'धूणी तपे तीर':इतिहास के हाशिये पर ही दर्ज मानगढ़ बकौल प्रो नवलकिशोर - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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'धूणी तपे तीर':इतिहास के हाशिये पर ही दर्ज मानगढ़ बकौल प्रो नवलकिशोर

प्रो नवलकिशोर
प्रख्यात आलोचक
उपन्यासों पर बड़ा काम है 
च-6, उदयपार्क, सेक्टर-5,
हिरणमगरी,
उदयपुर-313002 
(0294) 2465422
मो. 09351587096
(यह समीक्षा मधुमती सहित कई पत्रिकाओं में छप चुकी है। प्रो नवलकिशोर जी की अनुमति से यहाँ पाठक हित में प्रकाशित कर रहे हैं।इस कृति को बिहारी सम्मान से नवाजे जाने अपनी माटी की तरफ से बधाई।आज लेखक हरिराम मीणा जी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि इसी साल सत्रह नवम्बर को इस काण्ड के सौ साल पूरे हो रहे हैं।सच में आदिवासियों के बलिदान को रेखांकित करते हुए आज आदिवासियों के हालातों पर फिर से विमर्श की ज़रूरत है--सम्पादक )

’धूणी तपे तीर‘ इसी उपेक्षित, किन्तु प्रकाण्ड घटना को लेकर लिखा गया उपन्यास है। शहादत के लिहाज से यह घटना जलियाँवाला बलिदान से कम स्मरणीय नहीं है, जो उसके लगभग छः साल पहले घटित हुई थी और जिसमें उससे चार गुना अधिक शहीद हुए थे। यह घटना अभी भी इतिहास के हाशिये पर ही दर्ज हो पाई है।आदिवासी-विद्रोह की यह सत्यकथा अधीनस्थ (सबाल्टर्न) वर्ग के उपनिवेशवाद (साम्राज्यवाद) और आंतरिक उपनिवेशवाद (सामंतवाद) के विरुद्ध संघर्ष में राजस्थान के मेवाड अंचल के आदिवासियों द्वारा किया गया एक गौरवमय योगदान है। 

सबसे पहले हिन्दी साहित्य में आदिवासी समाज से प्रस्तुत लेखक की मुलाकात रेणु के ’मैला आँचल‘ के संथालों से हुई थी, अपने जमीनी हक से बेदखल संथालों से, जो अपने सत्व के लिए लडते-भिडते हैं तो जुल्म के शिकार होते हैं। रेणु पीडतों के साथ हैं, एक सच्चे हमदर्द की तरह। ’मैला आँचल‘ के बाद आदिवासी जीवन को लेकर, विशेषकर बस्तर जैसे अंचल को लेकर, कुछ उपन्यास आये जरूर, लेकिन उनमें कथाकार की दिलचस्पी ’एक्जोटिक‘ तत्त्व के प्रति ज्यादा थी, जैसे स्वच्छंद प्रेम की घोटुल-प्रथा को लेकर। हमारा कथा-साहित्य तब अधिकतर शहरी मध्यवर्ग पर केन्दि्रत था, वह व्यक्ति के अकेलेपन, सम्बन्धों में टूटन और महानगरीय संत्रास आदि में उलझा था। तभी हिन्दी लेखक-पाठक को झकझोरा महाश्वेता जी के ’हजार चौरासी की माँ‘ ने और उन्होंने जाना कि नक्सली हिंसा अन्याय के एक लम्बे सिलसिले की उपज थी और आंदोलन में कितने-कितने शिक्षित युवक कूद पडे थे। उसके बाद महाश्वेता जी के ऐसे उपन्यास भी आए जिनमें आदिवासियों की विद्रोह-कथाएँ थीं; बिरसा मुण्डा जैसे एक महानायक से उन्होंने हमारा परिचय करवाया। 



जनवरी, 2008, 
पृष्ठ संख्या:376, 
मूल्य:100 रुपए
हमने शिद्दत से महसूस किया कि हमारे इन आदिवासी बंधुओं को देश की आजादी के बाद भी अपनी जातीय आजादी के लिए निर्णायक संघर्ष करना पड रहा है। हिन्दी में भी उनके जीवन-संघर्ष को लेकर छुट-पुट लिखा जाता रहा है, किन्तु उनके बारे में किसी बडी रचना की अब भी प्रतीक्षा है। सत्तर-अस्सी के दशक तक तो हमारे लेखक उन्हें रूमानी झुटपुटे से ही देखते रहे थे। बिहार-झारखण्ड-बस्तर के अलावा हिन्दी क्षेत्रों में क्या कभी आदिवासी विद्रोह घटित हुए, इसकी कोई खबर हमारी साहित्यिक दुनिया को नहीं है। ऐसे में ’धूणी तपे तीर‘ एक बडे अभाव की कमोबेश मूर्ति के रूप में सामने आया है। राजस्थान के बांसवाडा अंचल में स्थित मानगढ पहाडी इस आदिवासी शहादत के कारण एक स्वतंत्रता-तीर्थ में बदल जानी चाहिए। भील-मीणों ने गोविन्द गुरु के नेतृत्व में पहले एक लम्बा शांतिपूर्ण अभियान चलाया था, लेकिन उनके इस अभियान को ठिकानेदारों ने बगावत के रूप में लिया और उसे कुचलने के लिए अंग्रेज-प्रभुओं से फौजी मदद की गुहार की। गोविन्द गुरु और उनके साथियों ने अंग्रेजी व रियासती फौजों से बचने के लिए मानगढ पहाडी को शरण-स्थली बनाया था। घिर जाने पर ही उन्होंने हथियार उठाए थे और तीरों तथा पुरानी बंदूकों जैसे भोथरे हथियारों से अंत तक मुकाबला किया था। उन पर न सिर्फ धोखे से हमला किया गया था, बेरहमी से मशीनगनी मौत का कहर भी बरपाया गया था। 

