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''अदम गोंडवी का न होना शायरी के उस मिजाज़ का अवसान है ''-डॉ.ओम निश्चल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अक्तूबर 21, 2012 | रविवार, अक्तूबर 21, 2012

अदम गोंडवी जयन्ती विषयक आलेख
अदम की शायरी की पड़ताल करता हुआ लेखक साथी डॉ.ओम निश्चल का आलेख
  
(ये आलेख मूल रूप से 'कल के लिए' पत्रिका के अदम गोंडवी विशेषांक में छापा गया है।ये वही पत्रिका है जिसे जयनारायण जी बुधवार संपादित कर रहे हैं।हम डॉ.ओम निश्चल जी के सहयोग से यहाँ साभार एक आलेख छाप रहे हैं।वैसे हम बता दे कि ये अंक बहुत चर्चित रहा जिसे हमारे ही साथी अशोक कुमार पाण्डेय ने अतिथि सम्पादक बनकर निकाला था। अदम जैसी आवाज़ असमय ही मौन  गयी है मगर आज  उनकी शायरी के ज़रिये इस विकट दौर में एक अतिरिक्त त्वरा के साथ  वे हमें बहुत याद आते हैं।-सम्पादक )

अदम गोंडवी का न होना शायरी के उस मिजाज़ का अवसान है जिसने सत्‍ता का कभी मुँह नहीं जोहा, जीवन में कभी समझौते नहीं किए। दुष्‍यंत कुमार के बाद ग़ज़लों की दुनिया में ऐसी कोई शख्‍सियत नही थी जो उनकी जगह ले सके। इसीलिए बरसों बाद जब गजल की दुनिया में अदम का आगमन हुआ तो उन्‍हें  दुष्‍यंत की परंपरा का शायर मानने  की  वजह यह थी कि वे गजलों में उसी साफगोई के साथ अवाम के नाम एक नया पैगाम लिख रहे थे। इसी तरह धूमिल हिंदी कविता में अपने नाराज़ तेवर के साथ आए तो अकविता की अराजक मुद्राओं से आच्‍छादित हिंदी कविता की धारा ही लगभग बदल गयी। धूमिल के बागी तेवर ने कविता को एक विस्‍फोटक की तरह रचा जहॉं किसी भी तरह के मानवीय अपकर्ष के विरुद्ध कविता के नए मुहावरे में वे लोकतंत्र की गड़बड़ियों की मुखर आलोचना कर रहे थे। अदम की शायरी को पढ़ते हुए धूमिल के तेवर का हल्‍का सा आभास मिलता है। दुष्‍यंत ने कई विधाऍं आजमायीं, उपन्‍यास, कहानी, कविता, गीत और गजल। लेकिन मकबूलियत उन्‍हें गजलों में  ही हासिल हुई। उनकी तुलना में बहुत ही कम पढ़े लिखे अदम ने केवल गजल का दामन थामा और थोड़े ही दिनों में दुष्‍यंत की तरह उनकी भी कई गजलों के अशआर जबान पर चढ़ गए। आपातकाल की जमीन पर लिखी दुष्‍यंत की गजलें जैसे आम आदमी की अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम बन गयीं, वैसे ही अदम की गजलों में इस मुल्‍क की लुटी पिटी तस्‍वीर साफ दिखाई पड़ती है।

आज से लगभग दो दशक पहले अदम गोंडवी की कुछ ग़ज़लें पढ़ने को मिली थीं। सियासत, लोकतंत्र और व्‍यवस्‍था पर चाबुक मारती अदम गोंडवी की ग़ज़लों में एक ऐसी खनक सुनाई देती थी, जैसी अस्‍सी के दौर में धूमिल की कविताओं और दुष्‍यंत कुमार की ग़ज़लों में सुनाई देती थी। गोंडा के एक छोटे से गॉंव से ऊपर उठ कर अदम का यश भूमंडलव्‍यापी हो उठा था। कोई नही जानता था कि खसरा खतौनी में रामनाथ सिंह के नाम से जाना जाने वाला यह शख्‍स ग़ज़ल के आँगन में आग बिखेरने वाला अदम गोंडवी है। उनकी मकबूलियत का आलम यह कि सियासत से लेकर अदब से ताल्‍लुक रखने वालों तक की जबान पर अदम के शेर विराजते रहे हैं। ग़ज़ल की परंपरा में दुष्‍यंत कुमार की ग़ज़लें एक मोड़ मानी जाती हैं तो अदम की ग़ज़लें एक और मोड़ अख्‍तियार करती हैं जिसमें एक साथ वे स्‍थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से संवाद करते हैं।


