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इतिहास के आईने में चित्तौड़ दुर्ग

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, फ़रवरी 14, 2013 | गुरुवार, फ़रवरी 14, 2013

     (ये आलेख आकाशवाणी चित्तौड़ द्वारा रेडियो किसान दिवस पर योगेश जी कानवा के संपादकत्व में प्रकाशित एक स्मारिका में छप चुका है.वहीं से साभार यहाँ फिर से प्रस्तुत है-सम्पादक )


इतिहास के आईने में चित्तौड़ दुर्ग
(आलेख-माणिक)
छायाचित्र सौजन्य-रमेश टेलर,चित्तौड़गढ़



विजय स्तम्भ की चित्राकृति पर नज़रें ठहरते ही चित्तौड़ का-सा शहर जेहन में आता है। श्यामल दास की कृति वीर विनोद और कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तकों में चित्तौड़ को बेहतर ढंग से आंका गया है। इस मझोले किस्म के शहर का विचार तब ज़रूर आता है जब हम तथ्यों से अटे इतिहास को उचिंदने बैठते हैं। ऐसे में हमें खुद को उस अतीत बोध की तरफ ले जाने की कोशिश करनी चाहिए जहां विश्व का सबसे लंबा राजवंश मेवाड़ अपने वैभव के साथ आज भी इमारतों के बीच सांस ले रहा है। अतीत मोह से दूरी बनाए रखते हुए ग़र हम दुर्ग चित्तौड़ पर रतन सिंह महल के शिल्प से लेकर आधुनिक चमक के साथ खड़े फ़तेह प्रकाश महल तक की कारीगरी को देखे तो एक लम्बी यात्रा से गुजरेंगे। जहां एक तरफ 13 किलो मीटर की परिधि में बनी मजबूत दीवार हमारा ध्यान खींचती है वहीं चित्तौड़ के अधिकाँश मंदिरों के ज़रिए हमारा परिचय निर्माण की नागर शैली से होता है। वैसे अरसे से सीताफलों के लिए प्रसिद्द चित्तौड़ दुर्ग में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहाँ के अचरज भरे महल, गोखड़े, बुर्ज,  दरवाजे पर्याप्त हैं। वैसे भारी संख्या में शिवालयों और जलाशयों के नाम से पहचान रखने वाले इस चित्तौड़ के गो-मुखी कुंड का चित्र अपने लोकप्रिय अंदाज़ में हमेशा सभी को सुहाता रहा है। अपने पुरानेपन के साथ यथासमय होती सार संभाल के कारण ये दुर्ग आज भी अपनी जंगी इमारतों के ज़रिये हमारे लिए अचरज करने का मुक्कमल बहाना है।

ये भी सच है कि वक़्त के साथ हर नगर की संभ्यता और संस्कृति अपनी पहचान के नए प्रतिमान खड़े करती है। जीवन शैली में भी यथासमय सुविधाजनक बदलाव आते ही हैं। इस कथन के प्रभाव से चित्तौड़ भी अछूता नहीं रहा। गुप्त काल के प्रमुख केंद्र नगरी के नाम से प्रसिद्द चित्तौड़ क्षेत्र, अपने सालों के इतिहास के बहुत से ख़ास हिस्सों को आज भी कमोबेश रूप में ज्यों का त्यों हमारे सामने रखे हुए है। बप्पा रावल और चित्रांगद मौर्य जैसे खासे चर्चित पुरुषों के नाम से चित्तौड़ की कहानी शुरू होते हुए हमने बहुतों बार सुनी है। ईसा की सातवीं शताब्दी से लेकर आज तक इस चित्तौड़ ने कई लोकप्रिय किरदार अपने साथ जोड़े रखे हैं। भले त्याग-भक्ति और जौहर की ये स्थली अपना आवरण बदलते हुए धीरे-धीरे सीमेंट जोन में बदल रही है मगर हमें इस बात का अच्छे से अहसास है कि इतिहास और संस्कृति ही तो हैं जो हमें अपनी जड़ों से उखड़ने नहीं देते। सोचने बैठो तो याद आता है कि सीसा, जस्ता, चुना  उपजने वाली इस भूमि पर चित्तौड़ी आठम का भी अपना इतिहास है। हालांकि जब भी हम नॉस्टेलजिक होते हुए अपने अतीत को सोचते हैं तो जुबां पर चित्तौड़ के उच्चारण मात्र से ही कई सारे नाम जेहन में आ जाते हैं। 

