सीरत और सूरत को बदलता किसान जगदीश प्रजापत/नटवर त्रिपाठी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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सीरत और सूरत को बदलता किसान जगदीश प्रजापत/नटवर त्रिपाठी

(समस्त चित्र स्वतंत्र पत्रकार श्री नटवर त्रिपाठी के द्वारा ही लिए गए हैं-सम्पादक )
सफेद मूसली व स्ट्राबेरी की खेती ने दी नई पहचान 

चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा तहसील के बांगरेड़ा ग्राम के तीस वर्षीय जगदीश प्रजापत के दो बेटे-बेटियां और परिवार के आधा दर्जन बच्चे यहां से 11 किलोमीटर दूर निम्बाहेड़ा कस्बे में इंग्लिश मिडियम से पढ़ रहे हैं और परिवार का ही एक लड़का इंजीनियरिंग में तो दो लड़कियां नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं। सामान्य किसान और उसका सोच यूं ही नहीं है। पारंपरिक खेती के बजाय औषधीय और मसालों की खेती के परिणामों ने इस किसान परिवार का सोच ही बदल दिया है। आज ही वह स्ट्राबेरी की उपज की समस्या निवारण के लिए हवाई जहाज से महाबलेश्वर महाराष्ट्र के लिए निकला है। 

जगदीश अपने चाचा शान्तिलाल के साथ दस-बारह बीघा में सफेद मूसली की पैदावर का राजस्थान में रिकार्ड स्थापित कर नवाचारी किसान का खिताब हासिल किया है। गत सितम्बर 2012 में सफेद मूसली की मशीन ईजाद करने पर उसे राज्य के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने राज्य के प्रगतिशील किसान के पुरस्कार से नवाज़ा। यूं तो सफेद मूसली पहाड़ी स्थलों, ढलानों और बीहड़ जंगलों में स्वतः फलने-फूलने वाला पौधा है जहां से आदिवासी तथा घुम्मकर अपने झोले में स्वास्थ्य, आयु और यौन शक्ति के लिए जड़ीबूटी के रूप में यदा-कदा ‘‘मूसली लो-मूसली लो’’ की आवाज देते सुनाई पड़ते हैं। मामूली कक्षा आठ तक पढ़े जगदीश के पिता ने पहले अपना पारंपरिक व्यावसाय मटके और मिट्टी के बर्तन बनाना छोड़ खेती को अपने जीवन का आधार बनाया तो बेटे जगदीश ने औषधीय और बागवानी को अपना कर पारंपरिक खेती की सीरत और सूरत ही बदल दी। खेती में ही कुछ नया करने की छटपटाहट और पैसा कमाने की कामना ने एक दिन समाचार पत्र में छपे सफेद मूसली के आलेख ने इस किसान की तदबीर से तगद़ीर बदल गई। 

यह अविश्वसनीय है, परन्तु जगदीश प्रजापत का जमीन पर उतारा सत्य है कि 5-6 हजार बीघा की पारंपरिक खेती से कमाई करने वाला यह किसान आज 10-12 बीघा जमीन में सफेद मूसली की खेती कर प्रति बीघा सवा-डेढ़ लाख रूपया एक सीजन में कमा रहा है। बाकी की फसल और खेती की कमाई तो अलग है। हांलाकि वह कम पढ़ा लिखा है पर इंटरनेट से उन्नत खेती और बागवानी की नई-नई जानकारियां और इसमें लगे किसानों का पता लगाता है। अपने को उनसे तोलता है और हर फसल में कुछ नायाब करने में लगा है। लगभग एक दशक पहले जगदीश ने मात्र 4-5 बिस्वा में सफेद मूसली की खेती का प्रयोग किया जो एक दशक में 2-4-6-10 और बारह बीघा में इस खेती का आंकड़ा छू लिया। वह अपनी उपज का अब और अच्छा बाज़ार ढूंढ रहा है, उसके इस प्रयोग से कुछ किसानों ने भी उसका अनुगमन किया और 18-20 किसानों ने उससे मूसली का बीज लेकर यह ज्ञान सीख कर तुम्बा, दलौदा, कनेरा, बस्सी, छोटीसादड़ी तथा बड़ीसादड़ी के गांवों में कुछ नई सोच वाले किसान सफेद मूसली उपजाने लगे हैं। 