महज प्राइमरी तक की तालीम हासिल करने वाले अदम गोण्डवी का बुनियादी काम यों तो खेती-किसानी रहा है किन्तु इस काश्तकार ने गजल की भी एक इन्‍कलाबी फसल बोई है, जिसके चाहने वाले पूरे देश में फैले है। दशकों पहले से उनकी गजल के इस इन्कलाबी मिसरे- काजू भुने है प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में’- ने अचानक उन्हे सियासतदां और अदबी इलाके में चर्चा में ला दिया था। मंच पर आग उगलने वाली ग़ज़लों को सुन कर लोग पूछते थे, यह किसानी लिबास वाला शख्‍स कौन है? चेहरे-मोहरे और पहनावे से लगभग धूमिल की याद दिलाने वाले अदम के चेहरे पर एक किसान की खुद्दारी दिखती थी तो ग़ज़लों में आजादी के बाद मुल्‍क का लुटा पिटा नक्‍शा साफ नज़र आता था। अदम अभावों की धूसर दुनिया से बावस्‍ता ऐसे नागरिक थे जिन्‍हें देखकर आप यह मान ही नहीं सकते थे कि वे ही हमारे समय के अविस्‍मरणीय कवि अदम हैं। अपने तआरूफ में उन्‍होंने लिखा है:


फटे कपड़ों में तन ढाँके गुजरता हो जहाँ कोई/
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गाँव जाती है।


सरकारी कारिन्दों की दया से मुल्क में रिश्वत और कमीशनखोरी भी उत्तरोत्तर परवान चढ़ी है। इस पर अदम का कटाक्ष देखें-आजादी के छह दशकों बाद भी गावों के हालात नहीं बदले है। पूंजीपतियों व  जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे/ कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे। आजादी की व्यर्थता पर अदम पूछते है- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है/ दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आजाद है?’ आजादी को लेकर अस्‍सी के दशक के प्रारंभ में ऐसे ही जलते हुए सवाल धूमिल और लीलाधर जगूड़ी ने उठाए थे। सरकारी विज्ञापनों की भाषा उस प्रसाधन की तरह है जो भले ही मुल्‍क की झुर्रियों को कास्मेटिक्स के मुलम्मे से ढकने का विफल प्रयास करता है किन्‍तु अदम जैसा शायर इस रंग-रोगन को पहचान ही लेता है- तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आँकडे झूठे है, ये दावा किताबी है।उनकी गजलों में जो आग है, इन्कलाबी तेवर है, वह इसी समाज और व्यवस्था की खराबियों की देन है। अदब से महज किताबी रिश्ता न रखने वाले अदम गोण्डवी की गजल गरीबी, बेरोजगारी, भूख और आम आदमी के पक्ष में आवाज उठाती है। वह जिले के बडे से बडे हाकिम की कारगुजारियों से लेकर बडे ओहदेदारों और सरमायेदारों तक से नहीं घबराती और गॉंव के सामंतवादी रवैये को चमारों की गलीजैसी ऐतिहासिक नज्‍म में शब्‍दबद्ध करती है। दलितोत्‍पीड़न की इससे बड़ी मारक कविता शायद ही मिले लेकिन विमर्शों की विलासिता में खोए रहने वालों को शायद ही इसकी परवाह हो।

अदम गोंडवी 18 दिसंबर 2011 को हमारे बीच से सदा के लिए रुखसत हुए तो अदब की दुनिया में जैसे सन्‍नाटा-सा खिंच गया। काव्‍य मंचों पर आग उगलने वाला और जन संगठनों व जनांदोलनों में जान फूँकने वाली ग़ज़लों का शायर सदा के लिए खामोश हो गया तो अचानक प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया तथा सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्‍लाग्‍स में अदम की चिरखामोशी को लेकर शोक संवादों का तांता लग गया। उनके जीते जी कैफ़ भोपाली ने लिखा था, ‘मामूलीपन, अनपढ़,मटमैलापन भी इतना असाधारण, बारीक और गहरा हो सकता है, इसे सिर्फ अदम को सुन और पढ़ कर समझा जा सकता है।आलोक धन्‍वा ने उनकी मौजूदगी में आयोजित कविता की दुर्लभ महफिलों को याद करते हुए उन्‍हें सत्‍ता से मुठभेड़ करने वाले कवि की संज्ञा दी तो शुक्रवारजैसी पत्रिका ने उनकी शायरी के मिसरे-मिसरे में आम आदमी की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा के सौंदर्य की तस्‍दीक की और लिखा कि 'निपट गँवई अंदाज में महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली गोंडवी की अदा सबसे जुदा और विलक्षण थी।मंगलेश डबराल का कहना था कि वह दूसरे दुष्यंत नहीं बल्कि नागार्जुन की तरह आम आदमी से सरोकार रखने वाले रचनाकार थे। जन संस्‍कृति मंच की ओर से प्रणय कृष्‍ण ने लिखा कि जब-जब राजनीति की मुख्यधारा ने जनता से दगा किया, अदम ने अपने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल साबित किया।

