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दमामियों के बच्चे रोते राग में और ठेके लगाते हैं हाथ पॉंवों से /नटवर त्रिपाठी

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, सितंबर 25, 2012 | मंगलवार, सितंबर 25, 2012


-नटवर त्रिपाठी
(समस्त चित्र स्वतंत्र पत्रकार श्री नटवर त्रिपाठी के द्वारा ही लिए गए हैं-सम्पादक )

दमामियों के बच्चे तो पालने में ही ‘व्यां-व्यां’ राग में रोते हैं, रोने में उनकी लय नही टूटती है। हाथ पैरों से ठेके लगते हैं। गाना-बजाना दमामियों की रग-रग में है। 74 वर्षीय धनेत कलां के शहनाई वादक हरिरामजी से पूछा वे कब से गा-बजा रहे हो तो ठिठोली करते कहा यूं तो जन्म से ही ‘व्यां-व्यां’ राग में गाने लगे, हाथ-पॉंव पछाड़ कर ठेके भी। होश-हवाश तो 7-8 बर्ष वर्ष में आया तब पिताजी के पास कार्यक्रमों में सीखना प्रारंभ किया। 

उनकी की यह 200-250 वर्ष पुरानी यह शहनाई अपनी नो पीढ़ी से एक के बाद एक कुटुम्बी जन के होठों पर खेलती हुई हरिरामजी के होठों पर 6 से अधिक दशक से अठखेलियां कर रही है। उनकी नो पीढ़ी पहले की इस बांसुरी के स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आया और न फेरबदल हुआ। अंदाज लगाया जा सकता है तब भी इस अंचल में संगीत परम्परा कितनी समृद्ध थी। शहनाई बजाने वालों और उनसे जुड़े प्रश्नों को उकेरने पर कहने लगे कि भूं-भूं तो कई करते है, असली फनकार वाले अब कहां रह गए हैं। 

ठेठ गांव के लिबास में हरिराम शहनाई क्या बजाते है जैसे एक से एक धुन रसभरी, रस टपकाती, मनभावन, मनोहारी झरमर झरती लगती है। छोटे बड़े गांवों में तुर्रा-कलगी दंगल के दौरान जहां रोजमर्रा की जिन्दगी को छूते काव्य में सवाल-जवाब-तकरीरों के दंगल खुले आकाश के नीचे दर्शकों को हिलने नहीं देते हैं वहीं हरिरामजी की कर्णप्रिय शहनाई की तासीर ऐसी है कि आम जन को रिझाऐ और बांधे रखती है। तुर्रा-कल्गी दंगल अखाड़ों की व अंचल के कलाकर्मियों की नज़रें ऐसे कार्यक्रमों में उन्हें तलाशती रहती है। 

शहनाई वादन की तकनीक के बारे में बताया कि इसमें फंूक का करिश्मा है। कब कम और कब मध्यम तथा तीव्र बजानी होती है यह अभ्यास से तय होता है। फंूक देने में ताकत का इस्तेमाल होता है। शहनाई के होठ में दबे पत्ते का नियंत्रित रखना पड़ता है। जिस तरह गाड़ी के एक्सीलेटर को कब कैसा रखना होता है उसी अनुरूप बांसुरी के पत्ते को नियंत्रित करने के लिए फंूक का इस्तेमाल आरोह-अवरोह के हिसाब से चलता है। इससे गाल फूंलते हैं जो ठीक नहीं है। हवा पहले से ही गांलों में दबी पड़े रहे तो और ताकत लगानी पड़ती है। बांसुरी को ‘मसकिया’ बाजा बताया गया है। ताड़ का पत्ता गुलाबबाग उदयपुर और बिछीवाड़ा की तरफ से आता है। शहनाई में 7 सुर और आठवां कोमल सुर होता है। गोल चक्कर जो इसमें होता है परली कहते हैं। इसके डोरों को चपरास बोलते है। पत्ते के मुंह की सफाई के लिए कुचरनी का पत्रा होता है। कभी कभी तो पूरा खेल निकल जाता है बांसुरी में स्वर बैठते ही नहीं। उनके जीवन काल में भी दो-तीन ऐसी घटनाऐं हैं जब सब प्रयत्नों के बावजूद बांसूरी ठीक से नहीं बज पाई। वे बताते हैं छोटीसादड़ी में एक खरादी शहनाई बनाता था अब जिले में कोई नहीं है। अब जो शहनाई आरही है उसमें स्वर नहीं उभरते। उसे हम कंसूरी (बेसूरी) कहते हैं। 

भैरवी, घूमर, पणिहारी, नगला, कालिंजड़ा, प्रभाती गाते बजाते। शास्त्री रागिनी में प्रभाति सुबह 4-5 बजे, मध्य रात्रि सोरठ, 9-10 बजे रात्रि को नगमा गाते हैं। तुर्रा-कल्गी में गजानन-गणपति झाड़शाही में माच की टेर के साथ, राजा रानी संवाद में सुर में टेर लगा देते हैं। माच की राग रागिनी में लावणी, छोटी गजल, बड़ी कड़ी, मारवाड़ी, चूंदड़ी, सोरठा, गजल, कालिगड़ा, असावरी का इस्तेमाल होता है। भजन गायकी में जैसा गान होता है उसमें साथ रह कर बांसुरी से सुर देगें। कबीर, तुलसी और मीरा के भजनों की धुनों पर साथ साथ शहनाई बजाई जाती है। इनका अपना नगारा भी है।