गोविन्द गुरु ने भीलों-मीणों के बीच कैसे जागृति फैलाई, कैसे उन्हें संगठित किया और कैसे उन बे-आवाजों को अपने हकों के लिए बोलना सिखाया व बलिदान के लिए तैयार किया, यही इस उपन्यास की अन्तर्वस्तु है। इस घटना के पीछे की प्रामाणिकता के लिए पहले लेखक ने गंभीर शोध किया और अनन्तर उसे कथा में ढाला। गोविन्द गुरु आर्य समाज में दीक्षित धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी धर्म-चेतना आत्म-लाभ वाली धर्म- चेतना नहीं थी। वह आर्य-समाज की आरम्भिक लोकवादी और सुधारवादी न्याय-चेतना से अनुप्राणित थी। यह चेतना ही उन्हें समाज-चिन्ता की ओर ले गई, ठीक मध्यकालीन भक्तों-संतों की परम्परा में। समय की माँग थी कि वे केवल साधक और गुरु बनकर ही रहें, अपने अनुयायियों में अन्याय के प्रतिरोध की भावना भी जगाएँ तथा उसके लिए संघर्ष में उनका नेतृत्व करें। लेखक का लक्ष्य निकट अतीत की इस अविस्मरणीय घटना को आख्यान के जरिये इस तरह प्रस्तुत करना है कि उसकी सच्चाई असंदिग्ध बनी रहे। लेखक स्वीकार करता है कि वह इतिहासविद् नहीं है, लेकिन उसने जो भी लिखा है वह उसकी निजी शोध पर आधारित है और आगे उसका प्रामाणिक इतिहास लिखना उन इतिहासकारों का कर्त्तव्य है जो हाशिए के लोगों से सच्ची हमदर्दी रखते हैं। यह हमदर्दी ही उसे मानगढ-काण्ड को जनपक्षीय दृष्टि से प्रस्तुत करने के लिए उपन्यास-लेखन की ओर ले गई है। 

लेखक की इस बलिदान- कथा में दिलचस्पी स्वाभाविक है, वह स्वयं उस समाज का अंग है; लेकिन केवल जातिगत दिलचस्पी से ऐसी कथा नहीं लिखी जा सकती जो मानवीय मुक्ति-संग्राम की अटूट श्ाृंखला की कडी बन सके। उसके लिए जिस व्यापक स्वतंत्र्य-दृष्टि की अपेक्षा है, वह लेखक के पास है और उसके साथ है एक कवि की संवेदना। लेखक ने अपनी नायक के संन्यासी-व्यक्तित्व के अनुरूप साधु-गिरी वाली जबान का कुशल विनियोग किया है। जिस सामाजिक परिवेश में गोविन्द गुरु जीये, वह धर्म-शासित था, ऐसे समाज में कोई धार्मिक व्यक्ति ही सामाजिक नेतृत्व दे सकता था, मध्यकाल के इतिहास से इस बात को हम समझ ही सकते हैं। लेखक ने धर्म गुरु गोविन्द जी की इस मानवीय भूमिका को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। गोविन्द गुरु स्वयं भील-मीणा समुदाय के नहीं थे, उस समुदाय से कुछ बेहतर स्थिति के घुमन्तू व्यापारी बंजारा वर्ग से आए थे। पहले उन्होंने अपने को जाति-मुक्त (डी-क्लास) किया और भील-मीणों से स्वयं को एकमेक कर लिया। तदनन्तर उन्हें अंधविश्वासों, रूढयों, कुप्रथाओं और नशाखोरी से छुटकारा दिलाने का प्रयास किया; तभी वह उन्हें एक प्रतिरोधी समाज में संगठित कर सके। उनका यह कार्य प्रकटतः अराजनैतिक था, लेकिन परिणाम में राजनैतिक दिशा की ओर ले जाता था। 