अदम की शायरी का राजनीति से गहरा वास्‍ता रहा है। रोज ब रोज घटने वाली घटनाओं को वे राजनीति और आम आदमी के सरोकारों के केंद्र में रख कर देखते थे। इसीलिए उनके यहॉं अपने ही जनपद के जिलाधिकारी की काली कमाई पर कटाक्ष है तो आडवाणी, गडकरी, बाबा रामदेव और अन्‍ना हजारे तक के राजनीतिक किरदारों तक की जम कर खबर ली गयी है। अदम की ऑंखों ने पहले ही भॉंप लिया था: मोहतरम अन्‍ना हजारे आप कर पाऍंगे क्‍या/ ये शहर शीशे का है और संगदिल सरकार है।और मृत्‍यु से कुछ पहले का ही शेर है: आडवाणी, गडकरी आए तो पर्दा उठ गया/ सौदागर हैं वोट के दामन पसारे आ गए।उन्‍होंने अपनी गजलों में नागार्जुन, धूमिल और दुष्‍यंत को भी याद किया है जिससे उनका उस कवि- कुल से सहज ही नाता जुड़ता है, जिसकी कसौटी लोक है। उनकी खुद्दारी ने किसी सत्‍ता के आगे नहीं बल्‍कि किसी मजलूम या साहिबे-किरदार के समक्ष ही मत्‍था टेका।

अचरज नहीं कि लोग उनमें कबीर का अंदाजेबयॉं, दुष्‍यंत की तल्‍खी और धूमिल की तार्किक आक्रामकता और नागार्जुन की ललकार देखते हैं तो सहसा कबीर के बारे में उनका ही कहा याद आता है कि उस जुलाहे की भाषा में फूलों की नाजुकी बेशक हो, पर उसमें चट्टान की-सी सख्‍ती है। कहना न होगा कि यही कसौटी उन्‍होंने अपनी ग़ज़ल के लिए भी निर्मित की थी। तनी हुई प्रत्‍यंचा की-सी भाषा में कबीर अपने वक्‍त के धार्मिक पाखंड से टकराए तो अदम अपने वक्‍त के राजनीतिक पाखंड से। अधिक क्‍या, मार्क्‍सवाद की किताबी सैद्धांतिकी के विरुद्ध उनकी ग़ज़ल एक ऐसी व्‍यावहारिक कार्यशाला है, जिससे गुज़र कर न केवल क्रांति की एक मुकम्‍मल तमीज़ पैदा होती है बल्‍कि इससे गॉव के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हालात को भी बखूबी समझा जा सकता है। एक मुलाकात में मुनव्‍वर राना ने अपनी शायरी के मिजाज़ पर रोशनी डालते हुए किसी शायर का यह शेर सुनाया था: वाकिफ़ नहीं तो उसके लबों को कँवल न लिख/अल्‍फाज़ को खिजाब लगा कर ग़ज़ल न लिख।अदम की शायरी अपनी सादाबयानी में किसी विस्‍फोटक से कम नहीं है।

