शोध आलेख : देवदत्त पट्टनायक के साहित्य में मिथक-दृष्टि: मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में मिथक / रविन्द्र जाट

देवदत्त पट्टनायक के साहित्य में मिथक-दृष्टि: मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में मिथक
- रविन्द्र जाट

 

शोध सार : प्रस्तुत शोध-आलेख समकालीन मिथक-लेखन के परिप्रेक्ष्य में देवदत्त पट्टनायक के साहित्य का विश्लेषण करते हुए मिथक की आधुनिक प्रासंगिकता और उसके मनोवैज्ञानिक आधारों की पड़ताल करता है। लेख यह रेखांकित करता है कि आधुनिक काल में विज्ञान के उदय के बाद किस तरह मिथक आधारित विश्वदृष्टि का लोप हुआ। विज्ञान आधारित विश्वदृष्टि यद्यपि वस्तुनिष्ठ तथ्यों की व्याख्या में मिथक का स्थानापन्न बन गया किंतु वह उन सभीसार्थकताऔरसामाजिकताकी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाया जिसे मिथक अतीत में पूरा करते थे। लेख इसी तथ्य को अर्नेस्ट बेकर जैसे मनोवैज्ञानिकों तथा मिरचिया एलियाड जैसे मिथकशास्त्रियों का संदर्भ लेते हुए स्पष्ट करता है। इसी संदर्भ में यह शोध सिद्ध करता है कि मिथक केवल प्राचीन कथाएँ नहीं, आधुनिक मनुष्य के लिए संज्ञानात्मक नियामक के रूप में कार्य करते हैं।

लेख का अगला हिस्सा मिथकों की मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में देवदत्त पटनायक की धारणाओं का उनकी विभिन्न किताबों का संदर्भ लेते हुए विश्लेषित-संश्लेषित करता है। साथ ही यह लेख, पट्टनायक की मिथक-दृष्टि को सामाजिक भूमिका और सामाजिक न्याय के प्रश्नों की कसौटी पर भी आलोचनात्मक ढंग से कसता है। लेख का अंतिम हिस्सा पट्टनायक की कुछ कृतियों, जैसेशिखंडीऔरसीताका विश्लेषण करते हुए उनके लेखन में जुड़ते नवीन सामाजिक आयामोंविशेषकर क्वीर और स्त्रीवादी प्रश्नोंकी चर्चा करता है।

बीज शब्द : मिथक, व्यक्तिनिष्ठ सत्य, वस्तुनिष्ठ सत्य, लोगोस, मिथोस, स्वावलंबन-मूलक विमर्श, सार्थकता, संज्ञानात्मक नियामक, शक्ति-विमर्श।

मूल आलेख : देवदत्त पटनायक का मिथक आधारित साहित्य बहुत बृहत् है। अंग्रेजी भाषा में उनकी 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे मिथकीय अवधारणाओं और धार्मिक कहानियों को प्रबंधन, बाजार औरसेल्फ-हेल्पकी भाषा में उपलब्ध कर समकालीन बौद्धिक जीवन की एक अहम माँग को पूरा करते हैं।  इंटरनेट पर अक्सर उनका कोई इंटरव्यू, पोडकास्ट और वक्तव्य किसी किसी मिथक को आधुनिक संदर्भों से जोड़ता मिल जाता है। टी.वी. पर भी उनकी पूरी उपस्थिति है।एपिक चैनलपर उनके धारावाहिक देवलोक विद देवदत्त पटनायक के कुल तीन सीजन चुके हैं। मिथकों और उनकेहीरोदेवताओं की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाता और हल्की-फुल्की मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करता यह धारावाहिक काफी प्रचलित है। वे मिथकों की लाल-कपड़ों में लिपटी, अतीत की अंधेरी गलियों में कैद कहानियों को निकालकर, व्यवसायिक गलियारों के किनारे स्थित भव्यमॉलके चकमक बुक-स्टोर या एयरपोर्ट के चमचमातेशोकेसमें ला सजाते हैं।

