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कहानी:संकल्प / डॉ. अजमेर सिंह काजल

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 31, 2013 | रविवार, मार्च 31, 2013

अप्रैल 2013 अंक       (यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।)                  
डॉ. अजमेर सिंह काजल     
1068 सैक्टर-2 रोहतक 
हरियाणा  मो. 09416473332
अप्रैल का महीना लग चुका था। गर्मी का बढ़ता प्रकोप। कटाई का मौसम पूरे जोश पर था। गांव के लोग इसी अवसर की बाट देखते हैं। चार-छः महीने का अनाज और अगली फसल तक निफराम (चिंतामुक्त)। बीसियों साल गांव के इसी माहौल में पला-बढ़ा, दसवीं पढ़ा नानक अपने गांव की माटी का लोभ-लालच छोड़कर शहर में बस गया था। उसने यहीं पर एक छोटा सा घर बना लिया था। बहुत कोशिश की कि कोई नौकरी मिल जाए, लेकिन नहीं मिली। थक-हारकर उसने सफाई का धंधा पकड़ लिया था। 

शहर में किसी की जान-पहचान गांव जैसी नहीं होती। गाम में तो जात-बिरादरी के नाम से आदमी को याद करते हैं। यहां उसके काम की इज्ज़त कम जात की ज्यादा होती है। शहर में गांव जैसी अंधेरगर्दी नहीं होती। यहां माणस की कद्र उसके काम और उसके माणस होने से भी होती है। साहित्य में जिन पावन गावों की चर्चा होती आई है, उनका अस्तित्व नहीं है। अब तो सभी जगह असंतोष, तनाव की आशंका बढ़ती जा रही है।

नानक को शहर में आए दो वर्ष हो गए थे। उसमें जीवन जीने का होंसला  आ गया था। अनेक लोगों से उसका परिचय बढ गया था। आस-पास होने वाली सभाओं में जाने लगा था। अप्रैल माह में अनेक कार्यक्रम हो रहे थे। वह बाबा साहेब की जयंती के कार्यक्रम में शामिल हुआ था। पत्नी व बच्चे भी साथ थे। हजारों की भीड़ थी। पंचशील के झण्डे फहरा रहे थे। जय भीम के जयकारे लग रहे थे। बुद्ध और भीम के गीतों से माहौल में लहरियां उठ रही थीं। लोगों में गजब का उत्साह था। यह इनका सबसे बड़ा त्योहार था। यहां भाषण चल रहा था। ‘‘आज़ादी के बाद भी हमें आज़ादी नहीं मिली है। इस पर सोचो। क्यों? क्या कारण हैं? सारा देश जाग गया। हम नहीं जागे। कब जागोगे? कब छोड़ोगे ऐसे काम जो इंसानी गरिमा छीन लेते हैं। जब इन्हें छोड़ोगे तभी इंसान बनोगे। तभी सम्मान मिलेगा। अज्ञानता में पड़े लोग सदियों से बिलबिला रहे हैं। इन्हें सोधी (होश) नहीं आई। खूब तालियां बजीं। नारे लगे। एकता की कसमें खाई गईं। सभा समाप्त हो गई। लोगों ने घरों की राह ली।

भाषण सुनने-सुनते नानक का मन सिहरने लगा था। पैर फड़फड़ाने लगे थे। उसे पिता याद आए। वे कहते-कहते चले गए कि तुम इस धंधें को मत करना। उनकी मौत के बाद नानक के भाईयों ने किसी न किसी तरह अलग धंधे अपना लिए। नानक उसी धंधे में पड़ा रहा। उसमें जीवंतता तो थी लेकिन अन्य कार्यों में हाथ डालने से डरता था। कहीं नुकसान न हो जाए। कहीं लोग अपमान न कर दें। साथ ही उसका दिमाग आज की विचारोतेजना में ही घूमता रहा। अनेक प्रश्न उठे। तृप्त हुए। रह-रह कर पिता की बातें याद आईं। थोड़ी देर बाद सब भूल-भाल गया। किसी को नहीं मालूम स्मृति में पड़े बीज कब पल्लवित हो जाएं। समय बलवान है। उसके प्रवाह को रोक पाना किसी के बूते की बात नहीं। 