हरिराम मीणा
सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी,
विश्वविद्यालयों में 
विजिटिंग प्रोफ़ेसर 
और राजस्थान विश्वविद्यालय
में शिक्षा दीक्षा
ब्लॉग-

http://harirammeena.blogspot.in
31, शिवशक्ति नगर,
किंग्स रोड़, अजमेर हाई-वे,
जयपुर-302019
दूरभाष- 94141-24101
ईमेल - hrmbms@yahoo.co.in
फेसबुकी-संपर्क 
अंग्रेज ठिकानेदारों की मदद से वनभूमि-वनोपज आदि पर उनके प्राकृतिक और परम्परागत अधिकारों से उन्हें वंचित करने लगे थे। एक तरफ उनका सामंती शोषण चल रहा था, ठिकानेदार उन्हें सताते थे, जबरन वसूली करते थे, उनसे बेगार लेते थे और उनसे गुलामों जैसा सलूक किया जाता था। दूसरी तरफ वे उपनिवेशवादी शोषण से और त्रस्त किए गए। इन अत्याचारों के विरोध में हकों की माँग को राज-विरोध माना गया और उसे कुचलने के लिए विदेशी शासन ने देशी शासकों को पूरी फौजी मदद दी। उपन्यासकार ने इन अत्याचारों का और इनके प्रतिकार में संगठित होते जनान्दोलन का तथा जनान्दोलन के निर्मम दमन का एक ऐसा कथावृत्त तैयार किया है जिसे पढना शुरू करने पर पाठक अंत में आकर ही दम लेता है। लेखक ने यह ध्यान रखा है कि आंदोलन की पराजय संघर्ष के अंत का संकेत न बने, वह संघर्ष के अंतिम विजय तक जारी रहने का संदेश भी दे। यह संदेश लेखक भावुक आशावाद के साथ नहीं, एक हल्की-सी उम्मीद जगा कर देता है। कथा का समापन जो इतिहास-रस देता है वह द्वन्द्व-रहित रसानन्द के रूप में नहीं मिलता। एक गहरे विषाद का अनुभव भी साथ ही जुडा होता है। 

इस आदिवासी संघर्ष के आख्यान द्वारा लेखक इस समाज को उसका खोया मानवीय गौरव लौटाता है। जिस समाज को लगभग असभ्य समझा जाता रहा है, वह एक जीता-जागता समाज है और बहुत-सी बातों में तथाकथित समाज से ज्यादा मानवीय है। स्वतंत्रता की मूलभूत मानवीय आकांक्षा से उन्हें भी उसी प्रकार विद्रोह के लिए प्रेरित किया था जैसे कि राष्ट्रीय स्वाधीनता के आन्दोलनकारियों को। इस औपन्यासिक आख्यान की विशेषता यह है कि इसमें आदिवासी-अस्मिता को वृहत्तर समाज से काटकर नहीं देखा गया है, संघर्ष के केन्द्रमें वर्ग-चरित्र है, लेखक उसे उत्पीडत और उत्पीडक वर्ग के बीच सदा से चलते आ रहे संघर्ष के रूप में ही देखता है। 

’धूणी तपे तीर‘ में लेखक का लक्ष्य एक स्वातंत्र्य-संघर्ष को आख्यान के जरिए इस तरह प्रस्तुत करना है कि उसकी सच्चाई असंदिग्ध बनी रहे। गोविन्द गुरु और उसके साथियों को जीवन्त रूप में प्रस्तुत करने के लिए कल्पना के घोडों को कहानी की राह पर बेलगाम नहीं दौडाया गया है। इसलिए एक शुद्ध उपन्यास की अपेक्षा इससे नहीं की जानी चाहिए। यह सत्य वृत्तान्त और आख्यान की ऐसी मिश्र विधा के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें लेखक प्रकारान्तर से एक अलग इतिहास लिख रहा होता है। भूमिका में लेखक का यह मंतव्य द्रष्टव्य है, ’’स्पष्ट है कि मनुष्य के हक की लडाई के इतिहास को मनुष्य-विरोधी शोषक-शासकों ने दबाया है और उनके आश्रय में पलने वाले इतिहासकारों ने उनका साथ दिया है।‘‘ ऐसे इतिहासकारों के वर्चस्व की विरोधी जनवादी साहित्यिक परम्परा में ही इस ऐतिहासिक उपन्यास का प्रणयन हुआ है। कथावृत्त की प्रामाणिकता की अतिरिक्त चिंता के दबाव में लेखक की रचनात्मकता कुछ बँधी-बँधी-सी जरूर रही है, लेकिन इस उपन्यास को उपन्यास के बँधे-बँधाए मापदण्ड से न तौलकर एक परिधि-बाह्य समाज की एक दस्तावेजी कथा के रूप में ही अधिक लिया भी जाना चाहिए। 

साहित्य इतिहास से कथाएँ लेता रहा है, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि साहित्य का आख्यान इतिहास की वास्तविक कथा को अपदस्थ भी कर देता है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है जायसी की ’पद्मावती‘ की कहानी। पद्मावती-कथा का आधार इतिहास-घटित कुछ है या नहीं, या कोई लोकाख्यान मात्र है, आज निर्भ्रान्त रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता; लेकिन लोकप्रिय पद्मिनी वृत्तान्त जायसी की कृति से निश्चय ही प्रभावित हुए हैं। मानगढ का कोई आगामी ऐतिहासिक विवरण हरिराम जी की गोविन्द गुरु की कथा से प्रभावित भले न हो, वह उसे किनारे कर नहीं चल सकता। ’धूणी तपे तीर‘ उसके लिए एक स्रोत-ग्रंथ सिद्ध होगा। 

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