कर देखना, फिर लौट आने की आश्वस्ति देना होता है। और जो जाते हुए पीछे मुड़कर नहीं देखते, वो फिर कभी नहीं लौटते। प्रेम में चिड़िया हो जाना जरूरी है, 'उसकी' पसंदीदा खट्टी-मीठी चॉकलेटे सिरहाने रख जाना भी प्रेम ही है। प्रेम ही है चलते हुए अचानक किसी चिड़िया को देखकर थोड़ी देर यूँ ही रुक जाना और बहुत देर तक उसे निहारते जाना। पत्तों का हरा रंग प्रेम का सबसे पहला रंग है, तो पत्तों का पीला रंग प्रेम का सबसे अंतिम रंग। आम के पत्तों का बदलता हुआ रंग देख पाना प्रेम में होना है। प्रेम अपने होने की आश्वस्ति है। प्रेम वह चश्मा है जिसे पहनकर हम तितलियों, चिड़ियाओं, पेड़ों और फूलों का होना देख पाते हैं। उन सभी प्रेमियों को मेरा शुक्रिया, जिन्होंने खुद आकाश होकर सिखाया अपनी प्रेमिकाओं को चिड़िया होना। और उन्हें भी जो प्रेम में हैं, और वो जो प्रेम में नहीं हैं, उनसे मेरा एक सवाल- वो जो प्रेम नहीं करते, वो क्या करते होंगे?

29 फरवरी, 2026

ओ री रेखा..! कहाँ रहती हो आजकल? और अब सुनने भी तो कितना कम लगी हो तुम, और रुकना! रुकना तो जैसे भूल ही गई हो, बात क्या है आखिर? कहाँ व्यस्त हो? ओह, अच्छा ! वो आम का पेड़, जिसके नीचे कुर्सी लगाकर तुम पूरे दिन बैठी रहती हो, वही तो रहती है वो चिड़िया, जो तुम्हें सुनने नहीं देती मेरी आवाजें। ना जाने दिन भर वो चिड़िया तुम्हें क्या कहती रहती है, ऐसा कि तुम एकटक बस उसे ही निहारती रहती हो? तुम्हारे पैरों में जो चिड़िया पकड़ने की इच्छाएं बंधी हुई हैं, पूछना था तुमसे कि कब उतारोगी उन्हें? क्योंकि पता है मुझे, उन्हें उतारे बिना ठहरोगी नहीं तुम, और जब तक तुम ठहरोगी नहीं, तब तक निहारोगी नहीं ना मुझे? तुम्हें तो चिड़िया देखने से फुरसत ही नहीं मिलती? अच्छा, चलो अब ऐसा भी मुंह मत बनाओ, अगर तुम्हें इतना ही लगाव है इस चिड़िया से तो मुझसे भी करा दो ना उसकी दोस्ती ताकि मैं भी निहार सकूँ तुम्हारे साथ देर तक बैठकर उस चिड़िया को। मैं भी बांधना चाहती हूँ अपने पैरों में चिड़िया पकड़ने की इच्छाएं।

4 मार्च, 2026

नहीं नहीं, अभी नहीं दे सकते तुम मुझे मेरे मर चुके होने का प्रमाण क्योंकि अभी तो बची है फूलों, तितलियों, पेड़ों, पत्तों, गिलहरीयों, और चिड़ियाओं के होने में मेरे जीवित होने की आश्वस्ति। जब तक ये रहेंगे, तब तक मुझे नहीं दे सकता कोई भी मेरे मर चुके होने का प्रमाण। इसलिए तुम मत कहो मुझे कि मैं मर चुकी हूँ। देखो जरा, खिड़की के बाहर आम के पेड़ पर बैठी हुई उस चिड़िया को जो देख रही है इधर। उसका दिखना मेरे होने की आश्वस्ति है। जाओ और निहारो उसके चेहरे को, तुम्हें दिखेगा वहाँ मेरा होना। जब तक मेरे घर के आँगन में लगे हुए उस आम के पेड़ पर दिखता रहेगा चिड़िया का होना, तब तक मैं नहीं मर सकती..

