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कीर्तिस्तम्भ(Tower of Victory):-स्वर्णिम इतिहास के गुमनाम पहलू /नटवर त्रिपाठी

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अक्तूबर 10, 2012 | बुधवार, अक्तूबर 10, 2012


नटवर त्रिपाठी
(समस्त चित्र स्वतंत्र पत्रकार श्री नटवर त्रिपाठी के द्वारा ही लिए गए हैं-सम्पादक )

चित्तौड़ के भाल पर दैदीप्यमान तिलक और भारत की कीर्तिपताका ‘कीर्तिस्तम्भ’ (विजयस्तम्भ) सुशोभित है। काफी पहिले बिजली गिर जाने से विजयस्तम्भ की पहली मंजिल क्षतिग्रस्त होगई। यह कीर्तिपताका एक बारिग हिल गई थी। मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह ने इसकी मरम्मत का बीड़ा उठाया और 1854 में इस पर नया मण्डप लगवा दिया।   

जगत प्रसिद्ध इस विशाल इमारत के कई महत्वपूर्ण पाट, बीम, पिल्लर, ब्रेकेट्स क्षतिग्रस्त हो गए। लगता था भगवान विष्णु को समर्पित कुंभा का यह पावन स्मारक अस्थिर हो गया था और धीरे-धीरे एक ओर झुक रहा है। मरम्मत आवश्यक थी। ब्रिटेन से गौरे इन्जिनियर बुलाये गये पर कोई ठोस उपाय नहीं सुझा पाए। महाराणा ने अपने कारिन्दों पर भरोसा किया। विजयस्तम्भ की मरम्मत का कार्य हाथ में लिया। 

पन्द्रह वर्ष पहिले स्व. रोडजी मिस्त्री अपनी उम्र के ढ़लान का हिसाब लगाते घर की हथाई पर धूप सेक रहे थे। वे साक्षी रहे 30 के दशक में विजयस्तम्भ के शिखर की मरम्मत के। उन्होंने अपने हाथों से कीर्तिस्तम्भ के भाल पर चन्दन का लेप किया। अपनी काया के सुधार की आस में माला फेरते उनकी नजरे मुझ पर पड़ी। आदर सहित अभिवादन के प्रतिउत्तर में उनके दोनों हाथ माला सहित उठ गए। बैठने का संकेत किया। मैंने कहा आपने विजय स्तम्भ की कई वर्ष मरम्मत की। उसके शिखर पर कार्य किया। चित्तौड़ दुर्ग के बीसियों स्मारकों का जीर्णोंद्धार किया। दुर्लभ मूर्तियों, स्तम्भों और पुरातात्त्विक महत्व के ठिकानों को सहेजा। आजन्म आपकी छिनी-हथौड़ी इन स्मारकों को आने वाली पीढ़ी को देखने समझने के लिए सुरक्षित किया। ऐसे में आपका योगदान प्रेरणास्पद और कर्मयोगी का है।  आज व नहीं हैं। पर उस आठ वर्ष पहिले जब मैंने उनके दर्शन किए तो रोडजी ने सहज भाव में टूटी-फूटी जबान में दो टूक बात कही। शरीर भले उनका अशक्त था परन्तु आवाज में गांभिर्य। उन्होंने कहा आज भी विजय स्तम्भ, मीरा मन्दिर या पौराणिक शिल्प स्मारक जैसी कृतियां उकेरी जा सकती है। निमार्ण की तकनीक मौजूद है। प्राचीन पुरातातत्वक स्थलों की मरम्मत आज भी बखूबी हो रही है। पर हर किस्म के निमार्ण का एक काल होता है। इस काल खण्ड में अभी की जरूरतों के ही स्मारक बनेगें। हां पुरातन का स्वरूप बनाए रखने के रास्ते सदा ही खुले हैे। 

विजयस्तम्भ की नौवीं और अन्तिम मंजिल की मरम्मत का ब्योरा देते हुए रोडजी ने बताया कि वे 55-60 वर्ष पुरातत्व के मन्दिरों, देवालयों, शिल्प स्तमभों और भग्नावशेषों की मरम्मत में लगे रहे। पर यह कोई विशेष बात नहीं। कई लोग करते हैं। पुरातत्व विशिष्ठ विषय है और इसकी अपनी विधा है। उन्होंने बताया कि राणा फतहसिंह ने अपने कार्यकाल में दुर्ग पर फतहप्रकाश राजप्रासाद बनवाया। इसमें अभी संग्रहालय हैं। इसी राजप्रासाद के निमार्ण समाप्त होते होते सन् 1928-29 में उन्होंने यहीं काम की शुरूआत की। रोजाना मजदूरी के दो आना ‘बारह पैसा’ मिलते थे। अपने बाप-दादा के पास काम सीखता था और दुर्ग का धवल राजप्रसाद बन गया तो विजयस्तक्भ की मरम्मत का कार्य प्रारम्भ हुआ। 

