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पुस्तक समीक्षा:जब भी किसी स्त्री ने ललकारा,शास्त्र तर्क के आगे बौने ही रहे

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 13, 2011 | मंगलवार, सितंबर 13, 2011


जिस समाज में हम रहते हैं उसमें स्त्री सदैव बंदिनी रही हैं। शास्त्रों का भ्रम भले ही उसे वंदिनी के रुप में प्रस्तुत करता रहा हो, पर सच इससे बहुत दूर की कौड़ी ही रहा है। जिन शास्त्रों ने उसे पूजा की वस्तु के रुप में प्रस्तुत किया वही उसके लिए सबसे बड़े बंधन रहे। यह सच है जब भी किसी स्त्री ने उनको ललकारा, शास्त्र तर्क के आगे बौने ही रहे। लेकिन समाज के व्यापक सरोकारों ने स्त्री की आजादी को अपने लिए खतरा बना कर उसे इतिहास से बहिष्कृत रखा, उसके सपनों को बंदी बनाकर उसे सदैव छला, इस सच को कोई भी झूठ नकार नहीं सकता।

खिरनी की छांह में एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसने किसी की परवाह किये बगेर अपने को वह बनाया जो वह बनना चाहती थी। वंृदा के जीवन संघर्षों की कहानी है यह रचना! यह रचना किसी भी तरह के वैचारिक आग्रह से नहीं अपने संवेदन अपने को पल्लवित करती चलती हैं। गांवों का जीवन और वह भी स्त्री के लिए, कहां उसके लिए जगह होती वहां? उसके सपने होते भी है और नहीं भी! क्हीं बार तो वह सपने देखती हैं और कहीं बार ऐसा होता है कि वह सपने देखना ही छोड़ देती हैं। कभी घर का दबाव, कभी आस-पड़ौस का, कभी जाति का कभी समाज का, और इतने दबावों में वह सामाजिक परम्परा, विवाह का शिकार होती है। उसके बाद उसका जीवन उसका जीवन रहता ही नहीं। समाज उसको स्वतंत्र स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होता! वृंदा बचपन से ही बहुत सपने देखती हैं। वह चाहती है कि वह कुछ कर दिखाये! वह अपने को अपनी ही छांव में बढ़ाती हैं। हर तरह की समस्या के बावजूद वह कैसे आगे और आगे पढ़ती जाती है, और एक दिन वह अपने लक्ष्य के नजदीक पहंुच जाती है। उसे नौकरी हो जाती है। यानी वह आत्म निर्भर बन जाती है। वह स्वतंत्र है। जब उसके पास अपनी मेहनत के सिवा कुछ नहीं था! उसने मेहनत को चुना और वह आज घर आती है तो घरवाले उसे उसकी माॅ से नहीं मिलने देते और वह बेरंग लौटती है। अक्सर स्त्री की दुश्मन स्त्री ही बनती है। वृंदा की दीदी उसे हर कदम पर जलील करती है।

कहीं न कहीं वह यह चाहती है कि उसकी सफलता को सामाजिक तौर पर निष्फल साबित किया। वह अपने को जहां भी मौका मिलता है, वृंदा को पराजित करती है! वृंदा इसको बहुत अच्छे से समझती है। घर के बाकी तमाम लोगों को वह अपनी इस चाल के तहत यह समझने में कामयाब होती है वृंदा गाँव की जमीन को हथियाना चाहती है? उसके बाद सबकुछ पलट जाता है। जिस राजीव ने उससे बड़े-बड़े वादे किये थे वह आज अपने असली रुप में आ गया। दो बेटियों की मान बनने के बाद उसे पता चला कि यह राजीव वह राजीव नहीं है जिसको तुमने अपने मन में बसा रखा है यह तो फ्रोड़ी आदमी है,मक्कार है, अपने पुरुषवर्चस्व के आगे उसे कुछ नहीं दिखता! वह वृंदा को कहता तुम हो क्या? वृंदा को विवाह अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती के रुप में लगने लगता है और वह अपने को निराशा में उतारती जाती है! कभी दादा तो कभी बचपन की यादे उसे बार-बार ढ़ाढ़स देती हैं और वह अपने में अपनी बेटियों की ताकत अर्जित करती हुई अपने को जीवन की संभावनाओं की और मोड़ती हैं। वृंदा यह जानती है कि इस महाजनी सभ्यता में बहुत कम लोग है जो उसको निस्वार्थ चाहते हैं, बाकी लोग उसे नहीं उसके पैसों को पे्रम करते हैं। उसके सारे रिश्तेदार तो करते हैं उससे पे्रम करनेवाला राजीव तक इसी यकीन पर वृंदा को पे्रम करते का नाटक करता है। वृंदा की लड़ाई कमजोरों के लिए है, ‘मेरी लड़ाई उस तंत्र से है, उस बनावट से है जो धरती को बिकाऊ बना देती है, रिश्तो को सजावट बना देती है, भावनाओं और इंसानों को, सिक्कों से तोलती है।

सच कहूं तो मेरी लड़ाई उस मां के लिए है जिसके पास दुनियां की हर दौलत होती है, नहीं होते तो सिक्के.... मेरी लड़ाई उस कमतर रह गये कल्लू केे लिए है जो कमजोर है, अनपढ़ और गरीब होने के कारण मां के आश्रय से वंचित रह जाता है। मेरी लड़ाई उन औरतों के लिए है जो विवाह के नाम पर अपमानित की जाती है, रिश्तों के नाम पर जिनका स्वाभिमान परीक्षाओं से गुजरता है और अंततः वे फिर निर्वासित होकर रह जाती है, फिर भी अपनी लड़ाई लड़ती रहती है। मैं भी उस युद्ध पर ही हूँ अभी।‘ 

खिरनी की छांह- प्रीता भार्गव,बोधि प्रकाशन, जयपुर, 2011 मूल्य-10

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

कालुलाल कुलमी

(केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर शोधरत कालूलाल
मूलत:कानोड़,उदयपुर के रेवासी है.)

वर्तमान पता:-
महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
पंचटीला,वर्धा-442001,मो. 09595614315
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