माणिक की कविता 'वक़्त नहीं बदलता हमारे लिए' - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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माणिक की कविता 'वक़्त नहीं बदलता हमारे लिए'

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

चुनिन्दा लोगों के हित 
टिक टिक करती है ये घड़ियाँ 
वक़्त नहीं बदलता 'हमारे लिए'

वक़्त है कि गुजारिश करता है
बहुत से बाकी रहे कामों के साथ
हाँकता है हमी को

डांटता है
'फुरसत' के चंद पलों की मांग पर
हड़काता है हमें इस कदर 

मानो
हमारे न चलने से
रुक जायेगी देश की प्रगति

किसी की जेबें खाली रह जायेगी
आ जाएगा फरक
आमदानी में किसी के

ग़र हम रुक जाए पलभर भी
ज़मीन पर
चलते-चलते लें-लें इत्मीनान की साँसे

ये कम फीसदी लोग
गालियाँ देने लगेंगे
हम अधिसंख्य को

अजीब वक़्त है यारों

वो 'कुछ' होकर भी अधिपति हैं
और 'हम' बहुसंख्य होकर भी
दया के पात्र

अज़ीब वक़्त है 



माणिक 
अध्यापक

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