8 मार्च, 2026

ये वे स्त्रियाँ हैं जो सहेज नहीं पाई अपना चिड़िया होना, जिन्होंने कभी नहीं निहारा अपने हिस्से का आसमान। जिनके हाथों में कभी नहीं आया किताबों का स्पर्श। ये वे स्त्रियाँ हैं जिनके हिस्से कभी नहीं आया उनके हिस्से का ठहराव, जिससे यह सहेज पाती अपना चिड़िया होना, निहार पाती आसमान जी भरकर अपने हिस्से का और छू पाती किताबों को अपने हाथों से और पढ़ पाती उनमें अपनी कहानियाँ। कब होगा इनकी पक्की ईंटों वाले घर का सपना पूरा? कब मिलेगा इन्हें स्थाई निवास? ये महिलाएँ जो ना जाने कब से चलती ही आ रही हैं, कब रुकेगी यह? कौन देगा इन्हें आश्वस्ति इनके पक्की ईंटों वाले घर के पूरा हो जाने की? कौन थमाएगा इनके हाथों में किताबें? मन करता है कभी-कभी कि जाऊँ और इनके पैरों में जो बंधी बड़ी-बड़ी पायलों को उतार कर बांध आऊं उनमें चिड़िया पकड़ने की इच्छाएँ और इनके हाथ जो चूड़ियों का बोझ उठाते उठाते थक गए हैं, इनमें पकड़ा आऊँ कविता की कोई किताब। मगर रुक जाती हूँ हर बार, ना जाने क्या है जो रोकता है। फिर अचानक से इन निरन्तर चलतीं आ रही महिलाओं के पांव की एड़ियो पर जाती है मेरी नज़र, और देखती हूं ना जाने कितने छालों ने इनकी एड़ियों को बना लिया है अपना स्थायी निवास। कौन करेगा उन पर मरहम पट्टी? इन्हें क्यों नहीं दिखती अपनी छिली हुई एड़ियां? शायद दिखती होगी, पर ठहर कर अपने पैरों को सहलाने का इन्हें पर्याप्त समय मिला ही कहाँ? आखिर क्यों मान लिया इन्होंने कि निरन्तर चलते रहना ही है इनकी नियति है? इससे पहले कि मैं पूछ पाती इनसे यह सवाल? इनके चेहरे पर लिखा हुआ आधा-अधूरा जवाब नज़र आया, "अरे अबाणु कटे आल तक तो माने गणों आगे जाणो है।"

12 मार्च, 2026

इन दिनों जब आम के पत्ते बदल रहे हैं अपना रंग, और चिड़िया सहेज रही है उनमें अपने हिस्से का ठहराव। मेरा मन अटका है मेरे घर के इधर-उधर चक्कर लगाने वाले इन कुत्तों के बच्चों पर। सच में बहुत 'लाड़' आता है इन पर, कितने प्यारे हैं ना ये! और जब इन कुत्तों के बच्चों से छूटता है मेरा मन, तो अपने गाँव की दुकानों में मिलने वाली एक-एक रुपए की पेप्सियों पर अटक जाता है मेरा मन। मगर अफसोस कि इन पेप्सी की इच्छा करती मेरी आँखें, जब जेब में डालती है अपना हाथ, तो पाती है कि जेबें खाली हैं मेरी। और हो भी क्यों ना, माँ का वो जादुई बटुवा नहीं है मेरे पास, जिससे बच्चों की जेबें कभी खाली नहीं होती। कभी-कभी सोचती हूँ, वो लोग सबसे ज्यादा अमीर होते होंगे ना, जिनके पास माँ का वो जादूई बटुवा होता होगा, जिसमें मुश्किल से मुश्किल समय में भी मिल ही जाता है कुछ ना कुछ तो? और वो… लोग सबसे ज्यादा गरीब, जिनके पास माँ का वो जादूई बटुवा नहीं होता। और इस तरह करती हूँ स्थगित अपनी इस एक-एक रुपए में मिलने वाली पेप्सी पीने की अपनी इच्छा को। सच में, माँ का ना होना कितना कुछ स्थगित करना सिखा देता है हमें? मैंने भी तो किया है कितना कुछ स्थगित, कभी गर्म रोटी खाने की इच्छा, तो कभी सुबह देर से उठने की इच्छा। सब स्थगित ही तो किया है मैंने। ओ माँ मेरी...! हाँ, तो इन एक-एक रुपए में मिलने वाली पेप्सियों से जब हटाती हूँ अपना मन तो अपने घर के आंगन में लगे बेर के पेड़ पर अटक जाता है फिर से मेरा मन। और यह कोई सामान्य बेर का पेड़ नहीं है, बल्कि वह बेर का पेड़ है, जो अपने खट्टे-मीठे बेरों में, ना जाने कितनी दूर से चलते आ रहे लोगों के हिस्से का ठहराव बांधे हुए है। यही तो रुकते हैं तय समय पर शाम को, अपने माथे पर लकड़ियों का गठर उठाए, बहुत दूर से चले आ रहे वो 'बा सा'। और यही रुकते हैं रेबारियों के झुंड। हाँ, वही रेबारी लोग, जो ना जाने कब से चले आ रहे हैं, जिनके हिस्से का ठहराव उन्हें अब भी नहीं मिला। कभी-कभी तो सोचती हूँ, कि क्या इनके पैर दुखते नहीं होंगे, ये जो इतनी दूर से चले आ रहे हैं, और क्या इन्हें धूप नहीं लगती होगी? ना जाने कितने वर्षों से तो चले आ रहे हैं ना यह लोग, फिर भी इनके पक्की ईंटों का घर का सपना अब भी पूरा नहीं हुआ। कब होगा इनकी पक्की ईंटों के घर का सपना पूरा? क्या इन रेबारियों के लोगों ने निरंतर चलते रहना को ही मान लिया है अपनी नियति? पूछती हूँ जब ये प्रश्न अपने इस बेर के पेड़ से, तो मेरे इन प्रश्नों पर उचका देता है यह अपने कंधे, और कहता है, मैं नहीं जानता, मैं तो बस इनके हिस्से का थोड़ा सा ठहराव इन्हें दे सकता हूँ। बाकी इनके हिस्से का पूरा ठहराव तो मुझे नहीं मालूम कि कब मिलेगा इन्हें।