इनका खानदान रजवाड़ों के दमामी रहे और जीवन भर उनके यहां गाते बजाते रहे। बुलावे पर ही वे जाते हैं, बिन बुलाऐ कभी नहीं जाते-आते। त्यौहार, उत्सव, शादी, विवाह, लग्न, सगाई-सरपण और धार्मिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होते हैं।  अपने जजमानों को मृत्यु के समय केश-कान देते है। इन्हें रजवाड़ों में और खास तौर से डगला का खेड़ा रजवाड़े में जाना आना होता है। वहां ये जल्ला, मांड, मूमल, घूमर, केसरिया बालम कलाली गाते-बजाते हैं। वहां संगत नहीं होती है। एक बार की बात है रावले के सरदार ने उनका गाना सुनने के बाद कहा कि ‘ वाह रे बेटा! अब कई बात है बाप अर बेटा साथे गा रिया है’। किन्तु अब बाप-बेटों की ऐसी जोड़ी ढूंढने पर नहीं मिलती है।  रजवाड़ों के बाद अब पिछली पीढ़ी अन्य पेशों में लगी है। वे बताते हैं अब गला साथ नहीं देता। खरखड़ी आती है। गले में पानी आ जाता है, भरबड़ होती है। शहनाई के थोड़े जानकारों में शंभूपुरा के मोड़ीराम, सेंती के भैरू बैण्ड मास्टर तथा कनेरा के सत्यनारायण हैं। अब लालटेन लेकर जिले में बांसुरी वादक ढूंढे तो नहीं मिलते हैं।

हरिरामजी का कहना है ‘‘मिले तो कुड़ भला नहीं मिले तो उस्ताद भी बुरा’’ शहनाई का मेल सबके साथ नहीं होता है। हमें कलाकार का पीछा करना होता है और कलाकार को हमारे साथ सहकार। परस्पर सामंजस्य सेे संगीत उभरता है अन्यथा लोग उठ कर चले जाते हैं। आस-पास की बात कहें तो उदयपुर में तो अभी शहनाई वादक हैं, चित्तौड़ में अभाव है। स्व. बिस्मिल्लाखां साहब की शहनाई की तारीफ करते हरिराम अघाते नहीं हैं। शहनाई के साथ नगाड़ा, ढ़ोलक, हारमोनियम का इस्तेमाल होता है। कोटड़ी के कालूजी, शंभूपुरा के कैलाशजी व ओड़ून्द के नंदरामजी अच्छे साजिन्दों में से है। छोटीसादड़ी का एक खेरादी शहनाई बनाता था। उसके बाद अब शहनाई बनाने वाला कोई नहीं रहा है। रोलाड़ा के बालूबा ढ़ोली ने 11 शहनाई इकट्ठी की पर उन्हें यही शहनाई पसन्द आई। यह नो पीढ़ी की धरोहर किसी को ये कैसे दे सकते थे। 

ये सब जगह, सब आयोजनों में, भाग लेते हैं। सगसजी, भजन मण्डलियों, खेल दलों, शादी-विवाह के नगारखाने, रजवाड़ी घरों में जाकर शहनाई बजाते हैं। रामदेवजी, सती माता, रूण्डेश्श्वर, कालिकामाता, मीरा मन्दिर, द्वारका उत्सव, भीलवाड़ा, उदयपुर, भारतीय लोककला मण्डल, नागौर, मीरा उत्सव, उद्योग मेले आदि में संगीत प्रेमियों के साथ समागम करते हैं। 

अपने पिताजी घासी रामजी के बाद गोविन्दपुरा के नानूराम जी तुर्रा के हरफनमौला थे ने बार बार अभ्यास कराया। जब तीन चार दर्जन पार्टियों में शहनाई बजाने का अभ्यास हो गया तो उस्ताद नानुराम ने गांधीचौक में पहली बार माच खेल में शहनाई का प्रयोग कराया तब से यह शहनाई निरन्तर बज रही है। फिर आस-पास जहां भी तुर्रा-कल्गी के खेल हुए उसमें भाग लिया। नानाभाई उन्हें नए नये नारकिये कहते थे। हरिरामजी बताते हैं शहनाई से उन्हें सब कुछ मिला है। सभी प्रकार के सुख और सकून प्राप्त हुए। इसमें आज भी बजाने में बड़ा आनन्द आता है। यह शहनाई पिताजी के समय फट गई थी जिसकी मरम्मत के बाद आज भी वैसी ही बज रही है। कई लोगों ने और अठाणा के घासी बॉ ने इस शहनाई को लेना चाहा था परन्तु अपनी खानदान की निशानी से वे महरूम नहीं होना चाहते थे। उनका दर्द यह है कि दसवीं पीढ़ी में इनका बेटा तो नहीं पर बड़ा हो रहा पौता शायद बजाए।उनकी इच्छा है कि शहनाई बजती रहनी चाहिए। इसलिए कोई सीखना चाहे तो वे सीखाने के लिए सदैव तत्पर हैं। गुरू शिष्य परंपरा के पोषक इस संस्कृति पुरूष की इच्छा है कि वे शहनाई वादकों की कुछ जोड़ियां खड़ी कर जावें।
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नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com 
नटवर त्रिपाठी

(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं। पूरा परिचय 
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