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पुन:प्रकाशन:प्रतिरोध के सिनेमा की आहटें / संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, सितंबर 15, 2013 | रविवार, सितंबर 15, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी
 सितम्बर अंक,2013 

पुन:प्रकाशन:प्रतिरोध के सिनेमा की आहटें / संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह 

(पहले उदयपुर फिल्म फेस्टिवल की तैयारियों के .दौरान ही हमें यह आभास हुआ कि इस 'प्रतिरोध के सिनेमा' अभियान को यथायोग्य संबल देते हुए इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। भाई संजय जोशी ने हमारे एक अनुरोध पर सिनेमा यात्रा के यह संस्मरण हमें उपलब्ध कराए।उनका आभार।यही आलेख अंशत: 'अनहद' नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका था,यहाँ पाठक हित में पूरा आलेख प्रकाशित है-सम्पादक)
                  
विश्व सिनेमा के इतिहास में फ्रांसीसी न्यू वेव का अहम योगदान है। इसने न सिर्फ क्लाद  शैबराल, जॉ रेनुआ, अले रेने, फ्रांकुआ त्रुफो और गोदार्द जैसे प्रमुख सिनेकारों को जन्म दिया बल्कि सुदूर भारत में भी नई लहर के सिनेमा को पनपने की जमीन दी। भारत में इसकी बहसें पहले पहल कलकत्ता के कॉफी हाउस में सुनाई दी। चिदानंद दासगुप्ता, सत्यजीत रे, मृणाल सेन कलकत्ता फिल्म सोसाइटी बनाकर इस नए सिनेमा को समझने की शुरुआत कर रहे थे। बंगाल के अलावा केरल में भी फिल्म सोसाइटी आंदोलन ने विश्व सिनेमा को लोकप्रिय बनाने में मदद पहुंचायी। 1960 में पुणे में देश का पहला फिल्म स्कूल खुला जिससे 1966 में प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक भी जुड़े । घटक ने बहुतेरे युवाओं को सिनेमा माध्यम में काबिल बनाया, जिन्होंने फिल्म स्कूल से वापिस लौटकर अपनी भाषा में महत्वपूर्ण फिल्में बनायीं। मणिकौल, कुमार शाहनी, के के महाजन, सईद मिर्जा, अदूर गोपालकृष्णन, जॉन अब्राहम ऐसे कुछ नाम हैं जिन्होंने लीक से हटकर सिनेमा बनाया और मुख्यधारा के सिनेमा के बरक्स एक नई सिने भाषा का विकल्प भी दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।

1964 में पुणे फिल्म स्कूल के साथ-साथ राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के अस्तित्व में आने के कारण सिनेमा में गंभीर अध्ययन के प्रयास शुरू हो सके। कलकत्ते की कॉफी हाउस की बहसों में फिल्म सोसाइटी आंदोलन की नींव भी पड़ी। पुणे में स्थित फिल्म अभिलेखगार होने की वजह से फिल्म सोसाइटी के राष्ट्रीय नेटवर्क (फेडरेशन ऑफ फिल्म सोसायटीज ऑफ इंडिया) ने पूरे देश में विश्व सिनेमा के बारे में समझदारी विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बहुत लंबे समय तक सत्यजीत रे ने फेडरेशन ऑफ फिल्म सोसाइटीज ऑफ इंडिया को नेतृत्व दिया।

पुणे के फिल्म संस्थान के नीतिगत फैसले की वजह से केरल, उड़ीसा, बंगाल, असम आदि दूरस्थ इलाकों से युवा प्रतिभाएं पुणे में शिक्षित होकर अपने-अपने राज्यों में काम करने लौटी। इन युवाओं ने न सिर्फ अपनी भाषा में अपनी कहानी वाली फिल्मों का निर्माण किया बल्कि फिल्म सोसाइटी संचालित कर दर्शकों की अभिरुचि को समृद्ध भी किया। ऐसा सौभाग्य हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश को हासिल नहीं हुआ। हालांकि फिल्म सोसायटी आंदोलन से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और कुछ हद तक जमशेदपुर, पटना, आगरा और दिल्ली अछूते नहीं रह सके थे। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. महेश चन्द्र चट्टोपाध्याय ने लंबे समय तक इलाहाबाद में पढ़ने आने वाले युवाओं को विश्व सिनेमा के आनंद से परिचित करवाया।