चित्तौड़ के ज़िक्र में कुछ शिलालेख भी शामिल समझे जाएँ जिनमें 200 ईसा पूर्व का बौध-जैन धर्म से जुडा नगरी शिलालेख, अश्वमेध यज्ञ को आधार देता घोसुण्डी शिलालेख, सन 713 ईस्वी का शंकर घट्टा शिलालेख,  मानमोरी का शिलालेख उनमें से कुछ हैं।मीरा जैसी प्रगतिशील कवयित्री की धरती पर मुनि जिनविजय जैसे मेहनती पुरातत्वविद भी हुए हैं।  कलाविदों को संरक्षण और प्रोत्साहन देने वाले महाराणा कुम्भा के साथ यहाँ दिल्ली को ललकारने वाले महाराणा राजसिंह का नाम भी उकेरना ज़रूरी है। रावल रतन सिंह, राणा सांगा जैसे नामों की सूचि में पद्मिनी, पन्ना, कर्मावती, फुलकंवर का ज़िक्र न करना आधी दुनिया के सन्दर्भ में गुस्ताखी होगी। जल्दबाजी में हम भूल जाते हैं कि ये धरती जैन मुनि हरिभद्र सूरी के अवदान से भी सिंचित है। यहाँ हुए युद्दों की चर्चा चलते ही जयमल राठौड़, फ़तेह सिंह सिसोदिया, गोरा बादल, कल्ला राठौड़ के किरदार याद आ पड़ते हैं। चित्तौड़ के ऐतिहासिक वैभव को ठीक अंदाज में समझने हेतु यहाँ ग्याहरवीं शताब्दी में बनी जैन सातबीस देवरी से लेकर कुछ वर्ष पहले शुरू हुए लाईट एंड साउंड शो तक को मनोयोग से देखे जाने की ज़रूरत है। चित्तौड़ शहर की तरफ से दुर्ग की चढ़ाई वाले रास्ते में पड़ते दरवाजों के साथ ही एक तरफ साथ-साथ चलती लम्बी दीवार हमें चिंतन के लेवल पर बहुत पीछे ले जाने में सक्षम नज़र आती है। वहीं दुर्ग के पिछले हिस्से में सूरजपोल गाँव से हेरिटेज वॉक के मार्फ़त लगभग ध्वस्त दरवाजों से होते हुए दुर्ग तक की चढ़ाई का अपना आनंद है।

जहां तक दुर्ग के आकर्षण की बात है इतिहास पर भारी पड़ते मल्लिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत जैसे साहित्यिक ग्रन्थ से लोग पद्मिनी के बहाने यहाँ तक खींचे आते हैं। कभी यहाँ धार्मिक पदयात्राओं के जात्री गो-मुख कुंड में स्नान को अपनी यात्रा का सबसे अहम् पड़ाव करार देते हुए आते रहे हैं तो बहुत से विदेशी यहाँ के पुरातात्विक महत्व वाले शिल्प से खींचे चले आते हैं। कभी देसी किस्म के साधारण लोग तो कभी प्रादेशिक संस्कृति से लबरेज बंगाली-गुजराती हुजूम। लिखने की इस भागादौड़ी में हम भूल नहीं जाएं कि दुर्ग पर स्थित परमार शासकों के हाथ का बनाया समिद्धेश्वर मंदिर देखने काबिल है। किले के दक्षिणी छोर पर बड़े भाग में फैला मृगवन इस दुर्ग की आभा को अपने तरीके से बढ़ाता है। यहाँ इस बात का भी ज़िक्र किया जाना चाहिए कि घोर नास्तिकों के लिए यहाँ शिल्प प्रधान इमारतें मायने रखती है तो धार्मिक आस्थावान पर्यटकों के हित यहाँ कालिका माँ, महालक्ष्मी मंदिर, कुम्भश्याम मंदिर, बाणमाता, अन्नपूर्णा देवी, नीलकंठ महादेव सरीखे मंदिर भी बने हुए हैं। समय के साथ आगंतुकों के लिए आधुनिक सुख सुविधाओं का भी विस्तार होने लगा है। गाईड, रेस्तरा, ऑटो, हेंडीक्राफ्ट, ऊँट घोड़ा सवारी जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ यहाँ पर्याप्त रूप से पार्क, पार्किंग, और स्टे फेसिलिटी भी विकसित हुयी हैं।