देवदत्त पटनायक के साहित्य को देखने का एक नजरिया इसे स्व-सहायता यास्वावलंबन-मूलक विमर्शके मिथक आधारित ढाँचे के रूप में देखने का हो सकता है। आधुनिक प्रतिस्पर्धी और अति-महत्त्वाकांक्षी जीवन सहज ही उनटूल्सकी माँग करता है जो अधिक से अधिक गारंटी के साथ सफलता और कुशलता मुहैया करा सकें। इसका एक समाधान तकनीक देती है। कैलेंडर, रिमांइडर, ईमैल जैसे साधनों ने जीवन के हर मिनट को सफलता के भावी लक्ष्य में बाँध दिया है। किंतु, तकनीक बाहरी जीवन को तो व्यवस्थित-नियंत्रित कर सकती है, लेकिन मनुष्य के आंतरिक जीवन की भी कुछडिमांडहैं। इसी कीसप्लाईके लिए इंटरनेट कीपॉडकास्ट और टॉक क्रांतिके अतिरिक्त एक विशालकिताबी-कारखानाभी खड़ा किया गया है। इस कारखाने के उत्पादों के लिए एक नयी साहित्यिक विधा भी जन्मी है—‘सेल्फ-हेल्प

व्यवहार और आदत परिवर्तन के सामान्य से नियमों से आरंभ यह विधा आज सबसे अधिकफेमसऔरसेलिंगविधाओं में से एक है। 1936 में प्रकाशित डेल कार्नेगी कीहाउ टू विन फ्रेंडस एंड इन्फ्लुएंस पीपल’, नैपोलियन हिल कीथिंक एंड ग्रो रिच’ (1937), स्टीफन कोवे की 7 हैबिट्स ऑफ हाईली इफेक्टिव पीपल’ (1989)—ये इस विधा की कुछ क्लासिक का दर्जा प्राप्त कर चुकी किताबें हैं। इनकी विषय-वस्तु को इनका शीर्षक ही सार रूप में प्रस्तुत कर देता है। अमीरी, प्रसिद्धि और पद को पाने का सार केवल सोच में निहित है। ये किताबें सोचने के हीयूजर मैनुअलप्रदान करती है। वर्तमान में इसमें दो प्रमुख नवाचार भी दिखते हैं। पहला, इन यूजर मैनुअल को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए वैज्ञानिक तथ्यों और शोधों का सहारा लिया जा रहा हैं ; जैम्स क्लियर की एटॉमिक हैबिट्स तथा चार्ल्स डुहिग की पावर ऑफ हैबिट इसी किस्म की प्रतिनिधि पुस्तकें हैं। दूसरा, इनको वैधता किसी संस्कृति में प्रचलित मिथकों और कहानियों से दी जाती है। इस दूसरे रास्ते काबिबलीकल मिथकोंके आधार पर पश्चिम में सबसे बेहतरवैचारिक दोहनजॉर्डन पीटरसन ने किया है। उनकी किताबों के शीर्षक हैं—‘12 रूल्स फॉर लाइफ: एन एंटीडोट टू केओस; ‘बियॉन्ड ऑर्डर: 12 मोर रूल्स फॉर लाइफ इनमें पहली किताब की ही एक करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं।

पीटरसन की भाँति ही देवदत्त  लोगों के जहन में पहले से पैठे विश्वासों और कहानियों का इस्तेमाल कुशलता, सफलता और प्रसन्नता केएल्गोरिदमतैयार करने के लिए करते हैं। वे प्राचीन प्रतीकों की आधुनिक सौंदर्यदृष्टि के अनुसाररि-पैकेजिंगंकरमार्केटिंगयोग्य बनाते हैं। 2013 में प्रकाशित उनकी मूल अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवादबिजनेस सूत्र का उप-शीर्षक है: ‘प्रबंधन से जुड़ा पुराणों पर आधारित भारतीय दृष्टिकोण इसके पुस्तक के कवर पेज पर ब्रह्मा का शर्ट और टाई पहने कमल पर बैठा रेखाचित्र है 2017 में प्रकाशित उनकी अन्य पुस्तक है: ‘कैसे बने धनवान: वेद और पुराण की वह 12 सीख जो मैं कभी नहीं भूला उनकी पुस्तक बिजनेस सूत्र का एक अंश है:

कॉरपोरेट जगत में 'अप्सरा' वह बोनस, अनुलाभ (perks) और ईसॉप्स (ESOPs) हैं, जिन्हें एक असुरक्षित इंद्र (प्रबंधक) किसी कर्मठ ऋषि (प्रतिभाशाली कर्मचारी) का ध्यान भटकाने के लिए भेजता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि वह ऋषि पुरस्कार के 'सुख' में ही उलझा रहे और इंद्र का तख्तापलट करने की अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान सके।1