यहां गौरतलब है कि फिल्म सोसायटी आंदोलन मुख्यतया फीचर फिल्म की विधा तक ही सीमित था। डॉक्यूमेन्टरी पर लंबे समय तक भारत सरकार की संस्था फिल्मस डिवीजन का ही एकाधिकार था। बहुत बाद में जब वीडियो तकनीक  चलन में आयी और फिल्म बनाना तथा फिल्म के उपकरण हासिल करना बहुत आसान और सस्ता हो चला तब स्वतंत्र डॉक्यूमेन्टरी का निर्माण शुरू हुआ और कुछ नए सत्यों से साक्षात्कार हुआ।

वीडियो तकनीक  के आने से पहले फिल्म निर्माण का सारा काम सेलुलाइड पर होता था। सेलुलाइड यानि सिल्वर ब्रोमाइड की परत वाली प्लास्टिक की  पट्टी को रौशनी से परिचित (एक्सपोज) करवाने पर  छवि का अंकन निगेटिव फिल्म पर होता फिर यह फिल्म लैब में धुलने (रासायनिक प्रक्रिया) के लिए जाती। यह एक समय लेने वाली  और तमाम झंझटों से गुजरने वाली प्रक्रिया थी। आज से पंद्रह साल पहले तक 11 मिनट की शूटिंग के लिए फिल्म रोल और धुलाई का खर्च ही 8 से 10 हजार रुपये था। अब इसमें किराया भाड़ा भी शामिल करें तो खर्चा और बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि यह अनुमान 16 मिलीमीटर के फॉरमैट के लिए लगाया जा रहा है। सेलुलाइड के प्रचलित फॉरमैट 35 मिमी में  यह खर्च दुगुने से थोड़ा ज्यादा पड़ेगा। फिर शूटिंग यूनिट में कैमरापर्सन, कम से कम दो सहायक और साउंड रिकार्डिस्ट की जरूरत पड़ती और सारे सामान के लिए एक मंझोली गाड़ी और ड्राइवर। इसके उलट वीडियो में आज की तारीख में 100 रुपये में आप 40 मिनट की रिकॉर्डिंग कर सकते हैं।

दोनों माध्यमों में एक बड़ा फर्क यह भी था कि जहां सेलुलाइड में आप सिर्फ एक बार छवियों को अंकित कर सकते वहीं वीडियो के मैग्नेटिक टेप में आप अंकित हुई  छवि को कई बार मिटा  कर नई छवि का अंकन कर सकते हैं। वीडियो की यूनिट सिर्फ एक व्यक्ति भी संचालित कर सकता है। 1990 के दशक के मध्य तक न सिर्फ वीडियो कैमरे सस्ते हुए बल्कि कंप्यूटर पर एडिटिंग करना भी आसान और सस्ता हो गया। वीडियो तकनीक  ने बोलती छवियों की विकासयात्रा में एक क्रांतिकारी योगदान प्रदर्शन के लिए सुविधाजनक और किफायती प्रोजक्टर को सुलभ करवाकर किया।

संभवतः इन सारे तकनीकी बदलावों के कारण 1990 के बाद भारतीय डॉक्यूमेंटरी जगत में लंबी छलांग दिखायी देती है। 1990 के पहले आनंद पटवर्धन एक अकेले शख्स थे जो भारतीय दर्शकों के लिए गैर फीचर फिल्मों का निर्माण अपनी शर्तों पर कर रहे थे तो फिर 90 के बाद हर राजनीतिक उथल-पुथल वाले इलाकों में डॉक्यूमेंटेशन का काम होने लगा और कई एक नए पटवर्धन नई विषयवस्तु और प्रस्तुति के साथ दिखायी पड़ने लगे।