प्रकृति के सुरम्‍य परिवेश में भले ही कहीं वर्ड्सवर्थ और सुमित्रा नंदन पंत जैसे कवि पैदा होते हों, किन्‍तु जिसके गॉंव का परिवेश संतप्‍त हो और आम जनता भुखमरी की धूप में संतप्‍त हो, ऐसे परिवेश में वे राग और रोमान की बातें नहीं कर सकते थे। जिन्‍होंने गॉंव का परिवेश शीर्षक उनकी नज्‍म पढ़ी है उन्‍हें बताने की जरूरत नहीं कि अपने छल बल से गॉंव के गरीबों का शोषण करने वाली शक्‍तियों एवं धार्मिक पाखंड के नाम पर भयादोहन करने वाले पंडे पुरोहितों के विरुद्ध उनकी नज्‍म इन्‍क्‍लाब का आह्वान करती है। वे कहने के लिए क्षत्रिय थे पर जब 'चमारों की गली' नामक नज्‍म लिखी तो अदब की दुनिया में जैसे हंगामा सा मच गया। अपने ही गॉंव परिवेश के ठाकुरों की बदमिजाजी पर चोट करते अदम को तनिक भी संकोच न होता था। वे क्षत्रिय होते हुए भी जातीय स्‍वाभिमान से ऊपर उठ चुके थे। यह नज्‍म अपनी ही बिरादरी से दुश्‍मनी मोल लेने के लिए काफी थी। लेकिन अदम को इसकी परवाह न थी। आज भी दलितों के शोषण और बलात्कार पर इतनी तेजाबी नज्‍म शायद ही किसी कवि-शायर ने लिखी हो।

राजनीति में उत्‍तरोत्‍तर जातिवाद और धार्मिकता का बोलबाला बढ़ा है। बाबरी और राममंदिर विवाद के दौर में देश में जम कर हिंदू कार्ड खेला गया और देखते देखते साधुओं की एक पूरी जमात हिंदू भावनाओं का ज्‍वार उठा कर संसद में आ गयी। अदम हर तरह की सांप्रदायिकता के खिलाफ थे। बाबरी मस्‍जिद प्रसंग में मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले लोगों से उनका कहना था कि ग़लतियाँ बाबर की थीं, जुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले/ ऐसे नाज़ुक वक्‍त में हालात को मत छेड़िये।आज अन्‍ना टीम के सदस्‍य अरविंद केजरीवाल के जिस बयान पर होहल्‍ला मचा है, उसे अदम दो दशक पूर्व ही कह चुके थे:


जिनके चेहरे पर लिखी है जेल की ऊँची फसील/
रामनामी ओढ़कर संसद के अंदर आ गये।

यही नहींउन्‍होंने यहॉं तक लिखा कि:

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें/
संसद बदल गयी है यहॉं की नखास में।

(समय से मुठभेड़, पृष्‍ठ 70)

एक ऐसा ही शेर उन्‍होंने एक और ग़ज़ल में कहा है: चंद सिक्‍कों के एवज ईमान बेचा जा रहा/ ये हमारे देश की संसद है या नख्‍खास है।‘  सदन को लक्ष्‍य कर उनका एक और शेर है: सदन की बढ़ गयी गरिमा छदामीलाल क्‍या आए/ इमरजेंसी में बंदी थे ये चीनी के घोटाले में।‘(धरती की सतह पर, पृष्‍ठ 15)

उनकी गजलों में संसद, विधान सभा, विधायक निवास, दारुलसफा, सदन, जम्‍हूरियत, पूँजीवाद, सियासी बज्‍म, जम्‍हूरी निजाम जैसे शब्‍द बहुत आते हैं। कहना न होगा कि उन्‍होंने लोकतंत्र में सत्‍ता के ऐश्‍वर्य में डूबे शासकों और कारिंदों का दौर देखा है। आजादी के मोहभंग का दौर देखा है। यही वजह है कि उनकी ग़ज़ल सधुक्‍कड़ी और सूफियाना लहजे में स्‍थगित नही होती बल्‍कि उसका अपना राजनीतिक पाठ है। वह केवल कलात्‍मकता का पर्याय होकर न रह जाए बल्‍कि हर तरह के जुल्‍म शोषण गैर बराबरी के खिलाफ एक तल्‍ख टिप्‍पणी बन सके, अदम ने ग़ज़ल को इसी मिशन के रूप में साधा था।

एक समय की हिंदी कविता पर भी आजादी के बाद के मोहभंग की छाया मौजूद रही है। साठोत्‍तरी कविता के मिजाज में यह मोहभंग अरसे तक छाया रहा है। धूमिल ने आजादी को लेकर कई बुनियादी सवाल उठाए थे। आजादी क्‍या तीन थके हुए रंगों का नाम है? यह सवाल धूमिल का था तो अदम ने पूछा, सौ में सत्‍तर आदमी जब देश में नाशाद है/दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्‍या आजाद है? सवाल लगभग एक से हैं पर लहजा अपना अपना है। अदम अपनी शायरी को चिन्‍गारी में नहीं, मशाल में बदलना चाहते थे। उनका इन्‍कलाबी तेवर कई बार जनता को हथियार उठाने तक की नसीहत देने से नहीं चूकता। एक और नज्‍म जनता को हक़ है में वे यही बात दुहराते हैं:

जब भुखमरी की धूप में जलते किसान हों
मुँह में ज़बान रखते हुए बेज़बान हों।
नफ़रत की रुत में दंगों के शोले जवान हों
जम्‍हूरियत के तन पे ज़िना के निशान हों
जनता को हक़ है हाथ में हथियार उठा ले।
                           
 (धरती की सतह पर, पृष्‍ठ 82)

अपनी अंतिम ग़ज़ल में भी उन्‍होंने लिखा है:
जब सियासत हो गयी है पूँजीपतियों की रखैल
आम जनता को बग़ावत का खुला अधिकार है।


 हो सकता है अदम का यह लेनिनवादी रवैया लोगों को रास न आए। किन्‍तु जिस तरह आज मुल्‍क के हालात हैं, उर्वर जमीन पर अपने श्रम के पसीने से देश का भाग्‍य लिखने वाले किसानों को जिस तरह पूँजीवादी ताकतों के गठजोड़ से चलने वाली सरकारें आत्‍महत्‍या के रास्‍ते पर ढकेल रही हैं, ऐसी  स्‍थिति में अदम का कहना नावाजिब नहीं लगता। आज भी अस्‍सी फीसदी ग्रामीण भारत के करोड़ों किसानों को उनकी लागत तक का मूल्‍य नहीं हासिल होता जबकि कारपोरेट घरानों के उत्‍पाद की कीमत बेलगाम बढ़ जाती है। उदारीकरण के युगारंभ के बाद से देश की खुशहाली का प्रोपेगंडा बेशक बड़े पैमाने पर किया गया हो, किसानों मजदूरों की स्‍थिति उत्‍तरोत्‍तर दयनीय ही होती गयी है। सरकार ने विनिवेश के जरिए कमाऊ कंपनियों को भी निजी क्षेत्र में सौंपने की जो मुहिम चलाई है उससे सिर्फ पूँजीपति घरानों को लाभ मिलता है। किसानों की उपजाऊ जमीन भी औद्योगीकरण के नाम पर मामूली दर पर पूँजीपतियों को देने की जो उदारता सरकारें दिखाती हैं उसके पीछे दरअसल मोटी कमाई का ही स्‍वार्थ है। बीज,खाद, पानी पर किसानों की निर्भरता का फायदा भी सरकारें उठाती रही हैं किन्‍तु देश की खुशहाली के लिए जिस क्षेत्र को सबसे ज्‍यादा आत्‍मनिर्भर बनाया जाना चाहिए था उसे लगातार उपेक्षित रखा गया है। यही वजह है कि देश के तमाम हिस्‍से एक तरफ नक्‍सलवाद की समस्‍या से ग्रस्‍त हैं दूसरी तरफ अलगाववादी ताकतें सिर उठा रही हैं। सत्‍ता-व्‍यवस्‍था चौतरफा भ्रष्‍टाचार में डूबी और निर्धन जनता के निवाले छीनने पर आमादा है। ऐसे ही हालात में अदम अपनी आखिरी ग़ज़ल में यह लिखना नही भूले कि :

मोहतरम अन्‍ना हजारे आप कर पाऍंगे क्‍या/
ये शहर शीशे का है और संगदिल सरकार है।

अदम सपने देखने वाले कवि नहीं हैं। वे हकीकत की जमीन पर खड़े होकर बात करते हैं। जिस तरह के हालात पिछले दशकों में देश के रहे हैं कवि जनता के बीच में रह कर राग और रोमान की बातें नहीं कर सकता। वह भोग और ऐश्‍वर्य को पीठ दिखाने वाले कवियों में हैं। उनके सरोकारों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है जब वे खुद पूछते हैं—‘घर में ठंडे चूल्‍हे पर अगर खाली पतीली है/ बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है।अदम उस भोली भाली दुनिया के नागरिक थे जो खेती किसानी में रमा रहता है। देश के योजनाकारों से होती हुई कोई योजना उसके गॉंव तक पहुँचती भी है तो इतने बंदरबाट के बाद रुपये में दस पैसे ही पहुँच पाते हैं। फिर भी गोंडा जैसे पिछड़े जनपद के धूलधूसरित गॉंव में रहते हुए उन्‍होंने जो भी लिखा उसमें हमारे समय के विचलनों की सच्‍ची तस्‍वीर नुमायॉं है। देश के जननायकों का हाल उनसे छुपा न था। यह उनकी दृष्‍टि में चमचों, माइक और मालाओं से घिरी रहने वाली कौम है। लिहाजा इन सबके लिए उनके मन में कोई आदर न था। उनकी आवाज में जनता जनार्दन की आवाज़ सुन पड़ती है।