देवदत्त का संपूर्ण साहित्य केवल प्रबंधन और अमीरी के लिए प्राचीन भारतीय मिथकों और धार्मिक कहानियों से सूत्र इकट्ठा करने के विषय में नहीं है। उनके साहित्य का अधिकांश हिस्सा मिथकों और उनमें अनुस्यूत अर्थ को खोजने में पर भी केंद्रित है। उनकी पहली किताबशिवा: एन इन्ट्रोडक्शन 1997 में प्रकाशित हुई। उनकी आरंभिक पुस्तकें इसी किस्म के परिचयात्मक ढंग की है जैसे, 1999 में प्रकाशित विष्णु: एन इन्ट्रोडक्शन’, लक्ष्मीं: एन इन्ट्रोडक्शन एवं देवी, मदर गॉडेड्स आदि। मिथक, धार्मिक कहानियों में उनकी विशेष रुचि है। उनकी ये आरंभिक किताबें विभिन्न देवताओं का प्रतिमा-विज्ञान के आधार पर सहज परिचय देती हैं कि कौन-सा देवता हाथ में क्या लिए है, उसका क्या अर्थ है? आदि।

देवदत्त मिथकों को मात्र लोक-कथाओं या नीति-शिक्षाओं के संकलन के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें मानव अस्तित्व के अपरिहार्य उपकरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे बहुत-सी बिखरी कहानियों को सूत्रबद्ध कर एक ऐसी व्यापक विश्वदृष्टि का निर्माण करते हैं, जहाँ प्रत्येक मिथक मानवीय मनोविज्ञान की किसी किसी मूलभूत आवश्यकता या द्वंद्व का समाधान प्रस्तुत करता है। वे मिथकों को अतीत की सृजनात्मक कल्पना से बढ़कर मानवीय चेतना का सहज हिस्सा मानते हैं। इस दृष्टि से, 2006 में प्रकाशित उनकी कृतिमिथ=मिथ्या: हिंदु मिथकों का विश्वकोश केवल उनके लेखन का प्रस्थान-बिंदु है, बल्कि उनकी समग्र मिथक-दृष्टि का सैद्धांतिक घोषणापत्र भी है।

तथ्य बनाम सत्य

देवदत्त की मिथकीय विश्वदृष्टि की आधारभूत स्थापनातथ्यऔरसत्यमें अंतर करना है। "तथ्य वस्तुनिष्ठ सत्य है। यह मापने योग्य और सार्वभौमिक है। यह विज्ञान के दायरे में आता है।"2  देवदत्त के अनुसार, विज्ञान का क्षेत्र शुद्ध सूचना का है, यह मानवीय स्थिति से निरपेक्ष है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि वे हमेशा मिथकीय विश्लेषण में तथ्यों तथा वस्तुनिष्ठ सत्य से बचते ही हो। उदाहरणस्वरूप, पट्टनायक एक जगह डार्विन के जैविक विकासवाद की तुलना हिंदु दशावतार के मिथक से करते हैं।

विष्णु के अवतार हमें जैविक विकास के समानांतर ले जाते हैंमछली (जलीय), कछुआ (उभयचर), सूअर (थलचर), नरसिंह (पशु और मानव के बीच की कड़ी) और फिर वामन (बौना मानव) यह क्रम डार्विन के विकासवाद के वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ आश्चर्यजनक रूप से मेल खाता है, जो जल से थल की ओर और फिर जानवर से मनुष्य की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है।3

इसी प्रकार, वेएन्ट्रॉपीऔरप्रकाश के प्रकीर्णनजैसे भौतिक सिद्धांतों को क्रमश: शिव के तांडव और माया के वैचारिक ढाँचे के साथ जोड़ते हैं। यहाँ सवाल यह है कि यदि मिथक व्यक्तिनिष्ठ सत्य का हिस्सा है तो उसकी व्याख्या के लिए वस्तुनिष्ठ सत्य (वैज्ञानिक सत्य) के तथ्यों का सहारा क्यों? हालाँकि, वे ऐतिहासिक विवरणों और मिथकीय कथाओं के बीच सचेत दूरी बनाए रखते हैं। "इतिहास वस्तुनिष्ठ सत्य हैजो सभी के लिए समान है। मिथक वह सत्य है जिसे लोग मानते हैं। इतिहास वह है जो वास्तव में घटा है।"4

