कविता: रवि कुमार स्वर्णकार - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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कविता: रवि कुमार स्वर्णकार

अप्रैल 2013 अंक
संस्कृतिकर्मी के तौर जाने जाते हैं
जनवादी विचारों से ओतप्रोत रवि 
वर्तमान में चित्तौड़गढ़ जिले
 के रावतभाटा में नौकरी पर हैं 
यदा-कदा कविता,कविता पोस्टर के ज़रिए 
साहित्य-संस्कृति जगत में बने हुए हैं.
उन्हें शिवराम जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी की 
वैचारिक विरासत भी मिली है.
उन्हें उनके ब्लॉग सृजन और सरोकार 
पर ज्यादा अच्छे से जाना जा सकेगा.

ravikumarswarnkar@gmail.com,
रावतभाटा,राजस्थान 

                          

(रोज़मर्रा की दौड़ में हमारे हाथों से रिपसते जा रहे जीवन की चिंता करती ये कवितायेँ हमें सोचने का ईशारा करती हैं।अफसोस बढ़ती हुयी इस रंगीन चकाचौंध में क्रमश: फीकी पड़ती हमारी संवेदनाएं अब हमें नहीं कचोटती हैं। कविता ही है जो हमारी होने पर लगातार प्रश्न करती है।ऐसा ही कुछ है रवि की कविताओं में-सम्पादक )


भूल भुलैया
औपचारिकताओं से लदा समय
एक अंतहीन सी भूल भुलैया में उलझा है
जहां दरअसल
आगे बढना और ज्यादा उलझते जाना है

तार्किकता से दूर
गणित का सिर्फ़ यही बचता है
हमारे मानसों में
संख्याएं हमें कहीं का नहीं छोड़ती
वे हमें गिनने की मशीनों में
तब्दील कर देती हैं

जोड़ बाकी लगाते हुए
हमारे लिए हर चीज़ सिर्फ़ साधन हो जाती है
और लगातार इसकी आवृति से
धीरे-धीरे हमारे साध्यों में
कब बदल जाती है
पता ही नहीं चलता

इस तरह चीज़ों में ही उलझे हुए हम
ख़ुद एक चीज़ में तब्दील हो गये हैं
और बाज़ार के नियमों से
संचालित होने लगे हैं

बच्चे पूछ रहे थे कल कि
यह मानवीयता क्या चीज़ होती है?

०००००



रंग

रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं
इसलिए भी कि
हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं

कहते हैं पशुओं को
रंग महसूस नहीं हो पाते
गोया रंगों से सरोबार होना
शायद ज़्यादा आदमी होना है

यह समझ
गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में
तभी तो यह हो पा रहा है
कि
जितनी बेनूर होती जा रही है ज़िंदगी
हम रचते जा रहे हैं
अपने चौतरफ़ रंगों का संसार

चहरे की ज़र्दी
और मन की कालिख
रंगों में कहीं दब सी जाती है

०००००



दीपावली फिर टल गई


आफ़ताब का दम भरने वाले
दिए की लौ से खौफ़ खा गए

आखिर ब्लैकआउट के वक्त
उनके ही घर से
रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम
वे कैसे उठा सकते थे

आफ़ताब के सपने संजोती
उनकी ओर ताक रही निगाहें
नागहां बौखला गईं
और चूल्हों की आंच को
राख में लपेट दिया गया

दीपावली
एक बार फिर टल गई

०००००



समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता


समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता

उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स

उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम

कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां

ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां

उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है


                         (यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।)

1 टिप्पणी:

  1. सच में ये आभास हर चिन्तनशील इंसान को बीते कुछ सालों में होता रहा है कि आज का आदमी मशीन में तब्दील होता जा रहा है। गणित के सवालों में उलझता हुआ जीवन अब अधबीच के इन हिचकोलों से खुद परेशान है।आपकी पहली कविता एक उद्देश्य को पूरती हुई साफ़ तौर पर सार्थक हुयी है ।-माणिक

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