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नई किताब:मैं एक हरिण और तुम इंसान / सुरेन्द्र डी सोनी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 31, 2013 | रविवार, मार्च 31, 2013

अप्रैल 2013 अंक                         
मैं एक हरिण और तुम इंसान
कविता संग्रह
सुरेन्द्र डी सोनी
संस्करण 2013
पेपरबैक/पृष्ठ. 144
मूल्य 70.00 रुपये मात्र
बोधि प्रकाशन, जयपुर
आवरण चित्र:
कुंअर रवीन्द्र
एक पाठकीय दृष्टि 



हरिण दौड़ता है...कभी बेलाग...कभी बेतहाशा..। कभी कुलांचे भरता अपनी मौज में, कभी प्राण बचाने को प्राण ही निचोड़कर पैरों में लिए हुए..। यह दौड़ना उसकी नियति है, विवशता भी, आनंद भी और व्येथा भी....। इंसान हरिण-मन की इस दौड़ को अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह से देखता और समझता है। 



सुरेन्द्र डी सोनी की कविता इसी दौड़ की कविता है। उनके अपने मन की कविता - जिसे मन से कहा गया, मन में रचा गया। कविता के होने और बचे रहने की चिन्ताइ से शुरु करके कवि जीवन की उन तमाम गलियों में टेर लगाता आया है, जहां भी उसके मन का हरिण उसे ले जाता है अपने पीछे-पीछे। जीवन से भरपूर गलियां हैं कहीं, सूखे कुंए-बावड़ी और कीचड़ भरे रास्ते भी हैं यहां...! वह किसी से बचता नहीं, किसी से कन्नी नहीं काटता...! जो है, वह जैसा है, अपना है और सच्चात है..। जीवन का हर वह रुप जो कवि को दिखता है, वह उसे निहारता है, उसे स्वी!कार करता है और सतत अपना बनाते जाने की प्रक्रिया के बाद व्यीक्त। कर देता है। इस क्रम में कितने ही अप्रिय क्षण आते हैं, जिन्हेंअ कहना अपनी ही निजता को उधेड़ना है, पर सुरेन्द्र इसे इस सहजता से कह देते हैं बिना किसी विचलन के...!

यह सहजता सायास गढ़ी नहीं जा सकती, इसीलिए कवि के भीतर की हलचल पूरी ईमानदारी से शब्दों में आ जाती है। रचनाकार यह भी जानता है कि अनुभूति जब अभिव्यलक्ति के स्तचर पर आती है तो उसके अर्थ खो बैठने का खतरा कम नहीं है। काग़ज़ उनकी बात का कफ़न ना बने, कहीं उनके भीतर का तूफान काग़ज़ पर आकर दम ना तोड़ दे, यह अभिव्यैक्ति की चिन्तान मात्र नहीं है, उस गहरे संकट का वक्त व्यज भी है जो मौजूदा समय में कविता के पूरे परिदृश्यय में छाया हुआ है। 

सुरेन्द्र डी सोनी
चुरू ,राजस्थान के सरकारी कोलेज में
इतिहास के प्राध्यापक हैं 
कविता कब संकट में आती है, यह जानना तभी संभव है जब कविता के सरोकार साफ़ हों। सुरेन्द्र डी सोनी निजी पीड़ाओं के कवि नहीं हैं, वह निजी पीड़ा के बहाने पूरे सामाजिक ताने-बाने को टटोलते हैं। दाम्पसत्य‍ के बीच दरकते विश्वास को संकेतों मे कहते हैं। कभी बरसों पुराने राज़ भी भरी अदालत खोल देते हैं- "जज साहब ने कहा/सबूत लाओ/दोनों के वकीलों ने/चाबियां निकाल-निकालकर/जज साहब की मेज पर रख दीं।" ...इस तरह संबंधों के सारे समीकरण सुलझे भी तो एक नए उलझाव के साथ। यह उलझाव कवि का असमंजस नहीं, समाज की विडम्बोना है जो किसी एक निर्णय के साथ खत्मे नहीं होती, एक स्तार पर मिटाई जाकर, अनेक स्तअरों पर शुरु हो जाती है। यही वजह है कि रचनाकार अपने लिखने के कारण को गिनाना नहीं भूलता- "हां लिखता हूं/इस दिल की बेचैनी को/कभी बुझाने के लिए/कभी भड़काने के लिए...।"

