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''कविता का यह समय वैचारिक संक्रमण का समय है। ''-कालुलाल कुलमी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, दिसंबर 18, 2012 | मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

नई राहों की खोज करती कविताएं

कविता का यह समय वैचारिक संक्रमण का समय है। कविता एक विचार के सांचे से बाहर आकर कई विषयों  को अपने भीतर समाहित करने का कार्य कर रही है। वह अपने ही ठहराव को खत्म कर रही है। प्रगतिशील विचार के प्रति जिस तरह का आकर्षण एक समय में था वह,वहां से कईं दिशाओं में गया और उसने समाज के उन पक्षों पर विचार करना प्रारम्भ किया जिनको वह खारिज करता रहा था। असल में किसी सीमा रेखा में बंधकर संवेदना का विस्तार नहीं होता, बल्कि उसमें ठहराव आता है।

बुरे दिनों में मुकेश चतुर्वेदी का कविता संग्रह है। इसका किताब के रुप में भी भिन्न कलेवर  और फ्लेवर है। कविताएं कई तरह के संदर्भो के साथ आती है। कविताओं का यह संदर्भ समाज के तमाम अंध संसारों में प्रवेश करता है जहां वह पहले प्रवेश नहीं कर पायी थी। वैसे इस बात पर बहुत गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए है कि माक्र्सवाद के नक्सल आंदोलन से साथ जो पीढ़ी आयी थी वह कहां गुम होती गई और उसके बाद इसके पति लगातार मोहभंग होता गया। उसके बाद भारतीय राजनीति में दलित राजनीति और दलित बुद्धिजीवियों की खेप आती है। कांशीराम जैसे नेता इस देश की परम्परागत राजनीति और सामाजिक सोच को बदलते हैं। जिसमें जाहिर है वे पिछड़े लोगों के सहारे यहां के समाज को उसकी शक्ति का अहसास कराते हैं। वह परम्परागत राजनीति जिसके सहारे समाज का कमजोर वर्ग सपने देख रहा था वह यही से नयी दिशा ग्रहण करते हैं। उसका प्रभाव समाज में देखा जा सकता है।

आजादी के इतने वर्षों बाद समाज जिस तरह से बदला वह मुख्यधारा की राजनीति को चुनौती देती हुई यह हाशिएं की राजनीति केन्द्र में आती है। ये कविताएं इसी तरह के सवाल उठाती है। जिस विचार का एक सदी तक इतना दबदबा था वह स्वयं ही खत्म हो गया। हत्या और हिंसा के साथ वह अपने ही लोगों को मारता रहा। अपने ही लोगों के साथ छल करता रहा। वहां आप अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते। आपको रहना तो पार्टी के अनुसार ही है। वहां अनुशासन के बाहर क्या था। जीवन के नानाअनुभव कविता में वहां कई कारणों से नहीं थे। जहां जीवन का अहसास होता है वहां मनुष्य का दुख होता है उसकी सघन अनुभूतियां होती है। औरत की दुनियां कितनी विचित्र होती है। उसके साथ सब होते हैं फिर भी वह अकेली होती है?

आंगन में गुडि़या से खेलती/तब बच्ची थी/लड़की अकेली थी
घर-गृहस्थी में/मां का हाथ बंटाती/पढ़ के लौटे भईया को
खाना परोसती/लड़की अकेली थी

उसका अकेलापन उसका नहीं है। उसको दिया गया अकेलापन है। जहां वह किसी से जुड़ती है तो उसका अकेलापन खत्म होता है लेकिन उसके पास अकेलेपन के अंधेरों के अलावा है भी क्या? वह कहां जानती है देश और दुनियां की बाते। उसको तो केवल उतना ही करने को कहा गया जितना किसी को उसकी जरुरत है। उसकी क्या जरुरत है इसके बारे में वह कहां जान पायी और कहां उसको उसका अवसर मिला।

इंसान जितना सुखी अपने संघर्ष के दिनों में रहता है उतना वह आराम के दिनों में अपने स्वार्थों में डूब जाता है। उसके पास अपने लिए वक्त रहता है पर अपनो के लिए नहीं रहता। वह अपनी ही दुनियां में भ्रमित हो जाता है।