जिस देश में इतनी दुरवस्‍थाऍं हों, आर्थिक परतंत्रता से बाहर आने की जनता में अनवरत तड़प हो, हाथ में छाले और पैरों में बिवाई हो, फाके में गुजरती शामें हों, ऐसे ही हालात में मुक्‍तिबोध, धूमिल , दुष्‍यंत, पाश, गोरख पांडे और अदम गोंडवी जैसे कवि पैदा होते हैं। अपनी गजलों में उन्‍होंने इसलिए अपनी परंपरा और सरोकारों के पक्षधर कवियों को याद किया है। कबीर की भाषा उन्‍हें जुलाहे की कमान सी तनी नजर आती है तो वामपंथी नागार्जुन उन्‍हें भीतर से उद्वेलित करते हैं। अदीबों की नयी पीढ़ी से वे धूमिल की विरासत को करीने से सहेजने की गुजारिश करते हैं। ऊपर से देखने पर अदम की गजलों की थीम में एक तात्‍कालिकता-सी दिखती है किन्‍तु अपने समय के सच को लिखने वाला कवि ही जनता में समादृत होता है। कबीर ने अपने समय के पाखंड को लिखा तो मुक्‍तिबोध ने अपने समय के पाखंड को। दुष्‍यंत की जलते हुए वन का वसंतकी कविताऍं नहीं, ‘साये में धूपकी गजलें मकबूल हुईं क्‍योंकि आपातकाल की तल्‍खी उनकी गजलों में मुखरित हुई है। अदम ने भी राजनीति और आम आदमी की नियति को अपनी शायरी के केंद्र में रखा। पर पता नही क्‍यों अपने आखिरी दिनों में राजनीतिक मुद्दों पर बात करने में कतराते थे। एक बातचीत की मुसल्‍सल कोशिश में वे मुझसे लगातार यही कहते रहे कि अब राजनीति पर बहुत हो चुका, अब साहित्‍यिक मुद्दों पर बात करें। बातचीत अंतत: नहीं हो सकी यह बात और है पर लगता है वे अब अपने आजमाए हुए रास्‍ते से अलग चलना चाहते थे। वे जीवित होते तो निश्‍चय ही गजलों में एक नई लकीर खींचते।



समीक्षक 
डॉ.ओम निश्चल
हिंदी के सुपरिचित कवि, नवगीतकार.
बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
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नई दिल्लीव-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,
ईमेल:omnishchal@gmail.com  
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7 टिप्‍पणियां:

  1. ओम जी बहुत-बहुत बढ़िया समीक्षा आनंद आ गया , अदम जी को तो जितनी बार पढ़ा जाय हर बार नया ही लगता है

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  2. कुँवर रवीन्‍द्र जी, इसे पसंद करने के लिए शुक्रिया। पर यह समीक्षा नही हे, यह स्‍वतंत्र आलेख है। आपके प्रीतिकर संदेश के लिए साधुवाद।

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  3. डॉ. निश्चल, इस खूबसूरत लेख में आपने अदम गोंडवी जी के समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व का खाका बड़ी प्रामाणिकता के साथ उकेर कर रख दिया है. वाह. अभिनन्दन.
    इस सुन्दर लेख के लिए ‘अपनी माटी’ को भी बधाई.
    कमलानाथ

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  4. प्रयास यही था कि अदम जी की शख्सितयत के ताने बाने को सुव्यिवस्थिकत तरीके से रख दिया जाए ताकि एक संक्षिप्तल आलेख में भी अदम की शायरी का आस्वाुदन और उनके कवि व्यकक्तिपत्वि की पूरी झलक मिल जाए। पसंद करने के लिए शुक्रिया।

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  5. आपकी इस मेहनत के लिए आपको कोटिश*नमन।

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  6. आपकी इस मेहनत के लिए आपको कोटिश*नमन।

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