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कविताएँ:कविवर उद्भ्रांत

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अगस्त 15, 2013 | गुरुवार, अगस्त 15, 2013

अगस्त-2013 अंक 

(1) कठपुतली

कठपुतली का खेल देखना
मेरे बचपन के दिनों का
सबसे प्रिय शगल था
डोर से बँधी हुई
कई कठपुतलियों को
खेल दिखानेवाला
हस्त-संचालन और
उँगली के इशारों से
यहाँ-वहाँ नचाता
कभी-कभी
एक कठपुतली
दूसरी को पकड़कर
धराशायी कर देती
और खूब पीटती
धमाधम धमाधम!
कभी प्यार करतीं वे
आपस में
शिद्दत से
और हम सभी बच्चे
देख उनका खेल यह
तालियाँ बजा-बजा
खूब होते प्रसन्न
तरह-तरह के
खेल होते कठपुतली के
और हम हैरत से
देखते हुए उन्हें
भर जाते
कई तरह की
भावनाओं से
उस समय
हमें लगता था ऐसा
जैसे वे जीवित हों
प्राणवन्त होकर सारा
क्रिया-व्यापार कर रहीं!
और कुछ समय के बाद
कठपुतली वाले के इशारे पर
वे जब निष्प्राण हो जातीं तो
हम सब बच्चे
हो जाते मायूस
कठपुतली वाला
खेल ख़त्म कर
उस खेल के या
अपने हुनर के ऐवज में
प्राप्त करता जनता से पैसे और
खूब सराहना भी
बन्द करता सारी कठपुतलियों को
झोले में और
सारे बच्चों को छोड़कर उदास
शीघ्र पुनः आने का
देते हुए आश्वासन
चला जाता
दूसरे मुहल्ले या नगर में
इसी भाँति अपनी
आजीविका चलाने के वास्ते!
खेल कठपुतली का
देखने वाले
समस्त बच्चे वे
बुजुर्ग हुए
जिन्दगी का बड़ा हिस्सा
जी लिया उन्होंने जब
तब जाकर उन्हें यह प्रतीत हुआ
जीवनभर
खेल खेलते रहे वे
स्वयं भी
कठपुतली का!
हर कोई
दूसरे को
कठपुतली समझता था
जिसकी डोर
उसके ही हाथों में!
जबकि
सत्य यह था कि:
उनके हाथों में कभी
नहीं रही कोई डोर
नाचते रहे
वे सारे ही
बन कठपुतली औरों की!

नहीं समझ पाए वे कभी
जीवन के अन्तिम क्षणों तक
कौन नचा रहा उन्हें?
राष्ट्र
या समाज
या
उन्हीं का आत्म?
अपने ही जीवन को
जीवन की तरह
कभी नहीं
जी सके वे!
नहीं समझ सके
यह रहस्य
कभी भी वे-
कि कठपुतली का
खेल दिखानेवाला
जीवन अपना ही
जी रहा था;
उसकी कठपुतलियों में
उसका हुनर
प्राण बनकर
होता संचालित था
और तब वह स्वयं भी
अपनी कठपुतलियों के हाथों की
बन जाता
कठपुतली!
दिनभर के
कठिन परिश्रम के बाद
वे कठपुतलियाँ फिर
बड़े प्यार से
अपने हाथों से
रोटियाँ खिलातीं उसे
बनकर जैसे उसकी
माँ ममतामयी और
छोटी बहन!
और तब
खेल दिखानेवाला
अपनी कठपुतलियों को
लाड़ में भर
देखते-निहारते
एक दिन
स्वयं
काठ हो जाता!
करते हुए सिद्ध
अपने आपको फिर
सचमुच की कठपुतली!
हैरत की बात-
उस समय उसके
सर्वोत्कृष्ट
ऐसे अद्भुत खेल पर भी
हृदयहीन दर्शकगण
नहीं बजाते ताली!
तितर-बितर हो जाते
मिट्टी में मिलाकर
उसकी जादुई आकर्षणयुक्त
सम्मोहक कला को
और
अपने-आपको
करने लगते तत्पर-
किसी दूसरे का खेल
देखने के वास्ते!