इस सांस्कृतिक संदर्भ के परिप्रेक्ष्य में 2005 के सितंबर महीने में  उत्तर भारत के एक प्रमुख सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच (जसम) ने अपनी उत्तर प्रदेश इकाई के कामकाज का विस्तार करने के लिए इलाहाबाद में एक बैठक आयोजित की तो फिल्म माध्यम को अपनाने का भी एक प्रस्ताव सामने आया। उसी बैठक में बंगाल और केरल के सिने सोसाइटी आंदोलनों के अनुभव से सीख लेते हुए वीडियो तकनीक  का इस्तेमाल करते हुए उत्तर प्रदेश में सिनेमा आंदोलन शुरू करने की योजना बनी। जसम ने अपनी नीति के तहत इसे पूर्णतया आम लोगों के सहयोग से विकसित करने का निर्णय लिया। जन सहयोग पर निर्भर रहने का यह मतलब भी था इस प्रयोग को किसी भी प्रकार की सरकारी, गैर सरकारी और कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप से मुक्त रखना था। इन्हीं सब वजहों में इस प्रयोग को प्रतिरोध का सिनेमा कहा गया।

23 मार्च, 2006 को गोरखपुर में चार दिन का प्रतिरोध का सिनेमा का पहला फेस्टिवल करने की योजना बनी। शहर में कोई आडिटोरियम नहीं था इसलिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी कैंपस के संवाद भवन नामक सभागार से काम चलाना था। लम्बे समय से गोरखपुर के रंगकर्मी एक आडिटोरियम के निर्माण के लिए आंदोलनरत हैं। रेलवे के एक आडिटोरियम और उसके परिसर को रेलवे सुरक्षा बल का प्रशिक्षण केन्द्र बना दिया गया था और जिस जगह आडिटोरियम बनना था, वह जमीन विवाद में फंस गई और मामला अदालत में चला गया। आडिटोरियम बनाने के लिए रंगाश्रम नाम की एक नाट्य संस्था यहाँ वर्षों से हर शनिवार को एक नाटक मंचित कर एक अनूठा आंदोलन चला रही है। सिनेमा दिखाने के लिए एक जरूरी शर्त है घने अंधेरे वाली ऐसी जगह जहां आवाज न गूंजती हो ताकि दृश्यों के साथ-साथ सिनेमा के दूसरे महत्वपूर्ण घटक ध्वनि का भी आनंद लिया जा सके। गोरखपुर में 1980 के दशक में प्रो. लाल बहादुर वर्मा की सक्रियता के कारण युवाओं का एक समूह जरूर सक्रिय रहा था जिसने विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बहस-मुहाबिसे और नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला शुरू किया था। गिरीश रस्तोगी ने नाटकों में भी सक्रियाता दिखायी थी लेकिन सिनेमा पर गंभीर बातचीत का सिलसिला कभी भी गोरखपुर में शुरू नहीं हुआ था। अलबत्ता इतिहास के अध्येता चन्द्रभूषण ‘अंकुर’ ने जरूर एक आध बार सिने सोसाइटी बनाकर शुरुआत की कोशिश जरूर की थी। इसलिए गोरखपुर में सिनेमा का फेस्टिवल शुरू करना थोड़ा मुश्किल और अप्रत्याशाओं से भरा था।

गोरखपुर यूनिवर्सिटी के उदास से पड़े संवाद ऑडिटोरियम में 175 कुर्सियां अलबत्ता साबुत  अवस्था में थीं। टेन्ट हाउस से 50 कुर्सियां लगाकर इसे 225 की सम्मानजनक संख्या तक पहुंचाया गया। हॉल में अंधेरा करने के लिए गोरखपुर की नवनिर्मित फिल्म सोसाइटी एक्सप्रेशन के उत्साही साथियों ने सीढियों पर चढ़कर काले कागज चिपकाए फिर बचे हुए रोशनदान से आती धूप की मोटी बीम को एक और उत्साही सदस्य ने किसी जुगाड़ से काले कागज से ढक दिया। संवाद भवन में अंधेरा तो कायम हो गया था लेकिन अभी भी साइड के लोहे वाली जालीदार  गेट को ढंकना था और एक मुख्य प्रवेश द्वार बनाना था जिसपर काले कपड़े का दो तरफा परदा लगना था।