नानक ने दोनों संतानों को प्राईवेट स्कूल में दाखिला दिलवा दिया था। सफाई के काम में वह रम गया था। कभी-कभार मन उकताता। बेचैनी होती। पर भूख की चिंता उसे वहीं ले जाती। बस्ती के अधिकतर लोग सीवर की सफाई का धंधा करते थे। सौ-दो सौ के लिए जिंदगी को मौत के हवाले कर देते थे। कभी-कभार तो एक बोतल दारू में ही काम निबटा देते। नानक को बुरा लगता। वे कुछ न कर पाते। न अपने औजार छोड़ पाते और न ही उनसे छुड़वा पाते। वह समझता-समझाता। पर जिन्हें फालतू की बात कहकर भूला दिया जाता। नानक पास की कॉलोनी में काम-धंधा करता था। पत्नी भी काम में सहयोग देती। 

रविवार का दिन था। सांय के चार बजे थे। कॉलोनी के एक मकान का सीवर बंद था। उसमें नंदी का परिवार रहता था। उसने बस्ती से नानक को बुलाया। वह घंटे बाद आया। नंदी ने काम के रुपए पूछे। उसने पांच सौ मांगे। नंदी ने इन्हें ज्यादा बताकर मना कर दिया। दो सौ देने की बात पर नानक ने साफ मना किया। काम करवाना है तो इतने ही लगेंगे। नंदी की पत्नी घर के अंदर थी। उसने नाक पर लत्ता बांधा था। उसके हाव-भाव से मालूम हो रहा था कि वह यहां की दुर्गंध से दुःखी है। उसने काम जल्दी करने की कहते हुए पति की ओर देखा। आंखों से इशारा किया सीवर जल्दी खुलवाओ। मोलभाव होने लगा। मुंहमांगे पैसे न मिलने पर नानक लौट आया। नंदी ने उसे ललकारा था। ‘‘तू सीवर साफ करने के नाम पर हमारा शोषण कर रहा है। नहीं देंगे तुम्हें पांच सौ रुपए। खुद ही कर लेंगे। भागो यहां से।’’

दम्पति ने मुंह पर चुन्नी बांध ली थी। वे ऐसे तैयारी कर रहे थे जैसे युद्ध में जा रहे हों। इनके पूर्वजों ने युद्ध लड़े थे। लेकिन यहां युद्ध का कोई मैदान नहीं था। सीवर से युद्ध लड़ना था। पति-पत्नी ने एक दूसरे को देखा। नंदी ने कहा, ‘‘अभी खोल देते हैं इसे। इसमें क्या है? ये लोग तो जरा भी झुकने को तैयार नहीं। हम खोलेंगे सीवर।’’

वे दृढ़संकल्पी हो आगे बढ़े। घर के बाहर आंगन में दरवाजे के अंदर ही सीवर का ढक्कन था। उसके आस-पास गंदगी जमीं थी। लोहे की छड़ पकड़े नंदी ने सीवर के ढक्कन के गड्ढे में इसे धकेलना चाहा। धकेल दिया। ढ़क्कन हटाने के लिए जोर लगाया। पत्नी ने भी सहयोग किया। सफलता नहीं मिली। जोर लगाने के बावजूद वे इसे जरा भी नहीं डिगा पाए। परास्त योद्धा की जानिब वापस मुडे़। सीवर को पीठ दिखा कर लौटना युद्ध में हार जैसा जान पड़ा।