खैर, तो इस तरीके से, यह मामूली बेर का पेड़, कई लोगों के रुकने का एक अच्छा कारण बना हुआ है, और हाँ, मेरे लिए इन आते-जाते लोगों की तस्वीरें खींचने का भी एक बड़ा अवसर है ये बेर का पेड़। हाँ, तस्वीरें, जिनमें हम सहेजते हैं, अपने भूले बिसरे लोगों को। और इन्हीं तस्वीरों के माध्यम से ही तो सहेज पाती हूं मैं इन आते-जाते लोगों को जो सहेज नहीं पाए अपने हिस्से का ठहराव।

13 मार्च, 2026

लड़कियों के लिए नौकरी करने का अर्थ केवल पैसे कमाना नहीं होता, बल्कि उनके लिए नौकरी करने का अर्थ होता है अपना चिड़िया होना, जी भरकर आसमान निहारना। "किसी फैशन शो में नहीं आयी हो" जुमले को सुनने के बावजूद अपने बालों को हमेशा खुले रखना, बनारस के रंगों वाले अपने सपनों को पूरा करना, जब मन चाहे अपने कंधे पर बैग उठाए बहुत दूर यात्रा पर निकल जाना, आधी रात को जब सब अपनी खिड़कियाँ दरवाजे बंद करके सो जाए, तब भी अपने घर की खिड़की खुली रखकर बिना किसी डर के चांद- तारें निहारना, पेड़ों के संग अपनी बैठकी अनिवार्य कर देना, भरी दुपहरी में बहुत दूर बहती किसी नदी में अपने दोनों पैर डुबोकर बहुत देर तक निश्चित होकर बैठे रहना, अपने कमरे में अपनी खींची हुई सारी तस्वीरों को और अपनी किताबों को बिना किसी की अनुमति के जैसे मनचाहे वैसे सजाना, उम्र का 25 वाँ बसंत देखकर खट्टी-मीठी चॉकलेटें और एक-एक रुपए में मिलने वाली पेप्सियों को खाने की अपनी इच्छा को स्थगित ना करना, शाम के वक्त अपने छत की सीढ़ियों पर बेखौफ होकर तसल्ली से अपने हाथ में चाय की एक प्याली लिए ढलते हुए साँझ के सूरज को निहारना, शाम के वक्त अपने घर की दहलीज पर बैठकर आते - जाते लोगों को बिना किसी डर के निहारना, बरसों से ओढ़ी हुई अपनी चुप्पियों को समाप्त कर देना, हर बात पर पेट पकड़कर हँसने वाली अपनी आदत से शर्माना बंद कर देना, और हाँ... अपने काले रंग पर दी जाने वाली सारी नसीहतों को नौकरी या आर्थिक आजादी से ही तो ढाँकती है लड़कियां। कुछ आजादियाँ जिन पर लगे हुए हैं अभी भी कई सारे ताले। सारे तालों की चाबियाँ है लड़कियों की नौकरियाँ। वो स्त्रियाँ जो नौकरी नहीं करती, वो अब भी वंचित है कई सारी आजादियों से। और जिन्हें अब भी नहीं पता कि सपने और इच्छाएँ व्यक्तिवाचक नहीं जातिवाचक है? आज के समय में बहुत ज्यादा बिकने वाला है यह शब्द कि 'धीरे-धीरे ही होगा सब ठीक'। 'धीरे-धीरे ही होगा सब ठीक' से सब ठीक हो जाने की आश्वस्ति पाकर ही तो न जाने कितने लोगों ने कर दिया है अपना जीवन स्थगित? आखिर यह धीरे-धीरे कब होगा पूरा? और क्या, 'धीरे-धीरे ही होगा सब ठीक' जब वाकई में हो जाएगा पूरा, तब क्या उन लोगों का जीवन लौट आएगा वापस, जिन्होंने स्थगित कर दिया था अपना जीवन इस 'धीरे-धीरे' की झूठी आश्वस्ति में?

रेखा कँवर

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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