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व्यंग्य:मार्च का महीना / जितेन्द्र ‘जीतू’

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 31, 2013 | रविवार, मार्च 31, 2013

अप्रैल 2013 अंक (यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।)
                            
जितेन्द्र ‘जीतू’
चार व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं-
आज़ादी से पहले, आज़ादी के बाद,
शहीद को पत्र,
पति से कैसे लड़ें,
काँटा लगा,
एक बाल संग्रह - झूठ बोले, 
कौआ काटे- के साथ बच्चों 
पर 3 अन्य किताबें भी आ चुकी हैं।

ईमेल संपर्क-
jitendra.jeetu1@gmail.com

सज्जन पूछेंगे, गुरु वसंत के बाद क्या? वसंत तो बीत गया, अब क्या? जैसे नेहरू के बाद प्रश्न उठा था- हू आफ्टर नेहरू? वे सज्जन हैं, अभी नादां हैं, भोले हैं, नहीं जानते कि वसंत के बाद हैं मार्च। मार्च अर्थात् व्यावहारिकता का मुख्य माह। कवियों का महीना वसंत है, तो मार्च एक्शन वालों का। कल्पना लोक वालों का महीना लदो तो कुछ कर गुज़रने वालों का समय आया है।

अपने एक परिचित की बढ़ी हुई दाढ़ी और उलझे हुए बाल देखे तो चौंक कर पूछा, ‘‘भाई, तबियत खराब है क्या?’’ वे़ नाराज होकर बोले, ‘‘कहानी का प्लाट ढूंढ़ रहे हैं क्या? इतना खोए रहते हो, नहीं जानते कि मार्च का महीना है।’’ मुझे अपनी नादानी पर अफसोस हुआ। अनभिज्ञता पर हैरानी हुई। मार्च का महीना आ गया और मुझे मालूम नहीं। कैसा लेखक है तू। वसंत आने से पूर्व तो चौंक-चौंक उठता था। अब क्या सावन की प्रतीक्षा कर रहा है। अरे अभद्र पुरूष! इतना भी नहीं जानता कि बीच में मार्च भी आता है जिसमें दाढ़ी बढ़ती है और बाल उलझे रहते हैं। मैंने आगे पूछा, ‘‘भाई, खाते-पीते भी हो या यूं ही काम करते रहते हो।’’ वे बोले, ‘खाना-पीना’ तो चलता रहता है। मार्च का महीना होगा और खाना-पीना नहीं होगा, कितने वहशी हो तुम?’’ मैं घबराया। पता नहीं ‘वहशी’ का क्या मतलब निकालकर वे मुझे ‘वहशी’ कह रहे हैं। ‘‘क्यों, क्या पूरे साल नहीं खाते।’’ मुझे पूछता पाकर वे आगे बढ़ने से रुके। मेरे पास आए और कान में फुसफुसाए, ‘‘भोले नाथ, पूरे साल का खाना-पीना एक तरफ, मार्च को महीने का खाना-पीना एक तरफ।’’

तो मित्रों, मार्च आ गया। मेरे शहर की सड़कों की हालत अभी तक वैसी ही है जैसे पहले थी, इसलिए शायद मुझे ध्यान नहीं रहा कि मार्च आ गया है। भद्र पुरुष सड़कें देखकर अनुमान लगाते हैं मार्च आने का। टूटी सड़कों ने कइयों को सड़क से उठाकर महल में बिठाया है, यह मार्च की महिमा है। कल एक समाचार पढ़ा कि शहर की सर्वाधिक चर्चित पुलिया हेतु चौथाई करोड़ रुपया आ गया है। लोगों ने दांतो तले उंगली दबाली। जो लोग साल भर अंगूठा दिखाते रहे, वे मार्च में एक्शन में आए।

एक जिले में जनगणना के लिए ‘कुछ लाख’ रुपये स्वीकृत हुए। मार्च के महीने में जबकि गणना फरवरी में ही पूरी हो चुकी थी। गणना जनों की हुई होगी या रुपयों की, सोचना आपका काम।

आज टेलीफोन खराब हुआ तो ‘कम्प्लेन्ट’ लिखाने आया। जवाब मिला, ‘‘अभी ठीक नहीं हो सकता।’’ ‘‘क्यों?’’ पूछने पर अवगत कराया गया कि सभी व्यस्त हैं। नए कनेक्शन लगने हैं। मार्च आ गया है न! लीजिए, मार्च आ गया है तो कनेक्शन लगने हैं। मैंने पूछा, ‘‘यदि मार्च नहीं आता तो?’’ बोला, ‘‘आप भी कैसी बात करते हो, फरवरी के बाद मार्च ही आता है।’’

मैं सोचने लगा हूं कि किसी साल फरवरी के बाद मार्च न आकर अप्रैल आ जाए तब? चहुं ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी। कार्य हो रहा होगा किंतु पूर्णता को प्राप्त नहीं होगा। मार्च कार्य पूर्ण होने का माह है। मार्च ही नहीं आएगा तो कार्य अधूरा रह जाएगा। दफ्तर शमशान घाट में बदल जाएंगे और सड़के उन तक पहुंचने का रास्ता। पूरा वर्ष अभिशाप है तो मार्च वरदान। क्या-क्या नहीं होता मार्च के लिए। सड़कें टूटती हैं मार्च के लिए। सरकारें मार्च के लिए बनती हैं, दफ्तर मार्च के लिए खुलते हैं, बच्चे पढ़ते मार्च के लिए हैं, गृहणियां मार्च की प्रतीक्षा करती हैं। टी.वी., फ्रिज, वी.सी.आर., मोटरसाइकिल, मकान का अस्तित्व कैसा, यदि मार्च न हो तो! पुरुष रोता रहे यदि मार्च न हो तो। स्त्रियाँ झींकती रहें यदि ‘इनका’ मार्च न आए तो। बच्चे बिलखते रहे यदि पापा का मार्च न आए तो। आइए वन्दना गाएं............


आया मार्च आया मार्च
मार्च मार्च मार्च मार्च
सारा साल मार्च मार्च

       मार्च के लिए मार्च मार्च                      
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