दुर्ग से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों की तरफ ध्यान जाते ही याद आता है कि यहाँ मध्यकालीन मेवाड़ युग में 1213-1253 तक रावल जैत्र सिंह नाम का प्रतापी शासक हुआ जिसने मेवाड़ की राजधानी आहड़ से चित्तौड़ शिफ्ट की। हमारे यहाँ ढंग के लोगों के अवदान को भूलने की परम्परा के चलते तीन सौ सालों तक राजधानी के रूप में रहे चित्तौड़ के तेजसिंह, समर सिंह जैसे रावल शासक बिसार दिए गए। सन 1303 में पद्मिनी पति रावल रतन सिंह के निधन के साथ ही मेवाड़ की रावल शाखा समाप्त हो गयी।फिर  1326 में   इस धरती पर हम्मीर सिसोदिया ने जालौर के राजा मालदेव सोनगरा को हराकर सिसोदिया वंश की स्थापना की जो आज तक चला आ रहा है। समय गुजरता रहा। साल 1433 तक इस बीच खेता, लाखा, मोकल जैसे राणा हुए जिनका अपना विस्तार और रोचक किस्से रहे हैं। मात्र 35 सालों के शासन में कलाप्रेमी कुम्भा ने हरफनमौला खिलाड़ी की तरह हर क्षेत्र में कीर्तिमान कायम किये। विजय स्तम्भ के निर्माण से लेकर जैन कीर्ति स्तम्भ का जिर्णाेद्धार इन्ही के खाते में शामिल होता है। दुर्ग पर बना कुम्भा महल आज भी कुम्भा के हित कई कहानियों को संजोये हुए है।

वीरों की ये परम्परा यहाँ ही विराम नहीं लेती है। रायमल, पृथ्वीराज उड़ाना, सांगा, उदय सिंह, प्रताप तक अनवरत चलती रही है। 1509 से 1528 के छोटे से कार्यकाल में ही महाराणा सांगा ने चित्तौड़ का नाम ऊंचा कर दिया। ये वही सांगा है जिन्होंने खातोली में इब्राहिम लोदी को हराया, गागरोन में महमूद खिलजी द्वितीय को और बयाना में बाबर को। बिना जीते देश नहीं लौटने के अपने प्रण के चलते खानवाह में बाबर से हारने के बाद मेवाड़ की सीमा में ताउम्र नहीं वाले सांगा ही थे। असल में ऐसे ही योद्धाओं से लबरेज है चित्तौड़ का इतिहास। सांगा यहाँ अपनी बहू मीरा के ज़रिये भी पहचाने जाने चाहिए। चित्तौड़ के किले को दो भाग में बांटती हुयी बनवीर की दीवार वाले बनवीर और कोई नहीं सांगा के भाई पृथ्वीराज उड़ाना के दासी पुत्र ही थे। इसी तरह पन्ना के अवदान को हर बार दर्ज करना हमारा दायित्व है जिसने उदय सिंह को बचाकर इस मेवाड़ी वंश को आगे के लिए हरिया कर दिया। आज भी पन्ना का कक्ष कुम्भा महल में देखा जा सकता है। साल 1559 में उदय सिंह द्वारा उदयपुर की नींव रखने के बाद चित्तौड़ पर मेवाड़ के शासकों ने बहुत कम समय बिताया। अफसोस महाराणा प्रताप के चित्तौड़ में निवास के अभी तक भी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।खैर।

