कालुलाल कुलमी की हुसैन पर कवितायेँ - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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कालुलाल कुलमी की हुसैन पर कवितायेँ


कालुलाल कुलमी(मो.08947858202)
देश की तमाम साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में ये युवा छप चुका है।केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर वर्धा विश्वविद्यालय में शोधरत है.मूल रूप से गांव-राजपुरा, महादेवजी के मंदिर के पास, पोस्ट-कानोड़, जिला-उदयपुर, राजस्थान-313604 का वासी है।हिन्दी लेखन में अपने ढंग से दस्तक देता हुआ हस्ताक्षर है।खासकर पुस्तक समीक्षाएं,आलेख में हाथ साफ़ है कभी कभार कविता करता है।इस युवा मेधा से उपजी कुछ कवितायेँ एक हस्तक्षेप की तरह यहाँ प्रस्तुत हैं।कालु कुलमी की 'अपनी माटी' पर छपी बाकी रचना यहाँ क्लिक कर पढी जा सकती है।


(1)
तुमने रंगों के मायने बदले
उनका भेद बदला
अपने मित्र की मौत के बाद
तुमने लाल रंग को उकेरा
अपने पैर नंगें कर लिए 
हमेशा के लिए




(2)
वह कौन सा रंग है
जिसमें तुम अपने को देखते हो
हां उसको अपने में रखे 
बरसों तुम साधते रहे खुद को


(3)
तुम खुद रंग हो
वहां चमकते हुए
तुम ऐसे ही हो या नहीं
हां एक तरह से 
यहां हो!

(3)
उम्र के आखिरी दौर में
तुम यहां से चले गये
जहां तुमको रहना था
राम भी अपनी जवानी में 
वनवास में थे
तुम को तो इस उम्र में
वनवास मिला!



(4)
तुम मेरे रंगों में हो
मुझे रंगते हुए।


(5)
तुम किस केनवास पर हो
रंग में या केनवास के रंग में
लाल पीले नीले या
बेरंग हो
बोलो
 तुमको किसमें 
खोजे और कैसे खोजे!



(6)
यहां सब रंग बेरंग हो रहे हैं
तुम जाते हुए कोई रंग दे जाओ
जिससे बेरंग होती दुनियां 
 में कोई रंग भरा जाए!


(7)
तुम किस कूची में हो
तुम कूची में हो या कहीं और
कहां से लाते हो रंग!
बाहर से या भीतर से




(8)
तुम आज कहां रंग भरोगे
रात में या दिन में
सुबह में या शाम में
पसीने में या...
आज रंग बहुत उदास है
तुम उनको अनाथ कर गये
वे अपनी चमक के साथ है
हां,वे रात की तरह नहीं
भोर की तरह है
अपने में उजास का
रंग भरते हुए!

(9)
तुम रंगों में हो
तुम रंगों के कोलाज में हो
तुम अपनी कूची में हो
तुम कहां हो
बोलो हुसैन
तुम कहां हो!
तुम रंगों में उतरते हो
या रंग तुममे
कौन किसमें आता जाता है?
केनवास पर रंग उतरते हैं
या तुम!
हुसैन कैसी पहेली हो तुम
पहेली ही है ये रंग जिनको तुमने
केनवास पर उतारा!


(7)
तुम आख्यान हो
जीवन और रंग
दोनों ही जगह


(8)
तुमने रंगों को जीवन दिया
रंगों ने तुमको पहचान
तुमने रामायण महाभारत को रचा
रंगों के साथ


(9)
तुम खेलते रहे बहुत से खेल
रंगों के साथ
अपने को रंग बनाये


(10)
उसने एक पोधा लगाया अपने आंगन में
वह अब पेड़ हो गया है
उस पर कौन आता है
रंग बहुत है उसमें
उसमें वह है
जिसने इसे लगाया
वहां बच्चे खेलते हैं
धूल का अभाव है
वह पेड़ दूर चले गये
अपनों को याद करता है
बच्चों को बताता है
तुम कुछ गाओं
मेरा मन बहलाओं
अब में अकेला हो गया हूं
कुछ गाओं
बच्चों! 
जिससे मेरी उदासी
आसमान से फिर न उतरे!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कवितायेँ पढ़ने को मिली ...शुक्रिया

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  2. अपनें पैर नंगे कर लिये हमेंशा के लिये । गजानंद माधव मुक्तिबोध की याद दिला दी । जो उनके साथ हुआ वो किसी भी मायनें मे न्‍यायसंगत नहीं थी । बहुत ही सुन्‍दर कविता पढ़ी । आपको असीम धन्‍यवाद ।

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