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''बलात्कार सामाजिक समस्या है''-डॉ. श्याम सखा

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, मार्च 09, 2013 | शनिवार, मार्च 09, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


क्या बलात्कार रोके जा सकते हैं?
पहले तो हमें यह समझना पड़ेगा कि बलात्कार सामाजिक समस्या है या कानूनी। कानूनसरकारव्यवस्था की बारी तो तब आती जब बलात्कार हो चुका होता है बलात्कार रोकने में कानून किसी भी देश में सक्षम नहीं हुआ चाहे वे अमेरिका हो या यूरोप मध्य एशिया के मुस्लिम देश जिनके उक्त कानून को हमारे देश में लागू करने की वकालत होती रहती है। वहां भी बलात्कार होने बन्द नहीं हुए हैं तो हमें मानना पड़ेगा कि बलात्कार कानून से ज्यादा सामाजिक समस्या है तो इसे रोकने के उपाय भी समाज को करने पड़ेगें। मैं चिकित्सक हूँ मेरी आदत हो गई है कि किसी भी बिमारी का ईलाज करने से पहले वह बीमारी क्यों हुईकिस कारण से हुई यह जानने का प्रयत्न करता हूँ।

पहले तो हमें चिन्तन करना होगा कि बलात्कार होते क्यों हैं दुनिया भर के शोध आंकड़ों के आधार पर यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि बलात्कार अधिकतर परिजनों या परिवार से जुड़े सगे सम्बन्धियोंमित्रों,पड़ोसियों द्वारा ही किए जाते हैं। यानि बाड़ ही खेती खाने लगती है। बलात्कारी बलात्कार क्यों करता है और पीड़ित ऐसा क्यों संभव होने देती हैअगर इसके बारे में सोचते हैं  भारतीय परिवेश में सबसे पहले बच्चों के ऐन्द्रिक प्रबन्धन या कुप्रबंधन पर दृष्टि डाले तो हमें पता चलेगा कि जाने अनजाने में हमें लड़के और लड़की दोनों को ही विकृत मानसिकता की ओर धकेल देते हैं। 

जैसे बहुत बचपन में जब बच्चे 5 साल से भी छोटे होते हैं तभी से माताएं जहां लड़की के यौन अंगों को ढ़कनाछुपाना आरम्भ कर देती हैं वहीं लड़को के प्रति वे ऐसा नहीं करती या कम ध्यान देती हैं उल्टा अगर कोई बच्ची स्नान करके नंगी आ जाती है तो उस पर उसको झिड़कियां पड़ती हैं शेम-शेम की आवाज उभरने लगती है ऐसा लड़कों के बारे में कम ही होता है। निम्र मध्य वर्गीय ग्रामीण व नागरिक परिवारों में ऐसा ज्यादा होता है। 

उच्च मध्य वर्गीय और उच्च वर्गीय परिवारों में अब लड़के को भी टोका जाने लगा है। इसके बाद जब प्युबर्टी (यौन दहलीज) आती है यानि लड़के लड़कियों में यौन लक्षण उभरने लगते हैं तब फिर ऐन्द्रिक प्रबन्धन या कुप्रबन्धन होने के कारण समस्या उभरने लगती है। जैसे लड़कियों में पल्लू ढ़कने के लिए बार-बार टोका टोकी करना, वह भी लड़के यानि भाई की उपस्थिति में जहां लड़की में हीन भावना या संकोच उत्पन्न करता है कई बार किसी बात पर लड़की को उन्मुक्त हंसने पर भी एसे टोक दिया जाता है या झिड़क दिया जाता है। वह भी यह कहकर कि लड़की को मुंह फाड़ कर हंसना शोभा नहीं देता। यही नहीं उसके बैठने के अन्दाजचलने के अन्दाज या कई बार देखने के अन्दाज पर भी टोका टोकी की जाती है। कह दिया जाता है कि फुदकना लड़कियों को शोभा नहीं देता आदि-आदि इस तरह किशोरावस्था में भी घर परिवार में ऐन्द्रिक प्रबन्धन या कुप्रबन्धन जहां लड़की में हीन भावना उत्पन्न करता है वही लड़कों में आक्रमता व उद्दडंता के भाव पैदा करता है। लड़की द्वारा किसी पुरुष या लड़के को भी अनजाने में छू जाना अपराध श्रेणी में आ जाता कार्य है। 