पूरे राजस्थान में अपनी आत्मरक्षा के प्रतीक जौहर की अनूठी परम्परा रही है। प्रदेश में हुए साढ़े ग्यारह जौहर में से तीन बार तो चित्तौड़ में ही हुए हैं। पहला पद्मिनी, दूजा कर्मावती और तीसरा फुलकंवर के सानिध्य में हुआ था। इसी इतिहास में कई युद्धों की चर्चा होनी लाजमी है जब अल्लाउद्दिन खिलजी, बहादुर शाह और अकबर ने अपने सामरिक महत्व के चलते चित्तौड़ को जीतना चाहा। बाद के सालों में मेवाड़ का इतिहास उदयपुर, कुम्भलगढ़, गोगुन्दा, हल्दीघाटी, दिवेर, के इर्द-गिर्द ही बनता-बिगड़ता रहा। संक्रमण के दौर आते जाते रहे। प्रताप के मुसीबत के साथी भामाशाह का दान हमें किले में स्थित भामाशाह हवेली देखने की गुहार लगाता है। दिल्ली नवाब औरंगजेब को अपने होंसलों से चिढ़ाने वाले महाराणा राजसिंह द्वारा किले का दुर्गीकरण आख़िरी चर्चा लायक बिंदु है। 

समय के साथ मेवाड़ की राजधानियां बदलती रही। शुरू से नागदा, अल्लट , चित्तौड़, गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, चावंड, और आखिर में उदयपुर बनी। उन्हीं में से चित्तौड़ पर केन्द्रित इस पूरे आलेख में कोशिश की है कि हम किम्वदंतियों के चक्कर में नहीं पड़े। लम्बी सुरंगों, छीपे हुए खजानों और रात में भूत की बातें बेवज़ह लगती है। किसी बड़े शासक का केवल एक नारी पात्र के लिए चित्तौड़ पर हमला नितांत अविश्वसनीय लगता है। रजपूती परम्पराओं की माने तो पद्मिनी के आनन् को कांच में दिखावे की रस्म भारी घप्प लगता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि कल्पना के बूते बना साहित्य कभी भी इतिहास पर भारी ना पड़े। आओ चित्तौड़ के बहाने उस समाज सुधारक कवयित्री को याद करें जिसने आज से 500 सौ साल पहले ही प्रगतिशील कदम धर लिए। उन अधिसंख्य और अनाम भील-मीणाओं को याद करें जिन्होंने अपने राणाओं के एक कहे पर लड़ाइयों में अपना बलिदान दे दिया। आओ अतिशयोक्ति भरे बखानों की परम्परा से बचते हुए तथ्य विहीन मिथक तोड़े।

आज के परिदृश्य के लिहाज से ये दुर्ग अपने इलाके में बसी सालों पुरानी बस्ती से जीवंत लगता है। मंदिरों में पुजारी मिलेंगे, कुंडों  में नहाते बच्चे, सीताफालों की रखवाली करती औरतें, कलात्मक सामान और चने बेचकर अपना गुजारा चलाते परिवार यहाँ मिलेंगे। कमोबेश एक शांत इलाका है चित्तौड़। जिला मुख्यालय पर बने इस दुर्ग को ही एकमात्र आकर्षण मानना हमारी भूल होगी। इसी जिले में नगरी सभ्यता, मेनाल झरना, मंडफिया मंदिर, मात्रिकुण्डिया, गंभीरी बाँध, बेड़च संगम जैसे तीर्थ भी यहाँ है। बस्सी काष्ठ कला, फड़ चित्रकारी, गवरी लोक नाट्य, भवाई नृत्य, आकोला छपाई कला, गंगरार का चमड़ा उद्योग जैसा कला पक्ष भी इसी जिले का हिस्सा है। इस पूरे विवरण की असली खुशबू तो चित्तौड़ दर्शन से ही ठीक अनुभव हो सकेगी। इस धरा पर आप सभी का स्वागत है।


माणिक 
अध्यापक

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