22 मार्च की शाम से शुरू करके रात तक काफी काम को अंजाम दे दिया गया था। संवाद भवन की सारी सीमितताओं के बावजूद एक बात खास थी उससे जुड़े बड़े लान का होना। इस लान का रचनात्मक इस्तेमाल ही हमारे नए सिनेमा दर्शकों को रोकने का काम करने वाला था। बनारस के युवा कलाकारों की प्रतिभाशाली टीम कला कम्यून ने चित्रकार अर्जुन के नेतृत्व में इस स्पेस को इंटरएक्टिव  स्पेस में बदलना शुरू किया। हॉल से तकरीबन 200 फुट दूर के मुख्य गेट पर प्रतिरोध का सिनेमा का बैनर टांगा गया। फिर इस गेट से यूनिवर्सिटी के प्रवेश द्वार तक करीब 500 मीटर की दूरी के बीच दो-तीन और बैनर लगाए। लान के अंदर डंडियों में रंग-बिरंगे झंडे लगाए गए। कला कम्यून ने अपनी अनोखी जुगाड़ शैली के तहत कबाड़ से औने-पौने दामों पर हासिल किए गए साइकिल के टायरों पर रंगीन पन्नियां चिपकाकर उनमें रंगीन कागजों की झालरें लटकायी और उन टायरों को हवा में उछालकर पेड़ों की शाखाओं से लटकाकर एक अद्भुत जनकला का माहौल बनाया।

22 मार्च, 2006 की उस शाम को एक्सप्रेशन के युवा साथियों में खासी उत्तेजना थी।  वे एक नई संस्कृति के गवाह बन रहे थे जो उन्हीं ने आसपास की दुनिया से निर्मित हो रही थी। हाल की बाहरी दीवार पर रंगीन साटन के कपड़ों में दो  आयाताकार फेस्टून टांगे गए। दो लम्बे आयताकार फेस्टूनों के बीच प्रतिरोध के सिनेमा का बैनर टांगा गया जो शहीदे आजम भगत सिंह की जन्म शताब्दी को समर्पित था ।इन दो फेस्टूनों और बैनर के बीच वाले हिस्से में चार दिन के प्रोग्राम का कलात्मक शिड्यूल लगाया गया। हाल की बाहरी दीवार और हाल में प्रवेश गेट के बीच  की जगह में रजिस्ट्रेशन काउंटर और हाल की ओर जाती सीड़ियों पर कला कम्यून द्वारा तैयार किये गए बड़े आकार वाले कविता पोस्टर लगाए गए। हाल की भीतरी दीवारों और परदे के आसपास की जगहों पर पसरी बहुत पुरानी गन्दगी को ढंकने के लिए रंग बिरंगी छोटी पतंगों का इस्तेमाल किया गया । रजिस्ट्रेशन काउंटर के पास एक बेहद रचनात्मक दीवाल बनायी गयी थी। यह दीवाल थी सफ़ेद चार्ट पेपरों से निर्मित तीन फीट गुना पांच फीट का ओपन स्पेस जिसपर युवा दर्शकों ने फेस्टिवल के चार दिनों के दौरान न सिर्फ अपनी तीखी और भावुक टिप्पणियाँ दर्ज की बल्कि किसी युवा ने ैंदहममजं प् स्वअम ल्वन भी दर्ज किया । लॉन के खुले हिस्से हिस्से को बुक और टी स्टाल के लिए छोड़ा गया जहां फेस्टिवल के चारों  दिन चाय और भोजन के अवकाश के दौरान खूब गरमागरम बहसें हुईं और कालजयी फिल्मों से प्राप्त आनंद के बाद सुख में डूबे लोग भी दिखे।

