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समीक्षा :-रजनी गुप्त की पुस्तक पर कालु लाल कुलमी:'स्त्री विमर्श की एक जरुरी किताब'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, मई 24, 2011 | मंगलवार, मई 24, 2011

 हर समाज कई स्तरों पर संक्रमण के दौर से एक साथ गुजरता है। ये परिवर्तन कई तरह से कई रुपों में समाज में कई स्तरों पर जाने अनजाने में होते रहते हैं। समाज में चिंतन की एक सतत् प्रक्रिया चलती रहती है वही समाज को कईं तरह से प्रभावित करती रहती हैं। सक्रमण के साथ सृजन और ध्वंस चलता रहता है। समाज अपने युगानुरुप मूल्यबोध का आविष्कार करता रहता है और जड़ता को खारिज करता चलता है। आज के बाजार के महाप्रवाह में जो घटित हो रहा है वह सामने हैं। स्त्रियों का नंगापन बाजार अपने लिये परोस रहा है और उसको स्वतंत्रता और आजादी से नवाज रहा है। इस पुस्तक पर बात करते हुए कई तरह के सवाल जेहन में एक साथ उभरते हैं। खासकर स्त्री विमर्श और स्वतंत्रबोध के स्तर पर! राज्य अपने अनुकूल विमर्श कराता है यह सिद्ध हो चुका है।  उसके लिए वह बौद्धिक वर्ग का उपयोग करता है। उसके लिए वह कई तरह के सम्मान प्रदान करता है या फिर खास तरह की समस्या का समाधान बौद्धिक चिंतन में तलाशता है। उसके लिये वह जिस तरह के संस्थान खड़े करता है वह हम जानते हैं।

स्त्री और उसकी आजादी, उसकी देह और उसके सपने साथ ही उसकी पहचान किससे होनी हैं। वह किसी अन्य से नहीं उसे अपने स्वतंत्र बोध से ही प्राप्त करनी होगी। उसे किसी की नजरों से नहीं अपनी ही नजरों से दुनिया देखनी होगी! अपने सपने खुद ही रचने होंगे। अपनी खोज खुद ही करनी होगी! लेखिका पुस्तक में एक जगह कहती है,‘जीवन अपने भीतर से उतना ही देता है,जितना आप पूरी ताकत से निकाल सको। अपने आप चलकर कोई खुशी किसी के पास नहीं आएगी। खुशियों का स्त्रोत कभी कोई और भला कैसे बन सकता है?सोचो जरा ,पराजित होकर औरों से खुशियां बटोरन की भला क्या तुक?क्यूंकर मिलेंगी तुम्हें औरों से खुशियां?‘ पृसं-७०

किसी की दया पर पलना या किसी की सहानुभूति के सहारे किसी भी तरह की खुशी को प्राप्त करना एक तरह का छलावा ही है। जिस तरह किसी इंसान का पालन-पोषण जंगल में होने पर वह उसी तरह का होता है वही समाज के हाशिएं के वर्ग के साथ हुआ। उसको अपनी उन्नति के अनुकूल वातावरण से पूरी तरह से बहिष्कृत कर समाज के कुछ खास वर्ग वर्ण केे लोगों ने उनको हर तरह से चेतना शून्य कर उनमें हिन भावना भरी और उसके लिए धर्मशास्त्रों और धर्म गुरुओं का उपयोग किया। स्त्री को इसके लिए कई स्तरों पर शिकार किया। रजनी गुप्त की यह किताब समाज की तमाम मान्यताओं के आलोक में स्त्री जीवन की पड़ताल करती है। स्त्री समाज में दान की वस्तु होती है या परायी सम्पति होती है। उसका स्वतंत्र कुछ भी नहींे होता! वह इतिहास से बाहर और साहित्य के कल्पना लोक की सम्पति होती है। वह जहां भी अपने वजूद के साथ आती है वहां समाज उसको बहिष्कृत करता है। वह बेटी, पत्नी,मॉ के रुप में ही समाज में पहचानी जाती है। वह स्वतंत्र होने के साथ ही कुलटा करार दी जाती है। उसको कुठांव पर फैंक दिया जाता है। वह दैहिक और सामाजिक दोनो ही स्तरों पर नकार दी जाती है। विधवा विवाह के कानून को कितने बरस हो गये। पर इस देश के समाज में ऐसी कई जातियां हैं जिनमें आज भी विधवा विवाह नहीं होता! दीपा मेहता की वाटर में जो दिखाया है वह इसी महान् समाज का कड़वा सत्य है। मेरे यहां मेनारिया जाति में आज भी विधवा विवाह नहींे होता है! वे जो कभी बच्चियां थी आज वे औरतें है और विधवा है। समाज उनको उसी रुप में स्वीकार करता है! सवाल यह है कि समाज का हर ताकत वर तबका कमजोर पर अपना अधिकार चाहता है और उसको किसी न किसी तरह अपने उपयोग की वस्तु बनाना चाहता है। स्त्री को इसी तरह से देखा जाता रहा है।

यह पुस्तक स्त्री विमर्श के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है। खासकर साहित्य और इतिहास के भीतर गहरी पैठ रखते हुए इस पुस्तक में इस तरह के कई तथ्य उजागर होते हैं कि किस तरह से समाज गुलाम पैदा करता है। उनको यकीन कराता है कि यही तुम्हारा सबसे श्रेष्ठ है, इससे बाहर गये तो खत्म हो जाओगे!  आज दुनियां में गुलामों का व्यापार बंद हो गया। उस प्रथा को समाज की चेतना ने खारिज कर दिया, लेकिक स्त्री की आजादी के मायने आज भी सवालोें के घेरे में हैं। वह फैशन के तौर पर बात करने वाले विमर्शकार हो या फिर हायतौबा मचानेवाले, वह क्षणिक आवेग वाले लोग हैं। यह बाहर और भीतर का संघर्ष हैं। इसलिए समय और संयम की मांग करता है। इस संघर्ष में शत्रु को पहले ही चिहिन्त करने की जरुर हो, ऐसा नहीं है। यह स्त्रियों की पुरुषों के खिलाफ सदियों की शत्रुता वाली बात नहीं है यह गहरी सांस्कृतिक लड़ाई है। इसको कई ंमोर्चो पर लड़ जाने की आवश्यक्ता है और इसमें सभी की भागीदारी आवश्यक है। लेखिका ने इस तरह की तमाम संभावनाओं और आंशकाओं की गहरी पड़ताल करते हुए गहरे से मूल्यांकन प्रस्तुत किया है, जिसको व्यवहार में लाया जाना चाहिए।

समीक्षक:-

कालुलाल कुलमी
(केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर शोधरत कालूलाल
मूलत:कानोड़,उदयपुर के रेवासी है.)
वर्तमान पता:-
महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
पंचटीला,वर्धा-442001,मो. 09595614315



पुस्तक:-सुनो तो सही  रजनी गुप्त , सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली प्रसं -2011 मूल्य-300

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