दिल की बेचैनी सिर्फ सामाजिक रिश्तो के बिखरने तक सीमित नहीं, वह जीवनानुभूतियों के विस्तार में उन सबसे प्रभावित है - जिसमें प्रेम है, मित्रता है, स्त्री का मन है और सभ्यसता के वे सब पड़ाव हैं, जहां आकर वह हमेशा या कि कहें बार-बार ठिठक जाती है। संस्कृ,ति और सभ्यीता के बीच की टकराहट बहुत स्थूऔल नहीं है इसलिए कविताओं में यह दो पंक्तियों के बीच की खाली जगह में पढ़ी जा सकती है- "ओह, गाड़ी तो बहुत लेट है/भीड़ से दूर जाकर/नए दोस्तय बनाएं/अगर चल रहा नेट है....।"

नए युग ने वह सब बनाया, वह सब दिया जो दूरियां मिटा दे....! वह सब पैदा किया जो दूरियों पर ही टिका है...! एक ओर से लकीर बनाते जाने और दूसरी ओर से मिटाते चलने पर यह यात्रा कहां जाकर ठहरेगी, कहना मुश्किल है। नेट पर हजारों-हजारों नए दोस्तद बन गए, ...और जहां जिस घर में साथ थे हम एक परिवार के लोग..., उनके बीच भींतें खड़ी हो गई। हर दीवार इन्सा्नियत का बंटवारा है, हर दीवार एक वक्ताव्यर है नई दुनिया के भीतर की सच्चाई को परत दर परत खोलता। सुरेन्द्र् डी सोनी का कवि पुराने और नए के द्वन्द्वर को पहचानकर चुप नहीं रहता, उसे आवाज देता है, खोलता है और बदलने की चुनौती देता है- “मशीन तुम्हेंच सिखा रही होगी जीना... मैं तो इसमें मरने की सहूलियत देखता हूं...।“

भोला है कवि का मन...! भोला न होता तो भला कवि-मन कैसे होता...! हरिण जैसा मन...दौड़ता है पर हमेशा मरीचिका में नहीं...! कभी-कभी सयाना होकर भी...! अभयारण्य! भी उसे अभयदान नहीं दे सकते तो दौड़ने के सिवा उसके पास विकल्पं है ही कहां..। यह विकल्पकहीनता हर उस व्य‍क्ति का हश्र है जो मौजूदा व्यडवस्था का भ्रष्टे अंग होना स्वीवकार नहीं कर रहा..। अपने ग्राम्यह जीवन की सहजता से परे होकर थोपी गई महानगरीय चाल को झेलता हुआ व्यवक्ति कहां से चला है, यह तो जानता है, ...अपनी जड़ें वह भूला नहीं है, लेकिन पहुंचेगा कहां, ..उसे नहीं पता....! उसे ही क्यों किसी को भी नहीं पता...!

सुरेन्द्र. डी सोनी की संवेदना का बहुफलकीय रचना संसार इन कविताओं में झलक भर को ही सही, दिखता जरुर है। एक बिन्दु. कैसे अपना गोला बनाता है और खुद इस गोले में घिरा दौड़ता हे, यह सूक्ष्मभ प्रस्थान बिन्दु उनका। कम शब्दों में पूरी कविता कहना वैसा ही है जैसे एक बिन्दु में वृत की गोलाई माप लेना, यह काम बखूबी कर पाए हैं वह...।

इसी कविता संग्रह से कुछ कवितायेँ

(1)सफ़र 

सफ़र 
नंगा होकर 
नाचने लगा 
बीच सड़क-

मुसाफिरों के चेहरों पर 
खीझ अच्छी नहीं .......। 


(2)लिखना क्यों 

हाँ लिखता हूँ ....
इस दिल की बैचनी को 
कभी बुझाने के लिए 
कभी भड़काने के लिए।

(3)दाम्पत्य 

रात की कोख से 
उठता है धुआँ
रोज़ ही रह जाता है कुछ
अधजला-सा।

(3)ठाठ 

मंदिर में आया है 
तो देख ज़माने के ठाठ-

आँख ही जो मूंदनी थी
तो घर क्या बुरा था .....?

संदीप उर्फ़ मायामृग
कवि
बोधि प्रकाशन जयपुर
के कर्ताधर्ता 

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