विज्ञान और मिथक के संबंध में कैरन आर्मस्ट्रांग की यह टिप्पणी देखने योग्य है:

सत्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति का अर्थ था कि 'लोगोस' ने 'मिथोस' को तथ्यात्मक सत्य के क्षेत्र से प्रभावी रूप से बेदखल कर दिया था पौराणिक कथाएँ जो कभी भौतिक जगत को समझने का एक माध्यम थीं, अब उन्हें तर्क की विफलता और विज्ञान के एक ऐसे आदिम प्रयास के रूप में देखा जाने लगा, जिसे प्रबोधन की अधिक सटीक पद्धतियों ने प्रतिस्थापित कर दिया था।5

आर्मस्ट्रांगलोगोसको बाहरी दुनिया के तथ्यात्मक तार्किक ज्ञान के संबंध में तथामिथोसको अनुभवजन्य सार्थक ज्ञान के संबंध में परिभाषित करते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ मिथमें स्पष्ट किया है कि किस तरह अतीत में मिथक की भूमिकालोगोस’ (वस्तुनिष्ठ  सत्य) एवंमिथोस’ (व्यक्तिनिष्ठ सत्य) दोनों के रूप में थी, किंतु आधुनिक काल में विज्ञान के उदय के साथ उसकी वस्तुनिष्ठ सत्य के रूप में भूमिका समाप्त हो गई। आर्मस्ट्रांग द्वारा चिह्नित इस ऐतिहासिक विस्थापन को पट्टनायक भारतीय संदर्भों में विस्तार देते हुए स्पष्ट करते हैं कि:

विज्ञान के उद्भव से पहले, मिथक ही वह एकमात्र जरिया था जिससे लोग संसार को समझते थे। बिजली क्यों कड़कती है, ऋतुएँ क्यों बदलती हैंमिथक इन सब बातों की व्याख्या करते थे। आज विज्ञान ने भौतिक संसार के 'कैसे' को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। अतः अब मिथक का सरोकार भौतिक जगत के वस्तुनिष्ठ सत्यों से नहीं रह गया है। अब उसका क्षेत्र केवल 'सत्य' यानी व्यक्तिनिष्ठ सत्यों तक सीमित है।6

विश्वभर के मिथकशास्त्रियों एवं मिथक-अध्येताओं ने विज्ञान की भूमिका कोकैसेतक सीमित कर दिया, जबकि मिथक काक्योंके प्रश्न पर अधिकार बताया। विश्वप्रसिद्ध मिथकशास्त्री जोसेफ कैंपबेल के शब्दों में "विज्ञान उस वास्तविकता का क्षेत्र है कि यहाँ क्या है और वह कैसे कार्य करता है। मिथक उस वास्तविकता का क्षेत्र है कि हम यहाँ क्यों हैं और इस सबका अर्थ क्या है।"7

ऐसा भी नहीं है किक्योंके प्रश्न पर मिथकों के पूर्ण अधिकार को बिना विरोध के ही स्वीकार कर लिया गया हो। जीवविज्ञानी एवं विज्ञान-लेखक रिचर्ड डॉकिंस ने असहमति दर्ज करते हुए कहा "ईश्वर का अस्तित्व किसी भी अन्य वैज्ञानिक परिकल्पना की तरह ही एक वैज्ञानिक परिकल्पना है... मैं इस विचार के विरुद्ध हूँ कि विज्ञान 'क्यों' वाले प्रश्नों के बारे में कुछ नहीं कह सकता। 'क्यों' के कई प्रश्न वास्तव में छद्म रूप में 'कैसे' के ही प्रश्न होते हैं।"8 डॉकिन्स की तरह ही उनके समान राय रखने वाले विचारकों का कहना है किक्योंके प्रश्न पर आधृत पहचान, अर्थ, उद्देश्य, नैतिकता सामूहिकता जैसे प्रश्नों का जबाव विज्ञान भी दे सकता है। इस संबंध में डॉकिन्स के साथ-साथ प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक कार्ल सगन का यह कथन लोकप्रिय है: वी आर मेड ऑफ स्टार स्टफ (हम अंततः तारों की धूल ही है) फिर भी, अभी तक नैतिकता पहचान आदि के सवाल और इनके जबाव विज्ञान की प्रत्यक्ष भूमिका से बाहर ही प्रतीत होते हैं। इस संबंध में वैज्ञानिक स्टीफन जे गोल्ड का यह विचार पट्टनायक के विचार के साथ ज्यादा सुसंगत लगता है। गोल्ड ने कहा कि विज्ञान और मिथक दो अलग-अलग क्षेत्र हैं और उन्हें एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