तभी एकाएक नंदी में जोश भर आया। हाव-भाव से लग रहा था कि अबकी बार सीवर के ढक्कन को हटा कर ही दम लेंगे। अंदर रुकी गंदगी को बहा देंगे। संघर्ष करने को तत्पर पति-पत्नी ने एक बार फिर से धावा बोला। कोशिश की। थोड़ा हिला। फिर जोर लगाया। एक किनारा हिला दिया। तभी एक झटके के साथ खुले ढक्कन के नीचे से मल बहने लगा। ढ़क्कन का दबाव हटते ही दुर्गंध का एक झौंका उठा जो बंद नाक को खोलकर दिमाग तक जा पहुंचा। दोनों जोर से चिल्लाए। हटो! हटो! पीछे हटो! जब तक वे पीछे हटते तब तक गंदगी के छींटे उनकी आंखों-माथे पर जा पड़े थे। कपड़े सन चुके थे। दोनों अपने हथियारों को वहीं डालकर बाहर की तरफ भागे। बाहर निकलते ही उन्हें अपमान का बोध हुआ और आंखे छिपाकर अंदर दौड़े। ज्यों ही फर्श पर पैर रखा, फिसलकर जा पड़े। पत्नी पीछे-पीछे थीं। उसने पति को पकड़ना चाहा। पर बचा न पाईं और स्वयं भी उनके साथ जा गिरीं। गंदगी से सने फर्श पर पड़े-पड़े अर्ध बेहोशी की मुद्रा में दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। क्या देख रहे थे? क्या सोच रहे थे? पांच सौ रुपए बचाने की कीमत या फिर इस काम की जधन्यता, गंभीरता या इसके जातिशास्त्र को।

अपने को इस स्थिति में पड़े देखकर नंदी के होशो-हवास उड़ गए थे। उसने पत्नी से कहा- ‘‘यह काम तो बहुत जटिल है, हम तो इसे कुछ नहीं समझते थे। आज मालूम हुआ यह तो सबसे भयंकर काम है। दोनों जल्दी-जल्दी उठे। दरवाजा बंद करने को चले। घर-आंगन में पसरी गंदगी से नंदी का तन-मन धिक्कार उठा। अंदर से आवाज आई-‘‘क्या करने चला था कमीने? क्या मिला?’’ 

फिर बोल उठा-‘‘ यह नहीं हो सकता। चाहे एक लाख देने पड़ें फिर भी कम हैं इस दुर्गंध के आगे। यह काम नहीं हो सकता। ये तो एक बोतल शराब में ही इसे कर देते हैं। इनके दिमागों में गंदगी रच-बस गई है। इन्हें इसका एहसास नहीं। यदि मैं इन्हें समझाऊं तो यह सब फिर करेगा कौन? मुझे क्या पड़ी है?’’ 

तभी उन्हें गली में नानक आता दिखाई पड़ा। देखकर दोनों चिल्लाए ‘‘वो आ गया! वो आ गया!’’ तब तक वह भी दरवाजे तक आ चुका था। दरवाजे पर उठ रही दुर्गंध से उसे मचलन हुई। उसने नंदी दम्पति को निहारा। उन्हें इस हाल में देखकर उसे सदमा लगा। आखें खुली की खुली रह गई। यह सब क्या हुआ? क्यों हुआ? 

नंदी उसके आगे हाथ जोड़कर खड़ा था। ‘‘हमें मुक्ति दिलाओ। तुम्हारे काम की कीमत का हमें अंदाजा नहीं था। तुम जो मांगोगे वहीं देंगे। हमारा काम कर दो।’’ 

उनकी आंखों में याचना भाव था। नंदी ने कहा-‘‘नानक तुम्हारी वजह से हमारा यह हाल हुआ है। चलो अब कर दो इसे।’’ 

नानक पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह यों ही खड़ा-खड़ा उन्हें देखता रहा। नंदी की पत्नी ने जोर देकर कहा-‘‘कर दो अब सफाई। खोल दो सीवर। हम पूरे पैसे देंगे। एहसानमंद रहेंगे।’’

‘‘ले ले चलो पांच सौ?’’ उसके स्वर में मनुहार था। नानक के मन में भाव जागा। अब आया ऊँट पहाड के नीचे। कामकाजी लोग पहाड़ हैं, लेकिन ऊँट अपने से बड़ा किसी को नहीं मानता। कहीं फंस जाए तो बचने के लिए कुछ भी कहने लगता है। यही ऊँट की फितरत है।

 नानक ने दृढ़संकल्पी होकर कहा- ‘‘नहीं! नहीं! मैं नहीं कर सकता। इतने रुपयों में।’’