(2)बहुरूपिया

उसे देखा था बचपन में
तरह तरह के भेस बनाता
आता जब बाजार में
तो सभी की निगाहें उसकी ओर उठ जातीं
कौतूहल से सभी देखते
कभी विस्मय से
कभी उसकी कलाकारी के लिए
भाव उठता प्रशंसा का भी
क्योंकि उसका रूप
सजीव होता बोलता हुआ
गोकि वह बोलता नहीं था
कभी लाल जीभ बाहर निकाले
गले में मुण्डमाला, कौड़ियों की माला डाले
बाँये हाथ में खप्पर
लाल रंग में भरा गोया खून
दाँये हाथ में तलवार
पैरों में घुँघरू बाँधे
काले कपड़ों में
लम्बे बालों और
काली आँखों वाला वह
जब किसी दूकान पर आता
जहाँ मैं मौजूद होता पहले से
कॉपी या किताब की ख़रीदारी को
या कोई किताब या पत्रिका को उलटते-पलटते
तो मैं सहम जाता
और दूकान के अन्दर खिसकता
जब तक वापस मुड़कर देखूँ
तब तक वह
अपने खप्पर में
छन्न की आवाज के सँग
दूकानदार के फेंके सिक्के को-
चवन्नी-अठन्नी के-
लेकर आगे बढ़ गया होता
दूकान का सारा कार्य-व्यापार
चलता रहता पूर्व की तरह ही
ग्राहक सामान ख़रीदते रहते
दूकानदार की
बिक्री जारी रहती बदस्तूर
और मैं छलाँग लगाकर बाहर
उसकी पाने एक झलक
निकलता फिर
किन्तु काली माँ की तरह
झलक अपनी एक दिखाकर ही
इस दृश्यमान जगत से जो
पहले ही
ओझल होता
मध्ययुगीन योद्धा कभी
कभी सिपाही
कभी सैनिक
कभी गुण्डा
कभी नेता
और कभी कभी तो रूप भिखारी के धरे
दीख पड़ता वह!
एक दिन साधु के वेश में,
अगले दिन खूंख्वार जल्लाद!
एक दिन तो सचमुच ही कमाल हुआ
प्रकट हुआ जब वह एक सिपाही के रूप में
नजर आया करता हुआ वकालत
शिक्षा का स्तर सुधारने की!
एक दिन मदारी,
एक और दिन जादूगर,
और कभी अफसर भी!
जादू!
ओह, यह सब कुछ
जादू नहीं तो और क्या था?
एक दिन वह ईश्वर की तरह और
घोषणा करते हुए
किअधर्म बढ़ गया है इस कदर
अब उसने ले लिया है अवतार
और धरती
जल्दी ही पापमुक्त होगी!’
कभी वह रिश्वत लेता हुआ नजर आया,
कभी घूस देता हुआ!
आख़िर एक बार
जब कई दिनों तक
उसका हुनर नहीं हुआ सार्वजनिक
तो मैंने उसकी ख़बर ली
ज्ञात हुआ
उसका अन्तिम रूप एक डाकू था
जो इतना सच्चा था
देश और समाज में श्वेत-शफ्फाक
कपड़ों में विचरण करते हुए
अनगिनत डाकुओं के बीच भी
पुलिस ने अपनी क्राइम फाइल को करने दुरुस्त
पहचानने में नहीं उसे भूल की
खिलौना पिस्तौल वाले तथाकथित डाकुओं के बीच
मार गिराया उसे
दिन के उजाले में
एक मुठभेड़ में
और इस दुर्दांतदस्युपर घोषित
लाखों रुपये का इनाम पाने को
अलग-अलग प्रान्तों की पुलिस के विरोधी गुटों में
मची मारकाट!
इस तरह अपनी मुक्ति के साथ ही
तरह-तरह के भेस धर
गुज़र-बसर करते हुए
अप्रतिम उस कलाकार को
आख़िर मिल ही गया
अपनी विलक्षण कला के लिए
जीवन का
सबसे बड़ा
पुरस्कार

उद्भ्रांत  
साहित्य जगत का एक 
बहुत ज़रूरी और बड़ा नाम
2008 के भवानी प्रसाद मिश्र सम्मान 
से नवाजे जा चुके 
पिछले समय पुस्तक 
 अस्ति  से भी चर्चा में रहे हैं.

और भी आगे जानकारी के लिहाज 
से पढ़ी जा सकती है.

संपर्क सूत्र-
बी-463, केन्द्रीय विहार, 
सेक्टर-51, नोएडा-201303, 
मोबाइल: 09818854678

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