बुरे दिनों में/ कितने करीब थे हम/दुःख नहीं करता था दुःखी
कष्ट नहीं देते थे कष्ट/अभावों के दिन थे/पर/
किसी चीज का/ अभाव नहीं खलता था
....
संपन्न समय में अब/कहां है सुखी
सुविधाओं के बीच भी/अभाव महसूसता है
बहुत याद आती है तुम्हारी/दोस्त/तुम बहुत याद आते हो

इंसान जिस राह से गुजरता है वह राह अगर दुखों की है तो उसे हमेशा याद रहती है। दुख सब को माझता है। अज्ञेय की यह पंक्ति सही है कि जो उससे गुजरता है वह दूसरों के लिए रास्ते बनाता है। वह अपने ही सुख में खो नहीं जाता है। वह अभावों को अपने भाव बनाता है तो आनेवाली नस्लों के लिए रास्ते तैयार करता है। यही उसका समाज कर्म होता है। यही उसका अपने लोगों से जुड़ना होता है।

इस संग्रह की कविताएं समाज को बदलने का विजन प्रदान करती हैं। अपने आसपास को देखने और समझने और उसको अपनी सामर्थ के अनुसार बदलने का सामर्थ देती हैं। जहां समाज में विदू्रपताएं हैं वहां समाज को बदलने का साहस रखनेवाले लोग भी है। जिस समाज में तमाम तरह की विडंबनाएं हैं वहां बहुत कुछ करने को भी है। कोई एक व्यवस्था अगर अपनी ही कमजोरियों से खत्म होती है तो उसके विकल्प भी तैयार होते रहते हैं। वैसे भी इतिहास का निर्णय सर्वोपरि होता है। इस देश का समाज जिस तरह से अपने प्रति सजग हो रहा है वह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। समाज का परिवर्तन सतत चलता है।े उसको किसी तिलस्म से तत्काल बदलने का दावा हमेशा खोखला होता है। इसको समझना आवश्यक होता है। जहां सदियों से ज्ञान का प्रकाश नहीं है वहां अगर कुछ ही समय में बदलाव की बात की जाए तो वह बहुत बड़ा विभ्रम ही होगा। मुकेश इसी तरह की बात अपनी कविताओं में करते हैं। परिवर्तन के लिए बहुत सी राहें हैं। जिनको आजमाना बहुत जरुरी है।

इन कंटीले रास्तों पे/हम जो चलते जाऐंगे
देखना/एक दिन-/काफिले बन जाऐंगे।

मुकेश की कविताएं सघन निराशा के क्षणों में बहुत बड़ी उम्मीद जगाती हैं। उनकी कविता पढ़ते हए राजेश जोशी की कविता याद आती है। काम पर जाते बच्चे। जो बच्चे काम पर जाते हुए बढ़ रहे हैं उनका भविष्य क्या होगा! बढ़ते हुए बच्चे, भविष्य में, खुद को बदलना, बेहतर दुनियां के लिए, है अकेला आदमी क्यों जैसी कविताएं संग्रह को बहुत महत्वपूर्ण बनाती हैं। कविताएं नाटकीय संवादों की तरह है। यह रचनाकार के जीवन और कार्य क्षेत्र का प्रभाव है। जिसको उनकी रचनात्मकता ग्रहण करती है। जिसके कारण कविताएं अपने आसपास को अभिव्यक्त करती है और अपने समाज को बदलने की अदम्य शक्ति देती हैं।

कविता संग्रह : बुरे दिनों में
मुकेश चतुर्वेदी
सूत्रधार प्रकाशन,सवाई माधोपुर
प्रस-2011
मूल्यः 50 रुपये
डॉ.कालूलाल कुलमी
युवा समीक्षक
ई-मेल:paati.kalu@gmail.com

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2 टिप्‍पणियां:

  1. aap ki lekhni bahut hi sahi hai. aap ko badhaaee.santosh gangele

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  2. कविताएं अपनें आसपास की अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम बनकर विचार पैदा करती है । चिन्‍तन और मनन से जो बदलाव आते है वो रूढि़यों को पार कर जाते है और समाज का चिन्‍तन का दायरा बढ़ाती है । आपना विश्‍लेषण सार्थक और सोचनें पर मजबूर तो करता ही है । साथ में समाज में चिन्‍तन के दयरों का बढ़ाता है । पढ़कर काफी अच्‍छा लगा, मजा आया ।

    उत्तर देंहटाएं

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