एक्सप्रेशन,  जो कि गोरखपुर फिल्म सोसाइटी का ही पहला नाम है , के संयोजक मनोजं सिंह इससे पहले भी कुछेक आयोजन कर चुके थे लेकिन उनका भी यह पहला बड़ा आयोजन था ।  उनकी और जसम के पुराने साथी अशोक चौधरी की टीम ने अपने सारे संपर्कों से बार-बार इस फेस्टिवल में आने के अनुरोध किया था ।  एक्सप्रेशन की कोर टीम के लगभग सारे सदस्य पत्रकारिता से जुड़े थे इसलिए अखबारों ने भी ठीक  से इस नए उत्सव को जगह दी । इस सबके बावजूद जब 23 मार्च की शाम को  5.30 बजे के उदघाटन सत्र  की समय सीमा के 10 मिनट बीत जाने के बावजूद 40 - 50  लोग ही जमा हुए तो जौनपुर से पधारे जसम के वरिष्ठ साथी अजय कुमार ने कहा कि श्संजय लगता है अभी थोडा और वक्त लगेगा गंभीर सिनेमा के लिए।श् आश्चर्यजनक रूप से अजय भाई की आशंका निर्मूल  साबित हुई और 6  बजते - बजते संवाद भवन की 225  कुर्सियां लगभग भर चुकी  थीं । हमने पहले से ही तय किया था कि सामान्य कार्यक्रमों की तरह हम  परम्परा का निर्वाह करते हुए दीप प्रज्जवलन जैसी औपचारिकता का निर्वाह नहीं करेंगे । उदघाटन  समारोह को ठीक समय पर भी प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया था ताकि समय से आने की भी आदत बने। मुख्य वक्ताओं से उनकी भाषण की समय सीमा के बारे में भी ताकीद किया जा चुका था। रामजी राय के मुख्य वक्तव्य, संजय जोशी द्वारा प्रतिरोध का सिनेमा का परिचय, रामकृष्ण मणि के चुस्त अध्यक्षीय वक्तव्य और आशुतोष कुमार के कुशल संचालन ने गोरखपुर के दर्शकों को एक नई तरह की सांस्कृतिक करवट का अहसास कराया। पहले दिन की योजना में 45 मिनट का उद्घाटन सत्र, एक घंटे का कविता नाटक और वीडियो फुटेज का मिलाजुला फार्म जो बादल सरकार के थर्ड थियेटर की शैली का था और 90 मिनट की मूक दौर की कालजयी फिल्म ‘बैटलशिप पोटमकिन’ का प्रदर्शन होना था। सिर्फ 30 मिनट देरी से शुरू हुए लेकिन एकदम चुस्त और सधे हुए  उद्घाटन सत्र ने दर्शकों को हॉल में बांधे रखा। कोलकाता से पधारे रंगकर्मी परनब की प्रस्तुति ‘निरुपमा दत्त मैं  बहुत उदास हूं’ सराहा गया। इस नाटक में परनब के साथ सिर्फ एक और कलाकार था और इस एक घंटे की प्रस्तुति में कुमार विकल, पाश और गोरख पाण्डेय की कविताओं के अलावा मणिपुर में एएफएसपीए के खिलाफ चल रहे आंदोलन का वीडियो फुटेज था। इस प्रस्तुति के दौरान जब अभिनेता का मंच से आगे बढ़कर थर्ड थियेटर की शैली में दर्शकों के एकदम नजदीक आकर उनसे सीधा संवाद करने लगे तो यह  गोरखपुर के दर्शकों के लिए यह एक नया अनुभव था। प्रस्तुति में मणिपुरी जनता के संघर्ष के दिल दहलाने वाले वीडियो फुटेज ने भी खासी उत्तेजना का संचार किया।

पहले दिन की आखिरी प्रस्तुति ‘बैटलशिप पोटमकिन’ के खत्म  होने के बाद बड़ी संख्या में दर्शकों के हॉल से बाहर निकलते देखकर फिल्म सोसायटी की युवा टीम उत्साह से लबरेज थी। गोरखपुर की फेस्टिवल टीम के लिए यह न सिर्फ पहला फेस्टिवल था बल्कि औपचारिक फिल्म स्क्रीनिंग का भी पहला मौका था। टीम में फेस्टिवल के संयोजक के बतौर सिर्फ मुझे ही अंतर्राष्ट्रीय  और राष्ट्रीय फिल्म समारोहों को देखने का अनुभव था। हालांकि बतौर संयोजक मेरा भी यह पहला आयोजन था। हम सबने मिलकर आयोजन को सफल बनाने के लिए अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को समझा और निभाया भी। चाहे वो प्रोजेक्टर के कुशल संचालन का मामला हो, आधे अधूरे सिनेमा हाल संवाद भवन में पूरी मुस्तैदी के साथ टॉर्च लिये गेटमैन की जिम्मेदारी निभाने की गंभीरता, रजिस्ट्रेशन डेस्क पर बेहतर तत्परता से लोगों को सूचनाएं देना और उन्हें हॉल में जाने के लिए प्रेरित करना या अगले दिन अखबार में समुचित जगह पाने के लिए प्रेस रिपोर्ट को अखबार के आफिसों  तक पहुंचाने की गंभीरता। अगले दिन के कार्यक्रमों की घोषणा और आभार के साथ 23 मार्च, 2006 का दिन प्रतिरोध के सिनेमा आंदोलन की शुरुआत के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया।