विज्ञान का अधिकार-क्षेत्र (Magisterium) अनुभवजन्य जगत तक विस्तृत है: ब्रह्मांड किस तत्व से निर्मित है (तथ्य) और यह इस प्रकार कार्य क्यों करता है (सिद्धांत) धर्म का अधिकार-क्षेत्र परम सार्थकता और नैतिक मूल्यों के प्रश्नों तक फैला हुआ है। ये दोनों अधिकार-क्षेत्र तो एक-दूसरे को अतिव्याप्त करते हैं और ही ये मानवीय अन्वेषण के समस्त पक्षों को अपने भीतर समेटते हैं।9

मिथक: मनोवैज्ञानिक सत्य

देवदत्त पटनायक मूलतः मिथक को उसके मनोवैज्ञानिक आयाम में ही देखने की वकालत करते हैं। वे मिथकों को प्राकृतिक तथ्य नहीं, मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में सामने रखते हैं। पट्टनायक के लिए मिथकों की वैधता सामूहिक विश्वास में हैं तथा इसकी उपयोगिता मानवीय मनोविज्ञान की विशिष्ट जरूरतों में। इसी अर्थ में वे मिथकों को सामाजिक एवं व्यक्तिनिष्ठ सत्यों के रूप में देखते हैं कि वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक सत्य के रूप में।

देवदत्त मिथकों की मूल मनोवैज्ञानिक आवश्यकता का कारण मानवीय स्वतंत्रता में देखते हैं। वे प्रकृति के नियतिवादी कार्य-कारण संबंध के समक्ष मनुष्य की स्थिति को रखते हुए कहते हैं:

पशु सुरक्षित है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। वह प्रकृति के नियमों का दास है। मनुष्य स्वतंत्र है क्योंकि उसके पास कल्पना है और कल्पना उसे विकल्प देती है। लेकिन विकल्पों की यह स्वतंत्रता अपने साथ असुरक्षा का बोध और गलत चुनाव करने का भय लेकर आती है। हम जितने स्वतंत्र होते हैं, उतने ही भयभीत भी।10

पट्टनायक के अनुसार, मनुष्य में कल्पना ही वह शक्ति है जो स्वतंत्रता और विकल्पों की संभावना को जन्म देती है।मनुष्य के पास कल्पना है, इसलिए उसके पास विकल्प हैं।11 कल्पना द्वारा निर्मित विकल्पों की प्रचुरता भविष्य को अनिश्चित और असुरक्षित बना देती है। हर नए विकल्प के साथ अवसर (उत्साह) और असुरक्षा (भय) दोनों जुड़े हैं। निर्णय के इस संज्ञानात्मक बोझ को कम करने के लिए, संस्कृति मिथक के माध्यम सेसत्ययाशॉर्टकटप्रदान करती है। पट्टनायक के अनुसार,  ‘पहचान’, ‘उद्देश्यऔरअर्थवे मनोवैज्ञानिक उपकरण हैं जो इस अनिश्चितता को एक दिशा देकर निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया को सुगम बनाते हैं। इस अनिश्चितता कोइतिहास का आतंककहकर मिथक की भूमिका के संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार मिरचिया एलियाड कहते हैं:

मिथक एक पवित्र इतिहास है; यह आदिम काल में घटित किसी घटना का वृत्तांत है... विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यह अलौकिक सत्ताओं की सफलताओं का वर्णन करता है, यह समस्त मानवीय गतिविधियों के लिए एक अनुकरणीय प्रतिमान (Exemplary Model) बन जाता है। ... [आदिम मनुष्य] यह विश्वास नहीं करता कि वह स्वयं अपना जीवन 'निर्मित' कर रहा है... वह आद्यरूपों (आर्कटाइप) के माध्यम से 'इतिहास के आतंक' से सुरक्षित रहता है।12