गली मौहल्ले में लड़के को लड़की से अकेले में बात करना तो लड़की को अपराध की  श्रेणी में ला खड़ा कर देता है। छोटे कस्बे और गांव में तो लड़कियों पर और भी अनेक बन्धन जैसे विवाहिताओं को घूंघट निकालनापुरुष रिश्तेदारों से बात न करनाबस में किसी अनजान पुरुष के साथ खाली सीट पर बैठना भी अपराध की श्रेणी में आ जाता है। इस तरह रजस्वला होने के दिनों में लड़की या महिला को रसोई में काम न करने देना भी उनमें हीन भावना एवं असहजता की भावना उत्पन्न करता है। इस तरह अचानक विधवा हुई स्त्री को चूडिय़ां न पहनने देना सहज श्रॄंगार  साधनों से वंचित कर देना भी ऐन्द्रिक कुप्रबन्धन कहलाएगा। यह एक बड़ा कारण हो सकता है जो हमारे समाज में स्त्री पुरुष को बराबरी का दर्जा न मिलने का कारण है और यह तो सर्व विदित है यह जो भी बलवान माना जाएगा वो निर्बल पर अत्याचार करने के लिए प्रेरित हो जाएगा। हालांकि ऐन्द्रिक प्रबन्धन बलात्कार होने का एक मात्र कारण नहीं है लेकिन इस कुप्रबन्धन में सुधार लाकर हम स्त्री पुरुष की बराबरी में एक ओर कदम तो बढ़ा ही सकते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में एक कहावत होती है। 'परहेज इलाज से बेहतर हमें बलात्कार रोकने हेतु  भी यह उपाय कर सकते हैं। इसमें भी हमें तीन पहलू देखने होगें पारिवारिकसामाजिक और न्यायायिक :-

पारिवारिक-
  1. सबसे पहला काम ऐन्द्रिक कुप्रबन्धन की जगह ऐन्द्रिक प्रबन्धन करना पड़ेगा।
  2. दूसरा बच्चों को परिजनोंमित्रोंसक्वबन्धियोंपड़ोसियों के गलत यौन अग्रसरता के बारे                         में सजग करना।
  3.  तीसरा बच्चों को क्रमश: या (स्टेप वाईज) यौन की शिक्षा से अवगत करवाना।
  4. परिवार में एक कदम हमें उठाना पड़ेगा कि अगर कुछ किशोर या युवा जो हमारे परिवार में है के बारे में यह सूचना मिलती है कि उसने किसी लड़की से छेडख़ानी की हैअभद्र व्यवहार किया हैतो माँ को चाहिए कि वह उसके लिए पन्द्रह दिन खाना न बनाए और लड़का खुद खाना बनाकर खाए।
  5. बहन उसको एक या दो साल के लिए राखी बांधने के लिए मना कर दे।
  6. पिता उसके जेब खर्च को बन्द कर दे या कम कर दे।
  7. अगर यह अपराध दोबारा किया जाए तो पारिवारिक सजा बढ़ा दी जाए।

सामाजिक-
  1. आमतौर पर हमारा समाज ब्लातकारी को गलत या हेय दृष्टि से देखने की बजाए ब्लातकार पीडि़त महिला को ही दुश्चरित्र या अपराधी मानने की मानसिकता बदलनी होगी।
  2.  समाज में पड़ोस और विद्यालय में भी छेडख़ानी करने वाले बच्चों को स्कूल की अंसेम्बली में सब के सामने खड़ा करके प्रताडि़त किया जा सकता है।
  3. स्कूल के सूचना बोर्ड पर उस बच्चे का फोटो एक दिन या एक सप्ताह के लिए उल्टा लटकाया जा सकता है।
  4. बार-बार ऐसा करने पर न केवल उसे स्कूल से निकाल दिया जाना चाहिए अपितु उसको मनोवैज्ञानिक से चिकित्सा के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।
  5. ऐसे ही कुछ सोसायटी या मौहल्लों में भी ऐसे अपराधी किशोरों का सामाजिक बहिष्कार करके सार्वजनिक स्थान पर उल्टा फोटो लटकाकर रखा जा सकता है। इसके लिए आवश्यक हो तो सरकार ऐसा करने के लिए कानून भी बना सकती है। मगर मेरा मानना है कि समाज ऐसा करने में ज्यादा सक्षम है।

न्यायिक
  1. हमें त्वरित न्याय एवं कठोर दंड का प्रबन्ध लाना होगा। जिससे ब्लातकार जैसे अपराध रोकने में सहायता मिले।
  2. किशोर न्याय-न्यायालय में गम्भीर अपराध जैसे ब्लातकारकत्ल आदि अपराध होने पर उन्हें सुधार करने कीपेक्षा विशेष किशोर कारागार बना कर विशेष दण्ड देना चाहिए। इसके लिए भी विशेष कानून की व्यवस्था पड़ेगी।
  3. कई देशों में बच्चों के प्रति ब्लातकार के दोषी अपराधियों को बच्चों की संस्थाओंसंस्थानोंयहाँ तक की मकानों,सोसाइटियां जहां बच्चे रहते है निर्धारित दूरी पर रहने का न्यायलयीन आदेश होता है। वह भी लागू किया जा सकता है। 
  4. इस सब के बाद भी अगर कोई सबसे कारगर उपाय है तो वह पारिवारिक संस्कार ही है जो किसी भी तरह के अपराध को कम करने में सक्षम हो सकते हैं। ब्लातकार या अपराधमुक् समाज तो ख्वाबगाहों में ही उपलद्ब्रध होने की संभावनाए है।

निदेशक,हरियाणा साहित्य अकादमी।
पेशे से चिकित्सक भी हैं।
आई.पी.16, 
सेञ्चटर-14, पंचकूला-134113
दूरभाष नं. 0172-2581807, 094163-59019
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