पहला गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 से 26 मार्च चार दिन तक चला। दूसरे दिन से फिल्मों की स्क्रीनिंग सुबह 11 बजे से लेकर रात 10 बजे तक थी। बाहर से कोलकाता के कैम्पस थियेटर के  परनब के अलाव रांची से मेघनाथ और कोलकाता से ही जितेन नंदी और शमिक भी बतौर अतिथि पधारे थे। ये मार्च के महीने की आखिरी तारीखें थीं । हॉल में एसी तो छोडिए पंखे भी तेज गति में नहीं चल पा रहे थे। तरीके से सिनेमा दिखाने की हमारी जिद के कारण शाम होते-होते खासी गरमी और उमस हॉल के अंदर हो जाती। देखने में आया कि इस पहले फेस्टिवल में सौ से डेढ़ सौ लोगों का एक समूह है जो लगातार हॉल के अंदर जमा है। सभी फिल्मों का परिचय दिया गया और आनंद पटवर्द्धन की फिल्म ‘युद्ध और शांति’ के बाद तो बकायदा चार लोगों के पैनल ने आनंद की अनुपस्थिति में लगभग पौने घंटे परिचर्चा भी जिलाए रखी। इसी पैनल के एक वरिष्ठ कवि से एक युवा दर्शक ने असहमति जताते हुए राष्ट्र की अवधारणा पर तीखे सवाल खड़े किए।

कोलकाता से पधारे पत्रकार बंधु जितेन बंदी और शामिक की मणिपुर में एएफएसपीए के खिलाफ चल रहे आंदोलनों वाली फिल्म के बाद बातचीत बहुत जोरदार हो गयी। किसी पुरुष दर्शक ने फिल्म में मणिपुरी औरतों द्वारा नग्न प्रदर्शन के खिलाफ नैतिकता का प्रश्न खड़ा किया। ऐसा करने पर हॉल के दूसरे कोने से महिलाओं ने गहरा प्रतिवाद किया और फिर नग्नता और नैतिकता के प्रश्न पर ही बहस छिड़ गयी। समारोह में लोगों को रोकने के लिए हॉल के बाहर मैदान में लगी लखनऊ के लेनिन पुस्तक केंद्र की प्रदर्शनी ने अहम भूमिका निभायी। इसके अलावा कला कम्यून के आकर्षक पोस्टर और रजिस्ट्रेशन डेस्क के पास बनायी सफेद चार्ट पेपर की वॉल ने भी लोगों को बांधे रखा।

गोरखपुर में संभवतः अरसे बाद ऐसा हो रहा था कि किसी सार्वजनिक आयोजन में लोगों को भागीदारी करने के इतने अवसर मिल रहे थे। यूनिवर्सिटी कैंपस में आयोजन करने का फायदा ये मिला कि हॉल में लगातार दर्शक बने रहे। युवाओं ने लाइन लगाकर अपनी ईमानदारी टिप्पिणयां करीं। शायद भागीदारी और तामझाम का न होना ही सबसे प्रमुख वजह थी जिसके कारण हड़बड़ी में तैयार किया गया हमारा फेस्टिवल गोरखपुर के लोगों के बीच जगह बना सका। इस सबके ऊपर एक और बात थी और वह थी इसे प्रतिरोध का सिनेमा कहना। असल में यह प्रतिरोध का सिनेमा ने होकर प्रतिरोध का उत्सव था।