पट्टनायक के अनुसार, मानवीय कल्पना द्वारा प्रदत्त असीमित स्वतंत्रता अपने साथ एक अस्तित्वगत गुरूत्व लेकर आती है। इस स्वतंत्रता के भार तले दबा मनुष्य जब मृत्यु के अपरिहार्य बोध और चरम इंद्रियगत भोग के बीच दोलायमान होता है, तब मिथक एकसंज्ञानात्मक नियामकके रूप में उभरते हैं, जो इन अतिवादी स्थितियों के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं। मिथकों के निर्माण में मृत्यु-बोध की भूमिका के संदर्भ में पट्टनायक का विचार है:

मृत्यु ही वह बीज है जिससे संस्कृति का वृक्ष पनपता है। प्रकृति में मृत्यु का अर्थ मात्र 'भोजन' है - एक जीव मरता है ताकि दूसरा जीवित रह सके। पर मनुष्य स्वयं को मात्र 'भोजन' समझने की इस नियति को स्वीकार नहीं कर पाता। वह अपनी कल्पना के सहारे एक ऐसी दुनिया रचता है जहाँ वह 'अमर' हो सके। मिथक वह भाषा है जो नश्वर मनुष्य को अमरता का आश्वासन देती है। यदि मृत्यु होती, तो तो कोई मंदिर होता, कोई चर्च और ही कोई मस्जिद।13

पट्टनायक के इसी विचार को प्रसिद्ध सांस्कृतिक नृविज्ञानी अर्नेस्ट बेकर भी अपनी पुस्तक डिनायल ऑफ डेथ में स्पष्ट करते हुए कहते हैं:

मृत्यु का विचार और उसका भय, मानव रूपी जीव को किसी भी अन्य चीज़ की तुलना में अधिक सताता है; यह मानवीय गतिविधियों का मुख्य स्रोत (Mainspring) हैऐसी गतिविधियाँ जिन्हें व्यापक रूप से मृत्यु की घातकता से बचने के लिए, और किसी किसी रूप में इसे मनुष्य की अंतिम नियति मानने से इनकार करके इस पर विजय पाने के लिए रचा गया है।14

पट्टनायक के लिए "मिथक तथ्यों के बारे में नहीं हैं; ये भावनाओं के बारे में हैं। यह मानव हृदय की गहरी असुरक्षाओं के प्रति एक प्रतिक्रिया है। यह संसार को समझने और उसे अधिक आरामदायक, अधिक पूर्वानुमानित और अधिक सार्थक बनाने का मानव हृदय का एक प्रयास है। यह आत्मा की भूख की एक अनुक्रिया है।"15 पट्टनायक मिथकों के केन्द्र में मानवीय भावना को रखते हैं। यह दुनिया तथा उसके बीच खुद को देखने का एक व्यक्तिनिष्ठ नजरिया है। भय, भूख, जुड़ाव इत्यादि प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर ही मिथकीय विश्वदृष्टि निर्मित होती है।

पट्टनायक के अनुसार इन मानवीय प्रवृत्तियों और इनसे जन्में प्रश्नों—‘मैं कौन हूँ?’ (पहचान का संकट), ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों?’ (पीड़ा का सवाल), ‘अंत के बाद क्या?’ (मृत्य का सवाल) आदि के प्रति दृष्टि क्रमश: ‘आत्मा का सिद्धांत’, ‘कर्म सिद्धांतएवंपुनर्जन्मआदि के रूप में मिथक ही देते हैं। "प्रकृति में केवल वस्तुएँ होती हैं, मूल्य नहीं। मूल्य संस्कृति की देन है। भूख ही वस्तु को मूल्य प्रदान करती है। प्यासे के लिए पानी लक्ष्मी है; जिसका पेट भरा हो उसके लिए वह केवल पदार्थ है। अतः, संसाधन अपने आप में अर्थहीन हैं; वे केवल भूख के संदर्भ में ही सार्थक और मूल्यवान बनते हैं।"16