‘‘तुमने ही तो मांगे थे पांच सौ।’’ नंदी की पत्नी ने कहा। 

‘‘ले लो पांच सौ और हमें मुक्त करो।’’ नंदी ने कहा। 
नानक ने कहा -‘‘नहीं होगा मुझसे यह काम।’’ 

‘‘अरे! और फिर कौन करेगा यह।’’ नंदी की पत्नी ने दबाव बनाने के लिए प्रश्न उठाया।
 नानक के मन से आवाज आई ‘‘जब तुम यह काम नहीं कर सकते तो मैं क्यूं करूं।’’ 

‘‘तुम तो सदा से करते आ रहे हो।’’ नंदी ने कहा।
 ‘‘हमारे बुजुर्गों ने शताब्दियों से ये धंधे किए हैं और शताब्दियों से तुमने सत्ता का रौब चलाया है। अब यह 
बदलना चाहिए।’’ नानक ने कहा। 
‘‘ये बातें बाद में कर लेंगे। पहले ये कर दो। नंदी की पत्नी ने कहा। 

उसने नानक के अंह भाव को तुष्ट करने के लिए फिर कहा - ‘‘चलो तुम सात सौ ले लो, कर दो इसे।’’ 
नानक टस से मस नहीं हुआ। उसने कहा ‘‘मैं नहीं करूंगा यह काम। गंदगी तुमने फैलाई है तो सफाई मैं क्यों 
करूं?’’ 
‘‘चलो मैं तुम्हे एक हजार देता हूँ खोल दो सीवर।’’ नंदी ने कहा।

‘‘नहीं! नहीं! यह घृणित काम मैं नहीं करूंगा।’’ नानक ने कहा।
‘‘चलो पंद्रह सौ दूंगा। अब तो खुश हो। चलो! चलो! जल्दी करो।’’ नंदी ने कहा।

नानक  ने कहा - ‘‘ना साहब। ना साहब! ये न होगा।’’

नंदी पांच सौ से पंद्रह सौ देने को तैयार था। नानक यह करने को राजी न हुआ। फिर नंदी का मन आक्रोशित होने लगा। उसे लगा नानक मेरा अपमान कर रहा है। मेरा कहा नहीं मान रहा है। उसके अंदर जमे पंजे गड़ाए पड़े जातिशास्त्र के बीज सिर उठाने लगे।  

पत्नी की तरफ देखते हुए उसने कहा-‘‘पैसे दे रहा हूं फिर भी। दिल खोलकर दे रहा हूँ फिर भी। यह तो मान ही नहीं रहा। मैं क्या करूं...?’’

उसमें आवेश उतर आया था। लग रहा था सीमाएं टूट जाएंगी। नंदी ने शब्द जोड़ते हुए कहा-‘‘अरे भई ले! चल ले ले। दो हजार! तीन हजार! पांच हजार! जो चाहे ले ले। अब देर मत कर। यह सब कर दे। अंधेरा होने वाला है।
नानक विचार सागर में डूब गया। यह मुझसे ही यह क्यों करवाना चाहता है। खुद क्यों नहीं करना चाहता। खुद बचा ले। दो हजार! तीन हजार! पांच हजार! मन से उठी आवाज़ शब्द बनकर होठों पर बुदबुदाई। 

वे फूट पड़े - ‘‘नहीं! नहीं! यह नहीं होगा। चाहे पांच हजार दो या दस-बीस हजार।’’

नंदी ने कहा - ‘‘हमारे प्राण बचा लो। हम सड़ रहे हैं।’’

‘‘तुम तो आज सड़े हो। हम तो सदियों से सड़ रहे हैं। क्या तुमने कभी हमारे बारे में सोचा। जो मैं तुम्हारे बारे में सोचूं। अब मैं बिल्कुल नहीं सोचूंगा। तुम ही सोचो अपने बारे में। अपनी सफाई के बारे में। तुम्हारे जाति वाले धंधे को मैं नहीं मानता और न ही मानने दूंगा।’’ नानक ने कहा