असुंदर के खिलाफ सुंदर का प्रतिरोध, कॉरपोरेट, एनजीओ, सरकारी स्पॉन्सरशिप के खिलाफ आम जन की भागीदारी का प्रतिरोध, औपचारिकता व तामझाम के खिलाफ सादगी और अनौपचारिकता का प्रतिरोध। हमारे इस प्रयोग पर सबकी निगाहें गड़ी थीं। हर कोई इस तैयार माल को हड़पना चाहता था। समारोह शुरू होने के ठीक पहले दैनिक जागरण, ऑक्सफैम और रिलायन्स तीनों ने अपने-अपने नामों के आगे पीछे प्रतिरोध का सिनेमा जोड़ने का आकर्षक प्रस्ताव दिया। शायद हमें लोगों के सहयोग और प्रतिरोध पर ज्यादा भरोसा पर इसलिए संवाद भवन में 23 मार्च के दिन सिर्फ प्रतिरोध का सिनेमा का ही बैनर फहरा रहा था। इस चार दिन के फेस्टिवल ने यह साबित किया कि छोटे-छोटे सहयोग से भी बड़े आयोजन हो सकते हैं। पहले गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में आयोजन टीम को कुल 15000 का नुकसान हुआ जो आने वाले वर्षों में फायदे में बदल गया। कम खर्च में लोगों के सहयोग के बूते आयोजन करने का यह प्रयोग जल्द ही दूसरे शहरों में अपनाया जाने लगा। 2007 में गोरखपुर के अलावा इलाहाबाद और भिलाई में भी इसकी शुरुआत हुई। 2008 में बरेली और लखनऊ इससे जुड़े। फिर 2009 में नैनीताल व पटना और 2011 में इंदौर और बलिया, 2012 में आजमगढ़ और बनारस और 2013 में उदयपुर और कोलकाता।

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान अब धीरे-धीरे समूचे उत्तर भारत में अपनी जगह बना रहा है। 24 मार्च 2011 को हुये छठे  गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में एक राष्ट्रीय  नेटवर्क का गठन किया गया। 2014 के अंत  तक  कम से कम 25 शहरों में ऐसे आयोजन नियमित हो जायेंगे। अब प्रतिरोध का सिनेमा के अभियान से पंजाब, राजस्थान और प. बंगाल जैसे राज्य भी जुड़ गए हैं। इसके राष्ट्रीय  नेटवर्क को स्वतंत्र फिल्मकारों, नाट्यकर्मियों, चित्रकारों, लेखकों, कवियों, छात्रों आदि के बड़े समूह का समर्थन हासिल है।

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान नियमित फिल्म स्क्रीनिंग से आगे बढ़कर प्रकाशन, फिल्म वितरण, अनुवाद और निर्माण के क्षेत्र में प्रयोग कर रहा है। सिनेमा के परदे का इस्तेमाल अब हर नुक्कड़, गांव, कस्बे और चौराहे में नियमित तौर पर सुरुचि के साथ संपन्न किया जा रहा है। प्रतिरोध का सिनेमा अभियान इसी गति से आगे बढ़ता रहा और अगर यह स्वतंत्र रहने की अपनी कसमों को निभाता रहा तो आने वाले दिनों में निश्चय ही हिंदी पट्टी में अपनी जमीन का सिनेमा भी बनना संभव होगा जिसके दर्शक ही निर्माता, वितरक होंगे और आलोचक भी।

लेखकद्वय

संजय जोशी 

देशभर में वैकल्पिक सिनेमा की अलख जताते हुए कस्बाई इलाकों में सिनेमा के सही मायने बताये  हैं संजय भाई ने। प्रतिरोध का सिनेमा के संस्थापक के तौर पर एक बड़ी पहचान है। अपने स्तर पर संजय जोशी ने कई डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन किया है। जसम के सक्रीय कार्यकर्ता हैसंपर्क:09811577426,ई-मेल  thegroup.jsm@gmail.com

और



मनोज कुमार सिंह 
दो दशक से पत्रकारिता में, गोरखपुर में  हिंदुस्तान दैनिक में सीनियर कॉपी एडिटर हैं और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव, प्रदेश सचिव उत्तर प्रदेश समन्वयक, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े हुए हैंसमकालीन  जनमत  के सम्पादक मंडल से भी सम्बद्ध हैं। संपर्क -9415282206 ई-मेल: manoj.singh2171@gmail.com
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