यही नहीं बागवानी और उन्नत खेती जो दूसरे किसान कम ही करते हैं, उसे और उसके सपनों को जलवायु और जमीनी असमानताओं के बावजूद वह साकार कर रहा है और हकीकत को जमीन पर उतारता जा रहा है। उसने सफेद मूसली के बाद स्ट्राबेरी जो ठंडे प्रदेश हिमाचल और महाराष्ट्र के अंचलों की खेती है, उसे अपने बांगरेड़ा के खेत में सफलतापूर्वक पैदा करने का सपना हासिल कर लिया है। सफेद मूसली और स्ट्राबेरी की खेती ने उसे न केवल प्रदेश में बल्कि अपने जिले चित्तौड़गढ़ में भी नायाब बना बना रही है। जगदीश का सपना है कि परंपरागत चली आ रही गेहूं, मक्का, तिलहन और दलहन खेती से ऊपर उठ कर औषधीय और मसालों की खेती को अंगीकार करे। इस सोच के चलते उसके खेत पर ईसबगोल, कलौंजी और लहसुन की व्यापक खेती है। इस किसान ने इस साल पांच बीघा में उन्नत अनार का बगीचा लगाने की तैयारी पूरी करली है। अभी उसके खेत में अमरीकन डालर याने मौटे चने से खेत में हरितिमा छाई है और सामान्य से चार गुना मौटे चने से खेत लकदक है।  

खेत के निकट ही सुखानंदजी के पहाड़ियों पर सफेद मूसली होने की बड़े-बुजुर्गों से जानकारी मिली तो वह पहुंच गया वहां से सफेद मूसली का बीज हांसिल करने। पहाड़ी पर जहां-तहां  पौधे दीखे, उनकी जड़ों को तलाशा और एकत्रित की। मई के अन्त में 4-5 बिस्वा जमीन में उन्हें रोप दिया। पहली बार पिलाई और बाद में मौसम की पहली बारिश से मूसली के फूटान ने जगदीश के मन को उत्साह से भर दिया। उसके पास एक बीघा जितना बीज हो चुका था और यूं स्वतः बीज को बढ़ाते-बढ़ाते दो-पांच-सात-दस और बारह बीघे तक की व्यावसायिक खेती की हसरत को केवल 6-7 वर्ष की खेती में उसने छू लिया। 

यह चौंकाने वाली बात है कि गेहूं-मक्का और दलहन की खेती में कभी 5-6 हजार रूपया से ज्यादा नहीं मिला परन्तु सफेद मूसली की फसल से उसे इतना मिल जाता है कि मजदूरी और रूपाई आदि के प्रति बीघा एक लाख रूपया खर्च निकालने के बाद उसे साबत सवा-डेढ़ लाख रूपया मिल जाता है। देखने और सुनने में अजीब लगता है परन्तु यह धरातलीय प्रमाण है कि सीज़न में उसके मूसली के खेत में 100-125 मजदूर एक साथ वह भी 30-40 दिन लगातार मूसली को जमीन में से निकालने, साफ करने, छिलाई और धुलाई करने में लगे रहते हैं। इस गांव में मजदूर नहीं मिलते आस-पास के गांवो यहां तक कि निम्बाहेड़ा कस्बे से विशेष टैम्पो-गाड़ियों में लाना होता है। पिछले वर्ष इस किसान ने दस बीघा जमीन में मूसली की खेती से खर्चा निकाल कर 14-15 लाख रूपये कमाये। इसी प्रगतिशील सोच से परिवार के 10-11 बच्चे तकनीकी और बेहतर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

जगदीश की स्ट्राबेरी की खेती अभी प्रायोगिक तौर पर चल रही है। पिछले वर्ष उसने लगभग 30 हजार रूपये की फसल भी ली परन्तु इसकी जड़ों में किसी अज्ञान बीमारी से उबरने के लिए वह हरसंभव कोशिश में लगा है। रतलाम के तीतरी ग्राम वह महाराष्ट्र के महाबलेश्वर के सट्राबेरी के किसानों के अनुभवों को बांट रहा है और उसे उम्मीद है कि वह निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर स्ट्राबेरी की नायाब फसल व्यावसायिक तौर पर उगा सकेगा। अन्य औषधीय ईसबगोल तथा मसाले की कलौंजी तथा लहसुन की खेती से वह उत्साहित है। पारंपरिक खेती के बदले व्यावसायिक और आर्थिक संबल देने वाली उपज के लिए वह दृढ़ संकल्पी है।


नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-
natwar.tripathi@gmail.com 
नटवर त्रिपाठी
(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं। पूरा परिचय 


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