नानक के निरंतर प्रतिकार करते जाने से नंदी का अंह ठण्डा होने लगाा था। निवेदन के स्तर तक आते-आते उसका उच्चारण गीला हो गया था। ‘‘काम करने से आदमी छोटा बड़ा थोड़े ही हो जाता है भाई। सभी काम बराबर हैं।’’ नंदी ने तर्क उछाला।

‘‘मैं भी यही कह रहा हूं। सभी काम बराबर हैं। यदि बराबर मानते हो तो खुद ही कर लो। काम करवाते हो और फिर गाली देते हो।’’

नंदी की हिम्मत जवाब देने लगी थी और अधिकार निवेदन में बदल गया था। उसने कहा-‘‘ऐसी बात नहीं है। तुम गलत समझ रहे हो। तुम ही बता दो क्या लोगे? कैसे करोगे यह काम।’’

इधर-उधर से आ रही काम करवाने की बातों को सुन-सुनकर नानक विचलित होने लगा था। वह नंदी के निवेदन को पूर्ण रुप से ठुकरा नहीं पाया था। उसने निश्चय किया कि  आगे बढ़ती जा रही बातों को रोका जाए। वह आत्मविश्वास से लबालब हो उठा। नशें लरजने लगी थीं। उसने संकल्प लिया कि चाहे जो हो पर ये नहीं होगा। 

नानक का मन अपने द्वारा किए गए निर्णय पर अडिग हो गया था। जब व्यक्ति का मन स्थिर हो जाता है तो उतेजना गायब हो जाती है और व्यवहार शांत हो जाता है। ऐसी ही मुद्रा में उसने नंदी की ओर देखते हुए कहा - ‘‘मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा धन-दौलत। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा ये सम्मान। मुझे अपने सम्मान का निर्माण स्वयं करना है। नहीं चाहता मैं नफरत भरे पेशे और गंदगी में रेंगती जिंदगी। चाहे तुम हजारों दो या लाखों। कह दिया नहीं करूंगा। नहीं करूंगा और न ही अपनी औलादों को करने दूंगा।’’

नंदी दम्पति के कपड़ों से दुर्गध आ रही थी। वे फटी-फटी आंखों से नानक को देखे जा रहे थे। साथ ही वे कुछ सोच रहे थे और फिर बोले-‘‘ तुम्हें आज ये क्या हो गया है?’’

नंदी के प्रश्न पर नानक के मन में कितने ही सवाल उभर आए थे। उसके चेहरे पर प्रश्नों की जैसे परतें दिखलाई पड़ रही थीं। उसने कहा- ‘‘मुझे पछतावा है कि शताब्दियों बाद मुझे ये हुआ है। अब चाहे भूखा मर जाऊं या प्यासा। ये नहीं करूंगा।’’

नंदी ने अंतिम मनुहार करते हुए कहा - ‘‘भई हमारे पुरखों ने ये काम नहीं किए इसलिए हमें भी करने नहीं आते।’’

नानक के शब्दों से जैसे स्वाभिमान टपक रहा था। उसने कहा -‘‘तुम्हारे पुरखों ने नहीं किए तो क्या? अब कर सकते हो। हमारे पुरखों ने नहीं पढ़ा। पर हम बड़ी-बड़ी डिेर्गयां पा रहे हैं। संविधान कोई भी कार्य करने की आजादी देता है। तुम कर सकते हो ये काम, तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।’’

‘‘हाय! हाय! क्या कह रहे हो? ठाकुर होकर हम यह करेंगें।’’ नंदी की पत्नी ने कहा।

‘‘मैं कर सकता हूं तो तुम क्यों नहीं कर सकते? हूं तो मैं भी इंसान। तुम न मानो तो क्या? आज सभी बराबर हैं। सबका एक वोट है। जन्म, जाति, कर्म, धर्म, विचार और संघर्ष में तुमसे जरा भी छोटा नहीं हूं। नहीं मानता तुम्हारी व्यवस्था और दर्शन। लो संभालो इसे... इसे... उतारकर फैंक रहा हूं।’’ कहते हुए नानक बस्ती की तरफ बढ़ आया था।                              
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