पट्टनायक के लिए ये मिथक केवल प्रकृति के कठिन प्रश्नों का भावना-आधारित जबाव ही नहीं वरन तार्किक जबाव भी हैं। वे इसकी तार्किकता को वैज्ञानिक तार्किकता के समान नहीं वरन किसी विशिष्ट विश्वदृष्टि की अपनी तर्क योजना के अनुरूप मानते हैं। इसे वॉल्टर फिशर के शब्दों मेंनैरेटिव लॉजिककह सकते हैं। यहाँ सत्य किसी बाहरी वास्तविकता का प्रतिरूप नहीं वरन किसी खास विश्वदृष्टि की अपनी आंतरिक सुसंगता है। भले ही मिथक बाहरी विश्व के वस्तुनिष्ठ तथ्यों के प्रति कोई नई जानकारी दें, किंतु वे अनिवार्य ढंग से इन तथ्यों के बीच मनुष्य को पहचान और उद्देश्य देकर सक्रिय रखते हैं। इसी सक्रियता से मनुष्य अपने भय, भूख, जुड़ाव आदि प्रश्नों को हल करता है। इसके विपरित किसी एक विश्वदृष्टि से रिक्त आधुनिक अकादमिक अनुशासनों के संकट को चिह्नित करते हुए प्रमुख राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता कहते हैं:

विशेषज्ञता तेज़ी से अनुशासनात्मक तर्क की आंतरिक सुसंगति का विषय बनती जा रही है, कि यथार्थ के साथ उसके बाहरी संबंधों का हमारी विशिष्ट भाषाएँ दुनिया में झाँकने वाली खिड़कियाँ बनने के बजाय ऐसे 'घेरे' बन गई हैं जो यह परिभाषित करती हैं कि क्या सोचा जा सकता है।17

अकादमिक अनुशासनों के इनबंद घेरोंके बीच एक ही विश्वदृष्टि के भीतर विश्व को समझने और उसमें अपनी भूमिका निर्धारित करने में मिथकों की भूमिका के सदंर्भ में पट्टनायक की मिथक-दृष्टि प्रासंगिक लगती है। लेकिन यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि बाहरी वस्तुनिष्ठ सत्य से खुद को पृथक् करने के बाद इसकी विश्वदृष्टि में आयी दरार के बावजूद क्या प्राचीन मिथक आधुनिक विश्व की अधिक जटिल और नवीन समस्याओं को सुलझाने में कुछ कारगर हो सकते हैं? या प्राचीन मिथकों की भूमिका केवल एक प्रेरणा के रूप में हो सकती है जिनके आधार पर आधुनिक मनुष्य नये मिथक गढ़ सकेनये तथ्यों, नवीन समस्याओं और आधुनिक मूल्यों के आलोक में?

पट्टनायक की मिथक-दृष्टि की एक प्रमुख सीमा मिथक के सामाजिक पक्ष के प्रति थोड़ी उदासीनता है। मिथक केवल व्यक्ति को सार्थकता देने वाला मनोवैज्ञानिक उपकरण मात्र नहीं है; इसकी प्रकृति अनिवार्यतः सामाजिक है। व्यक्तिगत सत्य (दर्शन और भ्रम) और मिथक के मध्य की विभाजन रेखा 'सामूहिक स्वीकृति' ही है पट्टनायक 'धर्म', 'मूल्य' और 'चित्त-विस्तार' जैसी अवधारणाओं के माध्यम से इस सामाजिक पक्ष को व्याख्यायित तो करते हैं, किंतु उनकी दृष्टि कई बार अपनी ही 'वैचारिक सुसंगति' में इतनी उलझ जाती है कि वह ठोस सामाजिक विसंगतियों को ओझल कर देती है।

पट्टनायक समाज में व्याप्त लैंगिक, जातिगत वर्गीय शोषणों और संघर्षों को उतना महत्त्व नहीं दे पाते। उनकी मिथक-दृष्टि की सबसे बड़ी सीमा 'शक्ति-विमर्श' की उपेक्षा है। वे मिथक को एक 'संज्ञानात्मक मरहम' की तरह तो देखते हैं, परंतु सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त 'शक्ति के खेल' और 'वर्चस्व' के प्रति प्रायः मौन रहते हैं। पट्टनायक का वर्णव्यवस्था संबंधी दृष्टिकोण हैं: "वर्ण हमारी आंतरिक प्रकृति है, जबकि जाति समाज द्वारा दी गई हमारी पहचान है। वर्ण का अर्थ है हम संसार को कैसे देखते हैंक्या हम ज्ञान की खोज में हैं (ब्राह्मण), क्या हम सुरक्षा प्रदान करते हैं (क्षत्रिय), क्या हम विनिमय करते हैं (वैश्य), या क्या हम केवल सेवा करते हैं (शूद्र)"18  हालाँकि पट्टनायक अपनी कुछ किताबें जैसे शिखंडी: और अन्य अनकही कहानियाँ, सीता: रामायण का सचित्र पुनर्पाठ में क्रमशः तृतीय जेंडर और स्त्री प्रश्नों के रूप में सामाजिक वंचितों को भी अपने मिथकीय संसार में शामिल करते नजर आते हैं जो कि सामाजिक न्याय के मुद्दों के प्रति उनकी बढ़ती संवेदनशीलता के प्रति आशान्वित करता है।