इस दौर में मेवाड़ के अन्तिम शासक भूपालसिंहजी थे। मरम्मत की योजना कार्यान्वित हुई। बड़ी भरी-भरकम पायड़े बांधी गई। विजयस्तम्भ की प्रत्येक मंजिल पर बांस के सहारे सहारे अत्यन्त ठोस मार्ग बनाया गया। इस कार्य में एक अंधे कोली की राय को माना गया। अंधे कोली की इस स्मारक के योगदान की भूमिका के विषय में आज भी कई लोग जानते हैं। दर्जनों मिस्त्रियों और और मजदूरों ने लगातार तीन चार वर्ष तक विजयस्तम्भ पर कार्य किया। बांस-बल्लियों और पायड़ों पर भारी भरकम क्षतिग्रस्त पत्थर लाव और मोटे-मोटे रस्सों पर उतारे और चढ़ाए गए। चैन पुली भी काम में ली गई। प्रमुख मिस्त्रियों में कुछ नाम है- उदयपुर से काशीराम एवं नाथू सुथार। चिाौड़ के किशनलाल, फूलचंन्द, नन्दराम, खुमाण, चतरभुज, नारायण, बोतलाल, खूबीराम, अम्बालाल, मांगीलाल, भंवरलाल आदि। इसकी मरम्मत भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की देखरेख व परामर्श से मेवाड़ के मिस्त्रियों ने की। रोडजी ने बड़े अदब से बताया कि विजयस्तम्भ के मण्डप को कवेलू ढ़ाल इस तरह दिया कि उस पर एक बूंद पानी की नहीं रूके। पहले मन्दिरों के समान कमल वाला शिखर था जिसके पुरानी पुस्तकों में भी प्रमाण हैं। नवां शिखर मूल शिल्प के समकालीन दृष्टिगोचर होता है। 

प्रमुख इतिहासवेता डा. गोपीनाथ शर्मा भी इस मरम्मत कार्य के दौरान यहां अध्ययन के लिए आए और अंघे  कोली के योगदान की पुष्टि करते हुए भारी-भरकम मचान बनाने की ताईद की थी। विजयस्तम्भ के रोचक और रोमांचक अनुभव बताते हुए रोडजी ने बताया कि बड़े-बड़े क्षतिग्रस्त पाटों को निकालना और ढ़ांचे को ज्यों का त्यों बनाए रखना उस समय सामान्य बात थी पर आज तो अकल्पनीय लगती है। आज सोचा जाय तो असंभव तो नहीं है परन्तु यह कार्य संकल्पित हौंसले वाला था। 

रोडजी ने बताया कि दुर्ग के प्रसिद्ध समिद्धेश्वर मन्दिर जो 7वीं शताब्दी का है की भी मरम्मत का कार्य किया। नोलख भण्डार के पास श्रृंगार चवरी, राणा रत्नसिंह के महलों के सभामण्डप, जटाशंकर महादेव, सातबीस देवरियां, महालक्ष्मी मन्दिर, कालिका मन्दिर और दुर्ग के ही अनेक छिट-पुट स्थलों की मरम्मत कीं। गौमुख की सीढ़ियां पानी में खड़े रह कर बनाने वाले कारीगारों में वे भी एक थे। इसकी तह में सास-बहू के दो चबूतरे बने हैं जिसका प्रमाण इसी दशक में गौमुख की खुदाई के समय मिला। रोडजी ने चित्तौड़ के अलावा जोधपुर, मण्डोर और मेनाल के पुरातत्व स्थलों के मरम्मत के कार्य भी किए। 

रोडजी को जीवन के आखिरी पड़ाव में भी इन स्थलों की ठीक करने की हूक उठती थी। उनका मानना था कि दुर्ग का इतना व्यापक कार्य है कि वर्षों पर्यन्त इसके रखरखाव और मरम्मत का कार्य करते ही रहना होगा। 

ऐसे ही एक और मिस्त्री भंवरलाल ने विजयस्तम्भ के प्रथम मंजिल के एलिवेशन का नक्शा बतलाते हुए कहा विजय स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो जाने से इसकी पहिली मंजिल को बड़े-बड़े शिलाखण्डों को मजबूती के लिए ढ़क दिया था जिसे बाद में खोला था। उनके पिता किशनलाल को सात-बीस देवरियां मन्दिर समूह के निमार्ण के पूर्णता के अवसर पर भेंट दी गई चांदी करण और गज दिखलाते हुए एक रोचक घटना सुनाई। चारों और यह सुना जाता था कि विजय स्तम्भ की इमारत क्षतिग्रसत होने से झुक रही है। जब राणा भूपालसिंह के कार्यकाल में इसकी मरम्मत का प्रश्न आया और मन्जिल एक ओर झुकने की पुष्टि चाही गई तो मिस्त्री किशनलाल ने टूटे हुए स्थानों पर बड़े-बड़े कॉच लगा दिए। कुछ समय बाद उसी मिस्त्री ने प्रमाणित किया कि विजय स्तमभ के किसी भी हिस्से में झुकाव नहीं हो रहा है। यह सूझबूझ उसी मिस्त्री की थी। स्व. मनोहर लाल मण्डलिया ने भी विजय स्तम्भ के सभी मंजिलों के नक्शे घोसुण्डा के कागजों पर बने थे, जिनको जगह जगह दीमकों ने नष्ट कर दिया बतलाते हुए कहा कि उनके पिता श्री फूलचंद किशनलाल जी मिस्त्री के सहयोगी थे और रोडजी उनके पास काम करते थे। 
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नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com 
नटवर त्रिपाठी

(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं। पूरा परिचय 



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