डॉ. रमेश यादव की कविता:मेरे पुरखों ने किये हैं इतने लिंग-भेद कि मैं लिंग में भेद करना भूल गया हूँ - अपनी माटी

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मंगलवार, मार्च 12, 2013

डॉ. रमेश यादव की कविता:मेरे पुरखों ने किये हैं इतने लिंग-भेद कि मैं लिंग में भेद करना भूल गया हूँ

 यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


          (डॉ. रमेश यादव, हल्के हाथ से लिखी गयी अच्छी कविताओं के सृजक माने जाने चाहिए -सम्पादक )


(1) कितना सहज है


कितना
सहज है
शब्दों के भावों को पढ़ना
और
गढ़ना
रचना एक नया संसार
अपने ख्वाबों का 

कितना
आसान है
भावनाओं को छोड़ देना
समंदर के रेत पर
बनाने के लिए घरौंदा
सपनों का

कितना
आसान है
चाहत के स्पंदन से अनभिज्ञ
तारों को गिनना
और
खेलना लहरों से अठखेलियाँ

कितना सहज है
ज़िन्दगी के सहर में आने का वादा करना
दोपहर तक इतज़ार में बैठना
शाम ढले
दीपक जले
फिर बुझ चले 



(2) लिंग-भेद


मेरे पुरखों ने 
किये हैं 
इतने लिंग-भेद कि 
मैं 
लिंग में 
भेद करना भूल गया हूँ 

(3) फेसबुक की कविता

तुम फेसबुक की कविता हो 
मैं खेत-खलिहान की कविता हूँ 
लोग तुम्हें पसंद करते हैं 
और  
गाँव के लोग मुझे जीते हैं
अपनी ज़िन्दगी के रंगों में

 कविता और ताली

क्या कविता 
वह है जो 
ताली बजाने के लिए उत्साहित करती है   
या  
वह है 
जो लोगों के आँखों से 
मोती बन टपक पड़ती है

(4) मुझे बचाओ

एक दिन 
कविता चिल्लाई 
मुझे बचाओ 
बाज़ार से नहीं 
उनसे जो मुझे लिखते-पढ़ते हैं

(5)कवि

कवि कौन है 
वह 
जो लिखता है 
या वह 
जो लिखा हुआ पढ़ता है 
या फिर वह 
जिस पर लिखा जाता है

(6)भू-मंडलीकरण

कविता 
दुनिया का भूमंडलीकरण नहीं करती  
बल्कि 
गाँवों का भूमंडलीकरण करती है 

(7) श्रमिक

एक 
मैं हूँ जो 
कविता को ढोता हूँ 
एक वो हैं 
जो कविता को पढ़ते हैं 
मेरी पहचान एक श्रमिक की है 
और उनकी 
शहर के मशहूर कवि की... 


डॉ. रमेश यादव

(इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, मैदान गढ़ी,
नई दिल्ली स्थित पत्रकारिता एवं 
नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ में सहायक प्रोफ़ेसर हैं 
समसामियक विषयों पर निरंतर लिखते आ रहे हैं। 
अक्सर यथार्थपरक कविता करते हैं। 
संपर्क: E-Mail:dryindia@gmail.com 
Cell 9999446)

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