निष्कर्षत: मिथक का मनोवैज्ञानिक पक्ष मानवीय इच्छाओं, भयों और प्रवृत्तियों को केन्द्र में रखकर एक ऐसी विश्वदृष्टि निर्मित करना है जो प्रकृति का मानवीकरण करती है। विज्ञान ने मिथक के वस्तुगत आधारों(प्राकृतिक तथ्यों और घटनाओं) की व्याख्या कर उन्हें वस्तुनिष्ठ तथ्यों में बदल दिया है, वहीं वह आज भी उन व्यक्तिनिष्ठ अस्तित्वगत प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ है जिनका संबंध मनुष्य की आंतरिक असुरक्षा और सार्थकता की खोज से है। पट्टनायक के अनुसार, मिथक सामान्यतः इसी संदर्भ में ही प्रासंगिक है।

संदर्भ :

  1. पट्टनायक देवदत्त, बिज़नेस सूत्र: प्रबंधन का एक भारतीय दृष्टिकोण, अनुवाद- नीलम भट्ट, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, 2014, पृ.45
  2. पट्टनायक देवदत्त, मेरी गीता, अनुवाद- नीलम भट्ट, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, 2015, पृ. 14
  3. पट्टनायक देवदत्त, मिथक = मिथ्या: हिंदू पौराणिक कथाओं का एक परिचय, अनुवाद- आशुतोष गर्ग, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया, 2017, पृ.82
  4. वही, पृ.11
  5. Armstrong, Karen. A Short History of Myth. Canongate, 2005, p. 118.
  6. पट्टनायक देवदत्त, मिथक = मिथ्या: हिंदू पौराणिक कथाओं का एक परिचय, अनुवाद- आशुतोष गर्ग, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया, 2017, पृ. 18.
  7. Campbell, Joseph, and Bill Moyers. The Power of Myth. Edited by Betty Sue Flowers, Doubleday, 1988, p. 31
  8. Dawkins Richard, The God Delusion, Bantam Press, 2006, p. 50.
  9. Gould Stephen Jay, "Nonoverlapping Magisteria." Natural History, vol. 106, no. 2, 1997, pp. 16-22.
  10. पट्टनायक देवदत्त, मेरी गीता, अनुवाद- नीलम भट्ट, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, 2015, पृ. 27
  11. वही, पृ. 25
  12. Eliade Mircea, The Myth of the Eternal Return: Cosmos and History, Translated by Willard R. Trask, Bollingen Series XLVI, Princeton University Press, 1954, pp. 34-36.
  13. पट्टनायक देवदत्त, मिथक = मिथ्या: हिंदू पौराणिक कथाओं का एक परिचय, अनुवाद- आशुतोष गर्ग, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया, 2017, पृ. 118
  14. Becker Ernest, The Denial of Death, Free Press, 1973, p. ix.
  15. पट्टनायक देवदत्त, मिथक = मिथ्या: हिंदू पौराणिक कथाओं का एक परिचय, अनुवाद- आशुतोष गर्ग, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया, 2017, पृ. 1
  16. वही, पृ.110
  17. Mehta Pratap Bhanu, 'A Return to Reality', The Indian Express, 1 Jan. 2018, indianexpress.com/article/opinion/columns/a-return-to-reality-nationalism-debate-hindu-muslims-5006390/
  18. पट्टनायक देवदत्त, मेरी गीता, अनुवाद- नीलम भट्ट, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, 2015, पृ. 182

 

रविन्द्र जाट
छात्र (हिंदी स्नातकोत्तर ), अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
EFL University, Osmania University Main Rd, near Tarnaka, Ravindra Nagar, Osmania University, Amberpet, Hyderabad, Secunderabad, Telangana, 500007
ravindrahsj@gmail.com, 8305451139

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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